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हिंदी अलंकार
सम्पूर्ण नोट्स

Alankar (Figures of Speech) — Complete Study Notes with PYQs

14अलंकार
100+उदाहरण
50+PYQ संदर्भ
10MCQ प्रश्न
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शब्दालंकार (Shabdalankar)
शब्दों की ध्वनि या संरचना से सौंदर्य — पर्यायवाची रखने से अलंकार नष्ट हो जाता है
4 अलंकार
अनुप्रास अलंकार
Anupras Alankar — Alliteration | शब्दालंकार

जहाँ काव्य-पंक्तियों में किसी एक या एकाधिक व्यंजन वर्णों की क्रमानुसार आवृत्ति (Repetition) होती है, जिससे काव्य में नाद-सौंदर्य (Phonetic beauty) उत्पन्न हो, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।

📌 पहचान: व्यंजन वर्णों की आवृत्ति | वाचक शब्द: वर्णमैत्री, नाद-सौंदर्य
अनुप्रास के पाँच भेद
क. छेकानुप्रास — जहाँ वर्ण स्वरूप और क्रम से केवल 2 बार लगातार आए
  • दीनबंधु दुखियों के दुख दूर करो। — ('द' वर्ण 2-2 बार लगातार — 'दीनबंधु दुखियों' और 'दुख दूर'। इसलिए यह वृत्त्यनुप्रास से हटकर यहाँ आया है)
  • चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रही हैं जल-थल में। — ('च' वर्ण 2 बार लगातार — 'चारु चंद्र'। इसलिए इसे भी यहाँ रखा गया है)
  • संसार की समरस्थली में धीरता धारण करो। — ('स' और 'ध' वर्ण 2-2 बार लगातार — 'संसार समरस्थली' और 'धीरता धारण')
  • बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय। — ('ल' वर्ण 2 बार लगातार — 'लालच लाल')
  • कानन कठिन भयंकर भारी, घोर घाम हिम बारि बयारी। — ('क', 'भ', 'घ', 'ब' वर्णों के जोड़े 2-2 बार लगातार)
  • अमिअ मूरिमय चूरन चारू, समन सकल भव रुज परिवारू। — ('च' और 'स' वर्ण 2-2 बार लगातार — 'चूरन चारू' और 'समन सकल')
  • बंदौ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि। — ('क' वर्ण 2 बार लगातार — 'कंज कृपा')
ख. वृत्त्यनुप्रास — जहाँ कोई वर्ण 3 या उससे अधिक बार लगातार आए
  • रघुपति राघव राजा राम, पतित पावन सीता राम। — ('र' वर्ण लगातार 4 बार आवृत्ति)
  • मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो। — ('म' वर्ण लगातार 3 बार — 'मैया मोरी मैं')
  • तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए। — ('त' वर्ण लगातार 5 बार)
  • मुदित महीपति मंदिर आए, सेवक सचिव समंत बुलाए। — ('म' और 'स' वर्ण लगातार 3-3 बार)
  • कालिंदी कूल कदंब की डारन। — ('क' वर्ण लगातार 3 बार)
  • बंदउँ गुरु पद पदुम परागा, सुरुचि सुबास सरस अनुरागा। — ('प' और 'स' वर्ण लगातार 3-3 बार)
  • सठ सुधरहिं सतसंगति पाई, पारस परस कुधात सहाई। — ('स' वर्ण लगातार 3 बार — 'सठ सुधरहिं सतसंगति')
  • कल कानन कुंडल मोरपखा, उर पे बनमाल बिराजति है। — ('क' वर्ण लगातार 3 बार)
  • विमल वाणी ने वीणा ली, कमल कोमल कर में सप्रीत। — ('क' वर्ण लगातार 3 बार — 'कमल कोमल कर')
  • भव्य भावों में भयानक भावना भरना नहीं। — ('भ' वर्ण लगातार 5 बार)
  • कूलन में केलि में कछारन में कुंजन में, क्यारिन में कलिन कलीन किलकंत है। — ('क' वर्ण बहुतायत में लगातार)
  • रीझि रीझि रहसि रहसि हँसि हँसि उठै। — ('र' वर्ण लगातार 4 बार — 'रीझि रीझि रहसि रहसि')
ग. लाटानुप्रास — जहाँ पूरे वाक्य-खंड की आवृत्ति हो परंतु तात्पर्य बदल जाए
📖 विस्तृत परिभाषा

लाटानुप्रास में शब्द और वाक्य-खंड हू-ब-हू दोहराए जाते हैं परंतु उनका तात्पर्य (Purport / अभिप्राय) भिन्न हो जाता है। यह केवल वर्ण-आवृत्ति नहीं, बल्कि सम्पूर्ण पद या वाक्यांश की पुनरावृत्ति है जिसमें संदर्भ बदलने से अर्थ का नया आयाम खुलता है।

🔑 पहचान-सूत्र: वाक्य-खंड शब्दशः समान + तात्पर्य / अभिप्राय भिन्न
1
उदाहरण ⭐ सर्वाधिक पूछा गया
"पूत सपूत तो क्यों धन संचय,
पूत कपूत तो क्यों धन संचय।"
पंक्तिदोहराया गया खंडतात्पर्य
प्रथम पंक्ति "तो क्यों धन संचय" पुत्र सुयोग्य है तो धन उसके लिए आवश्यक नहीं — वह स्वयं अर्जन करेगा
द्वितीय पंक्ति "तो क्यों धन संचय" (वही शब्द) पुत्र कुयोग्य है तो धन संचय व्यर्थ है — वह उसे नष्ट कर देगा
2
उदाहरण
"तेगबहादुर, हाँ, वे ही थे गुरु-पदवी के पात्र समर्थ,
तेगबहादुर, हाँ, वे ही थे गुरु-पदवी थी जिनके अर्थ।"
पंक्तिदोहराया गया खंडतात्पर्य
प्रथम पंक्ति "तेगबहादुर, हाँ, वे ही थे" + "गुरु-पदवी" वे गुरु-पदवी पाने में पूर्णतः समर्थ/योग्य थे — पद को धारण करने की क्षमता पर बल
द्वितीय पंक्ति "तेगबहादुर, हाँ, वे ही थे" + "गुरु-पदवी" (वही शब्द) गुरु-पदवी का सच्चा अर्थ/प्रयोजन ही वे थे — पद उन्हीं के कारण सार्थक हुआ

यह लाटानुप्रास कैसे है: दोनों पंक्तियों में "तेगबहादुर, हाँ, वे ही थे" और "गुरु-पदवी" शब्द-समूह शब्दशः ज्यों के त्यों दोहराए गए हैं, परंतु पहली पंक्ति में बल "समर्थता/योग्यता" पर है जबकि दूसरी में बल "पदवी की सार्थकता/अर्थवत्ता" पर — अर्थात् शब्द एक हैं, तात्पर्य भिन्न है। यही लाटानुप्रास की कसौटी है।

घ. श्रुत्यनुप्रास — जहाँ एक ही उच्चारण स्थान वाले वर्णों की आवृत्ति हो
"तुलसीदास सीदत निसिदिन, देखत तुम्हारि निठुराई।"
दंत्य वर्णों: त, द, स, न की आवृत्ति — श्रवण-माधुर्य उत्पन्न करती है।
ङ. अन्त्यानुप्रास — जहाँ पंक्तियों के अंत में समान तुकबंदी (Rhyme) हो
  • बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी। — ('नी थी' की तुकबंदी)
  • छोरटी है गोरटी या चोरटी अहीर की। — ('रटी' शब्द की तुकबंदी)
  • जय हनुमान ज्ञान गुन सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर। — ('गर' शब्द की तुकबंदी)
यमक अलंकार
Yamak Alankar — Repeated Word, Different Meanings | शब्दालंकार

जहाँ काव्य में एक ही शब्द की दो या दो से अधिक बार आवृत्ति हो, परंतु प्रत्येक बार उसका अर्थ सर्वथा भिन्न हो, वहाँ यमक अलंकार होता है।

📌 सूत्र: एक शब्द + दो बार + भिन्न अर्थ | वाचक: शब्द की पुनरावृत्ति
यमक में शब्द एक ही रहता है — अर्थ बदलता हैश्लेष में शब्द एक बार आता है — अर्थ एक साथ कई होते हैं
1
उदाहरण ⭐ UKPSC Favourite
कनक कनक तें सौ गुनी, मादकता अधिकाय।
वा खाए बौराय जग, या पाए बौराय।
शब्द प्रथम अर्थ द्वितीय अर्थ
कनक स्वर्ण / Gold — जिसे पाने से मद चढ़ता है धतूरा / Datura — जिसे खाने से मद चढ़ता है
2
उदाहरण RO/ARO
काली घटा का घमंड घटा।
शब्दप्रथम अर्थद्वितीय अर्थ
घटा वर्षा ऋतु के काले बादल कम होना / क्षीण होना
3
उदाहरण
तीन बेर खाती थी वे तीन बेर खाती हैं।
शब्दप्रथम अर्थद्वितीय अर्थ
बेरबार / आवृत्ति — तीन बारएक प्रकार का फल (Berries)
4
उदाहरण UKSSSC VDO
जेते तुम तारे, तते नभ में न तारे हैं।
शब्दप्रथम अर्थद्वितीय अर्थ
तारेउद्धार करना / भवसागर से पार लगानाआकाश के नक्षत्र (Stars)
5
उदाहरण UPTET
माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर॥
शब्दप्रथम अर्थद्वितीय अर्थ
मनकामाला का दाना (Bead)हृदय का / मन के विचारों का
6
उदाहरण
कहे कवि बेनी, बेनी ब्याल की चुराई लीनी।
शब्दप्रथम अर्थद्वितीय अर्थ
बेनीरीतिकालीन कवि 'बेनीप्रसाद'बालों की चोटी (Braid)
7
उदाहरण UPPCS
तो पर वारौं उरबसी, सुनु राधिके सुजान।
तू मोहन के उरबसी, ह्वै उरबसी समान॥
शब्दअर्थ
उरबसी (तीन अर्थ)प्रथम: स्वर्ग की अप्सरा 'उर्वशी'
द्वितीय: उर (हृदय) + बसी (निवास करना)
तृतीय: गले में पहना जाने वाला एक विशिष्ट आभूषण
8
उदाहरण
सूर सूर तुलसी ससी, उडुगन केशवदास।
शब्दप्रथम अर्थद्वितीय अर्थ
सूरकवि 'सूरदास' जीसूर्य (Sun)
9
उदाहरण
सारंग ले सारंग चली, कर सारंग की ओट।
सारंग झीनो पाइके, सारंग कर गई चोट॥
शब्दअर्थ
सारंग (5 प्रयोग)1. दीपक
2. सुंदरी / स्त्री
3. आँचल / पल्लू
4. हवा
5. दीपक

अर्थ: एक सुंदरी एक जलते हुए दीपक को अपने आँचल की ओट (सहारा) में लेकर जा रही थी। लेकिन आँचल का कपड़ा झीना (पतला) पाकर हवा ने उस पर चोट की और दीपक को बुझा दिया।

श्लेष अलंकार
Shlesh Alankar — Multiple Meanings from One Word | शब्दालंकार

'श्लिष्ट' का अर्थ होता है— 'चिपका हुआ'। जहाँ काव्य में कोई शब्द केवल एक ही बार प्रयुक्त हो, परंतु प्रसंग-भेद के कारण उसके अनेक अर्थ निकलते हों, वहाँ श्लेष अलंकार होता है।

📌 सूत्र: एक शब्द + एक बार + अनेक अर्थ एकसाथ | वाचक: दो-अर्थी शब्द
यमक vs श्लेष: यमक में शब्द दो बार आता है, श्लेष में एक बार — परंतु एक ही शब्द के एक साथ कई अर्थ होते हैं।
1
उदाहरण ⭐ UKPSC Favourite
रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरैं, मोती मानुष चून।
पानी — किसके लिएअर्थ
मोती के लिएचमक / कांति
मनुष्य के लिएआत्मसम्मान / इज्जत
चून के लिएजल
2
उदाहरण RO/ARO
सुबरन को खोजत फिरत, कवि, व्यभिचारी, चोर।
सुबरन — किसके लिएअर्थ
कवि के लिएसुंदर अक्षर / अच्छे शब्द
व्यभिचारी के लिएसुंदर रूप / यौवन
चोर के लिएस्वर्ण / सोना
3
उदाहरण
मंगन को देखि पट देत बार-बार है।
शब्दप्रथम अर्थद्वितीय अर्थ
पटवस्त्र — भिक्षुक को वस्त्र दान करनाकिवाड़ / दरवाज़ा — भिक्षुक को देखकर दरवाज़ा बंद कर लेना
4
उदाहरण UKSSSC
जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय।
बारे उजियारो करै, बढ़े अँधेरो होय॥
शब्ददीपक के लिएकुपुत्र के लिए
बारेप्रज्वलित करने परबचपन में
बढ़ेबुझ जाने परयुवा / बड़ा होने पर
5
उदाहरण TGT/PGT
रावण सिर सरोज बन चारी। चलि रघुबीर सिलीमुख धारी॥
शब्दप्रथम अर्थद्वितीय अर्थ
सिलीमुखबाण / तीर — जो श्रीराम संधान कर रहे हैंभ्रमर / भौंरा — जो कमल-रूपी रावण के सिरों पर मंडरा रहे हैं
6
उदाहरण
नवजीवन दो घनश्याम हमें।
शब्दप्रथम अर्थद्वितीय अर्थ
घनश्यामकाले बादल — जो वर्षा द्वारा प्रकृति को नवजीवन देते हैंभगवान श्रीकृष्ण — जो भक्तों का उद्धार करते हैं
7
उदाहरण UPPCS
माया महाठगिनि हम जानी। तिरगुन फाँस लिए कर डोलै, बोलै मधुरी बानी।
शब्दप्रथम अर्थद्वितीय अर्थ
तिरगुनसत्व, रज, और तम (दर्शनशास्त्र के तीन गुण)तीन धागों वाली रस्सी
8
उदाहरण
विपुल धन अनेकों रत्न हो साथ लाये।
प्रियतम बतला दो लाल मेरा कहाँ है?
शब्दप्रथम अर्थद्वितीय अर्थ
लालएक बहुमूल्य रत्न (Ruby)बेटा / पुत्र
9
उदाहरण बिहारी सतसई
चिरजीवौ जोरी जुरै, क्यों न सनेह गंभीर।
को घटि ये वृषभानुजा, वे हलधर के बीर॥
शब्दप्रथम अर्थ (राधा-कृष्ण)द्वितीय अर्थ (गाय-बैल)
वृषभानुजावृषभानु + जा (पुत्री) = राधा जीवृषभ (बैल) + अनुजा (छोटी बहन) = गाय
हलधर के बीरहलधर (बलराम जी) के भाई = श्री कृष्णहलधर (हल खींचने वाला बैल) के भाई = बैल

