📊 Master Cheat Sheet — चारों युद्ध
⚡ 30-Second Revision
4 युद्ध → 1767-69 | 1780-84 | 1790-92 | 1799 | हैदर अली (पहले 2) → टीपू (अगले 2) | अंतिम 2 में टीपू की हार | 1799 में टीपू शहीद
📋 चारों युद्धों की तुलनात्मक तालिका
| युद्ध | वर्ष | गवर्नर जनरल | मैसूर का नेतृत्व | तत्कालीन कारण | समाप्ति संधि | परिणाम |
|---|---|---|---|---|---|---|
| प्रथम | 1767–1769 | लॉर्ड वेरेलस्ट | हैदर अली | निज़ाम-EIC गठबंधन + मालाबार विवाद | मद्रास की संधि (4 अप्रैल 1769) | बराबरी — अंग्रेजों की किरकिरी |
| द्वितीय | 1780–1784 | वारेन हेस्टिंग्स | हैदर अली → टीपू सुल्तान | माहे पर कब्ज़ा + संधि उल्लंघन | मंगलौर की संधि (मार्च 1784) | Status Quo — अंग्रेजों के लिए शर्मनाक |
| तृतीय | 1790–1792 | लॉर्ड कॉर्नवालिस | टीपू सुल्तान | त्रावणकोर पर टीपू का हमला | श्रीरंगपट्टम की संधि (18 मार्च 1792) | टीपू की बड़ी हार — आधा राज्य गया |
| चतुर्थ | 1799 | लॉर्ड वेलेज़ली | टीपू सुल्तान | नेपोलियन से दोस्ती + Subsidiary Alliance से इनकार | कोई संधि नहीं — टीपू शहीद | मैसूर का पतन — टीपू की वीरगति |
⚡ Key Battles — परीक्षा के लिए अनिवार्य
| युद्ध का नाम | वर्ष | अंग्रेज कमांडर | मैसूर पक्ष | परिणाम |
|---|---|---|---|---|
| चंगामा का युद्ध | 1767 | कर्नल स्मिथ | हैदर + निज़ाम | अंग्रेज भारी क्षति |
| त्रिचिनोपोली का युद्ध | 1767 | कर्नल स्मिथ | हैदर + निज़ाम | हैदर की वापसी |
| पोलिलूर का युद्ध | सितंबर 1780 | कर्नल बेली (बंदी) | टीपू/हैदर | मैसूर की शानदार जीत |
| पोर्टो नोवो | जुलाई 1781 | सर आयर कूट | हैदर अली | हैदर पराजित |
| अर्नी का युद्ध | 1781 | सर आयर कूट | हैदर अली | हैदर पराजित |
| कुम्बकोणम/अन्नागुड़ी | फरवरी 1782 | ब्रेथवेट (बंदी) | टीपू सुल्तान | टीपू की जीत |
| बंगलौर पर कब्ज़ा | 1791 | लॉर्ड कॉर्नवालिस | टीपू | टीपू पराजित |
| श्रीरंगपट्टम का अंतिम युद्ध | 4 मई 1799 | जनरल हैरिस + आर्थर वेलेज़ली | टीपू सुल्तान | टीपू शहीद |
👥 प्रमुख व्यक्तित्व
| व्यक्तित्व | भूमिका | प्रमुख योगदान/पहचान |
|---|---|---|
| हैदर अली | मैसूर का वास्तविक शासक | मूलतः वाडेयार सेना में साधारण सिपाही → Dalavayi (सेनापति) → वास्तविक शासक। अनपढ़ किंतु सैन्य प्रतिभाशाली। |
| टीपू सुल्तान | 'शेर-ए-मैसूर' | Mysorean Rockets का प्रयोग, Jacobin Club का सदस्य, Liberty Tree लगाया, फ्रांसीसी समर्थक। |
| सर आयर कूट | अंग्रेज सेनापति | पोर्टो नोवो (1781) में हैदर को हराया। वेलेज़ली नहीं, कूट था। |
| लॉर्ड कॉर्नवालिस | G.G. — तृतीय युद्ध | यॉर्कटाउन (1781) में अमेरिका से हार। भारत में टीपू को हराकर इज़्ज़त बचाई। |
| लॉर्ड वेलेज़ली | G.G. — चतुर्थ युद्ध | Subsidiary Alliance का जनक। उर्फ 'Sepoy Lord'। भाई आर्थर वेलेज़ली भी युद्ध में था। |
