जहाँ काव्य-पंक्तियों में किसी एक या एकाधिक व्यंजन वर्णों की क्रमानुसार आवृत्ति (Repetition) होती है, जिससे काव्य में नाद-सौंदर्य (Phonetic beauty) उत्पन्न हो, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।
- दीनबंधु दुखियों के दुख दूर करो। — ('द' वर्ण 2-2 बार लगातार — 'दीनबंधु दुखियों' और 'दुख दूर'। इसलिए यह वृत्त्यनुप्रास से हटकर यहाँ आया है)
- चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रही हैं जल-थल में। — ('च' वर्ण 2 बार लगातार — 'चारु चंद्र'। इसलिए इसे भी यहाँ रखा गया है)
- संसार की समरस्थली में धीरता धारण करो। — ('स' और 'ध' वर्ण 2-2 बार लगातार — 'संसार समरस्थली' और 'धीरता धारण')
- बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय। — ('ल' वर्ण 2 बार लगातार — 'लालच लाल')
- कानन कठिन भयंकर भारी, घोर घाम हिम बारि बयारी। — ('क', 'भ', 'घ', 'ब' वर्णों के जोड़े 2-2 बार लगातार)
- अमिअ मूरिमय चूरन चारू, समन सकल भव रुज परिवारू। — ('च' और 'स' वर्ण 2-2 बार लगातार — 'चूरन चारू' और 'समन सकल')
- बंदौ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि। — ('क' वर्ण 2 बार लगातार — 'कंज कृपा')
- रघुपति राघव राजा राम, पतित पावन सीता राम। — ('र' वर्ण लगातार 4 बार आवृत्ति)
- मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो। — ('म' वर्ण लगातार 3 बार — 'मैया मोरी मैं')
- तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए। — ('त' वर्ण लगातार 5 बार)
- मुदित महीपति मंदिर आए, सेवक सचिव समंत बुलाए। — ('म' और 'स' वर्ण लगातार 3-3 बार)
- कालिंदी कूल कदंब की डारन। — ('क' वर्ण लगातार 3 बार)
- बंदउँ गुरु पद पदुम परागा, सुरुचि सुबास सरस अनुरागा। — ('प' और 'स' वर्ण लगातार 3-3 बार)
- सठ सुधरहिं सतसंगति पाई, पारस परस कुधात सहाई। — ('स' वर्ण लगातार 3 बार — 'सठ सुधरहिं सतसंगति')
- कल कानन कुंडल मोरपखा, उर पे बनमाल बिराजति है। — ('क' वर्ण लगातार 3 बार)
- विमल वाणी ने वीणा ली, कमल कोमल कर में सप्रीत। — ('क' वर्ण लगातार 3 बार — 'कमल कोमल कर')
- भव्य भावों में भयानक भावना भरना नहीं। — ('भ' वर्ण लगातार 5 बार)
- कूलन में केलि में कछारन में कुंजन में, क्यारिन में कलिन कलीन किलकंत है। — ('क' वर्ण बहुतायत में लगातार)
- रीझि रीझि रहसि रहसि हँसि हँसि उठै। — ('र' वर्ण लगातार 4 बार — 'रीझि रीझि रहसि रहसि')
लाटानुप्रास में शब्द और वाक्य-खंड हू-ब-हू दोहराए जाते हैं परंतु उनका तात्पर्य (Purport / अभिप्राय) भिन्न हो जाता है। यह केवल वर्ण-आवृत्ति नहीं, बल्कि सम्पूर्ण पद या वाक्यांश की पुनरावृत्ति है जिसमें संदर्भ बदलने से अर्थ का नया आयाम खुलता है।
पूत कपूत तो क्यों धन संचय।"
| पंक्ति | दोहराया गया खंड | तात्पर्य |
|---|---|---|
| प्रथम पंक्ति | "तो क्यों धन संचय" | पुत्र सुयोग्य है तो धन उसके लिए आवश्यक नहीं — वह स्वयं अर्जन करेगा |
| द्वितीय पंक्ति | "तो क्यों धन संचय" (वही शब्द) | पुत्र कुयोग्य है तो धन संचय व्यर्थ है — वह उसे नष्ट कर देगा |
तेगबहादुर, हाँ, वे ही थे गुरु-पदवी थी जिनके अर्थ।"
| पंक्ति | दोहराया गया खंड | तात्पर्य |
|---|---|---|
| प्रथम पंक्ति | "तेगबहादुर, हाँ, वे ही थे" + "गुरु-पदवी" | वे गुरु-पदवी पाने में पूर्णतः समर्थ/योग्य थे — पद को धारण करने की क्षमता पर बल |
| द्वितीय पंक्ति | "तेगबहादुर, हाँ, वे ही थे" + "गुरु-पदवी" (वही शब्द) | गुरु-पदवी का सच्चा अर्थ/प्रयोजन ही वे थे — पद उन्हीं के कारण सार्थक हुआ |
यह लाटानुप्रास कैसे है: दोनों पंक्तियों में "तेगबहादुर, हाँ, वे ही थे" और "गुरु-पदवी" शब्द-समूह शब्दशः ज्यों के त्यों दोहराए गए हैं, परंतु पहली पंक्ति में बल "समर्थता/योग्यता" पर है जबकि दूसरी में बल "पदवी की सार्थकता/अर्थवत्ता" पर — अर्थात् शब्द एक हैं, तात्पर्य भिन्न है। यही लाटानुप्रास की कसौटी है।
- बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी। — ('नी थी' की तुकबंदी)
- छोरटी है गोरटी या चोरटी अहीर की। — ('रटी' शब्द की तुकबंदी)
- जय हनुमान ज्ञान गुन सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर। — ('गर' शब्द की तुकबंदी)
जहाँ काव्य में एक ही शब्द की दो या दो से अधिक बार आवृत्ति हो, परंतु प्रत्येक बार उसका अर्थ सर्वथा भिन्न हो, वहाँ यमक अलंकार होता है।
वा खाए बौराय जग, या पाए बौराय।
| शब्द | प्रथम अर्थ | द्वितीय अर्थ |
|---|---|---|
| कनक | स्वर्ण / Gold — जिसे पाने से मद चढ़ता है | धतूरा / Datura — जिसे खाने से मद चढ़ता है |
| शब्द | प्रथम अर्थ | द्वितीय अर्थ |
|---|---|---|
| घटा | वर्षा ऋतु के काले बादल | कम होना / क्षीण होना |
| शब्द | प्रथम अर्थ | द्वितीय अर्थ |
|---|---|---|
| बेर | बार / आवृत्ति — तीन बार | एक प्रकार का फल (Berries) |
| शब्द | प्रथम अर्थ | द्वितीय अर्थ |
|---|---|---|
| तारे | उद्धार करना / भवसागर से पार लगाना | आकाश के नक्षत्र (Stars) |
कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर॥
| शब्द | प्रथम अर्थ | द्वितीय अर्थ |
|---|---|---|
| मनका | माला का दाना (Bead) | हृदय का / मन के विचारों का |
| शब्द | प्रथम अर्थ | द्वितीय अर्थ |
|---|---|---|
| बेनी | रीतिकालीन कवि 'बेनीप्रसाद' | बालों की चोटी (Braid) |
तू मोहन के उरबसी, ह्वै उरबसी समान॥
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| उरबसी (तीन अर्थ) | प्रथम: स्वर्ग की अप्सरा 'उर्वशी' द्वितीय: उर (हृदय) + बसी (निवास करना) तृतीय: गले में पहना जाने वाला एक विशिष्ट आभूषण |
| शब्द | प्रथम अर्थ | द्वितीय अर्थ |
|---|---|---|
| सूर | कवि 'सूरदास' जी | सूर्य (Sun) |
सारंग झीनो पाइके, सारंग कर गई चोट॥
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| सारंग (5 प्रयोग) | 1. दीपक 2. सुंदरी / स्त्री 3. आँचल / पल्लू 4. हवा 5. दीपक |
अर्थ: एक सुंदरी एक जलते हुए दीपक को अपने आँचल की ओट (सहारा) में लेकर जा रही थी। लेकिन आँचल का कपड़ा झीना (पतला) पाकर हवा ने उस पर चोट की और दीपक को बुझा दिया।
'श्लिष्ट' का अर्थ होता है— 'चिपका हुआ'। जहाँ काव्य में कोई शब्द केवल एक ही बार प्रयुक्त हो, परंतु प्रसंग-भेद के कारण उसके अनेक अर्थ निकलते हों, वहाँ श्लेष अलंकार होता है।
पानी गए न ऊबरैं, मोती मानुष चून।
| पानी — किसके लिए | अर्थ |
|---|---|
| मोती के लिए | चमक / कांति |
| मनुष्य के लिए | आत्मसम्मान / इज्जत |
| चून के लिए | जल |
| सुबरन — किसके लिए | अर्थ |
|---|---|
| कवि के लिए | सुंदर अक्षर / अच्छे शब्द |
| व्यभिचारी के लिए | सुंदर रूप / यौवन |
| चोर के लिए | स्वर्ण / सोना |
| शब्द | प्रथम अर्थ | द्वितीय अर्थ |
|---|---|---|
| पट | वस्त्र — भिक्षुक को वस्त्र दान करना | किवाड़ / दरवाज़ा — भिक्षुक को देखकर दरवाज़ा बंद कर लेना |
बारे उजियारो करै, बढ़े अँधेरो होय॥
| शब्द | दीपक के लिए | कुपुत्र के लिए |
|---|---|---|
| बारे | प्रज्वलित करने पर | बचपन में |
| बढ़े | बुझ जाने पर | युवा / बड़ा होने पर |
| शब्द | प्रथम अर्थ | द्वितीय अर्थ |
|---|---|---|
| सिलीमुख | बाण / तीर — जो श्रीराम संधान कर रहे हैं | भ्रमर / भौंरा — जो कमल-रूपी रावण के सिरों पर मंडरा रहे हैं |
| शब्द | प्रथम अर्थ | द्वितीय अर्थ |
|---|---|---|
| घनश्याम | काले बादल — जो वर्षा द्वारा प्रकृति को नवजीवन देते हैं | भगवान श्रीकृष्ण — जो भक्तों का उद्धार करते हैं |
| शब्द | प्रथम अर्थ | द्वितीय अर्थ |
|---|---|---|
| तिरगुन | सत्व, रज, और तम (दर्शनशास्त्र के तीन गुण) | तीन धागों वाली रस्सी |
प्रियतम बतला दो लाल मेरा कहाँ है?