पहला अर्थ (राधा-कृष्ण के संदर्भ में): कवि बिहारीलाल जी कहते हैं कि राधा और कृष्ण की यह जोड़ी चिरंजीवी हो (युगों-युगों तक बनी रहे)। इन दोनों के बीच गहरा प्रेम क्यों न हो! इनमें से कोई भी किसी से कम नहीं है। यदि ये (राधा जी) राजा 'वृषभानु' की पुत्री हैं, तो वे (श्री कृष्ण) भी 'हलधर' (बलराम जी) के भाई हैं।

दूसरा अर्थ (गाय-बैल के संदर्भ में): कवि कहते हैं कि इस जोड़ी की आयु लंबी हो, इनमें गहरा लगाव क्यों न हो! इनमें कोई किसी से कम नहीं है, अगर एक वृषभ (बैल) की अनुजा (गाय) है, तो दूसरा भी हल को धारण करने वाले का भाई (अर्थात् बैल) ही है।

वक्रोक्ति अलंकार
Vakrokti Alankar — Twisted or Indirect Statement | PYQ Special

जहाँ वक्ता के कथन का श्रोता द्वारा कंठ-ध्वनि (आवाज़ के लहजे) या श्लेष (शब्द के अनेक अर्थ) के कारण कोई भिन्न या व्यंग्यात्मक अर्थ निकाल लिया जाए, वहाँ वक्रोक्ति अलंकार होता है।

क. काकु वक्रोक्ति — कंठ-ध्वनि (Tone) के कारण अर्थ बदले
1
उदाहरण ⭐ RO/ARO VDO Favourite
मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू, तुमहिं उचित तप मोकहुँ भोगू।

व्याख्या: शाब्दिक अर्थ: "हे स्वामी! मैं सुकुमारी हूँ, अतः मेरे लिए सुख भोगना उचित है और आप वन के कठोर तप के योग्य हैं।"
काकु (लहज़े) से व्यंग्यार्थ: सीता जी के बोलने के लहज़े से यहाँ एक विपरीत अर्थ उत्पन्न होता है— "क्या मैं (आपकी अर्धांगिनी होकर) केवल महल के सुख भोगने के योग्य हूँ और आप वन में कठोर तप करने के योग्य हैं?" इस प्रश्नवाचक लहज़े का स्पष्ट अर्थ यही है कि वे किसी भी स्थिति में श्री राम के बिना सुख नहीं भोगेंगी और उनके साथ वन की सभी कठिनाइयाँ सहेंगी।

2
उदाहरण
को नृप होउ हमें का हानी, चेरि छाड़ि अब होब कि रानी।

व्याख्या: शाब्दिक अर्थ: "कोई भी राजा बने, मुझे क्या हानि? क्या मैं दासी का पद छोड़कर रानी बन जाऊँगी?"
काकु (लहज़े) से व्यंग्यार्थ: मंथरा का लहज़ा यहाँ 'उदासीनता का ढोंग' है। वह अपनी स्थिति नहीं, बल्कि कैकेयी के 'सत्ता खोने' के डर को उजागर कर रही है। वह व्यंग्य करती है— "मैं तो दासी हूँ और रहूँगी, पर क्या आप रानी बनी रहेंगी?"

ख. श्लेष वक्रोक्ति — शब्द के अनेक अर्थ होने के कारण श्रोता जानबूझकर भिन्न अर्थ निकाले
1
उदाहरण UKPSC
को तुम हो इत आये कहाँ, घनश्याम हो तो कितहूँ बरसो।
चितचोर कहावत हैं हम तो तहाँ जाओ जहाँ धन है सरसो॥

व्याख्या: कृष्ण 'घनश्याम' और 'चितचोर' कहकर परिचय देते हैं। राधा जानबूझकर 'घनश्याम' = काले बादल और 'चितचोर' = धन चुराने वाला चोर अर्थ निकालती हैं — 'बादल हो तो कहीं और बरसो, चोर हो तो वहाँ जाओ जहाँ भारी संपत्ति हो।'

2
उदाहरण
कौन द्वार पर? हरि मैं राधे, क्या वानर का काम यहाँ?
कृष्ण नाम है मेरा गोरी, तो क्या काले का काम यहाँ?

व्याख्या: कृष्ण 'हरि' हूँ कहते हैं। राधा 'हरि' का दूसरा अर्थ 'वानर' (बंदर) निकालकर कहती हैं — बंदर का घर के अंदर क्या काम? फिर 'कृष्ण' = काला — राधा: 'तो काले का यहाँ क्या काम?'

3
उदाहरण TGT/PGT
भिक्षुक गो कित को गिरजे, सो तो मांगन को बलि द्वार गयो री।
पशुपाल कहाँ सजनी! जमुना तट धेनु चरावत री॥

व्याख्या: लक्ष्मी जी पार्वती से पूछती हैं — तुम्हारा 'भिक्षुक' (शिव) कहाँ है? पार्वती 'भिक्षुक' = वामन अवतार (विष्णु) अर्थ लेकर कहती हैं — वो राजा बलि के द्वार दान माँगने गए। 'पशुपाल' = कृष्ण — यमुना किनारे गाय चरा रहे हैं।

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अर्थालंकार (Arthalankar)
अर्थ (meaning) से सौंदर्य — पर्यायवाची रखने पर भी अलंकार का सौंदर्य बना रहता है
10 अलंकार

अर्थालंकार (Arthalankar)

जहाँ काव्य में शब्दों के 'अर्थ' के कारण चमत्कार, आकर्षण या सौंदर्य उत्पन्न होता है, वहाँ अर्थालंकार होता है। विशेषता: यदि शब्दों के स्थान पर पर्यायवाची शब्द भी रख दिए जाएँ, तो भी अलंकार का सौंदर्य नष्ट नहीं होता।

उपमा रूपक उत्प्रेक्षा अतिशयोक्ति भ्रांतिमान संदेह
उपमा अलंकार
Upma Alankar — Simile | अर्थालंकार का प्रथम भेद

'उपमा' शब्द दो शब्दों से बना है — 'उप' (समीप) + 'मा' (मापना/तौलना)। जहाँ किसी प्रस्तुत वस्तु (उपमेय) की तुलना किसी अप्रस्तुत, अत्यंत प्रसिद्ध वस्तु (उपमान) से उनके रूप, रंग, गुण या स्वभाव की समानता के आधार पर की जाती है, वहाँ उपमा अलंकार होता है।

उपमा के चार आवश्यक अंग (Components of Upma)
अंग १
उपमेय (प्रस्तुत)
जिसकी तुलना की जा रही है। जैसे: मुख, मन, शरीर
अंग २
उपमान (अप्रस्तुत)
जिससे तुलना की जा रही है। जैसे: चंद्रमा, पीपल का पत्ता
अंग ३
वाचक शब्द
समानता प्रकट करने वाला। जैसे: सा, सी, से, सम, सरिस, इव
अंग ४
साधारण धर्म
दोनों में समान गुण/स्वभाव। जैसे: सुंदर, कोमल, शांत
💡 वाचक शब्द — याद रखें
सासीसे समसरिसइव जैसेसमानतुल्य
1
UKPSC VDO
"पीपर पात सरिस मन डोला।"
उपमेयउपमानवाचकसाधारण धर्म
मनपीपर पात (पीपल का पत्ता)सरिसडोला (काँपना)
2
UPPSC RO/ARO
"मुख मयंक सम मंजु मनोहर।"
उपमेयउपमानवाचकसाधारण धर्म
मुखमयंक (चंद्रमा)सममंजु मनोहर (सुंदरता)
3
BPSC/MPPSC
"हरिपद कोमल कमल से।"
उपमेयउपमानवाचकसाधारण धर्म
हरिपद (ईश्वर के चरण)कमलसेकोमल
4
UKSSSC/UPSSSC
"नवल सुंदर श्याम शरीर की, सजल नीरद सी कल कांति थी।"
उपमेयउपमानवाचकसाधारण धर्म
श्याम शरीर की कांतिसजल नीरद (बादल)सीकल / सुंदरता
5
UP RO/ARO/UKPSC
"मखमल के झूल पड़े, हाथी सा टीला।"
उपमेयउपमानवाचकसाधारण धर्म
टीलाहाथीसाविशालता (लुप्त)
6
UK TGT/PGT/VDO
"वह इष्टदेव के मंदिर की पूजा सी, वह दीपशिखा सी शांत, भाव में लीन।"
उपमेयउपमानवाचकसाधारण धर्म
वह (स्त्री)पूजा, दीपशिखासीशांत
7
UPTGT/MPSC
"कुंद इंदु सम देह, उमा रमन करुना अयन।"
उपमेयउपमानवाचकसाधारण धर्म
देह (शिवजी का शरीर)कुंद (फूल), इंदु (चंद्रमा)समश्वेत/सुंदरता (लुप्त)
8
UPTET/MPSC
"नील गगन सा शांत हृदय था रो रहा।"
उपमेयउपमानवाचकसाधारण धर्म
हृदयनील गगनसाशांत
9
UKPSC/UP RO-ARO
"कोटि कुलिश सम बचनु तुम्हारा।"
उपमेयउपमानवाचकसाधारण धर्म
बचनु (वचन)कोटि कुलिश (करोड़ों वज्र)समकठोरता (लुप्त)
10
UKSSSC/UPTET
"हाय! फूल-सी कोमल बच्ची, हुई राख की थी ढेरी।"
उपमेयउपमानवाचकसाधारण धर्म
बच्चीफूलसीकोमल
11
UPPCS
"यह देखिए, अरविंद-से शिशु-वृंद कैसे सो रहे।"
उपमेयउपमानवाचकसाधारण धर्म
शिशु-वृंद (बच्चे)अरविंद (कमल)सेसो रहे (शांत और सुंदर)
13
VDO/VPDO
"खिली हुई हवा आई, फिरकी सी आई, चली गई।"
उपमेयउपमानवाचकसाधारण धर्म
हवाफिरकी (खिलौना)सीआई, चली गई (घूमते हुए)
रूपक अलंकार
Rupak Alankar — Metaphor | अर्थालंकार

जहाँ उपमेय (प्रस्तुत) और उपमान (अप्रस्तुत) के बीच के सारे अंतर को समाप्त करके उन्हें एक ही मान लिया जाए, वहाँ रूपक अलंकार होता है। इसमें उपमेय पर उपमान का 'अभेद आरोप' किया जाता है — अर्थात एक वस्तु को दूसरी वस्तु का रूप ही दे दिया जाता है।

