बंगाल में ब्रिटिश सत्ता का उदय

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बंगाल में ब्रिटिश सत्ता का उदय

मुर्शिद कुली खान से लेकर द्वैध शासन तक — पाँच अध्यायों में बंगाल की राजस्व-सत्ता धीरे-धीरे नवाबों से निकलकर ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों में जाने की पूरी कहानी। अंत में 140 प्रश्नों की अभ्यास क्विज़ दी गई है।

01

स्वतंत्र बंगाल की स्थापना और प्रारंभिक नवाब

1700 — 1756

मुग़ल साम्राज्य के पतन के दौरान बंगाल एक स्वतंत्र राज्य के रूप में उभरा। इस प्रक्रिया में तीन प्रमुख नवाबों का योगदान रहा — मुर्शिद कुली खान, सुजाउद्दीन मोहम्मद खान और अली वर्दी खान।

  • 1700: औरंगजेब ने इन्हें बंगाल का दीवान नियुक्त किया।
  • 1701: बिहार का दीवान नियुक्त किया गया।
  • 1704: उड़ीसा का दीवान नियुक्त किया गया।
  • 1717: स्वयं को बंगाल का स्वतंत्र शासक घोषित किया। इन्हें बंगाल का First Independent King माना जाता है।
  • राजधानी: ढाका से हटाकर मुर्शिदाबाद को राजधानी बनाया गया।
  • मुगलों से संबंध: स्वतंत्र शासक होते हुए भी मुग़ल दरबार में नियमित रूप से नज़राना (Tribute) भेजता रहा।
परीक्षा हेतु तथ्य

मुर्शिद कुली खान ने कृषि को बढ़ावा देने के लिए किसानों को 'तकावी ऋण' (कृषि ऋण) बांटे। राजस्व वसूली के लिए 'इजारेदारी प्रथा' (Revenue Farming) की शुरुआत की।

  • यह मुर्शिद कुली खान का दामाद था।
  • 1733: मुग़ल सम्राट मोहम्मद शाह 'रंगीला' ने फरमान जारी कर इसे बंगाल का नवाब घोषित किया।
  • इसे बंगाल का प्रथम आधिकारिक नवाब माना जाता है।
  • इसने बिहार को पूरी तरह से बंगाल सूबे का हिस्सा बना दिया।
  • अली वर्दी खान को बिहार का नायब दीवान नियुक्त किया।

सत्ता प्राप्ति

  • 1740 में 'गिरिया के युद्ध' में सुजाउद्दीन के पुत्र सरफराज की हत्या कर शासक बना।
  • मुग़ल सम्राट मोहम्मद शाह 'रंगीला' को 2 करोड़ रुपये घूस देकर अपने पद की वैधानिकता प्राप्त की।
  • सत्ता प्राप्ति के बाद मुगलों को नज़राना देना बंद कर दिया।
कथन

"यदि इन्हें न छेड़ा जाए तो शहद देंगी, और यदि छेड़ा जाए तो काट-काट कर मार डालेंगी।"

अली वर्दी खान — यूरोपियों की तुलना मधुमक्खियों से करते हुए

मराठा संघर्ष (1740–1751)

  • मराठा सरदार रघुजी भोंसले (सेनापति भास्कर पंडित) के लगातार आक्रमण हुए।
  • 1751 में मराठों से संधि करनी पड़ी।
शर्तविवरण
उड़ीसामराठों के अधिकार क्षेत्र में चला गया।
वार्षिक चौथबंगाल और बिहार से 12 लाख रुपये चौथ देना तय हुआ।
सीमा निर्धारणस्वर्णरेखा नदी को बंगाल और मराठा राज्य की सीमा मान लिया गया।
02

बंगाल की प्रथम क्रांति: नवाब सिराज-उद-दौला

1756 — 1757

अली वर्दी खान का कोई पुत्र नहीं था। उसकी सबसे छोटी बेटी (अमीना बेगम) का पुत्र सिराज-उद-दौला नवाब बना। इसके कारण उसके अपने ही परिवार में विद्रोही गुट बन गए।