| मीर सादिक | टीपू का विश्वासघाती मंत्री | चतुर्थ युद्ध में अंग्रेजों का पक्ष लेकर किले का द्वार खोला। टीपू की हार का कारण। |
प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध (1767 – 1769)
⚡ Quick Summary
हैदर अली ने अंग्रेजों के त्रिगुट को तोड़ा → मद्रास तक पहुँचा → अंग्रेजों को शांति माँगनी पड़ी → मद्रास संधि (1769) — Status Quo
🔍 हैदर अली का उदय — पृष्ठभूमि
हैदर अली ने मैसूर राज्य में वाडेयार राजा चिक्का कृष्णराज वाडेयार द्वितीय के अधीन एक घुड़सवार सैनिक के रूप में सेवा प्रारम्भ की। अपनी असाधारण सैन्य प्रतिभा के बल पर वह क्रमशः Dalavayi (सेनापति), तत्पश्चात् मुख्यमंत्री और अंततः 1761 में मैसूर का वास्तविक शासक बन गया। फ्रांसीसी सहयोग से उसने दिंडिगुल (Dindigul) में एक आधुनिक शस्त्रागार स्थापित किया।
📌 युद्ध के बहुआयामी कारण
- अंग्रेजों ने उत्तरी सरकार (Northern Circars) पाने के लिए नवंबर 1766 में निज़ाम आसफ जाह द्वितीय से संधि की — बदले में निज़ाम को हैदर अली से सुरक्षा का वचन + 7 लाख रुपये या सैन्य सहायता।
- हैदर अली ने बार-बार अंग्रेजों को गठबंधन का प्रस्ताव दिया — अंग्रेजों ने निज़ाम-संधि के विरुद्ध बताकर अस्वीकार किया।
- हैदर अली ने मालाबार तट पर अधिकार कर लिया → अंग्रेजों का बहुमूल्य मसाला-व्यापार बाधित।
- हैदर की सेना को फ्रांसीसियों ने आधुनिक यूरोपीय सैन्य-पद्धति में प्रशिक्षित किया — दिंडिगुल में आधुनिक शस्त्रागार।
- अंग्रेजों को फ्रांसीसी-मैसूर धुरी से दक्षिण भारत में गंभीर संकट का भय।
- अंग्रेजों के मित्र मुहम्मद अली खान वल्लाजाह (नवाब ऑफ अर्कॉट/कार्नेटिक) का हैदर से क्षेत्रीय विवाद।
- हैदर ने नवाब के भाई महफ़ूज़ खान एवं चंदा साहब के पुत्र राजा साहब को शरण दे रखी थी।
- हैदर वेल्लोर में अंग्रेजी किले की स्थापना से भी रुष्ट था।
🤝 गठबंधन का खेल — त्रिगुट बना और टूटा
यह युद्ध का सबसे महत्त्वपूर्ण कूटनीतिक अध्याय है। अंग्रेजों ने निज़ाम + मराठे + EIC का त्रिगुट बनाया — हैदर ने इसे तोड़कर अपने पक्ष में कर लिया।
- मराठे: जनवरी 1767 में पेशवा माधवराव I ने उत्तरी मैसूर पर आक्रमण किया — तुंगभद्रा नदी तक पहुँचे।
- निज़ाम: नवंबर 1766 की ब्रिटिश-निज़ाम संधि के तहत निज़ाम ने दो ब्रिटिश बटालियनों के साथ मैसूर पर चढ़ाई की।
- EIC: कर्नल जोसेफ स्मिथ के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना — तीनों मिलकर हैदर को घेरना चाहते थे।
- मराठों को तटस्थ किया: हैदर ने मराठों को 35 लाख रुपये दिए (आधा तुरंत, बाकी के लिए कोलार गिरवी) → मराठे मार्च 1767 तक वापस।
- निज़ाम को अपने साथ मिलाया: गुप्त संधि की शर्तें: हैदर निज़ाम को 18 लाख रुपये देगा + निज़ाम टीपू सुल्तान को कर्नाटक का नवाब मानेगा (विजय के बाद)।