💡 एग्जाम मास्टर ट्रिक — रूपक पहचान

उपमेय-उपमान के बीच योजक चिह्न (-) होता है — जैसे: चरण-कमल, भव-निसा, ज्ञान-आँधी

वाचक शब्द (सा, सी, सम, सरिस, जैसे) बिल्कुल नहीं होते।

अर्थ करने पर बीच में 'रूपी' शब्द निकलता है — जैसे: चरण रूपी कमल।

उपमा vs रूपक — मुख्य अंतर
बिंदुउपमारूपक
वाचक शब्दसा, सी, से, सम, सरिस होते हैंबिल्कुल नहीं होते
अंतरउपमेय-उपमान अलग रहते हैंदोनों को एक मान लिया जाता है
पहचान शब्दजैसे, सम, सरिसरूपी (अर्थ में छिपा होता है)
उदाहरणमुख चंद्रमा 'सा' सुंदरशशि-मुख (मुख = ही चंद्रमा)
1
UKSSSC/UPTET
"चरन कमल बंदौ हरिराई।"
उपमेयउपमानभावार्थ (रूपी)
चरन (चरण)कमलश्री हरि के 'कमल रूपी चरणों' की वंदना करता हूँ।
2
UKPSC RO-ARO
"मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहौं।"
उपमेयउपमानभावार्थ (रूपी)
चंद्रमाखिलौनाबाल-कृष्ण कहते हैं — हे माता! मैं 'चंद्रमा रूपी खिलौना' ही लूँगा।
3
UPSSSC VDO
"अंबर पनघट में डुबो रही, तारा घट ऊषा नागरी।"
उपमेयउपमानभावार्थ (रूपी)
अंबर, तारा, ऊषापनघट, घट, नागरीऊषा रूपी स्त्री, आकाश रूपी पनघट में, तारा रूपी घड़ों को डुबो रही है (तारे छिप रहे हैं)।
4
Sub-Inspector/UKSSSC
"पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।"
उपमेयउपमानभावार्थ (रूपी)
राम नामरतन धनमीराबाई — मैंने 'राम के नाम रूपी' अनमोल रत्न-धन प्राप्त कर लिया।
5
UK TGT-PGT
"उदित उदयगिरि मंच पर, रघुबर बाल पतंग।"
उपमेयउपमानभावार्थ (रूपी)
उदयगिरि (पर्वत), रघुबर (राम)मंच, बाल पतंग (सूर्य)उदयाचल रूपी मंच पर राम रूपी बाल-सूर्य उदित हुए।
6
UP Police
"शशि-मुख पर घूँघट डाले।"
उपमेयउपमानभावार्थ (रूपी)
मुख (चेहरा)शशि (चंद्रमा)उस नायिका ने 'चंद्रमा रूपी मुख' पर घूँघट डाला हुआ है।
7
TGT Hindi
"विषय वारि मन मीन भिन्न नहिं होत कबहुँ पल एक।"
उपमेयउपमानभावार्थ (रूपी)
विषय, मनवारि (जल), मीन (मछली)'मन रूपी मछली' विषय-वासना रूपी 'जल' से एक पल भी अलग नहीं होती।
8
UKPSC
"मन सागर मनसा लहरि, बूड़े बहे अनेक।"
उपमेयउपमानभावार्थ (रूपी)
मन, मनसा (इच्छा)सागर, लहरि'मन रूपी सागर' और इच्छाएँ उसकी 'लहरें' — इसमें अनेक लोग डूब गए।
9
UP RO-ARO
"राम कृपा भव-निसा सिरानी।"
उपमेयउपमानभावार्थ (रूपी)
भव (संसार की मोह-माया)निसा (रात)राम की कृपा से 'भव (संसार) रूपी निसा (रात)' समाप्त हो गई — अज्ञान का अंधकार मिटा।
10
UPTET
"संतौ भाई आई ग्यान की आँधी रे।"
उपमेयउपमानभावार्थ (रूपी)
ग्यान (ज्ञान)आँधीकबीर — मेरे जीवन में 'ज्ञान रूपी आँधी' आ गई, जिसने सारे भ्रम उड़ा दिए।
11
BPSC
"मुख-कमल समीप सजे थे, दो किसलय दल पुरैन के।"
उपमेयउपमानभावार्थ (रूपी)
मुख (चेहरा)कमल'कमल रूपी मुख' के पास कान ऐसे सजे थे जैसे कमल के पत्ते।
12
VDO
"भज मन चरन कँवल अविनासी।"
उपमेयउपमानभावार्थ (रूपी)
चरन (चरण)कँवल (कमल)मीराबाई — हे मन! अविनाशी के 'कमल रूपी चरणों' का भजन कर।
13
General Hindi PYQ
"प्रेम-सलिल से द्वेष-अनल बुझ जाता है।"
उपमेयउपमानभावार्थ (रूपी)
प्रेम, द्वेषसलिल (जल), अनल (आग)'प्रेम रूपी जल' से 'द्वेष रूपी आग' बुझ जाती है।
14
Essay/Literature
"दुख हैं जीवन-तरु के फूल।"
उपमेयउपमानभावार्थ (रूपी)
जीवनतरु (वृक्ष)दुख इस 'जीवन रूपी वृक्ष' पर खिलने वाले फूल हैं — दुख आना स्वाभाविक है।
⭐ परीक्षा में सर्वाधिक पूछे
चरन-कमल · भव-निसा · ग्यान की आँधी · मन-सागर · राम रतन धन
उत्प्रेक्षा अलंकार
Utpreksha Alankar — Fancy / Imagination | अर्थालंकार

जहाँ उपमेय (प्रस्तुत) में उपमान (अप्रस्तुत) की 'संभावना' या 'कल्पना' की जाए — वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। जब एक वस्तु को दूसरी वस्तु मान लिया जाए या वैसा होने की कल्पना की जाए, तो वह उत्प्रेक्षा है।

💡 एग्जाम मास्टर ट्रिक — वाचक शब्द देखो, उत्प्रेक्षा लिखो!

इनमें से कोई भी दिखे → तुरंत उत्प्रेक्षा:

मनु मनहु मानो मनो जनु जनहु जानो जनो ज्यों यों

⚡ उपमा से अंतर: उपमा में सा/सी/से/सम → तुलना होती है। उत्प्रेक्षा में मनो/जनु → कल्पना/संभावना होती है।

1
UKPSC RO-ARO
सोहत ओढ़े पीत पट, स्याम सलोने गात।
मनो नीलमनि सैल पर, आतप परयो प्रभात॥
उपमेयउपमानवाचकभावार्थ / कल्पना
स्याम गात (श्याम शरीर)नीलमणि पर्वतमनोकृष्ण के सांवले तन पर पीले वस्त्र — मानो नीलमणि पर्वत पर सुबह की पीली धूप पड़ रही हो।
2
UPSSSC VDO
उस काल मारे क्रोध के, तन काँपने उसका लगा।
मानो हवा के ज़ोर से, सोता हुआ सागर जगा॥
उपमेयउपमानवाचकभावार्थ / कल्पना
काँपता शरीरजागता सागरमानोक्रोध से शरीर काँपा — मानो तेज हवा से सोया हुआ सागर जाग गया हो।
3
UKSSSC
सिर फट गया उसका वहीं, मानो अरुण रंग का घड़ा।
उपमेयउपमानवाचकभावार्थ / कल्पना
फटा सिरलाल घड़ामानोफटे सिर से बहता खून — मानो लाल रंग का घड़ा फूट गया हो।
4
TGT/PGT Hindi
कहती हुई यों उत्तरा के, नेत्र जल से भर गए।
हिम के कणों से पूर्ण मानो, हो गए पंकज नए॥
उपमेयउपमानवाचकभावार्थ / कल्पना
आँसुओं भरी आँखेंओस युक्त नए कमलमानोउत्तरा की आँखों में आँसू भर गए — मानो नए कमल पर ओस की बूँदें जम गई हों।
5
BPSC
चमचमात चंचल नयन, बिच घूँघट पट झीन।
मानहुँ सुरसरिता बिमल, जल उछरत जुग मीन॥
उपमेयउपमानवाचकभावार्थ / कल्पना
चंचल आँखें (घूँघट में)गंगा में उछलती दो मछलियाँमानहुँझीने घूँघट में चमकती आँखें — मानो गंगाजल में दो मछलियाँ उछल रही हों।
6
UKPSC VDO
लता भवन ते प्रगट भे, तेहि अवसर दोउ भाइ।
निकसे जनु जुग बिमल बिधु, जलद पटल बिलगाइ॥
उपमेयउपमानवाचकभावार्थ / कल्पना
दोनों भाई (राम-लक्ष्मण)दो चंद्रमाजनुलताओं से राम-लक्ष्मण निकले — मानो बादलों को हटाकर दो चंद्रमा प्रकट हो गए हों।
7
Sub-Inspector
ले चला साथ मैं तुझे कनक,
ज्यों भिक्षुक लेकर स्वर्ण झनक।
उपमेयउपमानवाचकभावार्थ / कल्पना
धतूरा (कनक)सोना (स्वर्ण)ज्योंकनक (धतूरे) को ले जाना — मानो भिखारी सोना पाकर उसे झंकार सहित ले जा रहा हो।
8
UPPSC
पाहुन ज्यों आए हों गाँव में शहर के।
मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के॥
उपमेयउपमानवाचकभावार्थ / कल्पना
सजे हुए मेघ (बादल)सज-धज कर आया पाहुन (दामाद)ज्योंसजे बादल ऐसे आए — मानो शहर का दामाद गाँव में सज-धज कर आया हो।
9
UPTET
अति कटु बचन कहति कैकेयी।
मानहु लोन जरे पर देई॥
उपमेयउपमानवाचकभावार्थ / कल्पना
कैकेयी के कड़वे वचनजले पर नमक छिड़कनामानहुकैकेयी के कड़वे वचन ऐसे थे — मानो जले हुए घाव पर नमक छिड़क दिया हो।
10
UKSSSC
फूले कास सकल महि छाई।
जनु बरषा रितु प्रगट बुढ़ाई॥
उपमेयउपमानवाचकभावार्थ / कल्पना
धरती पर कास के सफेद फूलवर्षा ऋतु का बुढ़ापा (सफेद बाल)जनुधरती पर कास के सफेद फूल — मानो वर्षा ऋतु का बुढ़ापा (सफेद बाल) प्रकट हो गया हो।
11
MPPSC
जान पड़ता है नेत्र देख बड़े-बड़े।
हीरों में गोल नीलम हैं जड़े॥
उपमेयउपमानवाचकभावार्थ / कल्पना
बड़े-बड़े नेत्रहीरों में जड़े नीलमजान (जानो)बड़े नेत्रों को देख — लगता है मानो हीरों में गोल नीलम जड़ दिए गए हों।
12
TGT/PGT
दादुर धुनि चहु दिशा सुहाई।
बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई॥
उपमेयउपमानवाचकभावार्थ / कल्पना
चारों दिशाओं में मेंढकों की ध्वनिविद्यार्थियों का वेद-पाठजनुमेंढकों की सुहावनी टर्र-टर्र — मानो विद्यार्थी समूह वेद के मंत्र पढ़ रहा हो।
🎯 तीनों अर्थालंकार — एक नज़र तुलना
उपमा · रूपक · उत्प्रेक्षा — Exam-Ready Quick Reference
बिंदु 🟢 उपमा (Simile) 🟠 रूपक (Metaphor) 🔵 उत्प्रेक्षा (Fancy)
मूल भाव तुलना करना एक मान लेना (अभेद) कल्पना / संभावना करना
वाचक शब्द सा/सी/से/सम/सरिस/जैसे/इव कोई नहीं — योजक (-) चिह्न मनो/मानो/जनु/जनहु/ज्यों/यों
उपमेय-उपमान अलग रहते हैं — तुलना होती है एक हो जाते हैं — अभेद आरोप कल्पना में एक होते हैं
पहचान वाचक शब्द खोजो → सा/सी/सम/से योजक (-) खोजो → चरन-कमल मनो/जनु/ज्यों खोजो → तुरंत उत्प्रेक्षा
उदाहरण मुख मयंक सम मंजु मनोहर शशि-मुख पर घूँघट डाले मानो हवा के ज़ोर से सोता सागर जगा
⚡ परीक्षा में तुरंत पहचान — चीट-शीट
🟢 उपमा
सा · सी · से · सम
सरिस · जैसे · इव
मुख मयंक सम मंजु
🟠 रूपक
योजक (-) चिह्न
अर्थ में 'रूपी'
चरन-कमल, भव-निसा
🔵 उत्प्रेक्षा
मनो · मानो · जनु
ज्यों · यों · मनहु
मनो नीलमनि सैल पर
अतिशयोक्ति अलंकार
Atishayokti Alankar — Exaggeration / Hyperbole | अर्थालंकार

'अतिशय' (बहुत अधिक) + 'उक्ति' (कथन) → जहाँ किसी व्यक्ति, वस्तु या स्थिति का वर्णन इतना बढ़ा-चढ़ाकर किया जाए कि वह लोक-मर्यादा या वास्तविकता (Reality) की सीमा को पार कर जाए — वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है।

💡 पहचान ट्रिक

कोई निश्चित वाचक शब्द नहीं होता। पंक्ति पढ़ने पर यदि लगे कि बात 'लॉजिक या विज्ञान' के एकदम विपरीत है या सरासर असंभव है — तो अतिशयोक्ति

⚡ उत्प्रेक्षा से अंतर: उत्प्रेक्षा में 'मनो/जनु' वाचक होते हैं और संभावना होती है। अतिशयोक्ति में ऐसा कोई वाचक नहीं — बात सीधे असंभव होती है।

1
UKPSC/UPTET
हनुमान की पूँछ में, लगन न पाई आग।
लंका सगरी जल गई, गए निसाचर भाग॥

पूँछ में आग लगने से पहले ही पूरी लंका जल गई और राक्षस भाग गए। असंभव बात: आग लगने से पहले ही जलना।

2
MPPSC/Sub-Inspector
आगे नदियाँ पड़ी अपार, घोड़ा कैसे उतरे पार।
राणा ने सोचा इस पार, तब तक चेतक था उस पार॥

प्रताप अभी सोच ही रहे थे कि नदी कैसे पार करें — तब तक चेतक उस पार पहुँच गया। असंभव बात: सोचने से भी तेज़ घोड़े का दौड़ना।

3
UPSSSC/UPTET
देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करिके करुनानिधि रोये।
पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सों पग धोये॥

कृष्ण इतने रोए कि परात का पानी छुआ ही नहीं — आँसुओं से ही सुदामा के पैर धो दिए। असंभव बात: केवल आँसुओं से पैर धुलना।

4
Screenshot PYQ
इतना रोया था मैं उस दिन,
ताल-तलैया सब भर डाले।

इतना ज़्यादा रोया कि आस-पास के सारे तालाब आँसुओं से भर गए। असंभव बात: रोने से तालाब भरना।

5
UP RO-ARO
देख लो साकेत नगरी है यही।
स्वर्ग से मिलने गगन में जा रही॥

साकेत (अयोध्या) की इमारतें इतनी ऊँची हैं कि आसमान में जाकर स्वर्ग से मिल रही हैं। असंभव बात: इमारतों का स्वर्ग तक पहुँचना।

6
UK TGT-PGT
वह शर इधर गाण्डीव गुण से भिन्न जैसे ही हुआ।
धड़ से जयद्रथ का उधर सिर छिन्न वैसे ही हुआ॥

तीर छूटते ही — उसी क्षण जयद्रथ का सिर धड़ से अलग हो गया। असंभव बात: तीर छूटने और लगने के बीच का समय शून्य।