व्यक्तिरिश्तापरिणाम
घसीटी बेगमबड़ी मौसीढाका के गवर्नर नवाजिस मोहम्मद की विधवा। सिराज ने इसे जेल में डाल दिया।
शौकत जंगचचेरा भाईमयमुना बेगम का पुत्र, पूर्णिया का नवाब। 1756 के मनिहारी युद्ध में सिराज ने इसे हराकर मार डाला।
मीर जाफरबहनोईअली वर्दी खान का सेनापति था। सिराज ने इसे सेनापति पद से हटाकर मीर मदान को नया सेनापति बनाया।

मुख्य कारण

  • 1717 में फर्रुखसियर द्वारा प्राप्त 'दस्तक' (Free Pass) का ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा अपने निजी व्यापार के लिए दुरूपयोग किया जाना।
  • फोर्ट विलियम की किलेबंदी।

पहला चरण — सिराज का आक्रमण

  • 4 जून 1756: सिराज का कासिम बाजार (अंग्रेज फैक्ट्री) पर कब्जा।
  • 16 जून 1756: कलकत्ता पर अधिकार। नवाब ने कलकत्ता का नाम 'अलीनगर' रखा।
  • अंग्रेज गवर्नर (ड्रेक) और कमांडर (मिचन) भागकर 'फुल्टा द्वीप' में शरण लेने को मजबूर हुए।
  • 20 जून 1756: अंग्रेज अधिकारी हॉलवेल ने सिराज के सामने आत्मसमर्पण किया।
ऐतिहासिक प्रसंग

20 जून 1756 की रात 'ब्लैक होल (काल कोठरी) की घटना' हुई। 146 अंग्रेजों को एक छोटी कोठरी में बंद किया गया, जिसमें से केवल 23 जिंदा बच पाए।

स्रोत: हॉलवेल की पुस्तक 'अलाइव-द-वंडर'

द्वितीय चरण — अंग्रेजों की वापसी

  • दिसंबर 1756 में मद्रास से नौसेना (एडमिरल वाटसन) और थल सेना (रॉबर्ट क्लाइव) कलकत्ता पहुँची।
  • कलकत्ता के प्रभारी मनिक चंद ने बिना लड़े अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।
  • जनवरी 1757 में कलकत्ता पर पुनः अंग्रेजों का अधिकार हो गया।

अलीनगर की संधि — 9 फरवरी 1757 (सिराज और रॉबर्ट क्लाइव के बीच):

  • अंग्रेजों को कलकत्ता में किलेबंदी करने का अधिकार पुनः मिल गया।
  • अंग्रेजों को सिक्के ढालने का अधिकार भी मिल गया।
  • दस्तक को पुनः मंजूर कर लिया गया।
  • नवाब द्वारा छीने गए सभी क्षेत्र वापस कर दिए गए।

तृतीय चरण — क्लाइव का षड्यंत्र

  • मार्च 1757 में क्लाइव और वाटसन ने फ्रेंच बस्ती चंद्रनगर पर अधिकार कर लिया।
  • इसके बाद क्लाइव ने अमीचंद के जरिए एक षड्यंत्र रचा — यह षड्यंत्र वाटसन और अमीचंद के बीच हुई एक नकली संधि पर आधारित था।

इस षड्यंत्र में नवाब के निम्नलिखित करीबियों को तोड़ा गया:

व्यक्तिभूमिका / सौदा
मीर जाफरनवाब बनना चाहता था। बदले में 24 परगना जिले के सभी दीवानी अधिकार कंपनी को देना तय हुआ।
मनिक चंदकलकत्ता का प्रभारी अधिकारी।
ओमीचंद / अमीचंदधनी व्यापारी, जिसने षड्यंत्र में मध्यस्थता की।
जगत सेठ (माधवराव)बंगाल का सबसे बड़ा बैंकर।
राय दुर्लभदीवान सेनापति।
खादिम खाँषड्यंत्र में शामिल एक अन्य करीबी।
पक्षप्रमुख नाम
नवाब पक्षसिराज-उद-दौला — वफादार सेनापति: मीर मदान और मोहन लाल।
अंग्रेज़ व विरोधी पक्षरॉबर्ट क्लाइव — नवाब के विरोधी सहयोगी: मीर जाफर आदि।
तत्कालीन मुगल सम्राट (नाममात्र)आलमगीर द्वितीय — प्लासी के युद्ध (1757) के समय दिल्ली की गद्दी पर आलमगीर द्वितीय ही विराजमान था (शाह आलम द्वितीय 1759 में सम्राट बना)।

