झोड़ा
शाब्दिक अर्थ: संस्कृत के 'झटित' शब्द से उत्पन्न — अर्थात अत्यंत तेज़ गति। कुमाऊं का सर्वाधिक लोकप्रिय विशाल सामूहिक नृत्य-गीत, जिसमें सभी जातियों के स्त्री-पुरुष एक साथ भाग लेते हैं।
व्युत्पत्ति और अर्थ
- मूल शब्द 'झोड़ा' या 'भवाड़ा' का संबंध संभवतः संस्कृत के 'झटित' शब्द से माना जाता है।
- इसका कारण यह है कि इस नृत्य-गीत में पद-संचालन (कदमों की ताल) द्रुत (तेज) गति का होता है।
- साथ ही इसमें गाए जाने वाले गीतों की लय भी द्रुत गति की होती है।
प्रदर्शन शैली और स्वरूप
- यह एक विशाल सामूहिक नृत्य-गीत है, जिसमें सभी जातियों के स्त्री-पुरुष एक साथ भाग लेते हैं।
- नर्तक एक-दूसरे के कंधों पर हाथ रखकर एक बड़ा वृत्ताकार घेरा बनाते हैं।
- नृत्य की शुरुआत धीमे व सरल पद-संचालन के साथ होती है; गति बढ़ने के साथ इसका आकर्षण भी बढ़ता जाता है।
- वृत्त (घेरे) के बिल्कुल बीच में मुख्य गायक खड़ा होता है, जो गीत की प्रथम पंक्ति गाता है।
- घेरे में शामिल अन्य लोग संतुलित अंग-संचालन करते हुए उसे दोहराते हैं, जिससे लहरों जैसा प्रभाव उत्पन्न होता है।
- घेरे का हमेशा वृत्ताकार होना अनिवार्य नहीं — कभी-कभी दो दल बनाकर और स्थान बदलते हुए भी इसे गाया जाता है।
- कुमाऊं में दो या तीन मंजिलों वाले मिश्रित झोड़े भी होते हैं।
- ऐतिहासिक रूप से मासी के सोमनाथ मेले में सात-सात मंजिलों वाले झोड़ों का आयोजन भी होता था।
वर्गीकरण — विषय-वस्तु के आधार पर तीन भाग
स्थान या अवसर-विशेष से जुड़े देवी-देवताओं का स्मरण, मनौती और पूजा का वर्णन इनमें होता है।
- प्रमुख देवता-देवियां: शिव के विभिन्न रूप, काली, दुर्गा तथा नंदा मुख्य रूप से पूजी जाती हैं।
- गोरिल, लाकुड़ और नरसिंह जैसे ग्राम-देवता भी पूजे जाते हैं, जिन्हें 'गगन-पुत्र' भी कहा गया है।
- बलि प्रथा के अवशेष: देवी-देवताओं को बकरे, निशान (ध्वज) और नगाड़े भेंट करने का उल्लेख मिलता है।
- यह भेंट प्राचीन मानव-बलि के ही रूपांतरित (पशु-बलि) रूप को दर्शाती है।
- दार्शनिक रूपक: कुछ झोड़ों में शरीर को पांच तत्वों व दस इंद्रियों से बनी गाड़ी कहा गया है।
- इस गाड़ी का चालक 'मन' है, और ईश्वर ही इसे भवसागर से पार लगा सकता है।
इनका मुख्य उद्देश्य मनोरंजन और उल्लास है, ताकि लोग दैनिक चिंताओं से मुक्त हो सकें।
- प्रेम-सौंदर्य परक: इनमें शृंगार के संयोग पक्ष का वर्णन होता है।
- प्रेमी-प्रेमिकाओं के मिलन स्थल के रूप में खेतों या सुरक्षित घने जंगलों की चर्चा होती है।
- प्रेम-वर्णन में मर्यादा का निर्वाह किया जाता है — जैसे प्रेमी को 'मोतिया बेल' या 'छोटी मछली' का प्रतीक देना।
- हास्य-व्यंग्य: पारिवारिक संबंधों पर हल्की-फुल्की हंसी-मज़ाक होती है, जैसे पत्नी द्वारा पति के पत्रों पर व्यंग्य।
- इसमें किसी का दुर्भावनापूर्ण उपहास नहीं किया जाता।
- कल्याण-कामना: इनमें प्रेम का सर्वाधिक उत्कृष्ट और उदात्त रूप दिखता है।
- प्रसिद्ध गीत 'पाको बारा मासा' इसी श्रेणी का है, जिसमें धरती माता के प्रति शुभाकांक्षा व्यक्त हुई है।
ये झोड़े परिवर्तनशील जीवन, यथार्थ और समाज का दर्पण हैं — इनके चार मुख्य विषय हैं।
- राजनैतिक: ब्रिटिश शासन की कड़ी आलोचना (सेना में जबरन भर्ती, छेद वाले पैसे) इनमें मिलती है।
- स्वतंत्रता आंदोलन का वर्णन भी है — गांधी जी, सुभाष चंद्र बोस, नेहरू व भगत सिंह जैसे नेताओं का उल्लेख।
- भगत सिंह की फांसी के समय स्वर्ग से पुष्प-विमान उतरने का वर्णन भी मिलता है।
- 15 अगस्त और 26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर भी झोड़े गाए जाते हैं।
- आर्थिक: बढ़ती महंगाई, भुखमरी, बेकारी और व्यापारियों द्वारा कम तौलने (शोषण) का यथार्थ चित्रण मिलता है।
- भूमि-नाप (Settlement) के दौरान अमीन (राजस्व अधिकारी) की रिश्वतखोरी व गरीबों के शोषण पर भी तीखे झोड़े रचे गए हैं।
- सामाजिक: पुराने और नए युग (पीढ़ियों) का टकराव इनमें दिखता है।
- नई शिक्षा, वेशभूषा में बदलाव (घाघरा-हंसुली छोड़कर साड़ी पहनना, बच्चों का कोट-पैंट मांगना) जैसे विषय शामिल हैं।
- मद्य-निषेध, मुर्गी-पालन और श्रमदान (सड़क, पंचायत निर्माण) जैसे सुधारवादी विषय भी मिलते हैं।
- पारिवारिक: सास-बहू के झगड़े व देवरानी-जेठानी के प्रसंग इनमें मुख्य हैं।
- आधुनिक पत्नी का पति के साथ अलग रहने का हठ भी इनका विषय है।
परीक्षा-उपयोगी तथ्य
चांचरी
शाब्दिक अर्थ: 'चंचरीक' (भौंरा) की गति से संबंधित — नर्तक भौंरे की भांति गोल घूमते हुए घेरे को छोटा-बड़ा करते हैं। इसे झोड़े का ही प्राचीन व मूल रूप माना जाता है।
नामकरण एवं झोड़े से संबंध
- 'चांचरी', 'चांचड़ी' या 'चांचुरी' शब्द का संबंध 'चंचरीक गति' (भौंरे की गति) से माना जाता है।
- यह मूल रूप से दानपुर क्षेत्र के नृत्य-गीतों का नाम है, जो अल्मोड़ा-गढ़वाल की सीमा पर पिंडारी के मार्ग में स्थित है।
- इसे 'झोड़ा' का ही मूल और प्राचीन रूप माना जाता है।
- कई स्थानों पर चांचरी को झोड़ा ही कहा जाता है।
नृत्य शैली एवं गति
- इसमें घेरे का वृत्ताकार होना अनिवार्य है (झोड़े में यह सदैव आवश्यक नहीं होता)।
- नर्तक भौंरे (चंचरीक) की भांति वृत्ताकार घेरे में आगे बढ़ते हुए घेरे को छोटा करते हैं।
- पीछे हटते हुए नर्तक उसी घेरे को पुनः बड़ा कर देते हैं।
- झोड़े की तुलना में पद-संचालन (कदमों की ताल) अधिक मंद (धीमा) होता है।