7
State PCS
लहरें व्योम चूमती उठतीं।

समुद्र की लहरें इतनी ऊँची उठ रही हैं कि आसमान को चूम रही हैं। असंभव बात: लहरों का आकाश छूना।

8
BPSC
भूप सहस दस एकहिं बारा।
लगे उठावन टरहिं न टारा॥

दस हज़ार राजाओं ने एक साथ शिव-धनुष उठाना चाहा — फिर भी वह हिला नहीं। असंभव बात: एक धनुष पकड़ने के लिए 10,000 लोगों का एक साथ खड़ा होना।

9
UKSSSC
बाण नहीं पहुँचे शरीर तक,
शत्रु गिरे पहले ही भू पर।

तीर दुश्मन के शरीर तक पहुँचे भी नहीं — दुश्मन पहले ही डर कर गिर गए। असंभव बात: बाण लगने से पहले शत्रु का गिरना।

10
UKPSC Practice
कढ़त साथ ही म्यान तें, असि रिपु तन तें प्रान।

म्यान से तलवार बाहर निकलते ही — दुश्मन के प्राण निकल गए। असंभव बात: वार से पहले ही प्राण निकलना।

11
TGT Hindi
इत आवत चलि जात उत, चली छसातक हाथ।
चढ़ी हिंडोरे सी रहै, लगी उसासन साथ॥

विरह में कमजोर नायिका — साँस लेती है तो 6-7 हाथ आगे, साँस छोड़ती है तो 6-7 हाथ पीछे जाती है। असंभव बात: साँस से पेंडुलम की तरह झूलना।

12
UP TGT
पत्रा ही तिथि पाइये, वा घर के चहुँ पास।
नित प्रति पून्यौ ही रहै, आनन ओप उजास॥

नायिका के चेहरे की चमक से घर के आस-पास हमेशा पूर्णिमा जैसी रोशनी — असली तिथि पंचांग से जाननी पड़ती है। असंभव बात: चेहरे की चमक से हर रात पूर्णिमा होना।

भ्रांतिमान अलंकार
Bhrantiman Alankar — Illusion Leading to Action | अर्थालंकार

जहाँ रूप, रंग या गुण की अत्यधिक समानता के कारण 'उपमेय' में 'उपमान' का मिथ्या ज्ञान (निश्चित भ्रम) उत्पन्न हो जाए, और उसी भ्रम के वशीभूत होकर कोई क्रिया (Action) भी संपन्न कर ली जाए — वहाँ भ्रांतिमान अलंकार होता है।

(भ्रम + क्रिया — दोनों ज़रूरी हैं)

💡 पहचान ट्रिक + संदेह vs भ्रांतिमान

वाचक शब्द:

जानि मानि जान समझ समझकर भ्रम भ्रांति मानकर विचारि

⚡ भ्रांतिमान = भ्रम + क्रिया दोनों ज़रूरी। केवल भ्रम हो पर क्रिया न हो → भ्रांतिमान नहीं।

संदेह अलंकार:
अनिश्चय अंत तक बना रहे (यह रस्सी है या सर्प?) → संदेह।
भ्रांतिमान:
रस्सी को 'सर्प' मानकर भाग जाए → भ्रांतिमान।
1
नाक का मोती + तोता
नाक का मोती अधर की कान्ति से, बीज दाड़िम का समझकर भ्रान्ति से।
देखता ही रह गया शुक मौन है, सोचता है अन्य शुक यह कौन है॥
भ्रमितभ्रमक्रियावाचक
शुक (तोता) मोती → दाड़िम का बीज; नासिका → अन्य शुक मौन देखता रह गया (भ्रमित होकर रुक गया) समझकर, भ्रान्ति

व्याख्या: नायिका के लाल होंठों की चमक पड़ने से उसकी नाक का सफेद मोती लाल दिखने लगता है, जिसे तोता दाड़िम (अनार) का दाना समझ बैठता है। साथ ही उसकी नुकीली नाक को देखकर वह यह सोचकर मौन रह जाता है कि यहाँ कोई दूसरा तोता आ बैठा है।

2
हंसिनी + ओस बिंदु
ओस बिन्दु चुग रही हंसिनी, मोती उनको जान।
भ्रमितभ्रमक्रियावाचक
हंसिनी ओस की बूँदें → मोती चुगने लगी (क्रिया) जान

व्याख्या: प्रातःकाल घास पर पड़ी चमकदार ओस की बूँदों को देखकर हंसिनी को भ्रम होता है कि ये सच्चे मोती हैं, और वह उन्हें खाने के लिए चुगने लगती है।

3
नाइन + एड़ी
पायँ महावर देन को नाइन बैठी आय।
फिरि-फिरि जानि महावरी एड़ी मीड़ति जाय॥
भ्रमितभ्रमक्रियावाचक
नाइन नायिका की लाल एड़ी → पहले से लगा महावर बार-बार रगड़ती रही जानि

व्याख्या: नाइन नायिका के पैरों में महावर (आलता) लगाने बैठती है, पर नायिका की एड़ियाँ स्वाभाविक रूप से ही इतनी लाल हैं कि उसे भ्रम हो जाता है कि रंग पहले से लगा हुआ है। इसलिए वह रंग लगाने के बजाय उसे मिटाने के लिए बार-बार एड़ी रगड़ती रहती है।

4
सर्प + हाथी (दोनों भ्रमित)
बिल बिचारि प्रबिसन लग्यो नाग सूँड़ में ब्याल।
ताहि कारी ऊख भ्रम लियो उठाय उताल॥
भ्रमितभ्रमक्रियावाचक
सर्प + गजराज (दोनों) सूँड़ → बिल (सर्प को); सर्प → काली ईख (हाथी को) सर्प ने सूँड़ में घुसना चाहा; हाथी ने उठा लिया बिचारि, भ्रम

व्याख्या: यहाँ दोनों को एक-दूसरे से भ्रम होता है — साँप हाथी की सूँड़ को अपना बिल समझकर उसमें घुसने का प्रयास करता है, और हाथी उस काले साँप को काली ईख समझकर उसे तुरंत सूँड़ से उठा लेता है।

5
माता सीता + मुद्रिका
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब।
जानि असोक अङ्गार सीय हरषि उठि कर गहेउ॥
भ्रमितभ्रमक्रियावाचक
माता सीता स्वर्णिम मुद्रिका (अंगूठी) → प्रज्ज्वलित अंगार हर्षपूर्वक उठा लिया जानि

व्याख्या: अशोक वाटिका में हनुमान जी जब पेड़ से श्रीराम की चमकती स्वर्ण मुद्रिका नीचे गिराते हैं, तो सीता माता को भ्रम होता है कि यह अशोक वृक्ष द्वारा दिया गया सुलगता अंगार है, और वे प्राण त्यागने की इच्छा से प्रसन्न होकर उसे उठा लेती हैं।

6
शिशु (मुन्ना) + चोटी
मुन्ना तब मम्मी के सिर पर देख-देख दो चोटी।
भाग उठा भय मानकर सिर पर सापिन लोटी॥
भ्रमितभ्रमक्रियावाचक
शिशु (मुन्ना) माँ की दो चोटियाँ → सर्पिणी भयभीत होकर भाग गया मानकर

व्याख्या: छोटा बच्चा अपनी माँ के सिर पर गुंथी दो लंबी काली चोटियों को देखता है, और काले रंग व आकार की समानता के कारण उन्हें नागिनें समझकर डर से भाग खड़ा होता है।

7
भ्रमर + शुक (दोनों भ्रमित)
किंशुक कुसुम जानकर झपटा, भौंरा शुक की लाल तुंड पर।
तोते ने भी ठौर चलाई, जामुन का फल उसे समझकर॥
भ्रमितभ्रमक्रियावाचक
भ्रमर + शुक (दोनों) लाल चोंच → पलाश पुष्प (भ्रमर को); भ्रमर → जामुन फल (तोते को) भ्रमर ने झपट्टा मारा; तोते ने चोंच प्रहार किया जानकर, समझकर

व्याख्या: भौंरे को तोते की लाल चोंच देखकर भ्रम होता है कि यह पलाश (किंशुक) का लाल फूल है, इसलिए वह उस पर झपटता है; तोते को भी गोल काले भौंरे में जामुन के फल का भ्रम होता है, इसलिए वह भी उसे खाने के लिए चोंच चला देता है।

8
मयूर + श्रीकृष्ण
जानि स्याम को स्याम घन, नाच उठे बन मोर।
भ्रमितभ्रमक्रियावाचक
वन के मयूर श्याम वर्ण श्रीकृष्ण → काले बादल आनंदित होकर नाचने लगे जानि

व्याख्या: वन के मोरों को श्रीकृष्ण के सांवले रंग को देखकर आकाश में छाए काले बादलों का भ्रम हो जाता है, और बादल देखकर प्रसन्न होने की अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति के कारण वे आनंदित होकर नाचने लगते हैं।

9
मयूर + राधा-कृष्ण
वृन्दावन बिहरत फिरै, राधा नन्द किसोर।
नीरद दामिनि जानि संग, डोलैं बोलैं मोर॥
भ्रमितभ्रमक्रियावाचक
मयूर कृष्ण → नवनीरद (मेघ); राधा → दामिनी (विद्युत) आह्लादित होकर डोलने-बोलने लगे जानि

व्याख्या: राधा-कृष्ण को साथ वृंदावन में विहार करते देख मोरों को भ्रम होता है — सांवले कृष्ण में वर्षा के काले बादल और गोरी राधा में बिजली की चमक दिखाई देती है, जिससे वे प्रसन्न होकर झूमने और शोर मचाने लगते हैं।

10
पालतू मयूर + केश
बादल काले-काले केशों को देख निराले।
नाचा करते हैं हरदम पालतू मोर मतवाले॥
भ्रमितभ्रमक्रियावाचक
पालतू मयूर नायिका के काले केश → काले मेघ प्रफुल्लित होकर नृत्य करते हैं अनुमान (गुण-साम्य)

व्याख्या: नायिका के लंबे, घने काले बालों को देखकर घर के पालतू मोरों को आसमान में छाए काले बादलों का भ्रम हो जाता है, और इसी खुशी में वे मतवाले होकर नृत्य करने लगते हैं।

१०
संदेह अलंकार
Sandeh Alankar — Doubt / Dilemma | अर्थालंकार

जहाँ उपमेय और उपमान में रूप, रंग या गुण की अत्यधिक समानता के कारण यह अनिश्चय (दुविधा) बना रहे कि 'यह उपमेय है या उपमान' — वहाँ संदेह अलंकार होता है।

विशेषता: अंत तक संशय बना रहता है, बुद्धि कोई निश्चित निर्णय नहीं ले पाती और कोई क्रिया नहीं होती।

💡 एग्जाम ट्रिक — विकल्पसूचक वाचक शब्द
या अथवा कि कैधौं किंवा क्या

⚡ संदेह vs भ्रांतिमान: संदेह = अनिश्चय अंत तक, कोई क्रिया नहीं।  |  भ्रांतिमान = भ्रम + क्रिया दोनों।

1
द्रौपदी चीरहरण प्रसंग
सारी बिच नारी है कि नारी बिच सारी है।
कि सारी ही की नारी है कि नारी ही की सारी है॥

वाचक: 'कि' (अनेक बार)

व्याख्या: श्रीकृष्ण की कृपा से साड़ी खींचते-खींचते भी समाप्त नहीं होती और लगातार बढ़ती जाती है। साड़ियों के इस अनंत ढेर को देखकर दुःशासन पूरी तरह चकित हो जाता है और अंत तक यह तय नहीं कर पाता कि साड़ी के बीच स्त्री है या स्त्री के भीतर से साड़ी निकल रही है।

2
हनुमान जी की जलती पूँछ
कैधौं ब्योम बीथिका भरे हैं भूरि धूमकेतु।
बीररस बीर तरवारि सी उघारी है॥

वाचक: 'कैधौं' (क्या / अथवा)

व्याख्या: हनुमान जी की जलती हुई पूँछ की भयंकर अग्नि और उससे उठते धुएँ को देखकर लंकावासी राक्षस निर्णय नहीं कर पाते कि आकाश में बहुत-से विनाशकारी धूमकेतु उदय हो गए हैं, या साक्षात् वीर रस ने अपनी रक्त-रंजित तलवार म्यान से बाहर खींच ली है।

3
विरह या वरदान?
विरह है अथवा यह वरदान?

वाचक: 'अथवा'

व्याख्या: प्रिय से दूरी नायिका को मानसिक कष्ट देती है, पर इसी विरह के कारण वह हर पल प्रिय के ध्यान में डूबी रहती है। इसलिए उसका मन इस उलझन में रहता है कि यह वियोग उसके लिए अभिशाप है या फिर उसे प्रिय के और निकट लाने वाला कोई अनूठा वरदान।

4
नलिन नयन — मछलियाँ?
मद भरे ये नलिन नयन मलिन हैं?
अल्प जल में या विकल लघु मीन हैं?

वाचक: 'या'

व्याख्या: नायिका की आँखें आँसुओं से भरी और उदास (मलिन) हैं। इनकी बनावट और उनमें भरे जल को देखकर कवि का मन स्थिर नहीं हो पाता कि ये सचमुच कमल जैसी सुंदर आँखें हैं, या फिर कम पानी वाले किसी पात्र में तड़पती छोटी-छोटी मछलियाँ हैं।

5
मुख या चंद्र?
यह मुख है या चंद्र है?