- परिणाम: हैदर + निज़ाम की संयुक्त सेना (70,000) ने अंग्रेजों के विरुद्ध अभियान शुरू किया।
⚔️ युद्ध का क्रम — प्रमुख सैन्य घटनाएँ
- हैदर+निज़ाम की संयुक्त सेना (70,000) ने चंगामा (Changama) में कर्नल स्मिथ (7,000) पर हमला किया।
- अंग्रेजी सेना को भारी क्षति — किंतु कर्नल स्मिथ डटा रहा।
- कर्नल स्मिथ ने तिरुवन्नमलई (Tiruvannamalai) में हैदर + निज़ाम की संयुक्त सेना को पराजित किया।
- इस पराजय से निज़ाम का मनोबल टूट गया — उसने हैदर का साथ छोड़ना शुरू किया।
- अंग्रेजों ने हैदराबाद पर आक्रमण की धमकी दी → निज़ाम घबराया।
- 23 फरवरी 1768 को निज़ाम ने अंग्रेजों से नई संधि की — हैदर को विद्रोही और हड़पकर्ता (usurper) घोषित किया, और उन्हें मैसूर की दीवानी दे दी।
- यह हैदर के साथ सबसे बड़ा कूटनीतिक धोखा था। अब हैदर पूर्णतः अकेला था।
- मित्रविहीन होने के बावजूद हैदर अली ने हार नहीं मानी। उसने मंगलौर पर विजय प्राप्त की और सीधे मद्रास की प्राचीर के समक्ष पहुँच गया।
- मद्रास में पूर्ण दहशत — मद्रास लगभग निरस्त्र था, सारी सेना हैदर की मुख्य सेना को रोकने में लगी थी।
- हस्ताक्षरकर्ता: हैदर अली और EIC (लॉर्ड वेरेलस्ट के प्रतिनिधि)
- शर्त 1: दोनों पक्षों द्वारा परस्पर विजित प्रदेशों की वापसी (Status quo ante bellum)।
- शर्त 2: युद्धबंदियों का आदान-प्रदान।
- शर्त 3 (सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण — द्वितीय युद्ध की जड़): यदि कोई तृतीय पक्ष हैदर पर आक्रमण करे, तो अंग्रेज उसकी सहायता करेंगे। → 1771 में मराठों के हमले पर अंग्रेजों ने यह वचन तोड़ा।
हैदर अली EIC को 'व्यापारी निकाय' मानता था, संप्रभु शासक नहीं। उसे डर था कि कंपनी के अधिकारी मुनाफे के लिए संधि तोड़ देंगे। इसलिए उसने ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज III का नाम शामिल कराया ताकि यह 'दो संप्रभु राज्यों' के बीच का अंतरराष्ट्रीय समझौता दिखे — कंपनी के भ्रष्टाचार से बचने का चतुर दांव।
📌 ऐतिहासिक महत्त्व — परीक्षा की दृष्टि से
यह एकमात्र आंग्ल-मैसूर युद्ध था जिसमें अंग्रेज घुटने टेककर शांति माँगने विवश हुए। हैदर अली ने सिद्ध किया कि कूटनीति और सैन्य गतिशीलता से अंग्रेजों के त्रिगुट को भी तोड़ा जा सकता है। इसने मैसूर को दक्षिण भारत की सर्वाधिक शक्तिशाली क्षेत्रीय सत्ता के रूप में प्रतिष्ठित किया।
द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1780 – 1784)
⚡ Quick Summary
तात्कालिक कारण: माहे पर ब्रिटिश कब्ज़ा (1779) | हैदर की मृत्यु: 7 दिसंबर 1782 | संधि: मंगलौर (1784) — Status Quo, हेस्टिंग्स के हस्ताक्षर नहीं
🔍 पृष्ठभूमि और वास्तविक कारण
- 1771 में जब मराठों ने हैदर अली पर आक्रमण किया, तो अंग्रेजों ने मद्रास संधि की पारस्परिक सहायता की शर्त का उल्लंघन करते हुए कोई सैन्य सहायता नहीं प्रदान की।