- स्वरों के आरोह-अवरोह में भिन्नता होती है और लय अधिक जटिल होती है।
- धुनों का खिंचाव झोड़े की अपेक्षा दीर्घ (लंबा) होता है।
- वेशभूषा की विविधता और रंगीनी चांचरी का सबसे प्रमुख आकर्षण है।
भागीदारी
- नर और नारी इसमें समान रूप से भाग लेते हैं।
- एक घेरे में 5-7 व्यक्तियों से लेकर 300 तक व्यक्ति एक साथ शामिल हो सकते हैं।
- स्त्री-पुरुष छंद पर छंद मिलाकर घंटों तक अविराम गति से नृत्य करते हुए गाते हैं।
- मुख्य गायक झोड़े की भांति ही घेरे के बीच में रहता है।
विषय-वस्तु और भाव
विषय-वस्तु की दृष्टि से चांचरी में धार्मिक भावों की प्रधानता होती है, जो इसके वातावरण को अपेक्षाकृत गंभीर और आकर्षक बनाए रखती है।
- उदाहरण 1: शिव जटाधारी भैरू की शरण में जाकर आत्म-समर्पण करना।
- उदाहरण 2: पृथ्वी के रक्षक 'भुम्याल' (भूमिपाल) की स्तुति करना।
- उदाहरण 3: गृह-द्वार पर गणेश की स्तुति में दीपक जलाना।
एक चांचरी में भैरव की चौकी को हिमाचल से समुद्र पर्यंत बताते हुए संपूर्ण भारतवर्ष की एक राष्ट्रीय रूप में कल्पना की गई है।
- यह लोकगीतों पर आधुनिक युग के प्रभाव को दर्शाता है।
अब चांचरी में प्रेम-परक और सामाजिक विषयों का प्रभाव भी बढ़ने लगा है।
- उदाहरण: प्रेमी का प्रेयसी के गांव में धूनी रमाकर बैठ जाना।
- देवर (जो लाल मिठाई लाता है) की प्रशंसा की जाती है।
- पति (जो सस्ते गट्टे लाता है) की बुराई की जाती है।
कुछ चांचरियों में शोक या क्षोभ भी प्रकट किया जाता है।
- उदाहरण: एक गीत में बारह-बीसी (240) व्यक्तियों की बारात के डूब जाने का वर्णन है।
परीक्षा-उपयोगी तथ्य
छपेली
शाब्दिक अर्थ: 'छबीली' (सुंदर/आकर्षक स्त्रियों) से संबंधित। मुख्य रूप से दो लोगों का युगल नृत्य-गीत, वर्तमान में 'प्रेमी-प्रेमिका' के रूप में प्रसिद्ध है।
अर्थ एवं नामकरण
- 'छपेली' शब्द का संबंध 'छबीली' से माना जा सकता है।
- जहां छबीली स्त्रियां बैठती हों, या जिस गीत में छबीली स्त्रियों का प्रसंग वर्णित हो, वहां का नृत्य-गीत 'छबीली' या 'छपेली' कहलाता है।
नर्तक एवं स्वरूप
- यह मुख्य रूप से दो लोगों (प्रायः प्रेमियों) का युगल नृत्य है।
- परंपरागत रूप से ये दो पात्र प्रेमी-प्रेमिका, पिता-पुत्र, या भाई-बहन कोई भी हो सकते हैं।
- वर्तमान में यह शब्द मुख्य रूप से 'प्रेमी-प्रेमिका' के नृत्य-गीत के अर्थ में ही रूढ़ हो गया है।
- अब दूसरे पात्र के रूप में स्त्री के स्थान पर पुरुष भी स्त्री-वेश या अभिनय में भाग लेने लगा है।
पहचान व गायन शैली
- नृत्य में प्रेमी या प्रेमिका के एक हाथ में रंगीन रुमाल तथा दूसरे हाथ में दर्पण (शीशा) रहता है।
- इस नृत्य की गति अत्यंत तीव्र (तेज़) होती है।
- इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसका उल्लासपूर्ण संगीत, आकर्षक गति और सजीव व अर्थपूर्ण अंग-भंगिमा है।
- शैली 1: हुड़का व बांसुरी वाले अलग बैठकर गीत गाते हैं और नर्तक केवल हाव-भाव दिखाते हैं।
- शैली 2: नर्तक स्वयं हुड़का बजाकर गाता है और नर्तकी भाव-भंगिमा द्वारा गीत का अर्थ स्पष्ट करती है।
- यदि मुख्य गायक अलग बैठता है, तो प्रथम पंक्ति के बाद अन्य लोग उसे सामूहिक रूप में दोहराते हैं।
- इसमें एक 'टेक' (Refrain) होती है, जिसकी पुनरुक्ति छंदों के बीच-बीच में की जाती है।
विषय-वस्तु और भाव
इसका व्यापक विषय उन्मुक्त प्रेम और विशुद्ध शृंगार है। अवसर के अनुकूल विषय बदल सकता है, पर भाव सदैव सरल व उल्लासपूर्ण रहते हैं।
- गीतों में प्रेमिका की लंबी लटों पर मुग्ध होने का वर्णन मिलता है।
- उसके दांतों की तुलना बिजली की चमक से की जाती है।
- अल्मोड़े की हवा और बरेली की धूप (घाम) का भी वर्णन मिलता है।
- प्रेमिका को पाने के लिए उसके घर पानी भरने वाला नौकर बनने की कामना करता है।
- निरंतर साथ रहने के लिए प्रेमिका के केश (बाल) बन जाने की भी कामना करता है।
इन गीतों में कुमाऊं के स्थानीय खाद्य पदार्थों (जैसे कीमू फल, बासमती चावल) और विशिष्ट स्थानों का वर्णन भी मिलता है, जो लोगों की अभिरुचि को दर्शाता है।
सामाजिक वर्जना
छपेली के गीतों में श्लील-अश्लील (मर्यादा) का अधिक विचार नहीं होता, इसी कारण यह गीत वयस्क और आदरणीय (बुजुर्ग) व्यक्तियों के बीच कम गाया जाता है।
परीक्षा-उपयोगी तथ्य
तुलनात्मक दृष्टि
परीक्षा हेतु त्वरित पुनरावृत्ति — तीनों नृत्य-प्रधान गीतों में अंतर एक नज़र में।
| विशेषता | झोड़ा | चांचरी | छपेली |
|---|---|---|---|
| प्रकृति | विशाल सामूहिक (कंधे पर हाथ) | विशाल सामूहिक (भौंरे जैसी गति) | युगल (दो लोगों का) |
| क्षेत्र / उद्गम | संपूर्ण कुमाऊं | विशेषकर दानपुर क्षेत्र | शृंगारिक मंच / मेले |
| आकार | वृत्त या दो दल (वृत्त अनिवार्य नहीं) | वृत्ताकार होना पूर्णतः अनिवार्य | नर्तक-नर्तकी आमने-सामने |
| लय / गति | बहुत तेज़ (द्रुत) | अपेक्षाकृत धीमी और जटिल | अत्यधिक तेज़ और उल्लासपूर्ण |
| प्रमुख विषय | सामयिक, सामाजिक, शृंगार | मुख्यतः धार्मिक और गंभीर | विशुद्ध शृंगार और उन्मुक्त प्रेम |
| विशेष पहचान | बहुमंजिला संरचना (२–७ मंजिल) | लंबी धुन और रंगीनी | रुमाल और दर्पण का प्रयोग |
बैर
वर्ग: तर्क प्रधान लोकगीत। शाब्दिक अर्थ 'संघर्ष' है — यह गीत के माध्यम से किया जाने वाला एक संगीतमय वाक्-युद्ध (Musical Debate) है।
मुख्य विशेषताएं
- वाद्य-मुक्त गायन: इसमें किसी वाद्य यंत्र (जैसे हुड़का या ढोल) का प्रयोग नहीं होता।