वाचक: 'या'

व्याख्या: यह संदेह अलंकार का सबसे सरल उदाहरण है। नायिका के अत्यंत सुंदर और कांतिमय चेहरे को देखकर प्रेमी असमंजस में पड़ जाता है और तय नहीं कर पाता कि वह प्रियतमा का मानवीय मुख देख रहा है या आकाश में चमकता साक्षात् चंद्रमा।

6
तारा या मोतियों की झालर?
तारा सो तरनि तामे ठाढ़ि झिलमिलि होति,
कैधौं मोतिन की झालरि झलकत है॥

वाचक: 'कैधौं'

व्याख्या: जब सूर्य की किरणें पानी की बूँदों या बादलों के झरोखे से छनकर आती हैं, तो एक अद्भुत झिलमिलाती चमक बनती है। इसे देखकर दर्शक तय नहीं कर पाता कि दिन में ही तारे टूटकर झिलमिला रहे हैं, या आकाश में मोतियों से बनी कोई झालर हवा में हिलने के कारण चमक रही है।

7
सखी का मुख या चंद्रमा?
हरि-मुख यह आली! कि,
कैधौ उगो मयंका।

वाचक: 'कि' तथा 'कैधौ'

व्याख्या: जब एक सखी अचानक अपनी सुंदर सखी (या नायिका) के चेहरे को देखती है, तो उसकी अलौकिक आभा से चकित रह जाती है और खुद से पूछती है कि यह सचमुच उसकी सखी का कोमल मुख है, या आसमान में चंद्रमा निकल आया है। रूप की अत्यधिक समानता के कारण वह अंत तक संशय में रहती है।

8
पाप हुआ या पुण्य?
भूखे नर को भूलकर, हर को देते भोग।
पाप हुआ या पुण्य यह? करूँ हर्ष या सोग।

वाचक: 'या' (दो बार)

व्याख्या: एक व्यक्ति सामने खड़े भूखे इंसान को भोजन कराने के बजाय मंदिर में भगवान शिव को भोग चढ़ा देता है। अब उसका विवेक उसे कचोटता है और वह तय नहीं कर पाता कि ईश्वर की पूजा से यह पुण्य हुआ या भूखे की उपेक्षा से पाप, और इसी वजह से वह पूजा की खुशी मनाए या इंसानियत की हार का शोक।

UttarPath — हिंदी अलंकार नोट्स | UKPSC · UKSSSC · RO-ARO · VDO
११
विरोधाभास अलंकार
Virodhabhas Alankar — Apparent Contradiction | अर्थालंकार

📖 परिभाषा

जहाँ किन्हीं दो वस्तुओं या स्थितियों में वास्तविक विरोध न होते हुए भी, केवल शब्दों के माध्यम से विरोध का 'आभास' (प्रतीत) कराया जाए, वहाँ विरोधाभास अलंकार होता है। (सरल: जहाँ दो सर्वथा विपरीत बातें एक साथ कही जाएँ, किंतु गहराई से अर्थ निकालने पर कोई विरोध न रहे।)

💡 एग्जाम मास्टर ट्रिक

काव्य पंक्ति में प्रायः विलोम (Antonyms) या परस्पर विरोधी शब्दों का एक साथ प्रयोग देखने को मिलता है — जैसे: शीतल-ज्वाला, विषमय-अमृत, मीठा-नमक, अंधा-देखना

1
उदाहरण
या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहिं कोय।
ज्यों-ज्यों बूड़े स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्जवल होय॥

भावार्थ: कवि कहते हैं — इस प्रेमी मन की गति कोई नहीं समझ सकता। यह जैसे-जैसे कृष्ण की भक्ति के श्याम (काले) रंग में डूबता है, वैसे-वैसे और अधिक पवित्र (उज्जवल) होता जाता है।
काले रंग में डूबने से किसी वस्तु का सफेद/उज्जवल होना प्रत्यक्ष रूप से विरोधी कथन है — यही विरोधाभास है।

2
उदाहरण
शीतल ज्वाला जलती है, ईंधन होता दृग जल का।
यह व्यर्थ साँस चल-चल कर, करती है काम अनल का॥

भावार्थ: विरह में हृदय के भीतर एक ठंडी आग (शीतल ज्वाला) जल रही है, और आँखों से बहने वाला पानी (दृग जल) उसमें ईंधन का काम कर रहा है।
दो विरोध हैं — (1) ज्वाला (आग) कभी 'शीतल' नहीं होती। (2) जल (पानी) कभी आग का 'ईंधन' नहीं बनता; पानी तो आग बुझाता है।

3
उदाहरण
विषमय यह गोदावरी, अमृतन को फल देत।

भावार्थ: यह गोदावरी नदी विष (ज़हर) से युक्त होने के बाद भी अमृत के समान फल प्रदान करती है।
जो वस्तु 'विषमय' (ज़हरीली) हो, उसका 'अमृत' प्रदान करना पूर्णतः विरोधाभास है।

4
उदाहरण
सरस्वती के भंडार की, बड़ी अपूरब बात।
ज्यों खरचै त्यों-त्यों बढ़ै, बिन खरचै घटि जात॥

भावार्थ: माँ सरस्वती (ज्ञान) के भंडार की बात अनोखी है — इसे जितना खर्च करो (बाँटो), उतना बढ़ता है और न खर्च करने पर घट जाता है।
संसार में वस्तुएँ खर्च करने पर घटती हैं, किंतु यहाँ खर्च करने पर बढ़ने का कथन विरोधाभासी है।

5
उदाहरण
मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ।
शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ॥

भावार्थ: कवि कहता है कि मेरे रोने (रोदन) में भी प्रेम का गीत (राग) है, और मेरी ठंडी आवाज़ (शीतल वाणी) में भी क्रांति की आग छिपी है।
शीतल (ठंडी) वाणी के साथ 'आग' का होना प्रत्यक्ष विरोध को दर्शाता है।

6
उदाहरण
जब से है आँख लगी, तब से न आँख लगी।

भावार्थ: कवि कहता है कि जब से प्रिय से आँख लगी (प्रेम हुआ) है, तब से मेरी आँख ही नहीं लगी (नींद नहीं आई)।
'आँख लगना' (प्रेम होना) और 'आँख न लगना' (नींद न आना) — दोनों विपरीत क्रियाओं का एक साथ घटित होना विरोधाभास है।

7
उदाहरण
तंत्री नाद, कबित्त रस, सरस राग रति रंग।
अनबूड़े बूड़े तरे, जे बूड़े सब अंग॥

भावार्थ: संगीत, कविता और प्रेम के रस में जो नहीं डूबे (अनबूड़े), वे संसार में डूब गए (बर्बाद)। जो इनमें पूरी तरह डूबे, वे भवसागर पार कर गए।
'न डूबने वाले का डूब जाना' और 'डूबने वाले का पार हो जाना' स्पष्ट विरोधाभास है।

8
उदाहरण
मीठी लगे अँखियान लुनाई।

भावार्थ: नायिका की आँखों का नमकीनपन (लुनाई/सौंदर्य) बड़ा मीठा प्रतीत होता है।
'नमकीन' (लुनाई) वस्तु का 'मीठा' लगना विरोधी कथन है।

9
उदाहरण
सुधि आए सुधि जाय।

भावार्थ: प्रिय की याद (सुधि) आने पर मेरी अपनी सुध-बुध (सुधि) चली जाती है।
याद (स्मृति) आने पर स्वयं की स्मृति लुप्त हो जाना विरोधाभास है।

10
उदाहरण
भर लाऊँ सीपी में सागर, प्रिय मेरी अब हार विजय क्या।

भावार्थ: मैं एक छोटी सी सीपी में पूरा सागर भरकर ले आऊँगी।
क्षुद्र सीपी में विशाल सागर का समाहित होना तर्कसंगत रूप से विरोधी बात है।

१२
विभावना अलंकार
Vibhavana Alankar — Effect Without Cause | अर्थालंकार

जहाँ कारण (साधन/Cause) के नितांत अभाव में भी कार्य (Effect/Action) के संपन्न होने का वर्णन किया जाए, वहाँ विभावना अलंकार होता है। (सरल: जहाँ काम को करने वाला कोई साधन मौजूद न हो, फिर भी वह काम पूरा हो जाए।)

💡 एग्जाम मास्टर ट्रिक

विभावना की पहचान के लिए वाचक शब्द:

बिनु बिना रहित बिन
🚨
विभावना अलंकार: 'कारण' नहीं है, फिर भी 'कार्य' हो रहा है। (जैसे: बिना पानी के प्यास बुझ जाना)
विशेषोक्ति अलंकार: 'कारण' मौजूद है, फिर भी 'कार्य' नहीं हो रहा है। (जैसे: पानी में रहकर भी मछली का प्यासा होना)
1
उदाहरण
बिनु पद चलै सुनै बिनु काना।
कर बिनु करम करै बिधि नाना॥

भावार्थ: तुलसीदास जी परब्रह्म की महिमा का वर्णन करते हैं — वह ईश्वर बिना पैरों (पद) के चलता है, बिना कानों के सुनता है और बिना हाथों (कर) के अनेक प्रकार के कार्य संपन्न करता है।
अकादमिक स्पष्टीकरण: चलने, सुनने और कार्य करने के लिए पैर, कान और हाथ जैसे 'कारणों' का अभाव है, फिर भी ये 'कार्य' संपन्न हो रहे हैं।
वाचक शब्द: बिनु

2
उदाहरण
आनन रहित सकल रस भोगी।
बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥

भावार्थ: वह परब्रह्म बिना मुख (आनन) के ही संसार के संपूर्ण रसों का भोग करता है, और बिना वाणी (जीभ) के ही बहुत बड़ा वक्ता है।
अकादमिक स्पष्टीकरण: मुख और वाणी (कारण) के अभाव में भी रसभोग और वक्ता होने का 'कार्य' हो रहा है।
वाचक शब्द: रहित, बिनु

3
उदाहरण
निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय॥

भावार्थ: कबीरदास कहते हैं कि निंदक (आलोचक) को पास रखो, क्योंकि वह हमारी कमियाँ बता-बताकर हमारे स्वभाव को बिना जल और बिना साबुन के ही स्वच्छ (निर्मल) कर देता है।
अकादमिक स्पष्टीकरण: किसी को स्वच्छ करने के लिए जल और साबुन 'कारण' होते हैं। यहाँ इन कारणों के बिना ही निर्मलता (कार्य) की प्राप्ति हो रही है।
वाचक शब्द: बिन, बिना

4
उदाहरण
मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं।
ते नरेस बिनु पावक दहहीं॥

भावार्थ: तुलसीदास कहते हैं — जिन राजाओं के अत्याचारों से मुनि और तपस्वी दुःख पाते हैं, वे राजा मुनियों के श्राप से बिना अग्नि (पावक) के ही जलकर भस्म हो जाते हैं।
अकादमिक स्पष्टीकरण: जलने के लिए अग्नि (पावक) 'कारण' है, परंतु यहाँ अग्नि के अभाव में भी भस्म होने का 'कार्य' घटित हो रहा है।
वाचक शब्द: बिनु

5
उदाहरण
नाच अचानक ही उठे, बिनु पावस बन मोर।

भावार्थ: वन में मयूर बिना वर्षा ऋतु (पावस) के ही अचानक प्रफुल्लित होकर नृत्य करने लगे।
अकादमिक स्पष्टीकरण: मयूरों के नृत्य का 'कारण' वर्षा ऋतु होती है। यहाँ वर्षा के न होने पर भी नाचने का 'कार्य' संपन्न हो रहा है।
वाचक शब्द: बिनु

6
उदाहरण
सखि इन नैनन तें घनहारे।
बिनही रितु बरसत निसि बासर, सदा मलिन दोउ तारे॥

भावार्थ: विरह से व्याकुल गोपी कहती है — ये नेत्र बादलों को भी हरा चुके हैं, क्योंकि बादल तो वर्षा ऋतु में बरसते हैं, किंतु ये नेत्र 'बिना वर्षा ऋतु' के ही दिन-रात अश्रु बहाते रहते हैं।
अकादमिक स्पष्टीकरण: वर्षा होने के लिए वर्षा ऋतु (कारण) आवश्यक है, परंतु यहाँ उसके बिना ही अश्रु-वर्षा का 'कार्य' हो रहा है।
वाचक शब्द: बिनही (बिना)

१३
विशेषोक्ति अलंकार
Visheshokti Alankar — Cause Present, Effect Absent | अर्थालंकार

जहाँ कारण (साधन/Cause) के पूर्णतः उपस्थित होने पर भी कार्य (Action/Effect) के संपन्न न होने का वर्णन किया जाए, वहाँ विशेषोक्ति अलंकार होता है। (सरल: कार्य को पूरा करने वाले सभी साधन मौजूद हैं, किंतु फिर भी वह कार्य पूर्ण नहीं हो रहा।)

🚨
विभावना अलंकार: कारण (साधन) नहीं है ➔ फिर भी कार्य हो रहा है।
विशेषोक्ति अलंकार: कारण (साधन) उपस्थित है ➔ फिर भी कार्य नहीं हो रहा है।
1
उदाहरण
जल बिच मीन पियासी।
मोहि सुनि-सुनि आवै हाँसी॥

भावार्थ: कबीरदास कहते हैं — जल के बीच रहते हुए भी मछली (मीन) प्यासी है, यह सुनकर मुझे बहुत हँसी आती है। (आध्यात्मिक अर्थ: परमात्मा हमारे भीतर है, फिर भी मनुष्य उसे बाहर खोजता है।)
अकादमिक स्पष्टीकरण: प्यास बुझाने के लिए असीमित 'जल' (कारण) उपस्थित है, किंतु फिर भी प्यास बुझने का 'कार्य' संपन्न नहीं हो रहा।

2
उदाहरण
नीर भरे नित प्रति रहें, तऊ न प्यास बुझाई।

भावार्थ: वियोग शृंगार में नायिका के नेत्रों में नित्य-प्रति अश्रु रूपी नीर (जल) भरा रहता है, किंतु फिर भी उसके नेत्रों की प्रिय-दर्शन की प्यास नहीं बुझती।
अकादमिक स्पष्टीकरण: नेत्रों में नीर (कारण) विद्यमान है, परंतु प्यास बुझने का (कार्य) नहीं हो रहा है।