- इस धोखे से हैदर अली को अत्यंत क्रोध हुआ और वह अंग्रेजों को कभी भी विश्वसनीय नहीं मानने का निश्चय कर चुका था।
- फ्रांसीसियों ने हैदर अली की सेना को आधुनिक यूरोपीय युद्धपद्धति में प्रशिक्षित किया और उसे उन्नत हथियारों की आपूर्ति की।
- अमेरिकी संग्राम में व्यस्त अंग्रेज भारत में फ्रांसीसी-मैसूर अक्ष को समाप्त करना चाहते थे।
- मालाबार तट पर स्थित माहे (Mahe) एक फ्रांसीसी उपनिवेश था जो हैदर अली के राज्य की सीमा के अन्तर्गत और उसके संरक्षण (Protectorate) में था।
- मार्च 1779 में अंग्रेजों ने हैदर की अनुमति के बिना माहे पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया।
- यह हैदर अली के स्वाभिमान और सम्प्रभुता पर प्रत्यक्ष आघात था। उसने युद्ध की घोषणा कर दी।
🤝 हैदर अली का महागठबंधन (Grand Triple Alliance)
हैदर अली सुस्पष्ट रूप से जानता था कि अकेले वह अंग्रेजों को परास्त नहीं कर सकता। अतः उसने कुशल कूटनीति द्वारा निज़ाम (हैदराबाद) + मराठे + मैसूर का एक शक्तिशाली महागठबंधन निर्मित किया।
⚔️ युद्ध का क्रम — प्रमुख सैन्य-कूटनीतिक घटनाएँ
- हैदर अली ने 80,000 सैनिकों और 100 तोपों के साथ कर्नाटक पर धावा बोल दिया।
- उसने अंग्रेज सेनापति कर्नल बेली (Colonel William Baillie) को पोलिलूर (Pollilur) के युद्ध (सितंबर 1780) में बुरी तरह पराजित किया। बेली को बंदी बना लिया गया।
- कर्नाटक की राजधानी अर्कॉट (Arcot) पर हैदर ने कब्ज़ा कर लिया। मद्रास में अंग्रेज दहशत में थे।
- निज़ाम को तोड़ा: हेस्टिंग्स ने निज़ाम को गुंटूर (Guntur) का विवादित क्षेत्र वापस देकर उसे हैदर के गठबंधन से अलग कर दिया।
- मराठों को तोड़ा: महादजी सिंधिया (Mahadji Sindhia) की मध्यस्थता से मराठों के साथ साल्बाई की संधि (Treaty of Salbai, 1782) सम्पन्न की। मराठे युद्ध से बाहर हो गए।
- परिणाम: हैदर अली अब कूटनीतिक रूप से पूर्णतः एकाकी पड़ गया, तथापि उसने हार नहीं मानी।
- हेस्टिंग्स ने अपने सर्वाधिक अनुभवी सेनापति सर आयर कूट (Sir Eyre Coote) को मद्रास भेजा।
- पोर्टो नोवो (Porto Novo) के युद्ध में सर आयर कूट ने हैदर अली को निर्णायक पराजय दी।
- इसके पश्चात् अर्नी (Arni) और शोलिंगुर (Sholingur, नवंबर 1781) के युद्धों में भी हैदर पराजित हुआ।
- टीपू सुल्तान ने कुम्बकोणम (Kumbakonam)/ अन्नागुड़ी के युद्ध में अंग्रेज सेनापति कर्नल ब्रेथवेट (Colonel Braithwaite) को पराजित कर उसे बंदी बना लिया।
- इस युद्ध में मैसूर के Mysorean Rockets का पुनः प्रभावी प्रयोग हुआ।
- युद्ध के मध्य में ही हैदर अली की कैंसर (Cancer) से मृत्यु हो गई।
- उनके पुत्र टीपू सुल्तान ने सैन्य नेतृत्व ग्रहण किया और अगले 2 वर्षों तक युद्ध जारी रखा।
- टीपू ने 1783 में अंग्रेज ब्रिगेडियर मैथ्यूज (Matthews) को भी बंदी बनाया।