- केवल गायक के 'कंठ-स्वर' ही इसका एकमात्र आधार हैं।
- प्रतियोगिता: यह दो गायकों या दो दलों के बीच एक Singing Battle है।
- इसका उद्देश्य सामने वाले को तर्क-वितर्क में पराजित करना होता है।
- समय-सीमा: यह गायन कई घंटों या कभी-कभी कई दिनों तक भी चल सकता है।
- अत्यधिक फेफड़ों की क्षमता (Lung capacity) और ओजपूर्ण आवाज़।
- कल्पना शक्ति और त्वरित बुद्धि (प्रत्युत्पन्न मति)।
- पौराणिक, सामाजिक और समसामयिक विषयों का ज्ञान।
गायन प्रक्रिया
एक गायक किसी अद्भुत घटना, दृश्य या समस्या पर प्रश्न करता है।
दूसरा गायक पहले सटीक उत्तर देता है, फिर उसी स्वर में एक नई चुनौती रखता है।
यह उत्तर-प्रत्युत्तर अखंड गति से तब तक चलता है जब तक एक पक्ष हार न मान ले।
- अंत में दोनों गायक एक-दूसरे के प्रति सम्मान व मंगल कामना प्रकट करते हुए विदा लेते हैं।
मुख्य विषय
- राजनीति: शासन व्यवस्था, सामाजिक सुधार, या समसामयिक घटनाएं।
- पौराणिक: पुराणों की कथाएं, देवी-देवता और धार्मिक विश्वास।
- व्यंग्य और कटाक्ष: प्रतिद्वंद्वी के व्यक्तित्व या आदतों पर हास्य-व्यंग्य।
- किसी सामाजिक विसंगति पर भी कटाक्ष किया जाता है।
- रीति-रिवाज: विवाह, जन्म या समाज की रूढ़ियों पर तर्क।
ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ
- चारण शैली: यह प्राचीन 'चारण' या 'भाट' शैली का स्मरण कराती है।
- अपने पक्ष को सिद्ध करने के लिए गायक पूरी शक्ति लगा देते थे।
- सामाजिक प्रतिष्ठा: कुमाऊं में 'बैरिया' की काफी प्रतिष्ठा होती है।
- उन्हें विवाह व मेलों में विशेष रूप से आमंत्रित किया जाता है।
- विवाह में भूमिका: उत्तर-पूर्वी कुमाऊं में वर व कन्या पक्ष के साथ एक-एक 'बैरिया' रहना अनिवार्य होता था।
- यह बैरिया अपने पक्ष की मर्यादा के लिए उत्तरदायी होता था।
परीक्षा-उपयोगी तथ्य
भगनौल
वर्ग: अनुभूति प्रधान लोकगीत। कुमाऊं का प्रमुख प्रेम-गीत, जो हुड़का की ताल पर सामूहिक रूप से गाया जाता है। इसका मुख्य स्थायी भाव 'रति' (प्रेम) है।
नामकरण की तीन धारणाएं
'भग' (सौंदर्य) + 'नील' (नवल) से मिलकर बना — यानी जिसमें निरंतर नवीन सौंदर्य की अभिव्यक्ति हो।
'भाग' (स्वर लगाना) शब्द से — जिसमें मुख्य गायक के साथ साथी गायक भी अपना स्वर मिलाते हैं।
'भंग' (नवोढ़ा स्त्री) शब्द से — ये गीत मूलतः नई विवाहित स्त्रियों को संबोधित कर गाए जाते थे।
प्रदर्शन और गायन शैली
- मुद्रा: भगनौल को सदैव खड़े होकर गाया जाता है।
- हुड़का: मुख्य गायक हुड़का बजाते हुए गीत गाता है।
- आलाप: गायक सर्वप्रथम आलाप लेता है।
- टेक: इसके बाद 'टेक' (स्थायी) बोलकर गायन को आगे बढ़ाया जाता है।
भगनौल के चार स्वरूप — डॉ. पाण्डेय के अनुसार
गीत की पहली दो पंक्तियाँ ही 'टेक' (Refrain) बन जाती हैं।
पंक्तियाँ गद्य की तरह सुनाई जाती हैं और अंत में तुक (Rhyme) मिलाई जाती है।
केवल दो पंक्तियों का 'जोड़' (Couplet) होता है। यह सबसे रचनात्मक और प्रसिद्ध शैली है।
कई सार्थक/असार्थक पंक्तियों को जोड़कर एक पूरा दृश्य या प्रसंग तैयार किया जाता है।
मुख्य विशेषताएं
- प्रमुख रस: इसका मुख्य स्थायी भाव 'रति' (प्रेम) है।
- भाव: प्रेम का उत्कृष्ट, उदात्त और कहीं-कहीं आत्म-समर्पण वाला रूप दिखता है।
- प्रतीक: बुरुश का फूल, भंवरा, तोता (सुवा) और गुलाब जैसे प्रकृति-प्रतीकों का बहुल प्रयोग होता है।
- दार्शनिक स्वर: जीवन की क्षणभंगुरता, मृत्यु की निश्चितता और भाग्य के खेल जैसे विचार भी कहीं-कहीं मिलते हैं।
- साहित्यिक गुण: ये नैसर्गिक (Natural) प्रवाह में बहने वाले गीत हैं, प्रयत्न-साध्य नहीं।
- इनमें अलंकारों का सुंदर व स्वाभाविक प्रयोग मिलता है।
परीक्षा-उपयोगी तथ्य
न्यौली
वर्ग: अनुभूति प्रधान लोकगीत। कुमाऊं का सबसे मार्मिक, करुणा और विरह-प्रधान लोकगीत — विशुद्ध रूप से एक 'वन-गीत' है।
नामकरण और प्रकृति
- नाम का आधार: हिमालयी वनों में एकांत में गाने वाली 'न्यौली' चिड़िया के नाम पर इसका नामकरण हुआ।
- वन-गीत: यह विशुद्ध रूप से एक 'वन-गीत' है।
- इसे मेलों में नहीं गाया जाता।
- इसे घास काटते समय या लकड़ियाँ एकत्र करते समय गाया जाता है।
- इसे ऊँची चोटियों पर अकेले में भी गाया जाता है।
गायन शैली
- वाद्य-मुक्त: इसमें किसी वाद्य यंत्र (जैसे हुड़का) का प्रयोग नहीं होता।
- स्वर-विस्तार: गायक के स्वर और पहाड़ों की गूंज (Echo) ही संगीत का काम करती है।
- मार्मिक हूक: इसकी गायन शैली में लंबी हूक (Pathos) और लंबे स्वर होते हैं।
- यह हूक सीधे हृदय को स्पर्श करती है।
मुख्य विषय-वस्तु
न्यौली मूलतः विरह और करुणा का गीत है।
- यह प्रेमी-प्रेमिका के बिछोह का दुख व्यक्त करता है।
- विवाहित स्त्री (धियाण) द्वारा अपने मायके की याद में भी गाया जाता है।
भगनौल के विपरीत, न्यौली में जीवन का गहरा दार्शनिक चिंतन प्रमुख है।
- इसमें 'भाग्यवादिता' (Destiny) का भाव प्रधान रहता है।
इसमें दर्द और एकाकीपन का स्वर रहता है।
- जीवन के प्रति एक प्रकार की विरक्ति भी इसमें झलकती है।
परीक्षा-उपयोगी तथ्य
तुलनात्मक दृष्टि
परीक्षा हेतु त्वरित पुनरावृत्ति — भगनौल और न्यौली के बीच अंतर एक नज़र में।
| आधार | भगनौल | न्यौली |
|---|---|---|
| भाव-भूमि | प्रत्यक्ष संपर्क और 'मांसलता' (शारीरिक प्रेम) की प्रधानता | हृदय की गहराई, भावों की अतीन्द्रियता (आध्यात्मिक/मानसिक) |
| वाद्य यंत्र | हुड़का (Hudka) की ताल पर गाया जाता है | किसी वाद्य यंत्र का प्रयोग नहीं — केवल आवाज़ |