| शब्द | प्रथम अर्थ | द्वितीय अर्थ |
|---|---|---|
| लाल | एक बहुमूल्य रत्न (Ruby) | बेटा / पुत्र |
को घटि ये वृषभानुजा, वे हलधर के बीर॥
| शब्द | प्रथम अर्थ (राधा-कृष्ण) | द्वितीय अर्थ (गाय-बैल) |
|---|---|---|
| वृषभानुजा | वृषभानु + जा (पुत्री) = राधा जी | वृषभ (बैल) + अनुजा (छोटी बहन) = गाय |
| हलधर के बीर | हलधर (बलराम जी) के भाई = श्री कृष्ण | हलधर (हल खींचने वाला बैल) के भाई = बैल |
पहला अर्थ (राधा-कृष्ण के संदर्भ में): कवि बिहारीलाल जी कहते हैं कि राधा और कृष्ण की यह जोड़ी चिरंजीवी हो (युगों-युगों तक बनी रहे)। इन दोनों के बीच गहरा प्रेम क्यों न हो! इनमें से कोई भी किसी से कम नहीं है। यदि ये (राधा जी) राजा 'वृषभानु' की पुत्री हैं, तो वे (श्री कृष्ण) भी 'हलधर' (बलराम जी) के भाई हैं।
दूसरा अर्थ (गाय-बैल के संदर्भ में): कवि कहते हैं कि इस जोड़ी की आयु लंबी हो, इनमें गहरा लगाव क्यों न हो! इनमें कोई किसी से कम नहीं है, अगर एक वृषभ (बैल) की अनुजा (गाय) है, तो दूसरा भी हल को धारण करने वाले का भाई (अर्थात् बैल) ही है।
जहाँ वक्ता के कथन का श्रोता द्वारा कंठ-ध्वनि (आवाज़ के लहजे) या श्लेष (शब्द के अनेक अर्थ) के कारण कोई भिन्न या व्यंग्यात्मक अर्थ निकाल लिया जाए, वहाँ वक्रोक्ति अलंकार होता है।
व्याख्या: शाब्दिक अर्थ: "हे स्वामी! मैं सुकुमारी हूँ, अतः मेरे लिए सुख भोगना उचित है और आप वन के कठोर तप के योग्य हैं।"
काकु (लहज़े) से व्यंग्यार्थ: सीता जी के बोलने के लहज़े से यहाँ एक विपरीत अर्थ उत्पन्न होता है— "क्या मैं (आपकी अर्धांगिनी होकर) केवल महल के सुख भोगने के योग्य हूँ और आप वन में कठोर तप करने के योग्य हैं?" इस प्रश्नवाचक लहज़े का स्पष्ट अर्थ यही है कि वे किसी भी स्थिति में श्री राम के बिना सुख नहीं भोगेंगी और उनके साथ वन की सभी कठिनाइयाँ सहेंगी।
व्याख्या: शाब्दिक अर्थ: "कोई भी राजा बने, मुझे क्या हानि? क्या मैं दासी का पद छोड़कर रानी बन जाऊँगी?"
काकु (लहज़े) से व्यंग्यार्थ: मंथरा का लहज़ा यहाँ 'उदासीनता का ढोंग' है। वह अपनी स्थिति नहीं, बल्कि कैकेयी के 'सत्ता खोने' के डर को उजागर कर रही है। वह व्यंग्य करती है— "मैं तो दासी हूँ और रहूँगी, पर क्या आप रानी बनी रहेंगी?"
चितचोर कहावत हैं हम तो तहाँ जाओ जहाँ धन है सरसो॥
व्याख्या: कृष्ण 'घनश्याम' और 'चितचोर' कहकर परिचय देते हैं। राधा जानबूझकर 'घनश्याम' = काले बादल और 'चितचोर' = धन चुराने वाला चोर अर्थ निकालती हैं — 'बादल हो तो कहीं और बरसो, चोर हो तो वहाँ जाओ जहाँ भारी संपत्ति हो।'
कृष्ण नाम है मेरा गोरी, तो क्या काले का काम यहाँ?
व्याख्या: कृष्ण 'हरि' हूँ कहते हैं। राधा 'हरि' का दूसरा अर्थ 'वानर' (बंदर) निकालकर कहती हैं — बंदर का घर के अंदर क्या काम? फिर 'कृष्ण' = काला — राधा: 'तो काले का यहाँ क्या काम?'
पशुपाल कहाँ सजनी! जमुना तट धेनु चरावत री॥
व्याख्या: लक्ष्मी जी पार्वती से पूछती हैं — तुम्हारा 'भिक्षुक' (शिव) कहाँ है? पार्वती 'भिक्षुक' = वामन अवतार (विष्णु) अर्थ लेकर कहती हैं — वो राजा बलि के द्वार दान माँगने गए। 'पशुपाल' = कृष्ण — यमुना किनारे गाय चरा रहे हैं।
अर्थालंकार (Arthalankar)
जहाँ काव्य में शब्दों के 'अर्थ' के कारण चमत्कार, आकर्षण या सौंदर्य उत्पन्न होता है, वहाँ अर्थालंकार होता है। विशेषता: यदि शब्दों के स्थान पर पर्यायवाची शब्द भी रख दिए जाएँ, तो भी अलंकार का सौंदर्य नष्ट नहीं होता।
'उपमा' शब्द दो शब्दों से बना है — 'उप' (समीप) + 'मा' (मापना/तौलना)। जहाँ किसी प्रस्तुत वस्तु (उपमेय) की तुलना किसी अप्रस्तुत, अत्यंत प्रसिद्ध वस्तु (उपमान) से उनके रूप, रंग, गुण या स्वभाव की समानता के आधार पर की जाती है, वहाँ उपमा अलंकार होता है।
| उपमेय | उपमान | वाचक | साधारण धर्म |
|---|---|---|---|
| मन | पीपर पात (पीपल का पत्ता) | सरिस | डोला (काँपना) |
| उपमेय | उपमान | वाचक | साधारण धर्म |
|---|---|---|---|
| मुख | मयंक (चंद्रमा) | सम | मंजु मनोहर (सुंदरता) |
| उपमेय | उपमान | वाचक | साधारण धर्म |
|---|---|---|---|
| हरिपद (ईश्वर के चरण) | कमल | से | कोमल |
| उपमेय | उपमान | वाचक | साधारण धर्म |
|---|---|---|---|
| श्याम शरीर की कांति | सजल नीरद (बादल) | सी | कल / सुंदरता |
| उपमेय | उपमान | वाचक | साधारण धर्म |
|---|---|---|---|
| टीला | हाथी | सा | विशालता (लुप्त) |
| उपमेय | उपमान | वाचक | साधारण धर्म |
|---|---|---|---|
| वह (स्त्री) | पूजा, दीपशिखा | सी | शांत |
| उपमेय | उपमान | वाचक | साधारण धर्म |
|---|---|---|---|
| देह (शिवजी का शरीर) | कुंद (फूल), इंदु (चंद्रमा) | सम | श्वेत/सुंदरता (लुप्त) |
| उपमेय | उपमान | वाचक | साधारण धर्म |
|---|---|---|---|
| हृदय | नील गगन | सा | शांत |
| उपमेय | उपमान | वाचक | साधारण धर्म |
|---|---|---|---|
| बचनु (वचन) | कोटि कुलिश (करोड़ों वज्र) | सम | कठोरता (लुप्त) |
| उपमेय | उपमान | वाचक | साधारण धर्म |
|---|---|---|---|
| बच्ची | फूल | सी | कोमल |
| उपमेय | उपमान | वाचक | साधारण धर्म |
|---|---|---|---|
| शिशु-वृंद (बच्चे) | अरविंद (कमल) | से | सो रहे (शांत और सुंदर) |
| उपमेय | उपमान | वाचक | साधारण धर्म |
|---|---|---|---|
| हवा | फिरकी (खिलौना) | सी | आई, चली गई (घूमते हुए) |
जहाँ उपमेय (प्रस्तुत) और उपमान (अप्रस्तुत) के बीच के सारे अंतर को समाप्त करके उन्हें एक ही मान लिया जाए, वहाँ रूपक अलंकार होता है। इसमें उपमेय पर उपमान का 'अभेद आरोप' किया जाता है — अर्थात एक वस्तु को दूसरी वस्तु का रूप ही दे दिया जाता है।
① उपमेय-उपमान के बीच योजक चिह्न (-) होता है — जैसे: चरण-कमल, भव-निसा, ज्ञान-आँधी
② वाचक शब्द (सा, सी, सम, सरिस, जैसे) बिल्कुल नहीं होते।
③ अर्थ करने पर बीच में 'रूपी' शब्द निकलता है — जैसे: चरण रूपी कमल।
| बिंदु | उपमा | रूपक |
|---|---|---|
| वाचक शब्द | सा, सी, से, सम, सरिस होते हैं | बिल्कुल नहीं होते |
| अंतर | उपमेय-उपमान अलग रहते हैं | दोनों को एक मान लिया जाता है |
| पहचान शब्द | जैसे, सम, सरिस | रूपी (अर्थ में छिपा होता है) |
| उदाहरण | मुख चंद्रमा 'सा' सुंदर | शशि-मुख (मुख = ही चंद्रमा) |
| उपमेय | उपमान | भावार्थ (रूपी) |
|---|---|---|
| चरन (चरण) | कमल | श्री हरि के 'कमल रूपी चरणों' की वंदना करता हूँ। |
| उपमेय | उपमान | भावार्थ (रूपी) |
|---|---|---|
| चंद्रमा | खिलौना | बाल-कृष्ण कहते हैं — हे माता! मैं 'चंद्रमा रूपी खिलौना' ही लूँगा। |
| उपमेय | उपमान | भावार्थ (रूपी) |
|---|---|---|
| अंबर, तारा, ऊषा | पनघट, घट, नागरी | ऊषा रूपी स्त्री, आकाश रूपी पनघट में, तारा रूपी घड़ों को डुबो रही है (तारे छिप रहे हैं)। |
| उपमेय | उपमान | भावार्थ (रूपी) |
|---|---|---|
| राम नाम | रतन धन | मीराबाई — मैंने 'राम के नाम रूपी' अनमोल रत्न-धन प्राप्त कर लिया। |
| उपमेय | उपमान | भावार्थ (रूपी) |
|---|---|---|
| उदयगिरि (पर्वत), रघुबर (राम) | मंच, बाल पतंग (सूर्य) | उदयाचल रूपी मंच पर राम रूपी बाल-सूर्य उदित हुए। |
| उपमेय | उपमान | भावार्थ (रूपी) |
|---|---|---|
| मुख (चेहरा) | शशि (चंद्रमा) | उस नायिका ने 'चंद्रमा रूपी मुख' पर घूँघट डाला हुआ है। |
| उपमेय | उपमान | भावार्थ (रूपी) |
|---|---|---|
| विषय, मन | वारि (जल), मीन (मछली) | 'मन रूपी मछली' विषय-वासना रूपी 'जल' से एक पल भी अलग नहीं होती। |
| उपमेय | उपमान | भावार्थ (रूपी) |