- हस्ताक्षरकर्ता: टीपू सुल्तान एवं मद्रास के गवर्नर लॉर्ड मैकार्टनी (Lord Macartney)
- शर्तें: दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के अधिकृत प्रदेश और युद्धबंदी वापस किए। पुनः Status Quo (यथापूर्व स्थिति) बहाल हुई।
- यह किसी भारतीय शासक के साथ अंग्रेजों की अंतिम संधि जो समकक्ष आधार पर सम्पन्न हुई — मतलब अंग्रेज हारे नहीं जीते भी नहीं।
🐯 टीपू सुल्तान — व्यक्तित्व, प्रशासन एवं सुधार
⚡ Quick Summary
उपाधियाँ: शेर-ए-मैसूर, नागरिक टीपू, सुल्तान | मुद्रा: अहमदी, फारूकी (सोना), इमामी (चाँदी) | सुधार: रेशम उद्योग, रैयतवाड़ी, नौसेना बोर्ड (1796), Mysorean Rockets
👑 उपाधियाँ एवं पहचान (Titles & Identity)
- अपनी अदम्य वीरता के कारण टीपू को शेर-ए-मैसूर की उपाधि मिली।
- इसका राज्य-चिह्न बाघ (Tiger) था — झंडे, हथियारों और सिंहासन पर बाघ की आकृति उकेरी जाती थी।
- टीपू फ्रांसीसी क्रांति से अत्यधिक प्रभावित था। उसने जैकोबिन क्लब (Jacobin Club) की सदस्यता ग्रहण की।
- उसने स्वयं को 'नागरिक टीपू' (Citoyen Tipoo) कहलाना पसंद किया — फ्रांसीसी प्रजातांत्रिक परम्परा के अनुरूप।
- श्रीरंगपट्टम में Liberty Tree (स्वतंत्रता-वृक्ष) लगाया — फ्रांसीसी क्रांति के प्रतीक के रूप में।
- टीपू ने खलीफा से मान्यता (सनद) प्राप्त कर विधिवत 'सुल्तान' की उपाधि धारण की।
🪙 मुद्रा प्रणाली (Currency System)
टीपू सुल्तान ने एक स्वतंत्र शासक के रूप में अपने नाम के सिक्के चलवाए।
| धातु | सिक्के का नाम | विशेष तथ्य |
|---|---|---|
| सोना (Gold) | अहमदी (Ahmadi) एवं फारूकी (Faruqi) | परीक्षा में दोनों नाम पूछे जाते हैं |
| चाँदी (Silver) | इमामी (Imami) | — |
🛕 धार्मिक नीति एवं सहिष्णुता
- मराठों के आक्रमण से क्षतिग्रस्त श्रृंगेरी मठ के पुनर्निर्माण और देवी सरस्वती (शारदा) की मूर्ति की पुनर्स्थापना के लिए टीपू ने स्वयं धन भिजवाया।
- यह उसकी वास्तविक धर्मनिरपेक्षता का ऐतिहासिक साक्ष्य है।
- किले के भीतर स्थित श्री रंगनाथस्वामी मंदिर एवं नरसिंह मंदिर का टीपू ने पूर्ण संरक्षण किया।
📅 कैलेंडर एवं भाषा सुधार
- टीपू ने चंद्र-सौर (Luni-solar) प्रणाली पर आधारित एक नया कैलेंडर जारी किया।
- इसे 'मौलूदी कैलेंडर' (Mauludi Calendar) कहा जाता था।
- पारम्परिक प्रणाली के स्थान पर वर्ष और महीनों के नाम अरबी भाषा में लिखे जाने की शुरुआत की।
🏛️ प्रशासनिक एवं कूटनीतिक सुधार
- टीपू सुल्तान भारत का प्रथम शासक था जिसने अपनी प्रशासनिक एवं सैन्य व्यवस्था को यूरोपीय (पाश्चात्य) तर्ज़ पर आधुनिक बनाया।
- अंग्रेजों के विरुद्ध समर्थन जुटाने हेतु टीपू ने फ्रांस, तुर्की (Ottoman Empire), ईरान एवं मॉरीशस (Isle de France) में अपने राजदूत भेजे।
- टीपू ने अपने साम्राज्य को प्रांतों में विभाजित किया, जिन्हें 'आसफी टुकड़ी' (Asafi Tukdi) कहा जाता था।