3
उदाहरण
देखो दो-दो मेघ बरसते, मैं प्यासी की प्यासी।

भावार्थ: मैथिलीशरण गुप्त कृत 'साकेत' में उर्मिला विरह-व्यथा में कहती हैं कि मेरे दोनों नेत्र रूपी दो-दो मेघ निरंतर जल बरसा रहे हैं, किंतु मैं अभी भी प्यासी ही हूँ।
अकादमिक स्पष्टीकरण: जल बरसाने वाले दो-दो मेघों (कारण) की उपस्थिति के बावजूद प्यास न बुझना (कार्य का अभाव) विशेषोक्ति को प्रमाणित करता है।

4
उदाहरण
फूलहिं फलहिं न बेत, जद्यपि सुधा बरिसहिं जलद।
मूरख हृदय न चेत, जो गुरु मिलहिं बिरंचि सम॥

भावार्थ: तुलसीदास कहते हैं — यदि बादल (जलद) अमृत (सुधा) की वर्षा भी कर दें, तो भी बाँस (बेत) पर फूल-फल नहीं आते। उसी प्रकार यदि मूर्ख को ब्रह्मा (बिरंचि) के समान श्रेष्ठ गुरु भी मिल जाएँ, तो भी ज्ञान नहीं आता।
अकादमिक स्पष्टीकरण: अमृत की वर्षा तथा ब्रह्मा के समान गुरु की प्राप्ति रूपी 'सशक्त कारण' उपस्थित हैं, किंतु फिर भी फलने-फूलने और ज्ञानी होने का 'कार्य' घटित नहीं हो रहा।

5
उदाहरण
सुनत जुगल कर माल उठाई।
प्रेम बिबस पहिराइ न जाई॥

भावार्थ: सीता स्वयंवर के प्रसंग में, श्री राम को देखकर माता सीता ने दोनों हाथों (जुगल कर) से जयमाला उठा तो ली, किंतु प्रेम और संकोच के वशीभूत होने के कारण पहना नहीं पा रही हैं।
अकादमिक स्पष्टीकरण: माला पहनाने के लिए हाथ और माला (साधन/कारण) दोनों सुलभ हैं, परंतु प्रेम-विवशता के कारण माला पहनाने का 'कार्य' पूर्ण नहीं हो पा रहा।

6
उदाहरण
धन-दौलत के होने पर भी, उसे नींद नहीं आती।

भावार्थ: एक संपन्न व्यक्ति के पास सुख-सुविधाओं के समस्त साधन उपलब्ध हैं, किंतु फिर भी वह सुख की निद्रा से वंचित है।
अकादमिक स्पष्टीकरण: सुखपूर्वक सोने के लिए धन-दौलत और सुविधाएँ (कारण) मौजूद होने पर भी 'नींद आने' का कार्य नहीं हो रहा। अतः यह विशेषोक्ति का सटीक आधुनिक उदाहरण है।

१४
मानवीकरण अलंकार
Manvikaran Alankar — Personification | अर्थालंकार

जहाँ जड़ प्रकृति (पर्वत, नदी, बादल, वृक्ष, लताएँ आदि) अथवा अमूर्त भावों पर मानवीय भावनाओं, चेष्टाओं और क्रियाकलापों का आरोप किया जाए, वहाँ मानवीकरण अलंकार होता है। (सरल: जब कवि निर्जीव या प्राकृतिक उपादानों का वर्णन इस प्रकार करे मानों वे कोई जीवित मनुष्य हों।)

💡 एग्जाम मास्टर ट्रिक

काव्य पंक्ति पढ़ने पर यदि प्रकृति या निर्जीव वस्तु द्वारा मनुष्यों जैसे कार्यों (हँसना, रोना, नाचना, सजना, बोलना, जागना आदि) को संपन्न करने का भाव प्रकट हो — वहाँ मानवीकरण अलंकार होता है।

1
उदाहरण
फूल हँसे कलियाँ मुसकाईं।

भावार्थ: वसंत के आगमन पर फूल हँस रहे हैं और कलियाँ मुस्कुरा रही हैं।
अकादमिक स्पष्टीकरण: प्राकृतिक उपादानों (फूल और कलियों) पर 'हँसने' और 'मुस्कुराने' जैसी मानवीय चेष्टाओं का पूर्ण आरोप किया गया है。

2
उदाहरण UPMA ALSO
दिवसावसान का समय, मेघमय आसमान से उतर रही है,
वह संध्या सुंदरी परी-सी, धीरे-धीरे।

भावार्थ: सूर्यास्त (दिवसावसान) के समय 'संध्या' (शाम) को एक सुंदर परी के रूप में चित्रित किया गया है, जो आसमान से धीरे-धीरे नीचे उतर रही है।
अकादमिक स्पष्टीकरण: अमूर्त 'संध्या' (शाम) पर 'सुंदरी परी' का आरोपण कर उसके 'उतरने' की मानवीय क्रिया को दर्शाया गया है।

3
उदाहरण
जगी वनस्पतियाँ अलसाई, मुख धोती शीतल जल से।

भावार्थ: प्रातःकाल होने पर वनस्पतियाँ (पेड़-पौधे) आलस्य त्याग कर जाग रही हैं और ठंडे ओस रूपी जल से अपना मुख धो रही हैं।
अकादमिक स्पष्टीकरण: वनस्पतियों का 'आलस करना', 'जागना' और 'मुख धोना' विशुद्ध रूप से मानवीय क्रियाकलाप हैं।

4
उदाहरण
मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के।

भावार्थ: आकाश में छाए बादलों को देखकर कवि कहता है कि मेघ किसी शहरी दामाद की भाँति पूरी तरह सज-संवर कर (बन-ठन के) गाँव में आए हैं।
अकादमिक स्पष्टीकरण: प्राकृतिक उपादान 'मेघ' पर 'सजने-संवरने' जैसी मानवीय प्रवृत्ति का मनोहारी आरोप है।

5
उदाहरण UPMA ALSO
उषा सुनहले तीर बरसती, जय लक्ष्मी-सी उदित हुई।

भावार्थ: प्रातःकाल (उषा) की किरणें जब धरती पर पड़ती हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई विजय प्राप्त करने वाली देवी (जय लक्ष्मी) सुनहरे तीर चलाती हुई प्रकट हुई हो।
अकादमिक स्पष्टीकरण: 'उषा' (प्रातःकाल) पर 'तीर बरसाने' और 'जय लक्ष्मी' के रूप में उदित होने का मानवीय आरोप है।

6
उदाहरण
लो यह लतिका भी भर लाई, नव मुकुल नवल रस गागरी।

भावार्थ: कवि कहता है कि यह नई बेल (लतिका) भी एक नवयौवना स्त्री की भाँति नए पराग रूपी जल से अपनी गागरी (मटका) भरकर ले आई है।
अकादमिक स्पष्टीकरण: लता (बेल) पर गागरी (मटका) भरकर लाने वाली 'पनहारिन' या 'स्त्री' का मानवीकरण किया गया है।

7
उदाहरण
सागर के उर पर नाच-नाच, करती हैं लहरें मधुर गान।

भावार्थ: समुद्र की लहरें उसकी छाती (उर) पर नृत्य कर रही हैं और मीठा गीत गा रही हैं।
अकादमिक स्पष्टीकरण: लहरों पर 'नृत्य करने' (नाचने) और 'गीत गाने' की मानवीय चेष्टाओं का आरोपण है।

8
उदाहरण
कलियाँ दरवाज़े खोल-खोल, जब झुरमुट में मुसकाती हैं।

भावार्थ: सुमित्रानंदन पंत कहते हैं कि कलियाँ अपनी पंखुड़ियों रूपी दरवाज़े खोलकर झाड़ियों के बीच से मुस्कुरा रही हैं।
अकादमिक स्पष्टीकरण: कलियों का 'दरवाज़ा खोलना' और 'मुस्कुराना' स्पष्ट मानवीकरण है।

9
उदाहरण
सरसों की न पूछो, हो गई सबसे सयानी。
हाथ पीले कर लिए हैं, ब्याह मंडप में पधारी॥

भावार्थ: केदारनाथ अग्रवाल कहते हैं कि खेत में लहलहाती पीली सरसों अब बड़ी (सयानी) हो गई है और मानो उसने शादी के लिए अपने हाथ पीले कर लिए हैं तथा मंडप में आ बैठी है।
अकादमिक स्पष्टीकरण: सरसों की फसल पर एक 'विवाह योग्य कन्या' का अत्यंत सुंदर मानवीकरण किया गया है।

10
उदाहरण
मेखलाकार पर्वत अपार, अपने सहस्र दृग-सुमन फाड़。
अवलोक रहा है बार-बार...

भावार्थ: करधनी के आकार का एक विशाल पर्वत अपने ऊपर खिले हुए हज़ारों पुष्प रूपी आँखों (दृग) को फाड़-फाड़ कर नीचे तालाब में अपना चेहरा देख रहा है।
अकादमिक स्पष्टीकरण: पर्वत का 'आँखें फाड़ना' और दर्पण (तालाब) में स्वयं को 'देखना' मानवीय कृत्य है।

11
उदाहरण
चुपचाप खड़ी थीं वृक्ष-पाँत, सुनती जैसे कुछ निजी बात।

भावार्थ: वृक्षों की कतारें इतनी शांति से खड़ी थीं, जैसे वे इंसानों की तरह छुपकर किसी की 'निजी बातें' सुन रही हों।
अकादमिक स्पष्टीकरण: वृक्षों द्वारा 'निजी बात सुनने' का आरोप विशुद्ध मानवीकरण है।

12
उदाहरण UPMA ALSO
सिंधु सेज पर धरावधू अब तनिक संकुचित बैठी-सी।

भावार्थ: जयशंकर प्रसाद कहते हैं कि यह पृथ्वी (धरा) समुद्र रूपी शय्या (सेज) पर एक नई दुल्हन (वधू) की भाँति संकोच और शर्म के साथ सिकुड़ कर बैठी है।
अकादमिक स्पष्टीकरण: धरा (पृथ्वी) पर लज्जाशील 'वधू' (दुल्हन) का अत्यंत कोमल मानवीकरण है।

13
उदाहरण
हँसते हैं छोटे पौधे लघुभार।

भावार्थ: वायु के झोंकों से हिलते हुए कम वज़न वाले छोटे पौधे ऐसे प्रतीत होते हैं मानो वे प्रसन्नता से हँस रहे हों।
अकादमिक स्पष्टीकरण: पौधों में 'हँसने' की मानवीय भावना का आरोपण है।

14
उदाहरण
बूढ़े पीपल ने आगे बढ़कर जुहार की।

भावार्थ: वर्षा ऋतु के आगमन पर बादलों को आता देखकर गाँव के सबसे पुराने (बूढ़े) पीपल के वृक्ष ने आगे बढ़कर एक वयोवृद्ध व्यक्ति की भाँति अतिथि का स्वागत (जुहार) किया।
अकादमिक स्पष्टीकरण: पीपल के वृक्ष पर 'बुज़ुर्ग व्यक्ति' का तथा उसके द्वारा 'स्वागत करने' (जुहार) का मानवीकरण किया गया है।

15
उदाहरण RUPAK ALSO
अम्बर पनघट में डुबो रही, तारा घट ऊषा नागरी।

भावार्थ: प्रातःकाल (ऊषा) रूपी चतुर स्त्री, आकाश रूपी पनघट पर तारे रूपी घड़ों को डुबो रही है (तारे छिप रहे हैं)।
अकादमिक स्पष्टीकरण: यहाँ 'ऊषा' पर 'चतुर स्त्री' (नागरी) का आरोपण होने से मानवीकरण का सशक्त पुट विद्यमान है।

१५
अपह्नुति अलंकार
Apahnuti Alankar — Concealment/Denial | अर्थालंकार

जहाँ उपमेय (प्रस्तुत/जिसकी बात हो रही हो) का निषेध (नकार) करके उसमें उपमान (अप्रस्तुत/जिससे तुलना की जा रही हो) की स्थापना की जाए, वहाँ अपह्नुति अलंकार होता है। (उपमेय का निषेध + उपमान की स्थापना — दोनों ज़रूरी हैं)

💡 पहचान ट्रिक + रूपक vs अपह्नुति

वाचक शब्द (निषेधात्मक):

नहींनहिं नाहिंजिनिमिष (बहाने)

⚡ अपह्नुति = निषेध + स्थापना। किसी वस्तु को झुठलाकर किसी और वस्तु को सच बताना।

रूपक अलंकार: उपमेय को सीधे उपमान मान लिया जाए (यह मुख चन्द्रमा है) → रूपक।
अपह्नुति: उपमेय को 'नकार' कर उपमान माना जाए (यह मुख नहीं, चन्द्रमा है) → अपह्नुति।

1
उदाहरण पलाश के फूल + जंगल की आग
नाहिं पलास के पुहुप ये, हैं प्रमुदित वन-ज्वाल।
उपमेय (निषेध)उपमान (स्थापना)वाचक
पलास के पुहुपवन-ज्वाल (जंगल की आग)नाहिं

व्याख्या: यहाँ खिले हुए लाल पलाश के फूलों (उपमेय) को देखकर सीधे तौर पर यह नकार दिया गया है कि ये पलाश के फूल 'नहीं' हैं, बल्कि यह तो जंगल में लगी हुई आग (उपमान) है।

2
उदाहरण सुग्रीव का कथन + बालि
मैं जो कहा रघुबीर कृपाला।
बंधु न होय मोर यह काला॥
उपमेय (निषेध)उपमान (स्थापना)वाचक
बंधु (भाई बालि)काल (मृत्यु/यमराज)