|---|---|---|
| मन, मनसा (इच्छा) | सागर, लहरि | 'मन रूपी सागर' और इच्छाएँ उसकी 'लहरें' — इसमें अनेक लोग डूब गए। |
| उपमेय | उपमान | भावार्थ (रूपी) |
|---|---|---|
| भव (संसार की मोह-माया) | निसा (रात) | राम की कृपा से 'भव (संसार) रूपी निसा (रात)' समाप्त हो गई — अज्ञान का अंधकार मिटा। |
| उपमेय | उपमान | भावार्थ (रूपी) |
|---|---|---|
| ग्यान (ज्ञान) | आँधी | कबीर — मेरे जीवन में 'ज्ञान रूपी आँधी' आ गई, जिसने सारे भ्रम उड़ा दिए। |
| उपमेय | उपमान | भावार्थ (रूपी) |
|---|---|---|
| मुख (चेहरा) | कमल | 'कमल रूपी मुख' के पास कान ऐसे सजे थे जैसे कमल के पत्ते। |
| उपमेय | उपमान | भावार्थ (रूपी) |
|---|---|---|
| चरन (चरण) | कँवल (कमल) | मीराबाई — हे मन! अविनाशी के 'कमल रूपी चरणों' का भजन कर। |
| उपमेय | उपमान | भावार्थ (रूपी) |
|---|---|---|
| प्रेम, द्वेष | सलिल (जल), अनल (आग) | 'प्रेम रूपी जल' से 'द्वेष रूपी आग' बुझ जाती है। |
| उपमेय | उपमान | भावार्थ (रूपी) |
|---|---|---|
| जीवन | तरु (वृक्ष) | दुख इस 'जीवन रूपी वृक्ष' पर खिलने वाले फूल हैं — दुख आना स्वाभाविक है। |
जहाँ उपमेय (प्रस्तुत) में उपमान (अप्रस्तुत) की 'संभावना' या 'कल्पना' की जाए — वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। जब एक वस्तु को दूसरी वस्तु मान लिया जाए या वैसा होने की कल्पना की जाए, तो वह उत्प्रेक्षा है।
इनमें से कोई भी दिखे → तुरंत उत्प्रेक्षा:
⚡ उपमा से अंतर: उपमा में सा/सी/से/सम → तुलना होती है। उत्प्रेक्षा में मनो/जनु → कल्पना/संभावना होती है।
मनो नीलमनि सैल पर, आतप परयो प्रभात॥
| उपमेय | उपमान | वाचक | भावार्थ / कल्पना |
|---|---|---|---|
| स्याम गात (श्याम शरीर) | नीलमणि पर्वत | मनो | कृष्ण के सांवले तन पर पीले वस्त्र — मानो नीलमणि पर्वत पर सुबह की पीली धूप पड़ रही हो। |
मानो हवा के ज़ोर से, सोता हुआ सागर जगा॥
| उपमेय | उपमान | वाचक | भावार्थ / कल्पना |
|---|---|---|---|
| काँपता शरीर | जागता सागर | मानो | क्रोध से शरीर काँपा — मानो तेज हवा से सोया हुआ सागर जाग गया हो। |
| उपमेय | उपमान | वाचक | भावार्थ / कल्पना |
|---|---|---|---|
| फटा सिर | लाल घड़ा | मानो | फटे सिर से बहता खून — मानो लाल रंग का घड़ा फूट गया हो। |
हिम के कणों से पूर्ण मानो, हो गए पंकज नए॥
| उपमेय | उपमान | वाचक | भावार्थ / कल्पना |
|---|---|---|---|
| आँसुओं भरी आँखें | ओस युक्त नए कमल | मानो | उत्तरा की आँखों में आँसू भर गए — मानो नए कमल पर ओस की बूँदें जम गई हों। |
मानहुँ सुरसरिता बिमल, जल उछरत जुग मीन॥
| उपमेय | उपमान | वाचक | भावार्थ / कल्पना |
|---|---|---|---|
| चंचल आँखें (घूँघट में) | गंगा में उछलती दो मछलियाँ | मानहुँ | झीने घूँघट में चमकती आँखें — मानो गंगाजल में दो मछलियाँ उछल रही हों। |
निकसे जनु जुग बिमल बिधु, जलद पटल बिलगाइ॥
| उपमेय | उपमान | वाचक | भावार्थ / कल्पना |
|---|---|---|---|
| दोनों भाई (राम-लक्ष्मण) | दो चंद्रमा | जनु | लताओं से राम-लक्ष्मण निकले — मानो बादलों को हटाकर दो चंद्रमा प्रकट हो गए हों। |
ज्यों भिक्षुक लेकर स्वर्ण झनक।
| उपमेय | उपमान | वाचक | भावार्थ / कल्पना |
|---|---|---|---|
| धतूरा (कनक) | सोना (स्वर्ण) | ज्यों | कनक (धतूरे) को ले जाना — मानो भिखारी सोना पाकर उसे झंकार सहित ले जा रहा हो। |
मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के॥
| उपमेय | उपमान | वाचक | भावार्थ / कल्पना |
|---|---|---|---|
| सजे हुए मेघ (बादल) | सज-धज कर आया पाहुन (दामाद) | ज्यों | सजे बादल ऐसे आए — मानो शहर का दामाद गाँव में सज-धज कर आया हो। |
मानहु लोन जरे पर देई॥
| उपमेय | उपमान | वाचक | भावार्थ / कल्पना |
|---|---|---|---|
| कैकेयी के कड़वे वचन | जले पर नमक छिड़कना | मानहु | कैकेयी के कड़वे वचन ऐसे थे — मानो जले हुए घाव पर नमक छिड़क दिया हो। |
जनु बरषा रितु प्रगट बुढ़ाई॥
| उपमेय | उपमान | वाचक | भावार्थ / कल्पना |
|---|---|---|---|
| धरती पर कास के सफेद फूल | वर्षा ऋतु का बुढ़ापा (सफेद बाल) | जनु | धरती पर कास के सफेद फूल — मानो वर्षा ऋतु का बुढ़ापा (सफेद बाल) प्रकट हो गया हो। |
हीरों में गोल नीलम हैं जड़े॥
| उपमेय | उपमान | वाचक | भावार्थ / कल्पना |
|---|---|---|---|
| बड़े-बड़े नेत्र | हीरों में जड़े नीलम | जान (जानो) | बड़े नेत्रों को देख — लगता है मानो हीरों में गोल नीलम जड़ दिए गए हों। |
बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई॥
| उपमेय | उपमान | वाचक | भावार्थ / कल्पना |
|---|---|---|---|
| चारों दिशाओं में मेंढकों की ध्वनि | विद्यार्थियों का वेद-पाठ | जनु | मेंढकों की सुहावनी टर्र-टर्र — मानो विद्यार्थी समूह वेद के मंत्र पढ़ रहा हो। |
| बिंदु | 🟢 उपमा (Simile) | 🟠 रूपक (Metaphor) | 🔵 उत्प्रेक्षा (Fancy) |
|---|---|---|---|
| मूल भाव | तुलना करना | एक मान लेना (अभेद) | कल्पना / संभावना करना |
| वाचक शब्द | सा/सी/से/सम/सरिस/जैसे/इव | कोई नहीं — योजक (-) चिह्न | मनो/मानो/जनु/जनहु/ज्यों/यों |
| उपमेय-उपमान | अलग रहते हैं — तुलना होती है | एक हो जाते हैं — अभेद आरोप | कल्पना में एक होते हैं |
| पहचान | वाचक शब्द खोजो → सा/सी/सम/से | योजक (-) खोजो → चरन-कमल | मनो/जनु/ज्यों खोजो → तुरंत उत्प्रेक्षा |
| उदाहरण | मुख मयंक सम मंजु मनोहर | शशि-मुख पर घूँघट डाले | मानो हवा के ज़ोर से सोता सागर जगा |
सरिस · जैसे · इव
अर्थ में 'रूपी'
ज्यों · यों · मनहु
'अतिशय' (बहुत अधिक) + 'उक्ति' (कथन) → जहाँ किसी व्यक्ति, वस्तु या स्थिति का वर्णन इतना बढ़ा-चढ़ाकर किया जाए कि वह लोक-मर्यादा या वास्तविकता (Reality) की सीमा को पार कर जाए — वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है।
कोई निश्चित वाचक शब्द नहीं होता। पंक्ति पढ़ने पर यदि लगे कि बात 'लॉजिक या विज्ञान' के एकदम विपरीत है या सरासर असंभव है — तो अतिशयोक्ति।
⚡ उत्प्रेक्षा से अंतर: उत्प्रेक्षा में 'मनो/जनु' वाचक होते हैं और संभावना होती है। अतिशयोक्ति में ऐसा कोई वाचक नहीं — बात सीधे असंभव होती है।
लंका सगरी जल गई, गए निसाचर भाग॥
पूँछ में आग लगने से पहले ही पूरी लंका जल गई और राक्षस भाग गए। असंभव बात: आग लगने से पहले ही जलना।
राणा ने सोचा इस पार, तब तक चेतक था उस पार॥
प्रताप अभी सोच ही रहे थे कि नदी कैसे पार करें — तब तक चेतक उस पार पहुँच गया। असंभव बात: सोचने से भी तेज़ घोड़े का दौड़ना।
पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सों पग धोये॥
कृष्ण इतने रोए कि परात का पानी छुआ ही नहीं — आँसुओं से ही सुदामा के पैर धो दिए। असंभव बात: केवल आँसुओं से पैर धुलना।
ताल-तलैया सब भर डाले।
इतना ज़्यादा रोया कि आस-पास के सारे तालाब आँसुओं से भर गए। असंभव बात: रोने से तालाब भरना।
स्वर्ग से मिलने गगन में जा रही॥
साकेत (अयोध्या) की इमारतें इतनी ऊँची हैं कि आसमान में जाकर स्वर्ग से मिल रही हैं। असंभव बात: इमारतों का स्वर्ग तक पहुँचना।
धड़ से जयद्रथ का उधर सिर छिन्न वैसे ही हुआ॥
तीर छूटते ही — उसी क्षण जयद्रथ का सिर धड़ से अलग हो गया। असंभव बात: तीर छूटने और लगने के बीच का समय शून्य।
समुद्र की लहरें इतनी ऊँची उठ रही हैं कि आसमान को चूम रही हैं। असंभव बात: लहरों का आकाश छूना।
लगे उठावन टरहिं न टारा॥