- प्रत्येक प्रांत का प्रमुख 'आसफ' कहलाता था।
🌾 आर्थिक एवं कृषि सुधार
- टीपू ने कर्नाटक (मैसूर) को रेशम उत्पादन का प्रमुख केंद्र बनाया।
- विशेष रूप से बंगाल से शहतूत (Mulberry) की खेती और रेशम के कीड़े मँगवाए।
- टीपू ने जमींदारों / पॉलीगारों की मध्यस्थता समाप्त की और किसानों से सीधा सम्पर्क स्थापित किया।
- इस प्रकार एक प्रकार की रैयतवाड़ी व्यवस्था लागू की — यह अपने समय से आगे का विचार था।
- कृषि को प्रोत्साहन देने हेतु किसानों को सीधे तकावी ऋण (कृषि ऋण) प्रदान किए।
- एक वाणिज्यिक बोर्ड (Board of Trade) का गठन किया।
- काली मिर्च, नमक एवं चंदन (Sandalwood) के लाभदायक व्यापार पर राज्य का एकाधिकार (State Monopoly) स्थापित किया।
- भूमि की उर्वरता और सिंचाई सुविधाओं के आधार पर कर 1/3 से 1/2 भाग तक निर्धारित किया गया।
⚓ सैन्य एवं नौसेना आधुनिकीकरण
- समुद्री सुरक्षा सुदृढ़ करने हेतु टीपू ने 1796 ई. में नौसेना बोर्ड (Board of Admiralty) का गठन किया।
- जहाज़-निर्माण और नौसेना के लिए मंगलौर (Mangalore), वाजिदाबाद एवं मौलिदाबाद (Molidabad) में डॉकयार्ड स्थापित किए।
- सेना को प्रशिक्षित करने और जैकोबिन क्लब की स्थापना में सहयोग के लिए फ्रांसीसी अधिकारी रिपो (Lieutenant Ripaud) को अपनी सेना में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया।
💬 टीपू सुल्तान के प्रसिद्ध कथन (Famous Quotes — परीक्षा अनिवार्य)
तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1790 – 1792)
⚡ Quick Summary
तात्कालिक कारण: त्रावणकोर पर टीपू का हमला | संधि: श्रीरंगपट्टम (18 मार्च 1792) | टीपू खो बैठा: आधा राज्य + 3 करोड़ रुपये + 2 पुत्र बंधक
📌 युद्ध के बहुआयामी कारण
- टीपू सुल्तान ने मंगलौर संधि (1784) की शर्त के अनुसार ब्रिटिश युद्धबंदियों को मुक्त करने से इनकार कर दिया।
- उसने मंगलौर संधि को अपमानजनक मानते हुए पुनः युद्ध का संकल्प लिया था।
- टीपू ने 1789 में फ्रांस एवं तुर्की (Ottoman Empire) में अपने राजदूत भेजे और सैन्य गठबंधन का अनुरोध किया।
- यह अंग्रेजों के लिए एक गंभीर खतरे का संकेत था। कॉर्नवालिस ने इसे युद्ध के औचित्य के रूप में प्रस्तुत किया।
- त्रावणकोर (Travancore) के राजा ने कोचीन (Cochin) के डचों से जालकोट्टा और कन्नानोर के किले खरीदे थे।
- ये किले पूर्व में कोचीन का भाग थे जो टीपू को कर देता था — टीपू ने इसे अपनी प्रभुसत्ता का अतिक्रमण माना।
- दिसंबर 1789 में टीपू ने नेडुमकोट्टा (Nedumkotta) — त्रावणकोर की सुदृढ़ रक्षापंक्ति — पर आक्रमण कर दिया।
- चूँकि त्रावणकोर अंग्रेजों का संरक्षित राज्य (Protected State) था, कॉर्नवालिस ने इसे अंग्रेजों पर आक्रमण माना और युद्ध घोषित किया।
⚔️ युद्ध का क्रम — दो चरण
- कॉर्नवालिस ने प्रथम चरण में जनरल मेडोज़ (General Medows) को सेना का नेतृत्व सौंपा।