व्याख्या: सुग्रीव श्रीराम से कहते हैं कि हे कृपालु! यह बालि मेरा भाई 'नहीं' है, यह तो साक्षात् मेरा 'काल' है। यहाँ भाई होने का निषेध कर काल (मृत्यु) की स्थापना की गई है।

3
उदाहरण आँसू + सच्चे मोती
ये नहिं आँसू नीर हैं, ये तो हैं मुक्ताहल।
उपमेय (निषेध)उपमान (स्थापना)वाचक
आँसू नीर (जल)मुक्ताहल (सच्चे मोती)नहिं

व्याख्या: यहाँ आँखों से गिर रहे आँसुओं (जल) को नकार कर उन्हें सच्चे मोती बताया गया है। पानी को झुठलाकर मोती को सच माना गया है।

4
उदाहरण होठ + कोमल पत्ते
अधर नहीं पल्लव हैं ये, लाल-लाल सुकुमार।
उपमेय (निषेध)उपमान (स्थापना)वाचक
अधर (होंठ)पल्लव (कोमल पत्ते)नहीं

व्याख्या: यहाँ नायिका के सुंदर लाल होठों को 'नहीं' कहकर नकारा गया है और उनके स्थान पर उन्हें लाल और कोमल पत्ते मान लिया गया है।

5
उदाहरण अपनी वाणी + भवानी का अस्त्र
सुनहु नाथ यह नहिं निज बानी।
प्रगट करहिं निज अस्त्र भवानी॥
उपमेय (निषेध)उपमान (स्थापना)वाचक
निज बानी (वाणी)भवानी का अस्त्रनहिं

व्याख्या: यहाँ वक्ता अपनी सामान्य वाणी को नकार रहा है और कह रहा है कि यह जो शब्द निकल रहे हैं, वे मेरी वाणी नहीं हैं, बल्कि यह तो देवी भवानी का अस्त्र प्रकट हो रहा है।

6
उदाहरण कैतव अपह्नुति
समय-समय पर आँसू के मिष, रोती है मेरी तरुणाई।
उपमेय (निषेध)उपमान (स्थापना)वाचक
आँसू गिरनातरुणाई (युवावस्था) का रोनामिष (बहाने)

व्याख्या: उच्च स्तरीय अपह्नुति (कैतव अपह्नुति) में 'नहीं' की जगह 'मिष' या 'बहाने' शब्द आता है। इसका अर्थ है कि ये आँसू नहीं गिर रहे हैं, बल्कि आँसुओं के बहाने मेरी युवावस्था रो रही है।

१६
प्रतीप अलंकार
Prateep Alankar — Reverse Simile | अर्थालंकार

नई परिभाषा (दिमाग में बैठाने के लिए): 'प्रतीप' का मतलब है — 'नियम का उल्टा कर देना' या 'VIP की बेइज्जती करना'। साहित्य का नियम है कि इंसान की तुलना हमेशा प्रकृति की महान चीज़ों (चाँद, सूर्य, सागर, कमल) से की जाती है। लेकिन प्रतीप अलंकार में कवि इस नियम को दो तरह से तोड़ता है:

उल्टी तुलना: महान चीज़ों को इंसान के बराबर लाकर खड़ा कर देना (जैसे — पेड़ को आदमी जैसा लंबा बताना)।
बिना लॉजिक बेइज्जती: महान चीज़ों को बिना किसी तार्किक कारण के सीधा 'बेचारा', 'गरीब', 'तुच्छ' या 'शर्मिंदा' कह देना।

💡 एग्जाम मास्टर ट्रिक 2.0

पंक्ति पढ़ते ही चेक करें:

• क्या प्रसिद्ध प्राकृतिक चीज़ (उपमान) को उपमेय (इंसान) जैसा बताया जा रहा है? (उल्टी उपमा)
• या क्या चाँद/कमल के लिए 'बापुरो' (बेचारा), 'रंक' (गरीब), 'लजाई' (शर्मिंदा) जैसे अपमानजनक शब्द आए हैं, बिना यह बताए कि उनमें कमी क्या है?

बापुरो (बेचारा)रंक (गरीब)लजाई (शर्मिंदा)मलीन

यदि हाँ, तो यह प्रतीप है।

1
उदाहरण 🔍 विश्लेषण
सिय मुख समता किमि करै, चंद बापुरो रंक।

सरल अर्थ: सीता जी के मुख की बराबरी वह चाँद कैसे करेगा? वह तो बेचारा (बापुरो) भिखारी (रंक) है।

यह प्रतीप क्यों है (व्यतिरेक क्यों नहीं): यहाँ चाँद में कोई भौतिक कमी (Physical Flaw) नहीं बताई गई है। चाँद को 'भिखारी' कहना कोई वैज्ञानिक तर्क नहीं है, यह सिर्फ एक भावनात्मक बेइज्जती है। बिना तर्क की बेइज्जती = प्रतीप।

2
उदाहरण 🔍 विश्लेषण
उसी तपस्वी-से लंबे थे, देवदारु दो-चार खड़े।

सरल अर्थ: वहाँ देवदारु के पेड़ ऐसे खड़े थे, जैसे वे उस तपस्वी के समान लंबे हों।

यह प्रतीप क्यों है: नियम कहता है "आदमी पेड़ जैसा लंबा है"। लेकिन यहाँ कहा गया "पेड़ आदमी जैसा लंबा है"। तुलना पूरी तरह उल्टी (Reverse) कर दी गई है। उल्टी तुलना = प्रतीप।

3
उदाहरण 🔍 विश्लेषण
उतरि नहाए जमुन जल, जो सरीर सम स्याम।

सरल अर्थ: राम यमुना में नहाए, जिसका जल उनके शरीर के समान साँवला (श्याम) था।

यह प्रतीप क्यों है: फिर से तुलना उल्टी कर दी गई। नदी के रंग की तुलना इंसान के रंग से कर दी गई, जबकि होना उल्टा चाहिए था।

4
उदाहरण 🔍 विश्लेषण
बहुरी बिचारु कीन्ह मन माहीं।
सीय बदन सम हिमकर नाहीं॥

सरल अर्थ: मैंने मन में बहुत सोचा, पर यह चाँद (हिमकर) सीता के मुख के बराबर हो ही नहीं सकता।

यह प्रतीप क्यों है: यहाँ भी कोई कारण नहीं दिया गया कि चाँद बराबर क्यों नहीं हो सकता (जैसे उसमें दाग है या वह घटता है)। बस सीधा कह दिया कि वह लायक नहीं है। बिना कारण के खारिज करना = प्रतीप।

5
उदाहरण 🔍 विश्लेषण
मुख सा चंद्र है। / मुख के समान चंद्र है।

सरल अर्थ: चाँद बिल्कुल तुम्हारे मुख जैसा है।

यह प्रतीप क्यों है: यह उपमा अलंकार ("मुख चाँद सा है") का 180 डिग्री उल्टा रूप है। उपमान को उपमेय बना दिया गया है।

6
उदाहरण 🔍 विश्लेषण
बहुरी बदन विधु लजाई।

सरल अर्थ: नायिका का मुख देखकर चाँद (विधु) भी शर्मा (लजाई) गया।

यह प्रतीप क्यों है: चाँद का शर्माना एक भावनात्मक आरोप है, कोई तार्किक कमी नहीं। उपमान को लज्जित/तुच्छ दिखाना प्रतीप का मुख्य लक्षण है।

7
उदाहरण 🔍 विश्लेषण
नेत्र के समान कमल हैं।

सरल अर्थ: यह कमल बिल्कुल तुम्हारे नेत्रों जैसा है।

यह प्रतीप क्यों है: "कमल नयन" का उल्टा कर दिया गया है। प्राकृतिक वस्तु (कमल) की तुलना मानव अंग (नेत्र) से की गई है।

8
उदाहरण 🔍 विश्लेषण
सखि मयंक ते मुख भलो, देखै होय अनंद।

सरल अर्थ: हे सखी, चाँद से तो यह मुख ही ज्यादा अच्छा है, जिसे देखकर आनंद आता है।

यह प्रतीप क्यों है: चाँद से अच्छा मुख है, बस कवि को ऐसा लगता है (देखै होय अनंद)। चाँद में क्या बुराई है, यह नहीं बताया गया।

9
उदाहरण 🔍 विश्लेषण
सुंदरता में राम-रूप-सा, अनुपम है यह नील गगन।

सरल अर्थ: आकाश इतना सुंदर है, मानो भगवान राम का रूप हो।

यह प्रतीप क्यों है: आकाश (ब्रह्मांड की विशाल चीज़) की तुलना मनुष्य रूपी राम से की गई है। तुलना का क्रम पलट दिया गया है।

10
उदाहरण 🔍 विश्लेषण
काहे को गर्व करै रजनीकर, तो मुख की समता नहिं पावै।

सरल अर्थ: ऐ चाँद! तू किस बात का घमंड करता है? तू तो इस मुख की बराबरी भी नहीं पा सकता।

यह प्रतीप क्यों है: चाँद के घमंड को तोड़कर उसे नीचा दिखाया गया है, लेकिन कोई ठोस कमी नहीं गिनाई गई है।

१७
व्यतिरेक अलंकार
Vyatirek Alankar — Superiority with Reason | अर्थालंकार

'व्यतिरेक' का शाब्दिक अर्थ है 'आधिक्य' (बढ़-चढ़कर होना)। जहाँ उपमेय को उपमान से श्रेष्ठ बताया जाए और उसका कारण भी स्पष्ट किया जाए, वहाँ व्यतिरेक अलंकार होता है।

💡 पहचान ट्रिक + प्रतीप vs व्यतिरेक

काव्य पंक्ति में जब प्रसिद्ध उपमान (चाँद, सोना, पर्वत, मक्खन) की कोई 'कमी' (दोष) बताई जाए और उपमेय का कोई 'गुण' बताकर उसे श्रेष्ठ सिद्ध किया जाए, तो व्यतिरेक अलंकार होता है।

किंतुपरगुण-दोष का अंतर

प्रतीप: उपमान को बिना कारण बताए तुच्छ/बेचारा कह दिया जाता है (चाँद बेचारा क्या बराबरी करेगा)।
व्यतिरेक: उपमेय को श्रेष्ठ बताने का ठोस कारण दिया जाता है (चाँद में दाग है, पर मुख बेदाग है)।

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उदाहरण UP RO/ARO & TGT PYQ
संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह परि कहै न जाना।।
निज परिताप द्रवै नवनीता। पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता।।
उपमेय (श्रेष्ठ)उपमानश्रेष्ठता का कारण
संत हृदयनवनीत (मक्खन)मक्खन स्वयं की गर्मी से पिघलता है, संत दूसरों के दुख से

व्याख्या: कवियों ने संतों के हृदय को मक्खन के समान बताया, पर सही से कह न सके। मक्खन तो अपने ताप से पिघलता है, जबकि पवित्र संत दूसरों का दुःख देखकर द्रवित होते हैं। यह व्यतिरेक का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है।

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उदाहरण UPPCS & UKPSC PYQ
सम सुबरन सुखमाकर सुखद न थोर।
सीय अंग सखि कोमल कनक कठोर।।
उपमेय (श्रेष्ठ)उपमानश्रेष्ठता का कारण
सीय अंग (सीता के अंग)कनक (सोना)सोना कठोर है, अंग कोमल हैं

व्याख्या: सीता जी के अंग स्वर्ण के समान सुंदर हैं, किंतु अत्यंत कोमल हैं जबकि सोना कठोर होता है — उपमेय को उपमान से श्रेष्ठ बताया गया है, कारण सहित।

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उदाहरण UKSSSC VDO PYQ
जिनके जस प्रताप के आगे।
ससि मलीन रबि सीतल लागे।।
उपमेय (श्रेष्ठ)उपमानश्रेष्ठता का कारण
राजा का प्रतापसूर्य व चंद्रमासूर्य में उतनी गर्मी नहीं, चाँद में उतनी चमक नहीं

व्याख्या: राजा के यश-प्रताप के आगे चंद्रमा मलिन और सूर्य शीतल लगता है — राजा के प्रताप को दोनों उपमानों से श्रेष्ठ सिद्ध किया गया है।

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उदाहरण State Exams One-Liner PYQ
राधा मुख को चंद्र सा, कहते हैं मति-रंक।
निष्कलंक है वह सदा, उसमें प्रकट कलंक॥
उपमेय (श्रेष्ठ)उपमानश्रेष्ठता का कारण
राधा मुखचंद्रमुख निष्कलंक है, चंद्र सकलंक (दाग वाला)

व्याख्या: जिनकी बुद्धि दरिद्र है वही राधा के मुख को चंद्रमा के समान कहते हैं — मुख हमेशा बेदाग है, जबकि चंद्रमा में कलंक दिखता है।

5
उदाहरण UKSSSC Patwari PYQ
साधु ऊँचे शैल सम, किंतु प्रकृति सुकुमार।
उपमेय (श्रेष्ठ)उपमानश्रेष्ठता का कारण
साधुशैल (पर्वत)पर्वत कठोर होता है, साधु का स्वभाव कोमल

व्याख्या: सज्जन पर्वतों के समान ऊँचे (महान) होते हैं, किंतु स्वभाव पर्वत जैसा कठोर नहीं बल्कि सुकुमार होता है।

6
उदाहरण UP SI PYQ
सिय मुख सरद कमल जिमि किमि कहि जाइ।
निसि मलीन वह निसि दिन यह बिगसाइ।।
उपमेय (श्रेष्ठ)उपमानश्रेष्ठता का कारण
सिय मुखशरद कमलकमल रात में मुरझाता है, मुख सदा खिला रहता है