परिणाम

  • मीर मदान युद्ध में मारा गया।
  • मीर जाफर की सेना युद्ध के दौरान शांत खड़ी रही।
  • सिराज-उद-दौला हार गया और बाद में मारा गया।

महत्व

  • बंगाल का नवाब अब अंग्रेजों की कठपुतली बन गया।
  • भारत का सबसे समृद्ध प्रांत अंग्रेजों के हाथ लगा।
  • 24 परगना की जागीर मिलने के साथ कलकत्ता में स्वतंत्र टकसाल स्थापित हुई — पहला सिक्का 1757 में ढला।
ऐतिहासिक प्रसंग

प्लासी का युद्ध वास्तव में कोई युद्ध था ही नहीं, बल्कि एक सौदा था। युद्ध के दिन भारी बारिश हुई थी। क्लाइव ने अपनी तोपों को तिरपाल से ढक दिया, जबकि मीर मदान ने ऐसा नहीं किया। जब नवाब की तोपें गीली होकर बंद हो गईं, तब मदान ने यह सोचकर अंग्रेजों पर हमला किया कि उनकी तोपें भी खराब हैं। लेकिन अंग्रेजों ने तुरंत गोलाबारी कर दी और मदान मारा गया।

03

मीर जाफर व बंगाल की दूसरी क्रांति

1757 — 1760

प्लासी की जीत के बाद मीर जाफर को नवाब बनाया गया, पर बंगाल का असली नियंत्रण अब कंपनी और क्लाइव के हाथ में जा चुका था।

  • इसे इतिहास में "क्लाइव का गीदड़" कहा जाता है।
  • वादे के अनुसार 24 परगना जिले का राजस्व वसूलने का अधिकार अंग्रेजों को दिया।
  • 1757–60 के बीच क्लाइव को 3 करोड़ रुपये उपहार में दिए।
  • मुग़ल सम्राट से क्लाइव को 'उमरा' की उपाधि दिलवाई।
  • 1758: क्लाइव बंगाल का पहला गवर्नर बना।
  • मीर जाफर को हिंदू शासकों — उड़ीसा के राम सिंह और पूर्णिया के राजा रामनारायण — के विरुद्ध भड़काया गया। इसे 'फूट डालो राज करो' नीति का जनक माना जाता है।

अन्य तथ्य

  • खजाना खाली होने पर मीर जाफर ने डचों से सहायता मांगी।
  • इसके परिणामस्वरूप वेदरा का युद्ध / चिनसुरा का युद्ध (1759) हुआ, जिसमें क्लाइव ने डचों का हमेशा के लिए अंत कर दिया।
  • बंगाल से लूटे गए धन का प्रयोग दक्षिण भारत में फ्रेंच के विरुद्ध तीसरे आंग्ल-कर्नाटक युद्ध (1757–63) में किया गया।
  • वांडीवाश का युद्ध (1760) — आयरकूट (ब्रिटिश) बनाम काउंट डी लाली (फ्रेंच)।
  • 1761 में पुडुचेरी पर अंग्रेजी अधिकार हो गया।
  • 1763 में पेरिस की संधि से यह युद्ध समाप्त हुआ।
नोट

1761 में पानीपत का तृतीय युद्ध — मराठा बनाम अहमद शाह अब्दाली (अफगान) — भी इसी दौर में हुआ था।

गवर्नरक्रमवर्ष
हॉलवेलबंगाल का प्रथम कार्यवाहक गवर्नर
हेनरी वैन्सीटार्टबंगाल का दूसरा गवर्नर1760
  • बंगाल का खजाना खाली हो गया, जिससे नवाब ने राजस्व दर बढ़ा दी।
  • इससे जनता में विद्रोह पनपने लगा।
  • मीर जाफर अंग्रेजों की बढ़ती मांगें पूरी नहीं कर सका।
  • वैन्सीटार्ट ने बिना युद्ध के मीर जाफर को हटा दिया।
  • मीर जाफर के स्थान पर उसके दामाद मीर कासिम के साथ मुर्शिदाबाद में संधि की गई।

संधि की शर्तें:

  • वर्धमान, चटगाँव व मिदनापुर सैन्य व्यय के रूप में अंग्रेजों को दिए गए।
  • तीसरे आंग्ल-कर्नाटक युद्ध के लिए 5 लाख रुपये अतिरिक्त दिए गए।
  • वैन्सीटार्ट को 50 हज़ार पाउंड और हॉलवेल को 27 हज़ार पाउंड की भारी घूस दी गई।

अंततः मीर जाफर ने गद्दी छोड़ दी और मीर कासिम नवाब बना।

04

मीर कासिम और बक्सर का युद्ध

1760 — 1764

मीर कासिम को अली वर्दी खान के बाद सबसे योग्य शासक माना जाता है। इसके प्रशासनिक व सैन्य सुधारों ने ही अंततः अंग्रेजों से सीधा टकराव पैदा किया, जो बक्सर के निर्णायक युद्ध में परिणत हुआ।

  1. राजधानी परिवर्तन: अंग्रेजों के प्रभाव व हस्तक्षेप से बचने के लिए राजधानी मुर्शिदाबाद से मुंगेर (बिहार) स्थानांतरित की।
  2. भ्रष्टाचार पर रोक: पुराने भ्रष्ट अधिकारियों से पिछला हिसाब मांगा, जिसके चलते बिहार के प्रांतपाल रामनारायण की हत्या करवाई गई। इसी क्रम में बंगाल में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की स्थापना हुई।
  3. सैन्य सुधार: गुर्गिन खाँ (अर्मेनियन जनरल) को नया सेनापति नियुक्त किया। सेना को यूरोपीय ढंग से प्रशिक्षित किया गया। मुंगेर में तोपखाना और तोड़ेदार बंदूक बनाने का कारखाना लगाया।
  4. व्यापारिक निर्णय: दस्तक के भारी दुरुपयोग को रोकने हेतु बंगाल के सभी आंतरिक व्यापार को कर मुक्त कर दिया। इससे भारतीय व्यापारियों को भी अंग्रेजों के समान अधिकार मिल गए।
टकराव की जड़

EIC अधिकारी 'एलिस' ने पटना पर आक्रमण किया। इसके बदले में मीर कासिम ने अनेक ब्रिटिशों की हत्या करवा दी।

  • कंपनी ने मीर कासिम को हटाकर मीर जाफर को पुनः नवाब बना दिया।
  • अंग्रेज अधिकारी मेजर एडम्स ने मीर कासिम को करवा, गिरिया (1763) और उधौनाला (1763) के युद्धों में पराजित किया।
  • मीर कासिम मुंगेर छोड़कर पटना चला गया।
पटना हत्याकांड

जर्मन अधिकारी वॉल्टर रेनहार्ड (उपनाम 'समरू') के साथ मिलकर मीर कासिम ने 147 अंग्रेज बंदियों की हत्या करवा दी। इसमें दो भाषिये — रामनारायण व सोख्खधु — भी शामिल थे।

1763 में मीर कासिम भागकर अवध के नवाब शुजाउद्दौला की शरण में चला गया।

यह भारत के इतिहास का सबसे निर्णायक युद्ध माना जाता है।

कारण

  • बंगाल में आंतरिक व्यापार को कर मुक्त किया जाना।
  • नवाब द्वारा मुग़ल बादशाह को दिए जाने वाले 12 लाख रुपये के नज़राने पर रोक लगाया जाना।
पक्षप्रमुख नाम
संयुक्त भारतीय पक्षमीर कासिम + अवध का नवाब शुजाउद्दौला + मुग़ल बादशाह शाह आलम-II
अंग्रेज़ पक्षसेनापति हेक्टर मुनरो + गवर्नर वैन्सीटार्ट + नवाब मीर जाफर

परिणाम

  • हेक्टर मुनरो के नेतृत्व में अंग्रेज विजयी हुए।
  • अंग्रेजों ने अवध के नवाब के सेनापति असद खाँ और रोहतास के सूबेदार शाहुमल को घूस देकर पहले ही खरीद लिया था।
  • अवध का नवाब और मुग़ल बादशाह — दोनों अंग्रेजों की कठपुतली बन गए।
  • बंगाल में EIC की सर्वोच्च सत्ता स्थापित हो गई।
  • वैन्सीटार्ट ने 20 लाख रुपये घूस लेकर मीर जाफर के बेटे नज्मुद्दौला को बंगाल का नवाब बना दिया।
अकादमिक नोट