दस हज़ार राजाओं ने एक साथ शिव-धनुष उठाना चाहा — फिर भी वह हिला नहीं। असंभव बात: एक धनुष पकड़ने के लिए 10,000 लोगों का एक साथ खड़ा होना।
शत्रु गिरे पहले ही भू पर।
तीर दुश्मन के शरीर तक पहुँचे भी नहीं — दुश्मन पहले ही डर कर गिर गए। असंभव बात: बाण लगने से पहले शत्रु का गिरना।
म्यान से तलवार बाहर निकलते ही — दुश्मन के प्राण निकल गए। असंभव बात: वार से पहले ही प्राण निकलना।
चढ़ी हिंडोरे सी रहै, लगी उसासन साथ॥
विरह में कमजोर नायिका — साँस लेती है तो 6-7 हाथ आगे, साँस छोड़ती है तो 6-7 हाथ पीछे जाती है। असंभव बात: साँस से पेंडुलम की तरह झूलना।
नित प्रति पून्यौ ही रहै, आनन ओप उजास॥
नायिका के चेहरे की चमक से घर के आस-पास हमेशा पूर्णिमा जैसी रोशनी — असली तिथि पंचांग से जाननी पड़ती है। असंभव बात: चेहरे की चमक से हर रात पूर्णिमा होना।
जहाँ रूप, रंग या गुण की अत्यधिक समानता के कारण 'उपमेय' में 'उपमान' का मिथ्या ज्ञान (निश्चित भ्रम) उत्पन्न हो जाए, और उसी भ्रम के वशीभूत होकर कोई क्रिया (Action) भी संपन्न कर ली जाए — वहाँ भ्रांतिमान अलंकार होता है।
(भ्रम + क्रिया — दोनों ज़रूरी हैं)
वाचक शब्द:
⚡ भ्रांतिमान = भ्रम + क्रिया दोनों ज़रूरी। केवल भ्रम हो पर क्रिया न हो → भ्रांतिमान नहीं।
अनिश्चय अंत तक बना रहे (यह रस्सी है या सर्प?) → संदेह।
रस्सी को 'सर्प' मानकर भाग जाए → भ्रांतिमान।
देखता ही रह गया शुक मौन है, सोचता है अन्य शुक यह कौन है॥
| भ्रमित | भ्रम | क्रिया | वाचक |
|---|---|---|---|
| शुक (तोता) | मोती → दाड़िम का बीज; नासिका → अन्य शुक | मौन देखता रह गया (भ्रमित होकर रुक गया) | समझकर, भ्रान्ति |
व्याख्या: नायिका के लाल होंठों की चमक पड़ने से उसकी नाक का सफेद मोती लाल दिखने लगता है, जिसे तोता दाड़िम (अनार) का दाना समझ बैठता है। साथ ही उसकी नुकीली नाक को देखकर वह यह सोचकर मौन रह जाता है कि यहाँ कोई दूसरा तोता आ बैठा है।
| भ्रमित | भ्रम | क्रिया | वाचक |
|---|---|---|---|
| हंसिनी | ओस की बूँदें → मोती | चुगने लगी (क्रिया) | जान |
व्याख्या: प्रातःकाल घास पर पड़ी चमकदार ओस की बूँदों को देखकर हंसिनी को भ्रम होता है कि ये सच्चे मोती हैं, और वह उन्हें खाने के लिए चुगने लगती है।
फिरि-फिरि जानि महावरी एड़ी मीड़ति जाय॥
| भ्रमित | भ्रम | क्रिया | वाचक |
|---|---|---|---|
| नाइन | नायिका की लाल एड़ी → पहले से लगा महावर | बार-बार रगड़ती रही | जानि |
व्याख्या: नाइन नायिका के पैरों में महावर (आलता) लगाने बैठती है, पर नायिका की एड़ियाँ स्वाभाविक रूप से ही इतनी लाल हैं कि उसे भ्रम हो जाता है कि रंग पहले से लगा हुआ है। इसलिए वह रंग लगाने के बजाय उसे मिटाने के लिए बार-बार एड़ी रगड़ती रहती है।
ताहि कारी ऊख भ्रम लियो उठाय उताल॥
| भ्रमित | भ्रम | क्रिया | वाचक |
|---|---|---|---|
| सर्प + गजराज (दोनों) | सूँड़ → बिल (सर्प को); सर्प → काली ईख (हाथी को) | सर्प ने सूँड़ में घुसना चाहा; हाथी ने उठा लिया | बिचारि, भ्रम |
व्याख्या: यहाँ दोनों को एक-दूसरे से भ्रम होता है — साँप हाथी की सूँड़ को अपना बिल समझकर उसमें घुसने का प्रयास करता है, और हाथी उस काले साँप को काली ईख समझकर उसे तुरंत सूँड़ से उठा लेता है।
जानि असोक अङ्गार सीय हरषि उठि कर गहेउ॥
| भ्रमित | भ्रम | क्रिया | वाचक |
|---|---|---|---|
| माता सीता | स्वर्णिम मुद्रिका (अंगूठी) → प्रज्ज्वलित अंगार | हर्षपूर्वक उठा लिया | जानि |
व्याख्या: अशोक वाटिका में हनुमान जी जब पेड़ से श्रीराम की चमकती स्वर्ण मुद्रिका नीचे गिराते हैं, तो सीता माता को भ्रम होता है कि यह अशोक वृक्ष द्वारा दिया गया सुलगता अंगार है, और वे प्राण त्यागने की इच्छा से प्रसन्न होकर उसे उठा लेती हैं।
भाग उठा भय मानकर सिर पर सापिन लोटी॥
| भ्रमित | भ्रम | क्रिया | वाचक |
|---|---|---|---|
| शिशु (मुन्ना) | माँ की दो चोटियाँ → सर्पिणी | भयभीत होकर भाग गया | मानकर |
व्याख्या: छोटा बच्चा अपनी माँ के सिर पर गुंथी दो लंबी काली चोटियों को देखता है, और काले रंग व आकार की समानता के कारण उन्हें नागिनें समझकर डर से भाग खड़ा होता है।
तोते ने भी ठौर चलाई, जामुन का फल उसे समझकर॥
| भ्रमित | भ्रम | क्रिया | वाचक |
|---|---|---|---|
| भ्रमर + शुक (दोनों) | लाल चोंच → पलाश पुष्प (भ्रमर को); भ्रमर → जामुन फल (तोते को) | भ्रमर ने झपट्टा मारा; तोते ने चोंच प्रहार किया | जानकर, समझकर |
व्याख्या: भौंरे को तोते की लाल चोंच देखकर भ्रम होता है कि यह पलाश (किंशुक) का लाल फूल है, इसलिए वह उस पर झपटता है; तोते को भी गोल काले भौंरे में जामुन के फल का भ्रम होता है, इसलिए वह भी उसे खाने के लिए चोंच चला देता है।
| भ्रमित | भ्रम | क्रिया | वाचक |
|---|---|---|---|
| वन के मयूर | श्याम वर्ण श्रीकृष्ण → काले बादल | आनंदित होकर नाचने लगे | जानि |
व्याख्या: वन के मोरों को श्रीकृष्ण के सांवले रंग को देखकर आकाश में छाए काले बादलों का भ्रम हो जाता है, और बादल देखकर प्रसन्न होने की अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति के कारण वे आनंदित होकर नाचने लगते हैं।
नीरद दामिनि जानि संग, डोलैं बोलैं मोर॥
| भ्रमित | भ्रम | क्रिया | वाचक |
|---|---|---|---|
| मयूर | कृष्ण → नवनीरद (मेघ); राधा → दामिनी (विद्युत) | आह्लादित होकर डोलने-बोलने लगे | जानि |
व्याख्या: राधा-कृष्ण को साथ वृंदावन में विहार करते देख मोरों को भ्रम होता है — सांवले कृष्ण में वर्षा के काले बादल और गोरी राधा में बिजली की चमक दिखाई देती है, जिससे वे प्रसन्न होकर झूमने और शोर मचाने लगते हैं।
नाचा करते हैं हरदम पालतू मोर मतवाले॥
| भ्रमित | भ्रम | क्रिया | वाचक |
|---|---|---|---|
| पालतू मयूर | नायिका के काले केश → काले मेघ | प्रफुल्लित होकर नृत्य करते हैं | अनुमान (गुण-साम्य) |
व्याख्या: नायिका के लंबे, घने काले बालों को देखकर घर के पालतू मोरों को आसमान में छाए काले बादलों का भ्रम हो जाता है, और इसी खुशी में वे मतवाले होकर नृत्य करने लगते हैं।
जहाँ उपमेय और उपमान में रूप, रंग या गुण की अत्यधिक समानता के कारण यह अनिश्चय (दुविधा) बना रहे कि 'यह उपमेय है या उपमान' — वहाँ संदेह अलंकार होता है।
विशेषता: अंत तक संशय बना रहता है, बुद्धि कोई निश्चित निर्णय नहीं ले पाती और कोई क्रिया नहीं होती।
⚡ संदेह vs भ्रांतिमान: संदेह = अनिश्चय अंत तक, कोई क्रिया नहीं। | भ्रांतिमान = भ्रम + क्रिया दोनों।
कि सारी ही की नारी है कि नारी ही की सारी है॥
वाचक: 'कि' (अनेक बार)
व्याख्या: श्रीकृष्ण की कृपा से साड़ी खींचते-खींचते भी समाप्त नहीं होती और लगातार बढ़ती जाती है। साड़ियों के इस अनंत ढेर को देखकर दुःशासन पूरी तरह चकित हो जाता है और अंत तक यह तय नहीं कर पाता कि साड़ी के बीच स्त्री है या स्त्री के भीतर से साड़ी निकल रही है।
बीररस बीर तरवारि सी उघारी है॥
वाचक: 'कैधौं' (क्या / अथवा)
व्याख्या: हनुमान जी की जलती हुई पूँछ की भयंकर अग्नि और उससे उठते धुएँ को देखकर लंकावासी राक्षस निर्णय नहीं कर पाते कि आकाश में बहुत-से विनाशकारी धूमकेतु उदय हो गए हैं, या साक्षात् वीर रस ने अपनी रक्त-रंजित तलवार म्यान से बाहर खींच ली है।
वाचक: 'अथवा'
व्याख्या: प्रिय से दूरी नायिका को मानसिक कष्ट देती है, पर इसी विरह के कारण वह हर पल प्रिय के ध्यान में डूबी रहती है। इसलिए उसका मन इस उलझन में रहता है कि यह वियोग उसके लिए अभिशाप है या फिर उसे प्रिय के और निकट लाने वाला कोई अनूठा वरदान।
अल्प जल में या विकल लघु मीन हैं?