| गायन शैली | सामूहिक गायन — 'होवार' (साथी) स्वर देते हैं | एकल गायन — स्वर-विस्तार और लंबी 'हूक' |
| संरचना (जोड़) | पहली पंक्ति (जोड़) कभी-कभी निरर्थक या केवल तुक हेतु होती है | पहली पंक्ति (जोड़) सदैव पूर्ण व सार्थक वाक्य होती है |
| लय और गति | आलाप द्रुत (तेज) गति के होते हैं | स्वर-विस्तार व मंथर गति (धीमी लय) होती है |
| दृष्टिकोण | बाहरी सौंदर्य (Physical Beauty) पर केंद्रित | आंतरिक पीड़ा और जीवन-दर्शन पर केंद्रित |
हुड़की बोल गीत
वर्ग: कृषि प्रधान लोकगीत। कुमाऊं का एक अत्यंत प्रसिद्ध कृषि-गीत एवं नृत्य, जो कृषि कार्यों के दौरान जनसामान्य का उत्साह बढ़ाने हेतु गाया जाता है।
अर्थ और वाद्य यंत्र
- हुड़का: डमरू के आकार का एक छोटा पारंपरिक वाद्य यंत्र; पूरे गायन और नृत्य में केवल इसी एकमात्र वाद्य यंत्र का प्रयोग किया जाता है।
- बोल (बाउल): इसका अर्थ गीत या गाथा के बोल (Lyrics) से है।
गायन का अवसर और उद्देश्य
- रोपाई का समय: यह गीत मुख्य रूप से खरीफ की फसल, विशेषकर धान की रोपाई और मक्का की खेती के समय गाया जाता है।
- उद्देश्य: कीचड़ भरे खेतों में लगातार काम करने वाले किसानों (मुख्यतः महिलाओं) की थकान दूर करने, उनके समय की बचत करने और उनका उत्साहवर्धन (मनोरंजन) करने के लिए इसे गाया जाता है।
गायन शैली और विषय-वस्तु
मुख्य गायक खेत में काम कर रही महिलाओं के बीच खड़ा होकर हुड़के की थाप पर गीत की पंक्तियां गाता है।
खेत में रोपाई कर रही महिलाएं (रोपाहार) एक साथ कोरस में उन पंक्तियों को दोहराती हैं।
इसकी शुरुआत धरती माता, जल, जंगल, जमीन और इष्ट देवताओं की स्तुति से होती है। इसके बाद गायक अत्यंत रोचक ढंग से ऐतिहासिक वीरों के संघर्षों और वीरगाथाओं (Heroic deeds) का वर्णन करता है।
गीत का प्रकार
परीक्षा-उपयोगी तथ्य
फाग गीत
वर्ग: मांगलिक संस्कार गीत। कुमाऊं की संस्कृति में 'फाग' विशुद्ध रूप से मांगलिक गीत (संस्कार गीत) हैं, जिन्हें शुभ अवसरों पर गाया जाता है।
गायन का अवसर
- प्रमुख संस्कार: किसी भी मांगलिक कार्य की शुरुआत फाग से ही होती है। इन्हें मुख्य रूप से नामकरण, अन्नप्राशन, उपनयन (जनेऊ), और विवाह जैसे सोलह संस्कारों के दौरान गाया जाता है।
- शगुन आखर: कुमाऊं में इन मंगलगीतों को 'शगुन आखर' (शगुन के समय गाए जाने वाले गीत) भी कहा जाता है।
गायन शैली और कलाकार
- फगारिया: 'फाग' गाने का अधिकार केवल महिलाओं को होता है। फाग गाने वाली इन बुजुर्ग और अनुभवी महिलाओं को समाज में 'फगारिया' कहा जाता है और उन्हें अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।
- कोरस और मंत्रोच्चारण: फाग गीत कभी अकेले नहीं गाए जाते, ये महिलाओं द्वारा सामूहिक रूप से (कोरस में) एक विशेष लय में गाए जाते हैं।
- समन्वय: जब पंडित जी द्वारा वैदिक मंत्रोच्चारण किया जा रहा होता है, ठीक उसी समय पृष्ठभूमि में महिलाओं द्वारा फाग का गायन चलता है, जो लोक और वेद का एक अनोखा समन्वय है।
परीक्षा उपयोगी विशेष तथ्य
प्रत्येक संस्कार और अवसर के लिए अलग-अलग फाग निर्धारित हैं। उदाहरण के लिए, उपनयन में गणेश पूजा का फाग अलग होता है।
विवाह के दौरान कन्या पक्ष द्वारा धुलार्घ, शृंगार और कन्यादान के अलग फाग गाए जाते हैं, लेकिन 'बारात विदाई' का फाग अत्यधिक मार्मिक और करुणापूर्ण होता है।
गीत का प्रकार
परीक्षा-उपयोगी तथ्य
ठुलखेल गीत
वर्ग: धार्मिक महाकाव्य गीत। कुमाऊं क्षेत्र का एक विशिष्ट लोकगीत, जो मुख्य रूप से धार्मिक प्रसंगों और महाकाव्यों पर आधारित होता है।
गायन का अवसर
- यह गीत कुमाऊं क्षेत्र में पुरुषों द्वारा विशेष रूप से भाद्रपद (भादों) महीने में कृष्ण जन्माष्टमी के आस-पास गाया जाता है।
मुख्य विषय-वस्तु
- ठुलखेल गीतों में प्रायः भगवान कृष्ण और भगवान राम की लीलाओं का सजीव वर्णन किया जाता है।
- जैसे — राम वनवास, सीता परीक्षा, और कृष्ण की बाल लीलाएं।
अन्य नाम — 'पहाड़ी रामायण'
इसमें राम की लीलाओं का इतना विस्तृत और लोक-शैली में वर्णन होता है कि कई स्थानों पर इसे 'पहाड़ी रामायण' के नाम से भी जाना जाता है।
मुख्य गायक
इस गीत का नेतृत्व करने वाले मुख्य गायक को 'बखणनियाँ' कहा जाता है।
गीत का प्रकार
परीक्षा-उपयोगी तथ्य
जागर गीत
वर्ग: धार्मिक अनुष्ठानिक लोकगाथा। 'जागर' का शाब्दिक अर्थ 'जगाना' है — यह उत्तराखंड (कुमाऊं और गढ़वाल दोनों) की एक धार्मिक और अनुष्ठानिक लोकगाथा शैली है, जिसका उद्देश्य इष्ट देवी-देवताओं को जागृत करना होता है।
उद्देश्य और अवसर
- ये लोकगाथाएं किसी धार्मिक अनुष्ठान, तंत्र-मंत्र, या विशेष पूजा के समय देवी-देवताओं, आत्माओं या पौराणिक शूरवीरों का आह्वान करने और उन्हें प्रसन्न करने के लिए गाई जाती हैं।
प्रमुख भूमिकाएं
जागर का नेतृत्व करने वाले और देवताओं की गाथा गाने वाले मुख्य गायक को 'जगरिया' (Jagariya) कहा जाता है।
जिस व्यक्ति के शरीर में देवता का अवतरण होता है (जो देवता के प्रभाव में आकर नृत्य करने लगता है), उसे 'डंगरिया' (Dangariya) कहा जाता है।
वाद्य यंत्र
- जगरिया गायन के साथ-साथ पारंपरिक वाद्य यंत्रों जैसे— हुड़की (हुडुक), ढोल, दमाऊ, डमरू और कांस्य की थाली का प्रयोग करता है।
- ये वाद्य इस अनुष्ठान का अनिवार्य हिस्सा हैं।
प्रमुख जागर
उत्तराखंड में गोलू देवता, गंगनाथ, ऐड़ी, भोलानाथ, भैरवनाथ, नरसिंह, और पांडवों के जागर अत्यंत प्रसिद्ध हैं।