व्याख्या: सीता जी के मुख को शरद ऋतु के कमल के समान कैसे कहा जाए — कमल रात में मलिन (बंद) हो जाता है, जबकि मुख रात-दिन हमेशा खिला रहता है।

7
उदाहरण UPTET/CTET PYQ
घटता बढ़ता है शशांक तो, यह मुख तो सम-सुन्दर है।
उपमेय (श्रेष्ठ)उपमानश्रेष्ठता का कारण
मुखशशांक (चंद्रमा)चाँद घटता-बढ़ता है, मुख सदैव एक-समान सुंदर

व्याख्या: चाँद की कमी (घटना-बढ़ना) गिनाकर मुख की श्रेष्ठता (सदैव एक-समान रहना) स्थापित की गई है।

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उदाहरण TGT Hindi PYQ
स्वर्ग से भी श्रेष्ठ है अपनी जन्मभूमि।
उपमेय (श्रेष्ठ)उपमानश्रेष्ठता का कारण
जन्मभूमिस्वर्गस्वर्ग में केवल सुख है, जन्मभूमि में अपनत्व और माँ का प्यार

व्याख्या: यह 'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी' का हिंदी रूपांतरण है — जन्मभूमि को स्वर्ग से श्रेष्ठ बताया गया है।

9
उदाहरण Practice Mock Question
खंजन मिलि गए गगन में, तारागण के संग।
सिय नयनन की समता, पा न सके तेहि रंग॥
उपमेय (श्रेष्ठ)उपमानश्रेष्ठता का कारण
सिय नयन (सीता के नेत्र)खंजन पक्षीखंजन नेत्रों की बराबरी न कर सका, इसलिए तारों में छिप गया

व्याख्या: खंजन पक्षी उड़कर आकाश में तारों के साथ छिप गए, क्योंकि वे सीता जी के नेत्रों की बराबरी नहीं कर पाए — नेत्रों की सुंदरता इतनी अधिक कि उपमान को हार माननी पड़ी।

10
उदाहरण Practice Mock Question
चंद कलंकी वह निकलंक।
उपमेय (श्रेष्ठ)उपमानश्रेष्ठता का कारण
वह (नायिका का मुख)चंदचंद कलंकी है, मुख निकलंक (बेदाग)

व्याख्या: यह व्यतिरेक का सबसे संक्षिप्त और सटीक सूत्र है — एक ही पंक्ति में उपमान का दोष और उपमेय का गुण बता दिया गया है।

⚖️
अपह्नुति vs व्यतिरेक vs प्रतीप — अंतर तालिका
तीनों में गड़बड़ाने वाले अलंकारों का स्पष्ट अंतर एक जगह
3 अलंकार
अंतर का आधारअपह्नुति अलंकारव्यतिरेक अलंकारप्रतीप अलंकार
शाब्दिक अर्थ छिपाना या इनकार करना। आधिक्य या बढ़-चढ़कर होना। उल्टा या विपरीत (उपमा का उल्टा)।
मूल परिभाषा उपमेय (असली वस्तु) को नकार कर उपमान (काल्पनिक वस्तु) की स्थापना करना। उपमेय को उपमान से श्रेष्ठ बताना, और उसका कारण (गुण/दोष) भी देना। उपमान को उपमेय से हीन (तुच्छ) बताना या उपमान को ही उपमेय बना देना।
पहचान की ट्रिक पंक्ति में 'नहीं', 'न' शब्दों का अनिवार्य प्रयोग होता है। उपमान की कोई कमी और उपमेय का कोई गुण स्पष्ट रूप से बताया जाता है। उपमान के लिए 'बापुरो' (बेचारा), 'रंक' (गरीब) जैसे शब्दों का प्रयोग होता है।
उपमेय की स्थिति उपमेय का अस्तित्व ही मिटा दिया जाता है। उपमेय श्रेष्ठ होता है (ठोस कारण के साथ)। उपमेय श्रेष्ठ होता है (बिना कारण के या तिरस्कार से)।
सरल उदाहरण यह मुख नहीं, चंद्रमा है। मुख चंद्रमा से सुंदर है, क्योंकि चाँद में दाग है। चंद्रमा तो बेचारा तुम्हारे मुख के समान है।
परीक्षाओं के PYQ उदाहरण सत्य कहहुँ दीनदयाला। बंधु न होय, मोर यह काला॥ साधु ऊँचे शैल सम, किंतु प्रकृति सुकुमार। सिय मुख समता किमि करै, चंद बापुरो रंक।
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दृष्टांत अलंकार
Dristant Alankar — Illustrative Analogy | अर्थालंकार

'दृष्टांत' का अर्थ है 'उदाहरण' या 'प्रमाण'। जहाँ किसी बात को स्पष्ट करने के लिए उसी के समान कोई दूसरी बात (उदाहरण के रूप में) कही जाए, और दोनों बातों में बिंब-प्रतिबिंब भाव (परछाईं जैसा संबंध) हो, बिना किसी वाचक शब्द के — वहाँ दृष्टांत अलंकार होता है।

💡 एग्जाम मास्टर ट्रिक

काव्य पंक्ति में दो अलग-अलग बातें होंगी जो अर्थ के स्तर पर एक जैसी लगेंगी (पहली लाइन थ्योरी, दूसरी लाइन उसका उदाहरण)। सबसे बड़ी पहचान — इसमें उपमा की तरह वाचक शब्द (जैसे, ज्यों, जिमि, सम, सा) का प्रयोग बिल्कुल नहीं होता, दोनों पंक्तियाँ स्वतंत्र होती हैं।

कोई वाचक शब्द नहींबिंब-प्रतिबिंब भावदो स्वतंत्र पंक्तियाँ
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उदाहरण UPPCS & UKPSC PYQ
एक म्यान में दो तलवारें, कभी नहीं रह सकती हैं।
किसी और पर प्रेम नारियाँ, पति का क्या सह सकती हैं॥
कथन (बिंब)उदाहरण (प्रतिबिंब)
स्त्रियाँ पति का किसी अन्य के प्रति प्रेम सहन नहीं करतींएक म्यान में दो तलवारें नहीं समातीं

व्याख्या: यह दृष्टांत का सबसे विख्यात उदाहरण है — पहली पंक्ति के कथन को सिद्ध करने के लिए दूसरी पंक्ति में ठीक वैसा ही बिंब दिया गया है, कोई 'जैसे/ज्यों' शब्द नहीं है।

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उदाहरण UP RO/ARO PYQ
सबै सहायक सबल के, कोउ न निबल सहाय।
पवन जगावत आग को, दीपहिं देत बुझाय॥
कथन (बिंब)उदाहरण (प्रतिबिंब)
बलवान की सब सहायता करते हैं, निर्बल का कोई नहींहवा आग को भड़काती है, दीपक को बुझा देती है

व्याख्या: पहली पंक्ति में सामाजिक सत्य बताया गया है, दूसरी पंक्ति में हवा और आग के उदाहरण से उसका प्रतिबिंब प्रस्तुत किया गया है।

3
उदाहरण UKSSSC VDO & Patwari PYQ
जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चंदन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग॥
कथन (बिंब)उदाहरण (प्रतिबिंब)
उत्तम स्वभाव वाले को बुरी संगति कुछ नहीं बिगाड़तीचंदन के पेड़ पर साँप लिपटे रहते हैं, पर विष नहीं फैलता

व्याख्या: सज्जन की प्रकृति (पहली पंक्ति) का प्रतिबिंब चंदन के पेड़ (दूसरी पंक्ति) से दिखाया गया है, बिना किसी तुलनात्मक शब्द के।

4
उदाहरण TGT Hindi & UP SI PYQ
बिगड़ी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय।
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय॥
कथन (बिंब)उदाहरण (प्रतिबिंब)
बिगड़ी बात लाख कोशिश करने पर भी नहीं बनतीफटे दूध को मथने से मक्खन नहीं निकलता

व्याख्या: बिगड़े हुए काम की तुलना फटे दूध से करके बिंब-प्रतिबिंब भाव उत्पन्न किया गया है। परीक्षाओं में यह दोहा बार-बार पूछा जाता है।

5
उदाहरण State Exams One-Liner PYQ
करत-करत अभ्यास ते, जड़मति होत सुजान।
रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निसान॥
कथन (बिंब)उदाहरण (प्रतिबिंब)
निरंतर अभ्यास से मूर्ख भी बुद्धिमान बन जाता हैकोमल रस्सी के बार-बार आने-जाने से पत्थर पर निशान पड़ जाते हैं

व्याख्या: अभ्यास के महत्त्व (कथन) को रस्सी और पत्थर के सुंदर उदाहरण (दृष्टांत) से पुष्ट किया गया है।

6
उदाहरण UPTET/CTET PYQ
सठ सुधरहिं सतसंगति पाई।
पारस परस कुधात सुहाई॥
कथन (बिंब)उदाहरण (प्रतिबिंब)
दुष्ट मनुष्य भी संतों की संगति पाकर सुधर जाते हैंपारस पत्थर के स्पर्श से लोहा भी सोना बन जाता है

व्याख्या: तुलसीदास जी की इस चौपाई में पहली पंक्ति के दावे को दूसरी पंक्ति में पारस पत्थर के उदाहरण से सिद्ध किया गया है।

7
उदाहरण UKPSC PCS Mains PYQ
रहिमन अंसुवा नयन ढरि, जिय दुख प्रगट करेइ।
जाहि निकारौ गेह ते, कस न भेद कहि देइ॥
कथन (बिंब)उदाहरण (प्रतिबिंब)
आँसू मन के छिपे दुःख को बाहर प्रकट कर देते हैंघर से निकाला गया व्यक्ति घर का भेद क्यों न बताए

व्याख्या: यहाँ आँसुओं को आँख (घर) से निकाला गया सदस्य माना गया है — घर से निकाले गए व्यक्ति के उदाहरण से आँसुओं की स्थिति प्रमाणित की गई है।

8
उदाहरण Practice Mock Question
पापी मनुज भी आज मुख से राम नाम निकालते।
देखो भयंकर भेड़िये भी आज आँसू ढालते॥
कथन (बिंब)उदाहरण (प्रतिबिंब)
पापी मनुष्य आज (स्वार्थवश) राम का नाम जप रहे हैंखूँखार भेड़िये शिकार के बाद घड़ियाली आँसू बहाते हैं

व्याख्या: पापी मनुष्य के कृत्य का प्रतिबिंब भयंकर भेड़िये के कृत्य से दिखाया गया है।

9
उदाहरण UP RO/ARO PYQ
ओछे नर के पेट में, रहे न मोटी बात।
आध सेर के पात्र में, कैसे सेर समात॥
कथन (बिंब)उदाहरण (प्रतिबिंब)
ओछे व्यक्ति के पेट में कोई गंभीर बात नहीं पचतीआधे सेर के बर्तन में एक सेर वस्तु नहीं समाती

व्याख्या: व्यक्ति की क्षमता (कथन) का दृष्टांत बर्तन की क्षमता (उदाहरण) से प्रस्तुत किया गया है।

10
उदाहरण Practice Mock Question
सुख-दुख के मधुर मिलन से यह जीवन हो परिपूरन।
फिर घन में ओझल हो शशि, फिर शशि में ओझल हो घन॥
कथन (बिंब)उदाहरण (प्रतिबिंब)
सुख और दुःख दोनों के मिलन से जीवन पूर्ण होता हैकभी बादलों के पीछे चाँद छिपता है, कभी चाँद के प्रकाश में बादल

व्याख्या: मानव जीवन के सुख-दुख (उपमेय वाक्य) का दृष्टांत चाँद-बादलों की लुकाछिपी (उपमान वाक्य) के माध्यम से दिया गया है।

🔑
वाचक शब्द — मास्टर तालिका (Quick Revision)
सभी अलंकारों के पहचान-शब्द एक जगह
6 अलंकार
अलंकारवाचक शब्द (पहचान-शब्द)
उपमा सा सी से सम सरिस इव जैसे समान तुल्य
उत्प्रेक्षा मनु मनहु मानो मनो जनु जनहु जानो जनो ज्यों यों
भ्रांतिमान जानि मानि जान समझ समझकर भ्रम भ्रांति मानकर विचारि
संदेह या अथवा कि कैधौं किंवा क्या
विभावना बिनु बिना रहित बिन
अपह्नुति नहीं नहिं नाहिं जिनि मिष (बहाने)
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MCQ अभ्यास (Quick Practice)
परीक्षा-शैली प्रश्न — उत्तर देखने के लिए क्लिक करें
10 प्रश्न
प्रश्न 1

"कनक कनक तें सौ गुनी..." — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?

प्रश्न 2

"रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून" — यहाँ 'पानी' के कितने अर्थ हैं?

प्रश्न 3

उपमा अलंकार के कितने अनिवार्य अंग होते हैं?

प्रश्न 4

रूपक अलंकार की पहचान के लिए क्या देखते हैं?

प्रश्न 5

"नाइन बैठी महावरी जानि एड़ी मीड़ति जाय" — इसमें कौन-सा अलंकार है?

प्रश्न 6

विभावना और विशेषोक्ति में मुख्य अंतर क्या है?

प्रश्न 7

उत्प्रेक्षा अलंकार के वाचक शब्द कौन-से हैं?

प्रश्न 8

अनुप्रास के किस भेद में पूरे वाक्य-खंड की आवृत्ति होती है परंतु तात्पर्य बदल जाता है?

प्रश्न 9

"बूढ़े पीपल ने आगे बढ़कर जुहार की" — इसमें कौन-सा अलंकार है?

प्रश्न 10 ⭐ UKPSC PYQ

वक्रोक्ति अलंकार के कितने भेद होते हैं?

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