वाचक: 'या'
व्याख्या: नायिका की आँखें आँसुओं से भरी और उदास (मलिन) हैं। इनकी बनावट और उनमें भरे जल को देखकर कवि का मन स्थिर नहीं हो पाता कि ये सचमुच कमल जैसी सुंदर आँखें हैं, या फिर कम पानी वाले किसी पात्र में तड़पती छोटी-छोटी मछलियाँ हैं।
वाचक: 'या'
व्याख्या: यह संदेह अलंकार का सबसे सरल उदाहरण है। नायिका के अत्यंत सुंदर और कांतिमय चेहरे को देखकर प्रेमी असमंजस में पड़ जाता है और तय नहीं कर पाता कि वह प्रियतमा का मानवीय मुख देख रहा है या आकाश में चमकता साक्षात् चंद्रमा।
कैधौं मोतिन की झालरि झलकत है॥
वाचक: 'कैधौं'
व्याख्या: जब सूर्य की किरणें पानी की बूँदों या बादलों के झरोखे से छनकर आती हैं, तो एक अद्भुत झिलमिलाती चमक बनती है। इसे देखकर दर्शक तय नहीं कर पाता कि दिन में ही तारे टूटकर झिलमिला रहे हैं, या आकाश में मोतियों से बनी कोई झालर हवा में हिलने के कारण चमक रही है।
कैधौ उगो मयंका।
वाचक: 'कि' तथा 'कैधौ'
व्याख्या: जब एक सखी अचानक अपनी सुंदर सखी (या नायिका) के चेहरे को देखती है, तो उसकी अलौकिक आभा से चकित रह जाती है और खुद से पूछती है कि यह सचमुच उसकी सखी का कोमल मुख है, या आसमान में चंद्रमा निकल आया है। रूप की अत्यधिक समानता के कारण वह अंत तक संशय में रहती है।
पाप हुआ या पुण्य यह? करूँ हर्ष या सोग।
वाचक: 'या' (दो बार)
व्याख्या: एक व्यक्ति सामने खड़े भूखे इंसान को भोजन कराने के बजाय मंदिर में भगवान शिव को भोग चढ़ा देता है। अब उसका विवेक उसे कचोटता है और वह तय नहीं कर पाता कि ईश्वर की पूजा से यह पुण्य हुआ या भूखे की उपेक्षा से पाप, और इसी वजह से वह पूजा की खुशी मनाए या इंसानियत की हार का शोक।
📖 परिभाषा
जहाँ किन्हीं दो वस्तुओं या स्थितियों में वास्तविक विरोध न होते हुए भी, केवल शब्दों के माध्यम से विरोध का 'आभास' (प्रतीत) कराया जाए, वहाँ विरोधाभास अलंकार होता है। (सरल: जहाँ दो सर्वथा विपरीत बातें एक साथ कही जाएँ, किंतु गहराई से अर्थ निकालने पर कोई विरोध न रहे।)
काव्य पंक्ति में प्रायः विलोम (Antonyms) या परस्पर विरोधी शब्दों का एक साथ प्रयोग देखने को मिलता है — जैसे: शीतल-ज्वाला, विषमय-अमृत, मीठा-नमक, अंधा-देखना।
ज्यों-ज्यों बूड़े स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्जवल होय॥
भावार्थ: कवि कहते हैं — इस प्रेमी मन की गति कोई नहीं समझ सकता। यह जैसे-जैसे कृष्ण की भक्ति के श्याम (काले) रंग में डूबता है, वैसे-वैसे और अधिक पवित्र (उज्जवल) होता जाता है।
काले रंग में डूबने से किसी वस्तु का सफेद/उज्जवल होना प्रत्यक्ष रूप से विरोधी कथन है — यही विरोधाभास है।
यह व्यर्थ साँस चल-चल कर, करती है काम अनल का॥
भावार्थ: विरह में हृदय के भीतर एक ठंडी आग (शीतल ज्वाला) जल रही है, और आँखों से बहने वाला पानी (दृग जल) उसमें ईंधन का काम कर रहा है।
दो विरोध हैं — (1) ज्वाला (आग) कभी 'शीतल' नहीं होती। (2) जल (पानी) कभी आग का 'ईंधन' नहीं बनता; पानी तो आग बुझाता है।
भावार्थ: यह गोदावरी नदी विष (ज़हर) से युक्त होने के बाद भी अमृत के समान फल प्रदान करती है।
जो वस्तु 'विषमय' (ज़हरीली) हो, उसका 'अमृत' प्रदान करना पूर्णतः विरोधाभास है।
ज्यों खरचै त्यों-त्यों बढ़ै, बिन खरचै घटि जात॥
भावार्थ: माँ सरस्वती (ज्ञान) के भंडार की बात अनोखी है — इसे जितना खर्च करो (बाँटो), उतना बढ़ता है और न खर्च करने पर घट जाता है।
संसार में वस्तुएँ खर्च करने पर घटती हैं, किंतु यहाँ खर्च करने पर बढ़ने का कथन विरोधाभासी है।
शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ॥
भावार्थ: कवि कहता है कि मेरे रोने (रोदन) में भी प्रेम का गीत (राग) है, और मेरी ठंडी आवाज़ (शीतल वाणी) में भी क्रांति की आग छिपी है।
शीतल (ठंडी) वाणी के साथ 'आग' का होना प्रत्यक्ष विरोध को दर्शाता है।
भावार्थ: कवि कहता है कि जब से प्रिय से आँख लगी (प्रेम हुआ) है, तब से मेरी आँख ही नहीं लगी (नींद नहीं आई)।
'आँख लगना' (प्रेम होना) और 'आँख न लगना' (नींद न आना) — दोनों विपरीत क्रियाओं का एक साथ घटित होना विरोधाभास है।
अनबूड़े बूड़े तरे, जे बूड़े सब अंग॥
भावार्थ: संगीत, कविता और प्रेम के रस में जो नहीं डूबे (अनबूड़े), वे संसार में डूब गए (बर्बाद)। जो इनमें पूरी तरह डूबे, वे भवसागर पार कर गए।
'न डूबने वाले का डूब जाना' और 'डूबने वाले का पार हो जाना' स्पष्ट विरोधाभास है।
भावार्थ: नायिका की आँखों का नमकीनपन (लुनाई/सौंदर्य) बड़ा मीठा प्रतीत होता है।
'नमकीन' (लुनाई) वस्तु का 'मीठा' लगना विरोधी कथन है।
भावार्थ: प्रिय की याद (सुधि) आने पर मेरी अपनी सुध-बुध (सुधि) चली जाती है।
याद (स्मृति) आने पर स्वयं की स्मृति लुप्त हो जाना विरोधाभास है।
भावार्थ: मैं एक छोटी सी सीपी में पूरा सागर भरकर ले आऊँगी।
क्षुद्र सीपी में विशाल सागर का समाहित होना तर्कसंगत रूप से विरोधी बात है।
जहाँ कारण (साधन/Cause) के नितांत अभाव में भी कार्य (Effect/Action) के संपन्न होने का वर्णन किया जाए, वहाँ विभावना अलंकार होता है। (सरल: जहाँ काम को करने वाला कोई साधन मौजूद न हो, फिर भी वह काम पूरा हो जाए।)
विभावना की पहचान के लिए वाचक शब्द:
विशेषोक्ति अलंकार: 'कारण' मौजूद है, फिर भी 'कार्य' नहीं हो रहा है। (जैसे: पानी में रहकर भी मछली का प्यासा होना)
कर बिनु करम करै बिधि नाना॥
भावार्थ: तुलसीदास जी परब्रह्म की महिमा का वर्णन करते हैं — वह ईश्वर बिना पैरों (पद) के चलता है, बिना कानों के सुनता है और बिना हाथों (कर) के अनेक प्रकार के कार्य संपन्न करता है।
अकादमिक स्पष्टीकरण: चलने, सुनने और कार्य करने के लिए पैर, कान और हाथ जैसे 'कारणों' का अभाव है, फिर भी ये 'कार्य' संपन्न हो रहे हैं।
वाचक शब्द: बिनु
बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥
भावार्थ: वह परब्रह्म बिना मुख (आनन) के ही संसार के संपूर्ण रसों का भोग करता है, और बिना वाणी (जीभ) के ही बहुत बड़ा वक्ता है।
अकादमिक स्पष्टीकरण: मुख और वाणी (कारण) के अभाव में भी रसभोग और वक्ता होने का 'कार्य' हो रहा है।
वाचक शब्द: रहित, बिनु
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय॥
भावार्थ: कबीरदास कहते हैं कि निंदक (आलोचक) को पास रखो, क्योंकि वह हमारी कमियाँ बता-बताकर हमारे स्वभाव को बिना जल और बिना साबुन के ही स्वच्छ (निर्मल) कर देता है।
अकादमिक स्पष्टीकरण: किसी को स्वच्छ करने के लिए जल और साबुन 'कारण' होते हैं। यहाँ इन कारणों के बिना ही निर्मलता (कार्य) की प्राप्ति हो रही है।
वाचक शब्द: बिन, बिना
ते नरेस बिनु पावक दहहीं॥
भावार्थ: तुलसीदास कहते हैं — जिन राजाओं के अत्याचारों से मुनि और तपस्वी दुःख पाते हैं, वे राजा मुनियों के श्राप से बिना अग्नि (पावक) के ही जलकर भस्म हो जाते हैं।
अकादमिक स्पष्टीकरण: जलने के लिए अग्नि (पावक) 'कारण' है, परंतु यहाँ अग्नि के अभाव में भी भस्म होने का 'कार्य' घटित हो रहा है।
वाचक शब्द: बिनु
भावार्थ: वन में मयूर बिना वर्षा ऋतु (पावस) के ही अचानक प्रफुल्लित होकर नृत्य करने लगे।
अकादमिक स्पष्टीकरण: मयूरों के नृत्य का 'कारण' वर्षा ऋतु होती है। यहाँ वर्षा के न होने पर भी नाचने का 'कार्य' संपन्न हो रहा है।
वाचक शब्द: बिनु
बिनही रितु बरसत निसि बासर, सदा मलिन दोउ तारे॥
भावार्थ: विरह से व्याकुल गोपी कहती है — ये नेत्र बादलों को भी हरा चुके हैं, क्योंकि बादल तो वर्षा ऋतु में बरसते हैं, किंतु ये नेत्र 'बिना वर्षा ऋतु' के ही दिन-रात अश्रु बहाते रहते हैं।
अकादमिक स्पष्टीकरण: वर्षा होने के लिए वर्षा ऋतु (कारण) आवश्यक है, परंतु यहाँ उसके बिना ही अश्रु-वर्षा का 'कार्य' हो रहा है।
वाचक शब्द: बिनही (बिना)
जहाँ कारण (साधन/Cause) के पूर्णतः उपस्थित होने पर भी कार्य (Action/Effect) के संपन्न न होने का वर्णन किया जाए, वहाँ विशेषोक्ति अलंकार होता है। (सरल: कार्य को पूरा करने वाले सभी साधन मौजूद हैं, किंतु फिर भी वह कार्य पूर्ण नहीं हो रहा।)
विशेषोक्ति अलंकार: कारण (साधन) उपस्थित है ➔ फिर भी कार्य नहीं हो रहा है।
मोहि सुनि-सुनि आवै हाँसी॥
भावार्थ: कबीरदास कहते हैं — जल के बीच रहते हुए भी मछली (मीन) प्यासी है, यह सुनकर मुझे बहुत हँसी आती है। (आध्यात्मिक अर्थ: परमात्मा हमारे भीतर है, फिर भी मनुष्य उसे बाहर खोजता है।)
अकादमिक स्पष्टीकरण: प्यास बुझाने के लिए असीमित 'जल' (कारण) उपस्थित है, किंतु फिर भी प्यास बुझने का 'कार्य' संपन्न नहीं हो रहा।
भावार्थ: वियोग शृंगार में नायिका के नेत्रों में नित्य-प्रति अश्रु रूपी नीर (जल) भरा रहता है, किंतु फिर भी उसके नेत्रों की प्रिय-दर्शन की प्यास नहीं बुझती।
अकादमिक स्पष्टीकरण: नेत्रों में नीर (कारण) विद्यमान है, परंतु प्यास बुझने का (कार्य) नहीं हो रहा है।
भावार्थ: मैथिलीशरण गुप्त कृत 'साकेत' में उर्मिला विरह-व्यथा में कहती हैं कि मेरे दोनों नेत्र रूपी दो-दो मेघ निरंतर जल बरसा रहे हैं, किंतु मैं अभी भी प्यासी ही हूँ।
अकादमिक स्पष्टीकरण: जल बरसाने वाले दो-दो मेघों (कारण) की उपस्थिति के बावजूद प्यास न बुझना (कार्य का अभाव) विशेषोक्ति को प्रमाणित करता है।
मूरख हृदय न चेत, जो गुरु मिलहिं बिरंचि सम॥
भावार्थ: तुलसीदास कहते हैं — यदि बादल (जलद) अमृत (सुधा) की वर्षा भी कर दें, तो भी बाँस (बेत) पर फूल-फल नहीं आते। उसी प्रकार यदि मूर्ख को ब्रह्मा (बिरंचि) के समान श्रेष्ठ गुरु भी मिल जाएँ, तो भी ज्ञान नहीं आता।