गीत का प्रकार
परीक्षा-उपयोगी तथ्य
तुलनात्मक दृष्टि
परीक्षा हेतु त्वरित पुनरावृत्ति — चारों 'अन्य गीत' का प्रकार व अन्य विशेषताएं एक नज़र में।
| आधार | हुड़की बोल | फाग | ठुलखेल | जागर |
|---|---|---|---|---|
| प्रकार | कृषि प्रधान गीत | मांगलिक संस्कार गीत | धार्मिक महाकाव्य गीत | अनुष्ठानिक देव-आह्वान गीत |
| प्रमुख अवसर | धान रोपाई / खरीफ खेती | सोलह संस्कार (नामकरण, उपनयन, विवाह आदि) | भाद्रपद — कृष्ण जन्माष्टमी | धार्मिक अनुष्ठान, तंत्र-मंत्र, विशेष पूजा |
| मुख्य गायक | हुड़किया | फगारिया (महिलाएं) | बखणनियाँ (पुरुष) | जगरिया |
| वाद्य यंत्र | केवल हुड़का | वाद्य-मुक्त (केवल कोरस) | प्रायः वाद्य-मुक्त, नाट्य-प्रधान | हुड़की, ढोल, दमाऊ, डमरू, थाली |
| विषय-केंद्र | धरती, देवता-स्तुति, वीरगाथा | मंगल-कामना व शगुन | राम व कृष्ण लीला ('पहाड़ी रामायण') | देवी-देवता/आत्मा आह्वान |
खुदेड़ गीत
वर्ग: अनुभूति एवं विरह प्रधान लोकगीत। गढ़वाल की सबसे प्रमुख और मार्मिक श्रेणी।
मायके की याद, करुणा और नारी-हृदय की पीड़ा पर आधारित।
मूल अर्थ एवं श्रेणी
यह गढ़वाल की 'अनुभूति एवं विरह प्रधान' श्रेणी का सबसे मार्मिक लोकगीत है।
गढ़वाली बोली में 'खुद' का तात्पर्य 'गहरी याद आना' या स्मृति में व्याकुल होना (तड़प) है।
गायिका एवं विषय-वस्तु
यह गीत मुख्य रूप से 'धियाण' (नवविवाहित युवती) द्वारा गाया जाता है।
इसका मुख्य विषय धियाण द्वारा अपने 'मैत' (मायके/पीहर), बचपन की सहेलियों और माता-पिता की याद में गाया जाने वाला विशुद्ध करुण/विरह रस है।
प्रदर्शन एवं गायन शैली
यह कोई सामूहिक या युगल गीत नहीं है, बल्कि अकेले (एकांत में) गाया जाने वाला गीत है।
इसमें किसी भी वाद्य यंत्र का प्रयोग नहीं होता। यह स्वतंत्र कंठ से और ऊंचे स्वरों (हूक) में गाया जाता है।
इसे मेलों या उत्सवों में नहीं, बल्कि वनों में घास काटते या लकड़ी बीनते समय गाया जाता है।
इसमें 'घुघुती' (पक्षी) और बादलों को मायके संदेश भेजने वाले प्रतीक (संदेश-वाहक) के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।
गीत का प्रकार
परीक्षा-उपयोगी MCQ ट्रैप (Cross-references)
- खुदेड़ (गढ़वाल) बनाम न्यौली (कुमाऊं): दोनों ही नवविवाहिताओं द्वारा जंगलों में गाए जाने वाले वाद्य-मुक्त, एकाकी विरह-गीत हैं। अंतर केवल क्षेत्र का है (खुदेड़ = गढ़वाल, न्यौली = कुमाऊं)।
- खुदेड़ बनाम बाजूबंद: दोनों गढ़वाल के वाद्य-मुक्त गीत हैं। किंतु खुदेड़ विशुद्ध रूप से एक एकाकी (Solo) विरह गीत है, जबकि बाजूबंद एक शृंगारिक युगल-संवाद (Duet) है।
बाजूबंद (दुड़ा)
वर्ग: अनुभूति, शृंगार एवं विरह प्रधान (युगल-संवाद)।
प्रमुख क्षेत्र: गढ़वाल (विशेषकर रंवाई, जौनपुर तथा टिहरी का सीमावर्ती अंचल)।
व्युत्पत्ति एवं प्रतीकात्मक नामकरण
बाजूबंद मूलतः पर्वतीय महिलाओं द्वारा भुजाओं में धारण किया जाने वाला एक पारंपरिक आभूषण है।
- लोक-साहित्य में इसे प्रेमी-प्रेमिका के आलिंगन (Embrace) के काव्यात्मक प्रतीक के रूप में स्थापित किया गया है।
- यह 'अटूट प्रेम-बंधन' का भी प्रतीक है।
रंवाई-जौनपुर क्षेत्र की स्थानीय बोली में इसे 'दुड़ा' कहा जाता है।
- इसका तात्पर्य दो व्यक्तियों (युगल) के मध्य होने वाले काव्यात्मक संवाद (Duet) से है।
- इसमें दो-दो पंक्तियों के प्रश्नोत्तर गाये जाते हैं।
प्रदर्शन प्रविधि एवं गायन शैली
इस लोकगीत का गायन मेलों, औपचारिक उत्सवों या मंचों पर नहीं होता।
- मुख्यतः जंगलों में घास काटते समय गाया जाता है।
- गोठों में तथा पशु चारण के दौरान भी गाया जाता है।
- बांज-बुरांस के वृक्षों की छाया में विश्राम करते हुए नैसर्गिक वातावरण में गाया जाता है।
यह विशुद्ध रूप से एक युगल गीत है।
- एक पहाड़ी से पुरुष (प्रेमी) काव्यात्मक प्रश्न या प्रेम-निवेदन करता है।
- दूसरी पहाड़ी से स्त्री (प्रेमिका) उसी लय में उसका काव्यात्मक प्रत्युत्तर देती है।
कुमाऊं की 'न्यौली' और गढ़वाल के 'खुदेड़' की भांति यह भी पूर्णतः वाद्य-मुक्त लोकगीत है।
- इसे स्वतंत्र कंठ से गाया जाता है।
- शांत घाटियों और वनों की गूंज (Echo) ही संगीत का कार्य करती है।
काव्यात्मक संरचना (गीत की बुनावट)
डॉ. गोविंद चातक के अनुसार, इसकी रचना मुख्य रूप से दो पंक्तियों (Couplets) में होती है।
- प्रथम पंक्ति: यह प्रायः तुक (Rhyme) मिलाने अथवा प्राकृतिक पृष्ठभूमि (जंगल, नदी, पेड़) का दृश्य निर्मित करने हेतु प्रयुक्त होती है।
- द्वितीय पंक्ति: इसमें मुख्य संदेश, काव्यात्मक ताना, या प्रेम-भाव निहित होता है।
'बैर' या 'भगनौल' की भांति यह भी तात्कालिक रचना-शैली है।
- गायक-गायिका पूर्व-रचित गीत नहीं गाते, बल्कि सामने वाले के कथन और प्राकृतिक उद्दीपन के आधार पर तुरंत (On the spot) नई पंक्तियों का सृजन करते हैं।
- इसी तात्कालिक रचना से एक-दूसरे को उत्तर दिया जाता है।
विषय-वस्तु एवं रस
इसका मुख्य स्थायी भाव 'शृंगार रस' (संयोग और वियोग दोनों) है।
- प्रेम-निवेदन, रूठना-मनाना और यौवन के सौंदर्य का वर्णन इसमें होता है।
- दिन ढलने पर घर लौटने की मजबूरी या बिछड़ने की तड़प का सजीव चित्रण भी मिलता है।
इन गीतों में प्रकृति का प्रयोग उद्दीपन विभाव के रूप में किया जाता है।
- बुरांस के फूल, काफल, बांज के वृक्ष तथा पहाड़ी नदियों को मानवीय प्रेम और यौवन के प्रतीकों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