हस्तलिखित नोट्स में "चार्ल्स रीड द्वारा रैयतवाड़ी प्रथा लागू करने" का उल्लेख मिलता है। ऐतिहासिक रूप से भू-राजस्व की इस रैयतवाड़ी व्यवस्था की शुरुआत 1792 में कैप्टन अलेक्जेंडर रीड और थॉमस मुनरो द्वारा बारा महल (मद्रास) में की गई थी।

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रॉबर्ट क्लाइव की वापसी और इलाहाबाद की संधि

1765 — 1772

3 मई 1765 को रॉबर्ट क्लाइव दूसरी बार बंगाल का गवर्नर बनकर लौटा। तत्कालीन प्रशासनिक स्थिति को देखकर उसने कहा था — "भ्रष्टाचार का ऐसा नंगा नाच मैंने न देखा, न सुना।" क्लाइव ने कूटनीति से काम लेते हुए दो महत्वपूर्ण संधियाँ कीं और बंगाल में द्वैध शासन की नींव रखी।

इलाहाबाद की संधि (I) — 12 अगस्त 1765

पक्षकार: मुग़ल बादशाह शाह आलम-II और रॉबर्ट क्लाइव।

  • मुग़ल सम्राट ने बंगाल, बिहार व उड़ीसा की 'दीवानी' (राजस्व वसूलने का अधिकार) स्थायी रूप से कंपनी को दे दी।
  • इसके बदले कंपनी मुग़ल सम्राट को 26 लाख रुपये सालाना पेंशन देगी।
  • अवध से कड़ा व इलाहाबाद के क्षेत्र छीनकर मुग़ल बादशाह को सौंप दिए गए।
  • नज्मुद्दौला को बंगाल का नवाब स्वीकार कर लिया गया।

इलाहाबाद की संधि (II) — 16 अगस्त 1765

पक्षकार: अवध के नवाब शुजाउद्दौला और रॉबर्ट क्लाइव।

  • अवध के नवाब से हर्जाने के रूप में 50 लाख रुपये लिए गए।
अधिकारकिसके पास
दीवानी (राजस्व और वित्त)ईस्ट इंडिया कंपनी के पास
निज़ामत (प्रशासन, पुलिस व न्याय)नवाब के पास
सार

कंपनी के पास 'बिना जिम्मेदारी का अधिकार' था, और नवाब के पास 'बिना अधिकार की जिम्मेदारी' थी।

मुग़ल ने बंगाल, बिहार व उड़ीसा के टैक्स का अधिकार EIC को सौंपा। इसके बाद क्लाइव ने राजस्व वसूली के लिए दो उप-दीवान नियुक्त किए:

  1. बंगाल: मोहम्मद रज़ा खान।
  2. बिहार: राजा शिताब राय।

द्वैध शासन क्यों लागू किया गया

  • कंपनी सीधे प्रशासन की जिम्मेदारी लेकर व्यापार से ध्यान नहीं हटाना चाहती थी — ब्रिटिश संसद द्वारा एक निजी कंपनी को इतनी बड़ी सत्ता सौंपे जाने पर सवाल उठने का डर था।
  • अन्य क्षेत्रीय शक्तियों — जैसे मराठों — का भी भय बना हुआ था।
  • भारत में ब्रिटिश सत्ता का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।
  • 1765 में 'Society of Trade' (Society of Traders) की स्थापना की।
  • बंगाल में द्वैध शासन लागू किया।
  • वेदरा के युद्ध (1759) में जीतकर डचों का अंत किया।
  • प्लासी के युद्ध का सेनापति और इलाहाबाद की संधि का सूत्रधार रहा।
  • इंग्लैंड लौटने पर इस पर मुकदमा चला। अंततः मानसिक तनाव व अफीम की लत के कारण आत्महत्या से मृत्यु हुई।
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अभ्यास क्विज़

140 प्रश्न · यूरोपीय कंपनियाँ · पुर्तगाली / डच / ब्रिटिश / फ्रांसीसी / डेनिश

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