अकादमिक स्पष्टीकरण: अमृत की वर्षा तथा ब्रह्मा के समान गुरु की प्राप्ति रूपी 'सशक्त कारण' उपस्थित हैं, किंतु फिर भी फलने-फूलने और ज्ञानी होने का 'कार्य' घटित नहीं हो रहा।
प्रेम बिबस पहिराइ न जाई॥
भावार्थ: सीता स्वयंवर के प्रसंग में, श्री राम को देखकर माता सीता ने दोनों हाथों (जुगल कर) से जयमाला उठा तो ली, किंतु प्रेम और संकोच के वशीभूत होने के कारण पहना नहीं पा रही हैं।
अकादमिक स्पष्टीकरण: माला पहनाने के लिए हाथ और माला (साधन/कारण) दोनों सुलभ हैं, परंतु प्रेम-विवशता के कारण माला पहनाने का 'कार्य' पूर्ण नहीं हो पा रहा।
भावार्थ: एक संपन्न व्यक्ति के पास सुख-सुविधाओं के समस्त साधन उपलब्ध हैं, किंतु फिर भी वह सुख की निद्रा से वंचित है।
अकादमिक स्पष्टीकरण: सुखपूर्वक सोने के लिए धन-दौलत और सुविधाएँ (कारण) मौजूद होने पर भी 'नींद आने' का कार्य नहीं हो रहा। अतः यह विशेषोक्ति का सटीक आधुनिक उदाहरण है।
जहाँ जड़ प्रकृति (पर्वत, नदी, बादल, वृक्ष, लताएँ आदि) अथवा अमूर्त भावों पर मानवीय भावनाओं, चेष्टाओं और क्रियाकलापों का आरोप किया जाए, वहाँ मानवीकरण अलंकार होता है। (सरल: जब कवि निर्जीव या प्राकृतिक उपादानों का वर्णन इस प्रकार करे मानों वे कोई जीवित मनुष्य हों।)
काव्य पंक्ति पढ़ने पर यदि प्रकृति या निर्जीव वस्तु द्वारा मनुष्यों जैसे कार्यों (हँसना, रोना, नाचना, सजना, बोलना, जागना आदि) को संपन्न करने का भाव प्रकट हो — वहाँ मानवीकरण अलंकार होता है।
भावार्थ: वसंत के आगमन पर फूल हँस रहे हैं और कलियाँ मुस्कुरा रही हैं।
अकादमिक स्पष्टीकरण: प्राकृतिक उपादानों (फूल और कलियों) पर 'हँसने' और 'मुस्कुराने' जैसी मानवीय चेष्टाओं का पूर्ण आरोप किया गया है。
वह संध्या सुंदरी परी-सी, धीरे-धीरे।
भावार्थ: सूर्यास्त (दिवसावसान) के समय 'संध्या' (शाम) को एक सुंदर परी के रूप में चित्रित किया गया है, जो आसमान से धीरे-धीरे नीचे उतर रही है।
अकादमिक स्पष्टीकरण: अमूर्त 'संध्या' (शाम) पर 'सुंदरी परी' का आरोपण कर उसके 'उतरने' की मानवीय क्रिया को दर्शाया गया है।
भावार्थ: प्रातःकाल होने पर वनस्पतियाँ (पेड़-पौधे) आलस्य त्याग कर जाग रही हैं और ठंडे ओस रूपी जल से अपना मुख धो रही हैं।
अकादमिक स्पष्टीकरण: वनस्पतियों का 'आलस करना', 'जागना' और 'मुख धोना' विशुद्ध रूप से मानवीय क्रियाकलाप हैं।
भावार्थ: आकाश में छाए बादलों को देखकर कवि कहता है कि मेघ किसी शहरी दामाद की भाँति पूरी तरह सज-संवर कर (बन-ठन के) गाँव में आए हैं।
अकादमिक स्पष्टीकरण: प्राकृतिक उपादान 'मेघ' पर 'सजने-संवरने' जैसी मानवीय प्रवृत्ति का मनोहारी आरोप है।
भावार्थ: प्रातःकाल (उषा) की किरणें जब धरती पर पड़ती हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई विजय प्राप्त करने वाली देवी (जय लक्ष्मी) सुनहरे तीर चलाती हुई प्रकट हुई हो।
अकादमिक स्पष्टीकरण: 'उषा' (प्रातःकाल) पर 'तीर बरसाने' और 'जय लक्ष्मी' के रूप में उदित होने का मानवीय आरोप है।
भावार्थ: कवि कहता है कि यह नई बेल (लतिका) भी एक नवयौवना स्त्री की भाँति नए पराग रूपी जल से अपनी गागरी (मटका) भरकर ले आई है।
अकादमिक स्पष्टीकरण: लता (बेल) पर गागरी (मटका) भरकर लाने वाली 'पनहारिन' या 'स्त्री' का मानवीकरण किया गया है।
भावार्थ: समुद्र की लहरें उसकी छाती (उर) पर नृत्य कर रही हैं और मीठा गीत गा रही हैं।
अकादमिक स्पष्टीकरण: लहरों पर 'नृत्य करने' (नाचने) और 'गीत गाने' की मानवीय चेष्टाओं का आरोपण है।
भावार्थ: सुमित्रानंदन पंत कहते हैं कि कलियाँ अपनी पंखुड़ियों रूपी दरवाज़े खोलकर झाड़ियों के बीच से मुस्कुरा रही हैं।
अकादमिक स्पष्टीकरण: कलियों का 'दरवाज़ा खोलना' और 'मुस्कुराना' स्पष्ट मानवीकरण है।
हाथ पीले कर लिए हैं, ब्याह मंडप में पधारी॥
भावार्थ: केदारनाथ अग्रवाल कहते हैं कि खेत में लहलहाती पीली सरसों अब बड़ी (सयानी) हो गई है और मानो उसने शादी के लिए अपने हाथ पीले कर लिए हैं तथा मंडप में आ बैठी है।
अकादमिक स्पष्टीकरण: सरसों की फसल पर एक 'विवाह योग्य कन्या' का अत्यंत सुंदर मानवीकरण किया गया है।
अवलोक रहा है बार-बार...
भावार्थ: करधनी के आकार का एक विशाल पर्वत अपने ऊपर खिले हुए हज़ारों पुष्प रूपी आँखों (दृग) को फाड़-फाड़ कर नीचे तालाब में अपना चेहरा देख रहा है।
अकादमिक स्पष्टीकरण: पर्वत का 'आँखें फाड़ना' और दर्पण (तालाब) में स्वयं को 'देखना' मानवीय कृत्य है।
भावार्थ: वृक्षों की कतारें इतनी शांति से खड़ी थीं, जैसे वे इंसानों की तरह छुपकर किसी की 'निजी बातें' सुन रही हों।
अकादमिक स्पष्टीकरण: वृक्षों द्वारा 'निजी बात सुनने' का आरोप विशुद्ध मानवीकरण है।
भावार्थ: जयशंकर प्रसाद कहते हैं कि यह पृथ्वी (धरा) समुद्र रूपी शय्या (सेज) पर एक नई दुल्हन (वधू) की भाँति संकोच और शर्म के साथ सिकुड़ कर बैठी है।
अकादमिक स्पष्टीकरण: धरा (पृथ्वी) पर लज्जाशील 'वधू' (दुल्हन) का अत्यंत कोमल मानवीकरण है।
भावार्थ: वायु के झोंकों से हिलते हुए कम वज़न वाले छोटे पौधे ऐसे प्रतीत होते हैं मानो वे प्रसन्नता से हँस रहे हों।
अकादमिक स्पष्टीकरण: पौधों में 'हँसने' की मानवीय भावना का आरोपण है।
भावार्थ: वर्षा ऋतु के आगमन पर बादलों को आता देखकर गाँव के सबसे पुराने (बूढ़े) पीपल के वृक्ष ने आगे बढ़कर एक वयोवृद्ध व्यक्ति की भाँति अतिथि का स्वागत (जुहार) किया।
अकादमिक स्पष्टीकरण: पीपल के वृक्ष पर 'बुज़ुर्ग व्यक्ति' का तथा उसके द्वारा 'स्वागत करने' (जुहार) का मानवीकरण किया गया है।
भावार्थ: प्रातःकाल (ऊषा) रूपी चतुर स्त्री, आकाश रूपी पनघट पर तारे रूपी घड़ों को डुबो रही है (तारे छिप रहे हैं)।
अकादमिक स्पष्टीकरण: यहाँ 'ऊषा' पर 'चतुर स्त्री' (नागरी) का आरोपण होने से मानवीकरण का सशक्त पुट विद्यमान है।
जहाँ उपमेय (प्रस्तुत/जिसकी बात हो रही हो) का निषेध (नकार) करके उसमें उपमान (अप्रस्तुत/जिससे तुलना की जा रही हो) की स्थापना की जाए, वहाँ अपह्नुति अलंकार होता है। (उपमेय का निषेध + उपमान की स्थापना — दोनों ज़रूरी हैं)
वाचक शब्द (निषेधात्मक):
⚡ अपह्नुति = निषेध + स्थापना। किसी वस्तु को झुठलाकर किसी और वस्तु को सच बताना।
रूपक अलंकार: उपमेय को सीधे उपमान मान लिया जाए (यह मुख चन्द्रमा है) → रूपक।
अपह्नुति: उपमेय को 'नकार' कर उपमान माना जाए (यह मुख नहीं, चन्द्रमा है) → अपह्नुति।
| उपमेय (निषेध) | उपमान (स्थापना) | वाचक |
|---|---|---|
| पलास के पुहुप | वन-ज्वाल (जंगल की आग) | नाहिं |
व्याख्या: यहाँ खिले हुए लाल पलाश के फूलों (उपमेय) को देखकर सीधे तौर पर यह नकार दिया गया है कि ये पलाश के फूल 'नहीं' हैं, बल्कि यह तो जंगल में लगी हुई आग (उपमान) है।
बंधु न होय मोर यह काला॥
| उपमेय (निषेध) | उपमान (स्थापना) | वाचक |
|---|---|---|
| बंधु (भाई बालि) | काल (मृत्यु/यमराज) | न |
व्याख्या: सुग्रीव श्रीराम से कहते हैं कि हे कृपालु! यह बालि मेरा भाई 'नहीं' है, यह तो साक्षात् मेरा 'काल' है। यहाँ भाई होने का निषेध कर काल (मृत्यु) की स्थापना की गई है।
| उपमेय (निषेध) | उपमान (स्थापना) | वाचक |
|---|---|---|
| आँसू नीर (जल) | मुक्ताहल (सच्चे मोती) | नहिं |
व्याख्या: यहाँ आँखों से गिर रहे आँसुओं (जल) को नकार कर उन्हें सच्चे मोती बताया गया है। पानी को झुठलाकर मोती को सच माना गया है।
| उपमेय (निषेध) | उपमान (स्थापना) | वाचक |
|---|---|---|
| अधर (होंठ) | पल्लव (कोमल पत्ते) | नहीं |
व्याख्या: यहाँ नायिका के सुंदर लाल होठों को 'नहीं' कहकर नकारा गया है और उनके स्थान पर उन्हें लाल और कोमल पत्ते मान लिया गया है।
प्रगट करहिं निज अस्त्र भवानी॥
| उपमेय (निषेध) | उपमान (स्थापना) | वाचक |
|---|---|---|
| निज बानी (वाणी) | भवानी का अस्त्र | नहिं |
व्याख्या: यहाँ वक्ता अपनी सामान्य वाणी को नकार रहा है और कह रहा है कि यह जो शब्द निकल रहे हैं, वे मेरी वाणी नहीं हैं, बल्कि यह तो देवी भवानी का अस्त्र प्रकट हो रहा है।
| उपमेय (निषेध) | उपमान (स्थापना) | वाचक |
|---|---|---|
| आँसू गिरना | तरुणाई (युवावस्था) का रोना | मिष (बहाने) |
व्याख्या: उच्च स्तरीय अपह्नुति (कैतव अपह्नुति) में 'नहीं' की जगह 'मिष' या 'बहाने' शब्द आता है। इसका अर्थ है कि ये आँसू नहीं गिर रहे हैं, बल्कि आँसुओं के बहाने मेरी युवावस्था रो रही है।
नई परिभाषा (दिमाग में बैठाने के लिए): 'प्रतीप' का मतलब है — 'नियम का उल्टा कर देना' या 'VIP की बेइज्जती करना'। साहित्य का नियम है कि इंसान की तुलना हमेशा प्रकृति की महान चीज़ों (चाँद, सूर्य, सागर, कमल) से की जाती है। लेकिन प्रतीप अलंकार में कवि इस नियम को दो तरह से तोड़ता है:
① उल्टी तुलना: महान चीज़ों को इंसान के बराबर लाकर खड़ा कर देना (जैसे — पेड़ को आदमी जैसा लंबा बताना)।
② बिना लॉजिक बेइज्जती: महान चीज़ों को बिना किसी तार्किक कारण के सीधा 'बेचारा', 'गरीब', 'तुच्छ' या 'शर्मिंदा' कह देना।
पंक्ति पढ़ते ही चेक करें:
• क्या प्रसिद्ध प्राकृतिक चीज़ (उपमान) को उपमेय (इंसान) जैसा बताया जा रहा है? (उल्टी उपमा)
• या क्या चाँद/कमल के लिए 'बापुरो' (बेचारा), 'रंक' (गरीब), 'लजाई' (शर्मिंदा) जैसे अपमानजनक शब्द आए हैं, बिना यह बताए कि उनमें कमी क्या है?