इन गीतों में पर्वतीय समाज के युवाओं का निश्छल, नैसर्गिक और स्वच्छंद प्रेम झलकता है।
- इसमें शिष्ट या दरबारी साहित्य जैसी कोई कृत्रिमता (Artificiality) नहीं होती।
- यह सीधे हृदय से हृदय का संवाद है।
गीत का प्रकार
परीक्षा-उपयोगी सारांश एवं MCQ ट्रैप
- श्रेणी का भ्रम: यद्यपि यह अनुभूति व विरह प्रधान श्रेणी में आता है, किंतु यह विशुद्ध शोक/विरह गीत (जैसे 'खुदेड़') नहीं है — इसका मूल स्वरूप 'शृंगारिक युगल-संवाद' है।
- बाजूबंद बनाम खुदेड़: दोनों वाद्य-मुक्त हैं, किंतु खुदेड़ एकाकी (Solo) विरह गीत है, जबकि बाजूबंद युगल (Duet) संवाद है।
- बाजूबंद बनाम छोपती: दोनों रंवाई-जौनपुर के प्रश्न-उत्तर वाले गीत हैं, किंतु बाजूबंद काम करते हुए/बैठकर (नृत्य-मुक्त) गाया जाता है, जबकि छोपती में नृत्य अनिवार्य है।
- बाजूबंद बनाम बैर गीत: दोनों में तात्कालिक रचना (आशुकवि शैली) होती है, पर 'बैर' कुमाऊं का तर्क-प्रधान वाक्-युद्ध है जबकि 'बाजूबंद' गढ़वाल का शृंगार-प्रधान प्रेम संवाद है।
लामण गीत (Laman Geet)
वर्ग: अनुभूति एवं विरह/शृंगार प्रधान लोकगीत। पहाड़ों के उन्मुक्त व नैसर्गिक प्रेम का सबसे मार्मिक उदाहरण।
मूलतः हिमाचली मूल का गीत, जो उत्तराखंड के सीमावर्ती क्षेत्रों में भी प्रचलित है।
मूल क्षेत्र और लोक-विस्तार
लामण मूलतः हिमाचल प्रदेश (विशेषकर किन्नौर, कुल्लू और सिरमौर) का सबसे प्रसिद्ध लोकगीत है।
उत्तराखंड में यह पूरे राज्य में नहीं गाया जाता।
- इसका प्रभाव केवल हिमाचल की सीमा से लगे जौनसार-बावर (देहरादून) तक सीमित है।
- साथ ही रंवाई-जौनपुर (उत्तरकाशी/टिहरी) के क्षेत्रों में भी यह प्रचलित है।
विषय-वस्तु और भाव
यह विशुद्ध रूप से युवाओं का एक शृंगारिक प्रेम-गीत है।
- इसका स्थायी भाव 'रति' (प्रेम) है।
इसमें नायक-नायिका के रूप-सौंदर्य का वर्णन, प्रेम का इज़हार, और मिलन की असीम तड़प (Longing) होती है।
- इन गीतों में सांसारिक यथार्थ कम और कल्पना व भावुकता बहुत अधिक होती है।
प्रदर्शन शैली
इसे किसी बंद कमरे या मंच पर नहीं, बल्कि पहाड़ों की ऊंची चोटियों या गहरी घाटियों में गाया जाता है।
- गायक इसे अत्यंत ऊंचे और लंबे सुर (High Pitch) में गाते हैं।
- ताकि आवाज दूर तक गूंजे और दूसरे पहाड़ पर मौजूद प्रेमी/प्रेमिका तक संदेश पहुंचे।
इसे मुख्य रूप से स्वतंत्र कंठ से (बिना किसी बड़े वाद्य यंत्र के) गाया जाता है।
- कई बार इसके साथ 'अलगोजा' (दोहरी बांसुरी) की अत्यंत सुरीली धुन का प्रयोग किया जाता है।
- यह इसकी मिठास को कई गुना बढ़ा देती है।
गीत का प्रकार
परीक्षा-उपयोगी तथ्य
चौंफला गीत
वर्ग: नृत्य प्रधान लोकगीत। गढ़वाल क्षेत्र का अत्यंत प्रसिद्ध, प्राचीन और आनंद-प्रधान 'नृत्य-गीत' (Dance-Song)।
डॉ. गोविंद चातक व अन्य लोक-इतिहासकारों के अनुसार वर्णित।
व्युत्पत्ति और अर्थ
इसका शाब्दिक अर्थ है 'चारों ओर खिलना'।
- यह उल्लास, उमंग और वसंत के आगमन का प्रतीक है।
- चारों दिशाओं में प्रकृति के खिलने का भाव इसमें निहित है।
इस लोकगीत में भाग लेने वाले नर्तकों के लिए विशेष संबोधन प्रयुक्त होते हैं।
- पुरुष नर्तक को 'चौंफला' कहा जाता है।
- स्त्री नर्तक को 'चौंफलो' कहा जाता है।
प्रदर्शन शैली
परीक्षा की दृष्टि से यह सबसे अहम बिंदु है — मूल चौंफला में किसी भी वाद्य यंत्र (Instrument) का प्रयोग नहीं होता।
- यह पूर्णतः वाद्य-मुक्त नृत्य-गीत है।
वाद्य यंत्र न होने के कारण संगीत की लय व ताल शरीर से ही उत्पन्न की जाती है।
- हाथों की ताली से ताल बनती है।
- पैरों की थाप (कदमों की आहट) से भी लय बनती है।
- झांझ-मंजीरों व चूड़ियों की खनक से भी संगीत उत्पन्न होता है।
स्त्री-पुरुष अलग-अलग टोलियां बनाकर या एक साथ वृत्ताकार (गोल) घेरे में नृत्य करते हैं।
- नर्तक एक-दूसरे के हाथों को गूंथकर घेरा बनाते हैं।
गायन और नृत्य की गति क्रमशः बदलती है।
- शुरुआत में गति धीमी (मंथर) होती है।
- गीत के अंत तक गति अत्यंत द्रुत (तेज) हो जाती है।
विषय-वस्तु और भाव
मान्यता है कि चौंफला नृत्य की उत्पत्ति माता पार्वती द्वारा भगवान शिव को प्रसन्न करने हेतु किए गए शृंगारिक नृत्य से हुई।
इसका मुख्य स्थायी भाव 'शृंगार रस' है।
इसमें मुख्य रूप से निम्न विषय वर्णित होते हैं:
- वसंत ऋतु का आगमन।
- प्रकृति के सौंदर्य (फूलों का खिलना) का वर्णन।
- नायक-नायिका का मिलन।
- प्रेम-निवेदन।
परीक्षा-उपयोगी तथ्य
ताल हाथ-पैर व आभूषणों की ध्वनि से बनती है।
वृत्ताकार (गोल) घेरे में नृत्य करते हैं।
झुमैलो गीत
वर्ग: नृत्य प्रधान लोकगीत। गढ़वाल का अत्यंत लोकप्रिय सामूहिक नृत्य-गीत — प्रकृति के उल्लास और नारी-हृदय की भावनाओं का अनूठा संगम।
डॉ. गोविंद चातक व अन्य विद्वानों के अनुसार वर्णित।
व्युत्पत्ति और अर्थ
इसकी उत्पत्ति 'झूमने' की क्रिया से मानी जाती है।
- वसंत ऋतु के उल्लास में जब प्रकृति और मनुष्य दोनों झूम उठते हैं, तो उसे झुमैलो कहा जाता है।
इन गीतों की हर पंक्ति के अंत में 'झुमैलो' शब्द टेक के रूप में बार-बार दोहराया जाता है।
- उदाहरण: "भला झुमैलो... हो झुमैलो"।
गायन का अवसर (Timing)
यह मुख्य रूप से वसंत ऋतु (विशेषकर चैत्र महीने) के आगमन पर गाया जाता है।
चैत्र मास में जब गढ़वाल की विवाहित युवतियां (धियाणियां) अपने मायके आती हैं, तो वे अपनी सहेलियों के साथ मिलकर इसे गाती हैं।
प्रदर्शन शैली