- टीपू ने मेडोज़ की सेना को पराजित किया और कर्नाटक में घुसकर लूटपाट की।
- टीपू ने पॉण्डिचेरी (Pondicherry) में फ्रांसीसी प्रतिनिधियों से सहायता माँगी किंतु फ्रांसीसी क्रांति (1789) में व्यस्त होने के कारण उसे कोई मदद नहीं मिली।
- इस विफलता के पश्चात् मेडोज़ ने मद्रास में कमान कॉर्नवालिस को सौंप दी।
- कॉर्नवालिस ने स्वयं एक विशाल सेना का नेतृत्व करते हुए अम्बूर, वेल्लोर और बंगलौर (Bangalore) पर कब्ज़ा किया।
- कॉर्नवालिस का कूटनीतिक त्रिगुट: अंग्रेज + निज़ाम + मराठे — टीपू तीनों ओर से घिरा।
- निज़ाम की सेना (नेतृत्व: महाबत जंग) ने उत्तर से तथा मराठा सेना (नेतृत्व: हर्री पंत, 25,000 घुड़सवार + 5,000 पैदल) ने पूना से अभियान किया।
- कॉर्नवालिस श्रीरंगपट्टम के निकट पहुँचा। टीपू पराजित होने पर विवश हुआ।
- भूमि-अधिसमर्पण: टीपू को अपना लगभग आधा राज्य तीनों विजेताओं में विभाजित करना पड़ा।
- अंग्रेजों को: बारामहल, डिंडिगुल, मालाबार, कूर्ग
- निज़ाम को: कृष्णा नदी के दक्षिण का क्षेत्र
- मराठों को: तुंगभद्रा नदी एवं उसकी सहायक नदियों के आसपास के क्षेत्र
- युद्ध-क्षतिपूर्ति: 3 करोड़ रुपये का भुगतान।
- बंधक (Hostages): 26 फरवरी 1792 को टीपू के दो पुत्रों — अब्दुल खालिक और मुइज़ुद्दीन — को कॉर्नवालिस के पास बंधक के रूप में सौंपा गया। राशि का आधा भुगतान होने पर उन्हें वापस किया गया।
📌 तृतीय युद्ध का ऐतिहासिक महत्त्व
तृतीय युद्ध ने मैसूर की शक्ति को निर्णायक रूप से क्षीण कर दिया। टीपू ने आधा राज्य खोया, 3 करोड़ रुपये दिए और अपने पुत्रों को बंधक बनते देखा। किंतु वह टूटा नहीं — उसने चतुर्थ युद्ध की तैयारी प्रारम्भ कर दी।
चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध (1799)
⚡ Quick Summary
कारण: नेपोलियन-टीपू पत्राचार + Subsidiary Alliance से इनकार | मीर सादिक का विश्वासघात | टीपू शहीद: 4 मई 1799 | मैसूर → वाडेयार III (Princely State)
📌 युद्ध के बहुआयामी कारण
- टीपू ने फ्रांसीसी डायरेक्टरी (French Directory) एवं नेपोलियन को पत्र लिखकर सैन्य गठबंधन का अनुरोध किया।
- उसने Isle de France (मॉरीशस) के फ्रांसीसी गवर्नर तथा अफगानिस्तान और अरब में भी गठबंधन हेतु राजदूत भेजे।
- टीपू ने Jacobin Club की सदस्यता ग्रहण की और श्रीरंगपट्टम में Liberty Tree लगाया।
- उसने अपने को 'Citoyen Tipoo' (नागरिक टीपू) कहा।
- वेलेज़ली ने टीपू के समक्ष सहायक संधि (Subsidiary Alliance) स्वीकार करने की माँग रखी।
- टीपू ने स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया। यह उसकी प्रभुसत्ता और स्वाभिमान का प्रश्न था।
- 1796 में वाडेयार वंश के हिंदू राजा की मृत्यु हो गई। टीपू ने उनके अल्पवयस्क पुत्र का राज्याभिषेक करने से इनकार कर दिया और स्वयं को मैसूर का सुल्तान घोषित कर दिया।