⚡ यदि हाँ, तो यह प्रतीप है।
सरल अर्थ: सीता जी के मुख की बराबरी वह चाँद कैसे करेगा? वह तो बेचारा (बापुरो) भिखारी (रंक) है।
यह प्रतीप क्यों है (व्यतिरेक क्यों नहीं): यहाँ चाँद में कोई भौतिक कमी (Physical Flaw) नहीं बताई गई है। चाँद को 'भिखारी' कहना कोई वैज्ञानिक तर्क नहीं है, यह सिर्फ एक भावनात्मक बेइज्जती है। बिना तर्क की बेइज्जती = प्रतीप।
सरल अर्थ: वहाँ देवदारु के पेड़ ऐसे खड़े थे, जैसे वे उस तपस्वी के समान लंबे हों।
यह प्रतीप क्यों है: नियम कहता है "आदमी पेड़ जैसा लंबा है"। लेकिन यहाँ कहा गया "पेड़ आदमी जैसा लंबा है"। तुलना पूरी तरह उल्टी (Reverse) कर दी गई है। उल्टी तुलना = प्रतीप।
सरल अर्थ: राम यमुना में नहाए, जिसका जल उनके शरीर के समान साँवला (श्याम) था।
यह प्रतीप क्यों है: फिर से तुलना उल्टी कर दी गई। नदी के रंग की तुलना इंसान के रंग से कर दी गई, जबकि होना उल्टा चाहिए था।
सीय बदन सम हिमकर नाहीं॥
सरल अर्थ: मैंने मन में बहुत सोचा, पर यह चाँद (हिमकर) सीता के मुख के बराबर हो ही नहीं सकता।
यह प्रतीप क्यों है: यहाँ भी कोई कारण नहीं दिया गया कि चाँद बराबर क्यों नहीं हो सकता (जैसे उसमें दाग है या वह घटता है)। बस सीधा कह दिया कि वह लायक नहीं है। बिना कारण के खारिज करना = प्रतीप।
सरल अर्थ: चाँद बिल्कुल तुम्हारे मुख जैसा है।
यह प्रतीप क्यों है: यह उपमा अलंकार ("मुख चाँद सा है") का 180 डिग्री उल्टा रूप है। उपमान को उपमेय बना दिया गया है।
सरल अर्थ: नायिका का मुख देखकर चाँद (विधु) भी शर्मा (लजाई) गया।
यह प्रतीप क्यों है: चाँद का शर्माना एक भावनात्मक आरोप है, कोई तार्किक कमी नहीं। उपमान को लज्जित/तुच्छ दिखाना प्रतीप का मुख्य लक्षण है।
सरल अर्थ: यह कमल बिल्कुल तुम्हारे नेत्रों जैसा है।
यह प्रतीप क्यों है: "कमल नयन" का उल्टा कर दिया गया है। प्राकृतिक वस्तु (कमल) की तुलना मानव अंग (नेत्र) से की गई है।
सरल अर्थ: हे सखी, चाँद से तो यह मुख ही ज्यादा अच्छा है, जिसे देखकर आनंद आता है।
यह प्रतीप क्यों है: चाँद से अच्छा मुख है, बस कवि को ऐसा लगता है (देखै होय अनंद)। चाँद में क्या बुराई है, यह नहीं बताया गया।
सरल अर्थ: आकाश इतना सुंदर है, मानो भगवान राम का रूप हो।
यह प्रतीप क्यों है: आकाश (ब्रह्मांड की विशाल चीज़) की तुलना मनुष्य रूपी राम से की गई है। तुलना का क्रम पलट दिया गया है।
सरल अर्थ: ऐ चाँद! तू किस बात का घमंड करता है? तू तो इस मुख की बराबरी भी नहीं पा सकता।
यह प्रतीप क्यों है: चाँद के घमंड को तोड़कर उसे नीचा दिखाया गया है, लेकिन कोई ठोस कमी नहीं गिनाई गई है।
'व्यतिरेक' का शाब्दिक अर्थ है 'आधिक्य' (बढ़-चढ़कर होना)। जहाँ उपमेय को उपमान से श्रेष्ठ बताया जाए और उसका कारण भी स्पष्ट किया जाए, वहाँ व्यतिरेक अलंकार होता है।
काव्य पंक्ति में जब प्रसिद्ध उपमान (चाँद, सोना, पर्वत, मक्खन) की कोई 'कमी' (दोष) बताई जाए और उपमेय का कोई 'गुण' बताकर उसे श्रेष्ठ सिद्ध किया जाए, तो व्यतिरेक अलंकार होता है।
प्रतीप: उपमान को बिना कारण बताए तुच्छ/बेचारा कह दिया जाता है (चाँद बेचारा क्या बराबरी करेगा)।
व्यतिरेक: उपमेय को श्रेष्ठ बताने का ठोस कारण दिया जाता है (चाँद में दाग है, पर मुख बेदाग है)।
निज परिताप द्रवै नवनीता। पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता।।
| उपमेय (श्रेष्ठ) | उपमान | श्रेष्ठता का कारण |
|---|---|---|
| संत हृदय | नवनीत (मक्खन) | मक्खन स्वयं की गर्मी से पिघलता है, संत दूसरों के दुख से |
व्याख्या: कवियों ने संतों के हृदय को मक्खन के समान बताया, पर सही से कह न सके। मक्खन तो अपने ताप से पिघलता है, जबकि पवित्र संत दूसरों का दुःख देखकर द्रवित होते हैं। यह व्यतिरेक का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है।
सीय अंग सखि कोमल कनक कठोर।।
| उपमेय (श्रेष्ठ) | उपमान | श्रेष्ठता का कारण |
|---|---|---|
| सीय अंग (सीता के अंग) | कनक (सोना) | सोना कठोर है, अंग कोमल हैं |
व्याख्या: सीता जी के अंग स्वर्ण के समान सुंदर हैं, किंतु अत्यंत कोमल हैं जबकि सोना कठोर होता है — उपमेय को उपमान से श्रेष्ठ बताया गया है, कारण सहित।
ससि मलीन रबि सीतल लागे।।
| उपमेय (श्रेष्ठ) | उपमान | श्रेष्ठता का कारण |
|---|---|---|
| राजा का प्रताप | सूर्य व चंद्रमा | सूर्य में उतनी गर्मी नहीं, चाँद में उतनी चमक नहीं |
व्याख्या: राजा के यश-प्रताप के आगे चंद्रमा मलिन और सूर्य शीतल लगता है — राजा के प्रताप को दोनों उपमानों से श्रेष्ठ सिद्ध किया गया है।
निष्कलंक है वह सदा, उसमें प्रकट कलंक॥
| उपमेय (श्रेष्ठ) | उपमान | श्रेष्ठता का कारण |
|---|---|---|
| राधा मुख | चंद्र | मुख निष्कलंक है, चंद्र सकलंक (दाग वाला) |
व्याख्या: जिनकी बुद्धि दरिद्र है वही राधा के मुख को चंद्रमा के समान कहते हैं — मुख हमेशा बेदाग है, जबकि चंद्रमा में कलंक दिखता है।
| उपमेय (श्रेष्ठ) | उपमान | श्रेष्ठता का कारण |
|---|---|---|
| साधु | शैल (पर्वत) | पर्वत कठोर होता है, साधु का स्वभाव कोमल |
व्याख्या: सज्जन पर्वतों के समान ऊँचे (महान) होते हैं, किंतु स्वभाव पर्वत जैसा कठोर नहीं बल्कि सुकुमार होता है।
निसि मलीन वह निसि दिन यह बिगसाइ।।
| उपमेय (श्रेष्ठ) | उपमान | श्रेष्ठता का कारण |
|---|---|---|
| सिय मुख | शरद कमल | कमल रात में मुरझाता है, मुख सदा खिला रहता है |
व्याख्या: सीता जी के मुख को शरद ऋतु के कमल के समान कैसे कहा जाए — कमल रात में मलिन (बंद) हो जाता है, जबकि मुख रात-दिन हमेशा खिला रहता है।
| उपमेय (श्रेष्ठ) | उपमान | श्रेष्ठता का कारण |
|---|---|---|
| मुख | शशांक (चंद्रमा) | चाँद घटता-बढ़ता है, मुख सदैव एक-समान सुंदर |
व्याख्या: चाँद की कमी (घटना-बढ़ना) गिनाकर मुख की श्रेष्ठता (सदैव एक-समान रहना) स्थापित की गई है।
| उपमेय (श्रेष्ठ) | उपमान | श्रेष्ठता का कारण |
|---|---|---|
| जन्मभूमि | स्वर्ग | स्वर्ग में केवल सुख है, जन्मभूमि में अपनत्व और माँ का प्यार |
व्याख्या: यह 'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी' का हिंदी रूपांतरण है — जन्मभूमि को स्वर्ग से श्रेष्ठ बताया गया है।
सिय नयनन की समता, पा न सके तेहि रंग॥
| उपमेय (श्रेष्ठ) | उपमान | श्रेष्ठता का कारण |
|---|---|---|
| सिय नयन (सीता के नेत्र) | खंजन पक्षी | खंजन नेत्रों की बराबरी न कर सका, इसलिए तारों में छिप गया |
व्याख्या: खंजन पक्षी उड़कर आकाश में तारों के साथ छिप गए, क्योंकि वे सीता जी के नेत्रों की बराबरी नहीं कर पाए — नेत्रों की सुंदरता इतनी अधिक कि उपमान को हार माननी पड़ी।
| उपमेय (श्रेष्ठ) | उपमान | श्रेष्ठता का कारण |
|---|---|---|
| वह (नायिका का मुख) | चंद | चंद कलंकी है, मुख निकलंक (बेदाग) |
व्याख्या: यह व्यतिरेक का सबसे संक्षिप्त और सटीक सूत्र है — एक ही पंक्ति में उपमान का दोष और उपमेय का गुण बता दिया गया है।