यद्यपि इसे स्त्री-पुरुष दोनों गा सकते हैं, मुख्य रूप से यह महिलाओं का सामूहिक नृत्य-गीत है।
चौंफला की तरह इसे भी प्रायः बिना किसी वाद्य यंत्र के गाया जा सकता है।
- किंतु मेलों और उत्सवों में इसके साथ ढोल-दमाऊ का प्रयोग भी किया जाता है।
महिलाएं एक-दूसरे की कमर या कंधों पर हाथ रखकर नृत्य करती हैं।
- अर्ध-वृत्ताकार (Half-circle) घेरे में झूमते हुए नृत्य होता है।
- कभी-कभी पूर्ण वृत्ताकार घेरे में भी नृत्य किया जाता है।
विषय-वस्तु और भाव
झुमैलो केवल उल्लास का गीत नहीं है।
- इसमें प्रकृति के सौंदर्य (फूलों के खिलने) का वर्णन होता है।
- साथ ही इसमें 'खुदेड़' (विरह और मायके की याद) का पुट भी मिला होता है।
वसंत के खिले हुए वातावरण के बीच नारी जीवन का यथार्थ भी प्रस्तुत होता है।
- नारी जीवन की कठिनाइयां।
- सास-ससुर का व्यवहार।
- पति के परदेस जाने की पीड़ा।
परीक्षा-उपयोगी तथ्य
तांदी गीत
वर्ग: नृत्य प्रधान लोकगीत। जौनसार-बावर और रंवाई-जौनपुर क्षेत्र (उत्तरकाशी व टिहरी का सीमावर्ती भाग) का सामूहिक उल्लास-प्रधान वृत्ताकार नृत्य।
व्युत्पत्ति और अर्थ
स्थानीय बोली में 'तांदी' का अर्थ 'लय' या 'ताल' से लिया जाता है।
- यह सामूहिक नृत्य की उस लय को दर्शाता है, जिसे लोग एक साथ मिलकर निभाते हैं।
प्रदर्शन शैली
तांदी एक वृत्ताकार नृत्य है।
- स्त्री-पुरुष एक-दूसरे का हाथ थामकर (या कमर पकड़कर) नाचते हैं।
इसमें 'ढोल' और 'दमाऊ' का अनिवार्य प्रयोग होता है।
- ढोल की थाप पर ही पूरा नृत्य संचालित होता है।
नर्तक दल स्वयं ही गाता है और नाचता है।
- अक्सर मेलों, त्यौहारों (जैसे माघ मेला) और शुभ अवसरों पर किया जाता है।
विषय-वस्तु और भाव
यह गीत किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज की खुशी के लिए होता है।
इन गीतों में ऐतिहासिक घटनाओं, स्थानीय महापुरुषों और पौराणिक कथाओं का वर्णन भी मिलता है।
यह अपनी द्रुत (तेज) लय और शारीरिक चपलता के लिए जाना जाता है।
परीक्षा-उपयोगी तथ्य
छोपती (छोपाती)
वर्ग: नृत्य प्रधान लोकगीत। गढ़वाल के रंवाई-जौनपुर क्षेत्र का चुलबुला 'शृंगारिक नृत्य-गीत' (Romantic Dance-Song)।
डॉ. गोविंद चातक व डॉ. यशवंत सिंह कठोच के सांस्कृतिक वर्गीकरण के अनुसार वर्णित।
व्युत्पत्ति और अर्थ
स्थानीय बोली में 'छोपती' शब्द उस कलात्मक और चंचल शैली से बना है, जिसमें प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे पर प्रेम-भरे कटाक्ष, ताने या भाव गीतों के माध्यम से 'छोपते' (फेंकते) हैं।
यह मूलतः एक 'प्रश्न-उत्तर' (Call and Response) या संवाद-आधारित गीत है।
- इसका अर्थ ही बातों को गीतों के जरिये एक-दूसरे पर उछालना है।
प्रदर्शन शैली
यह एक युगल (Duet) गीत है, जिसे स्त्री-पुरुष आमने-सामने होकर गाते हैं।
- गायन के साथ-साथ नृत्य भी किया जाता है।
पहाड़ों, जंगलों या खेतों में अक्सर बिना किसी वाद्य यंत्र के (स्वतंत्र कंठ से) गाया जाता है।
- मेलों और विशेष आयोजनों में स्थानीय वाद्य यंत्रों का प्रयोग भी किया जाता है।
कुमाऊं के 'बैर' या गढ़वाल के 'बाजूबंद' की तरह इसमें भी 'प्रत्युत्पन्न मति' (Instant Wit) की आवश्यकता होती है।
- सामने वाला गायक क्या गा रहा है, उसे सुनकर तुरंत उसी लय में जवाब रचना इसकी सबसे बड़ी खूबी है।
विषय-वस्तु और भाव
इसका स्थायी भाव पूर्णतः 'शृंगार रस' है।
- प्रेम का इज़हार, सौंदर्य का वर्णन, रूठना-मनाना और मिलन-विरह की भावनाएं इसमें पिरोई होती हैं।
यह गीत पहाड़ी समाज की उस नैसर्गिक और स्वच्छंद संस्कृति का प्रतीक है, जहां युवा निःसंकोच होकर अपनी भावनाओं को कला के माध्यम से व्यक्त करते हैं।
परीक्षा-उपयोगी तथ्य
पँवाड़े (भड़ौ)
वर्ग: वीरगाथा एवं गाथा गीत। शूरवीरों व उनके बलिदानों का 'संगीतमय इतिहास' (Heroic Ballads)।
डॉ. गोविंद चातक व डॉ. त्रिलोचन पाण्डेय के अनुसार वर्णित।
अर्थ और क्षेत्रीय नामकरण
उत्तराखंड की ऐतिहासिक शब्दावली में 'भड़' का अर्थ है — 'अत्यंत बलशाली शूरवीर' या महान योद्धा।
गढ़वाल क्षेत्र में शूरवीरों के यशोगान और वीरगाथा गाने की शैली को 'पँवाड़े' कहा जाता है।
कुमाऊं क्षेत्र में इन्हीं वीरगाथाओं को 'भड़ौ' या 'कटकू' कहा जाता है।
- 'कटक' का अर्थ है सेना।
प्रदर्शन शैली
इन गीतों का मूल उद्देश्य श्रोताओं की रगों में उत्साह भरना होता है।
- इसलिए इन्हें उच्च स्वर, तीव्र गति (Fast tempo) और वीर रस में गाया जाता है।
युद्ध के नगाड़ों जैसी ताल पैदा करने के लिए विशेष वाद्य यंत्रों का प्रयोग होता है।
- ढोल-दमाऊ, डौंर-थाली और हुड़के का प्रयोग किया जाता है।
पँवाड़े गाने का कार्य प्रायः पेशेवर लोक-गायकों द्वारा किया जाता है।
- जैसे औजी, ढोली या दास समुदाय।
- कभी-कभी इसे अनुष्ठानिक रूप में भी गाया जाता है।
- ऐसे अनुष्ठान में गाते-गाते किसी व्यक्ति (पश्वा) पर उस शूरवीर की आत्मा अवतरित हो जाती है।
विषय-वस्तु और महत्व
इसका एकमात्र स्थायी भाव 'वीर रस' है।
जब लिखित इतिहास उपलब्ध नहीं था, तब इन्हीं पँवाड़ों के माध्यम से पीढ़ियों तक वीरों की गाथाएं सुरक्षित रखी गईं।
- वीरों के जन्म, युद्ध-कौशल और बलिदान की कहानियाँ इसमें संरक्षित हैं।
इसमें मुख्य रूप से आक्रमणकारियों से हुए भीषण युद्धों और मातृभूमि की रक्षा का वर्णन होता है।
- जैसे तिब्बत, रोहिल्ला या गोरखा आक्रमणकारियों से संघर्ष।
परीक्षा के लिए प्रमुख पँवाड़े
- माधो सिंह भंडारी का पँवाड़ा: मलेथा की गूल बनाने वाले राजा महिपत शाह के महान सेनापति।