- यह अंग्रेजों को मैसूर पर आक्रमण का एक और बहाना प्रदान कर गया।
- वेलेज़ली की 'Subsidiary Alliance' नीति का उद्देश्य समस्त भारत को अंग्रेजी प्रभाव में लाना था।
- टीपू का स्वतंत्र मैसूर इस योजना में सर्वाधिक बाधक था — अतः उसे समूल नष्ट करना आवश्यक था।
- वेलेज़ली ने टीपू पर झूठे आरोप भी लगाए। टीपू के स्पष्टीकरण को उसने अस्वीकार कर दिया।
🤝 वेलेज़ली का महागठबंधन
वेलेज़ली ने टीपू के विरुद्ध वही रणनीति अपनाई जो कॉर्नवालिस ने अपनाई थी। उसने निज़ाम + मराठे + अंग्रेज का त्रिगुट बनाया।
⚔️ श्रीरंगपट्टम का अंतिम युद्ध — एक वीरगाथा
- जनरल हैरिस की मुख्य सेना ने पूर्व से, आर्थर वेलेज़ली (Arthur Wellesley) — भावी ड्यूक ऑफ वेलिंगटन — की सेना ने पश्चिम से, निज़ाम एवं मराठों ने उत्तर से आक्रमण किया।
- टीपू की सेना संख्या और संसाधन दोनों में अत्यंत अल्प थी।
- टीपू के मंत्री मीर सादिक (Mir Sadiq) ने अंग्रेजों से गुप्त समझौता कर लिया था।
- अंतिम युद्ध के समय उसने किले का एक महत्त्वपूर्ण जल-द्वार (Water Gate) खोल दिया और अपनी सेना को पीछे हटा लिया।
- इसी विश्वासघात से अंग्रेज किले में प्रवेश कर पाए।
- टीपू सुल्तान ने किले के वाटर गेट (Water Gate) के निकट अंतिम श्वास तक युद्ध किया।
- उसके शव के चारों ओर अनेक ब्रिटिश सैनिकों के शव भी पाए गए — यह उसके असाधारण साहस का प्रमाण था।
- वेलेज़ली ने टीपू की मृत्यु पर कहा — "आज भारत हमारा है!"
📋 युद्धोत्तर परिणाम — मैसूर का भाग्य
- अंग्रेजों को: कन्नड़ (Kanara), वायनाड (Wayanad), कोयंबटूर (Coimbatore), दर्वार और श्रीरंगपट्टम
- निज़ाम को: कृष्णा नदी और तुंगभद्रा के बीच का क्षेत्र
- मराठों को: उत्तरी मैसूर के कुछ भाग
- अंग्रेजों ने वाडेयार वंश के बालक कृष्णराज वाडेयार III को मैसूर की गद्दी पर बैठाया।
- किंतु उन्हें सहायक संधि (Subsidiary Alliance) स्वीकार करनी पड़ी।
- मैसूर में एक ब्रिटिश रेजिडेंट नियुक्त किया गया। मैसूर एक Princely State (देशी रियासत) बन गया जो 1947 तक चली।
- टीपू के परिवार को अंग्रेजों ने वेल्लोर (Vellore) में नज़रबंद किया।
- टीपू का खजाना, पुस्तकालय एवं प्रसिद्ध Mechanical Tiger लूट लिए गए।
🚨 परीक्षा के उच्च-महत्त्व वाले ट्रैप्स & PYQ
✅ सभी संधियाँ — अंतिम सार-तालिका
| युद्ध | संधि | तिथि | हस्ताक्षरकर्ता | परिणाम |
|---|---|---|---|---|
| प्रथम | मद्रास की संधि | 4 अप्रैल 1769 | हैदर अली + EIC (वेरेलस्ट) | Status Quo — अंग्रेजों की नैतिक हार |
| द्वितीय | मंगलौर की संधि | मार्च 1784 | टीपू + लॉर्ड मैकार्टनी | Status Quo — हेस्टिंग्स के हस्ताक्षर नहीं |
| तृतीय | श्रीरंगपट्टम की संधि | 18 मार्च 1792 | टीपू + कॉर्नवालिस | आधा राज्य + 3 करोड़ + 2 पुत्र बंधक |
| चतुर्थ | कोई संधि नहीं | 4 मई 1799 | — | टीपू शहीद — मैसूर अंग्रेजी आधिपत्य में |