| अंतर का आधार | अपह्नुति अलंकार | व्यतिरेक अलंकार | प्रतीप अलंकार |
|---|---|---|---|
| शाब्दिक अर्थ | छिपाना या इनकार करना। | आधिक्य या बढ़-चढ़कर होना। | उल्टा या विपरीत (उपमा का उल्टा)। |
| मूल परिभाषा | उपमेय (असली वस्तु) को नकार कर उपमान (काल्पनिक वस्तु) की स्थापना करना। | उपमेय को उपमान से श्रेष्ठ बताना, और उसका कारण (गुण/दोष) भी देना। | उपमान को उपमेय से हीन (तुच्छ) बताना या उपमान को ही उपमेय बना देना। |
| पहचान की ट्रिक | पंक्ति में 'नहीं', 'न' शब्दों का अनिवार्य प्रयोग होता है। | उपमान की कोई कमी और उपमेय का कोई गुण स्पष्ट रूप से बताया जाता है। | उपमान के लिए 'बापुरो' (बेचारा), 'रंक' (गरीब) जैसे शब्दों का प्रयोग होता है। |
| उपमेय की स्थिति | उपमेय का अस्तित्व ही मिटा दिया जाता है। | उपमेय श्रेष्ठ होता है (ठोस कारण के साथ)। | उपमेय श्रेष्ठ होता है (बिना कारण के या तिरस्कार से)। |
| सरल उदाहरण | यह मुख नहीं, चंद्रमा है। | मुख चंद्रमा से सुंदर है, क्योंकि चाँद में दाग है। | चंद्रमा तो बेचारा तुम्हारे मुख के समान है। |
| परीक्षाओं के PYQ उदाहरण | सत्य कहहुँ दीनदयाला। बंधु न होय, मोर यह काला॥ | साधु ऊँचे शैल सम, किंतु प्रकृति सुकुमार। | सिय मुख समता किमि करै, चंद बापुरो रंक। |
'दृष्टांत' का अर्थ है 'उदाहरण' या 'प्रमाण'। जहाँ किसी बात को स्पष्ट करने के लिए उसी के समान कोई दूसरी बात (उदाहरण के रूप में) कही जाए, और दोनों बातों में बिंब-प्रतिबिंब भाव (परछाईं जैसा संबंध) हो, बिना किसी वाचक शब्द के — वहाँ दृष्टांत अलंकार होता है।
काव्य पंक्ति में दो अलग-अलग बातें होंगी जो अर्थ के स्तर पर एक जैसी लगेंगी (पहली लाइन थ्योरी, दूसरी लाइन उसका उदाहरण)। सबसे बड़ी पहचान — इसमें उपमा की तरह वाचक शब्द (जैसे, ज्यों, जिमि, सम, सा) का प्रयोग बिल्कुल नहीं होता, दोनों पंक्तियाँ स्वतंत्र होती हैं।
किसी और पर प्रेम नारियाँ, पति का क्या सह सकती हैं॥
| कथन (बिंब) | उदाहरण (प्रतिबिंब) |
|---|---|
| स्त्रियाँ पति का किसी अन्य के प्रति प्रेम सहन नहीं करतीं | एक म्यान में दो तलवारें नहीं समातीं |
व्याख्या: यह दृष्टांत का सबसे विख्यात उदाहरण है — पहली पंक्ति के कथन को सिद्ध करने के लिए दूसरी पंक्ति में ठीक वैसा ही बिंब दिया गया है, कोई 'जैसे/ज्यों' शब्द नहीं है।
पवन जगावत आग को, दीपहिं देत बुझाय॥
| कथन (बिंब) | उदाहरण (प्रतिबिंब) |
|---|---|
| बलवान की सब सहायता करते हैं, निर्बल का कोई नहीं | हवा आग को भड़काती है, दीपक को बुझा देती है |
व्याख्या: पहली पंक्ति में सामाजिक सत्य बताया गया है, दूसरी पंक्ति में हवा और आग के उदाहरण से उसका प्रतिबिंब प्रस्तुत किया गया है।
चंदन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग॥
| कथन (बिंब) | उदाहरण (प्रतिबिंब) |
|---|---|
| उत्तम स्वभाव वाले को बुरी संगति कुछ नहीं बिगाड़ती | चंदन के पेड़ पर साँप लिपटे रहते हैं, पर विष नहीं फैलता |
व्याख्या: सज्जन की प्रकृति (पहली पंक्ति) का प्रतिबिंब चंदन के पेड़ (दूसरी पंक्ति) से दिखाया गया है, बिना किसी तुलनात्मक शब्द के।
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय॥
| कथन (बिंब) | उदाहरण (प्रतिबिंब) |
|---|---|
| बिगड़ी बात लाख कोशिश करने पर भी नहीं बनती | फटे दूध को मथने से मक्खन नहीं निकलता |
व्याख्या: बिगड़े हुए काम की तुलना फटे दूध से करके बिंब-प्रतिबिंब भाव उत्पन्न किया गया है। परीक्षाओं में यह दोहा बार-बार पूछा जाता है।
रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निसान॥
| कथन (बिंब) | उदाहरण (प्रतिबिंब) |
|---|---|
| निरंतर अभ्यास से मूर्ख भी बुद्धिमान बन जाता है | कोमल रस्सी के बार-बार आने-जाने से पत्थर पर निशान पड़ जाते हैं |
व्याख्या: अभ्यास के महत्त्व (कथन) को रस्सी और पत्थर के सुंदर उदाहरण (दृष्टांत) से पुष्ट किया गया है।
पारस परस कुधात सुहाई॥
| कथन (बिंब) | उदाहरण (प्रतिबिंब) |
|---|---|
| दुष्ट मनुष्य भी संतों की संगति पाकर सुधर जाते हैं | पारस पत्थर के स्पर्श से लोहा भी सोना बन जाता है |
व्याख्या: तुलसीदास जी की इस चौपाई में पहली पंक्ति के दावे को दूसरी पंक्ति में पारस पत्थर के उदाहरण से सिद्ध किया गया है।
जाहि निकारौ गेह ते, कस न भेद कहि देइ॥
| कथन (बिंब) | उदाहरण (प्रतिबिंब) |
|---|---|
| आँसू मन के छिपे दुःख को बाहर प्रकट कर देते हैं | घर से निकाला गया व्यक्ति घर का भेद क्यों न बताए |
व्याख्या: यहाँ आँसुओं को आँख (घर) से निकाला गया सदस्य माना गया है — घर से निकाले गए व्यक्ति के उदाहरण से आँसुओं की स्थिति प्रमाणित की गई है।
देखो भयंकर भेड़िये भी आज आँसू ढालते॥
| कथन (बिंब) | उदाहरण (प्रतिबिंब) |
|---|---|
| पापी मनुष्य आज (स्वार्थवश) राम का नाम जप रहे हैं | खूँखार भेड़िये शिकार के बाद घड़ियाली आँसू बहाते हैं |
व्याख्या: पापी मनुष्य के कृत्य का प्रतिबिंब भयंकर भेड़िये के कृत्य से दिखाया गया है।
आध सेर के पात्र में, कैसे सेर समात॥
| कथन (बिंब) | उदाहरण (प्रतिबिंब) |
|---|---|
| ओछे व्यक्ति के पेट में कोई गंभीर बात नहीं पचती | आधे सेर के बर्तन में एक सेर वस्तु नहीं समाती |
व्याख्या: व्यक्ति की क्षमता (कथन) का दृष्टांत बर्तन की क्षमता (उदाहरण) से प्रस्तुत किया गया है।
फिर घन में ओझल हो शशि, फिर शशि में ओझल हो घन॥
| कथन (बिंब) | उदाहरण (प्रतिबिंब) |
|---|---|
| सुख और दुःख दोनों के मिलन से जीवन पूर्ण होता है | कभी बादलों के पीछे चाँद छिपता है, कभी चाँद के प्रकाश में बादल |
व्याख्या: मानव जीवन के सुख-दुख (उपमेय वाक्य) का दृष्टांत चाँद-बादलों की लुकाछिपी (उपमान वाक्य) के माध्यम से दिया गया है।
| अलंकार | वाचक शब्द (पहचान-शब्द) |
|---|---|
| उपमा | सा सी से सम सरिस इव जैसे समान तुल्य |
| उत्प्रेक्षा | मनु मनहु मानो मनो जनु जनहु जानो जनो ज्यों यों |
| भ्रांतिमान | जानि मानि जान समझ समझकर भ्रम भ्रांति मानकर विचारि |
| संदेह | या अथवा कि कैधौं किंवा क्या |
| विभावना | बिनु बिना रहित बिन |
| अपह्नुति | न नहीं नहिं नाहिं जिनि मिष (बहाने) |
"कनक कनक तें सौ गुनी..." — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
"रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून" — यहाँ 'पानी' के कितने अर्थ हैं?
उपमा अलंकार के कितने अनिवार्य अंग होते हैं?
रूपक अलंकार की पहचान के लिए क्या देखते हैं?
"नाइन बैठी महावरी जानि एड़ी मीड़ति जाय" — इसमें कौन-सा अलंकार है?
विभावना और विशेषोक्ति में मुख्य अंतर क्या है?
उत्प्रेक्षा अलंकार के वाचक शब्द कौन-से हैं?
अनुप्रास के किस भेद में पूरे वाक्य-खंड की आवृत्ति होती है परंतु तात्पर्य बदल जाता है?
"बूढ़े पीपल ने आगे बढ़कर जुहार की" — इसमें कौन-सा अलंकार है?
वक्रोक्ति अलंकार के कितने भेद होते हैं?