- तीलू रौतेली का पँवाड़ा: गढ़वाल की लक्ष्मीबाई, जिन्होंने 15-22 वर्ष की आयु में 7 भीषण युद्ध लड़े।
- काफ्फू चौहान का पँवाड़ा: उप्पूगढ़ का वह स्वाभिमानी वीर, जिसने गढ़वाल नरेश अजयपाल के सामने अपना सिर नहीं झुकाया।
- भानुभक्त और रिखोला लोदी: इनके पँवाड़े भी गढ़वाल में अत्यधिक लोकप्रिय हैं।
परीक्षा-उपयोगी तथ्य
देवता (जैसे गोल्ज्यू, नागराज) की गाथा → 'जागर'।
चौमासा गीत
वर्ग: ऋतु एवं प्रकृति गीत। वर्षा ऋतु के दौरान नारी-हृदय की चरम पीड़ा (पति-विरह) व्यक्त करने वाला अत्यंत मार्मिक 'ऋतु गीत' (Seasonal Song)।
डॉ. चातक व डॉ. बाबुलकर के सांस्कृतिक वर्गीकरण के अनुसार वर्णित।
व्युत्पत्ति और अर्थ
'चौमासा' का शाब्दिक अर्थ है वर्षा ऋतु के चार महीने।
- आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद (भादों), और आश्विन (आसौज)।
- यह वह समय है जब पहाड़ों में भीषण बारिश होती है, नदियाँ उफान पर होती हैं, और रास्ते टूट जाते हैं।
विषय-वस्तु और असली मर्म
चौमासा का सबसे मुख्य भाव 'खुदेड़' (मायके की याद) नहीं, बल्कि पति का वियोग है।
- जब आसमान में काले बादल घिरते हैं, बिजली कड़कती है और रातें डरावनी हो जाती हैं, तब परदेस गए पति की याद नायिका को सबसे ज्यादा तड़पाती है।
वसंत में प्रकृति जहाँ खुशी देती है, वहीं चौमासे में प्रकृति डराती है।
- इन गीतों में 'पपीहे' (चातक) या 'मोर' की पुकार विरह की आग को और भड़काती है।
प्रामाणिक पंक्ति (डॉ. बाबुलकर)
"आऊ-आऊ चौमासा त्वे जागी रयो... मेरा स्वामी को मन निठुर होयो, घर-बार छोडीक विदेस रयो"
भावार्थ: हे चौमासे तू आ गया, मेरे स्वामी का मन निष्ठुर हो गया जो मुझे छोड़कर परदेस में है।
परीक्षा-उपयोगी तथ्य
बारहमासा गीत
वर्ग: ऋतु एवं प्रकृति गीत। भारतीय व पर्वतीय लोक-साहित्य का अत्यंत प्राचीन व समृद्ध रूप — प्रकृति के वार्षिक चक्र और नारी-हृदय पर उसके प्रभाव का काव्यात्मक चित्रण।
व्युत्पत्ति और अर्थ
इसका शाब्दिक अर्थ है वर्ष के बारह महीनों का क्रमानुसार वर्णन।
- चैत्र (मार्च-अप्रैल) से शुरू होकर फाल्गुन तक, प्रत्येक महीने की प्राकृतिक छटा और नायिका की बदलती मनोदशा का वर्णन किया जाता है।
विषय-वस्तु और भाव — माह-अनुसार मनोदशा
हर महीने में प्रकृति का रंग बदलता है और उसी के अनुसार भावनाएं भी बदलती हैं।
- चैत्र (वसंत): फूल खिलने पर मायके की याद आती है।
- ज्येष्ठ (गर्मियां): चिलचिलाती धूप में खेतों में काम करने की थकान का वर्णन होता है।
- श्रावण-भादों (वर्षा): पति के वियोग की तड़प होती है।
- मंसिर-पूस (सर्दियां): लंबी रातों के कटने की मुश्किल का जिक्र होता है।
यह किसी एक रस में बंधा नहीं है।
- इसमें शृंगार (संयोग और वियोग दोनों) और करुण रस का अत्यंत सुंदर सम्मिश्रण होता है।
प्रदर्शन शैली
- गायन का अवसर: इसे किसी एक विशेष महीने में नहीं, बल्कि साल भर महिलाओं द्वारा फुरसत के समय, चक्की पीसते हुए, या जंगलों में काम करते हुए गाया जाता है।
- वाद्य यंत्र: इसे प्रायः बिना किसी वाद्य यंत्र के, स्वतंत्र कंठ से गाया जाता है।
परीक्षा-उपयोगी तथ्य
फूलदेई / चैती / वसंती गीत
वर्ग: ऋतु एवं प्रकृति गीत। गढ़वाल व कुमाऊं दोनों क्षेत्रों का सबसे उल्लासपूर्ण व बाल-सुलभ प्रकृति गीत — वसंत ऋतु के आगमन का उत्सव।
व्युत्पत्ति और अर्थ
वसंत ऋतु या हिन्दू पंचांग के प्रथम मास 'चैत्र' (Chaitra) में गाए जाने वाले गीत।
'फूल' (Flowers) + 'देई' (देहली/दहलीज - Threshold)।
- वह त्योहार जिसमें घर की दहलीज पर फूल अर्पित किए जाते हैं।
प्रदर्शन शैली और अवसर
यह गीत मुख्य रूप से छोटे बच्चों (विशेषकर कन्याओं) द्वारा गाया जाता है।
यह 'फूलदेई' त्योहार के अवसर पर गाया जाता है, जो चैत्र मास की संक्रांति/प्रथम दिन मनाया जाता है।
बच्चे टोकरियों में फ्योंली, बुरांस, और प्योंली के ताजे फूल लेकर गांव के हर घर की दहलीज पर जाते हैं।
- वहाँ फूल डालते हैं और पारंपरिक गीत गाते हैं।
पारंपरिक पंक्ति
"फूल देई, छम्मा देई... देणी द्वार, भर भकार"
भावार्थ: यह दहलीज फूलों से भरी रहे, घर में सुख-शांति हो, और अन्न के भंडार हमेशा भरे रहें।
विषय-वस्तु और भाव
यह पूरी तरह से प्रकृति के प्रति कृतज्ञता (Gratitude) और समाज के लिए आशीर्वाद (Blessings) का गीत है।
इसमें वात्सल्य (बच्चों के प्रति प्रेम) और नव-जीवन का उल्लास भरा होता है।
- विरह या दुख का इसमें कोई स्थान नहीं होता।
परीक्षा-उपयोगी तथ्य
चूरा गीत
वर्ग: श्रम एवं कृषि/पशुपालन गीत (Pastoral & Labor Songs)। हिमालयी चरवाहों के घुमंतू व कठिन जीवन की संगीतमय अभिव्यक्ति।
डॉ. गोविंद चातक के लोक-साहित्य वर्गीकरण के अनुसार वर्णित।
व्युत्पत्ति और संदर्भ
'चूरा' का सीधा संबंध पहाड़ों में पशु चारण (Grazing) और चरवाहों (Shepherds) के जीवन से है।
ग्रीष्मकाल में चरवाहे अपने पशुओं को लेकर हिमालय के ऊंचे घास के मैदानों (बुग्याल) में जाते हैं।
- वहाँ अस्थायी झोपड़ियों (छानियों/खर्क) में रहते हैं।
- चूरा गीत इसी एकांत और घुमंतू जीवन की उपज हैं।
प्रदर्शन शैली और गायक
यह गीत मुख्य रूप से वयोवृद्ध (अनुभवी) चरवाहों द्वारा नई पीढ़ी के युवा चरवाहों को गाकर सुनाया जाता है।
ऊंचे पहाड़ों में भेड़-बकरियां चराते समय, या रात के समय छानियों में अलाव (Campfire) के चारों ओर बैठकर इसे गाया जाता है।
- प्रायः बिना किसी विशेष वाद्य यंत्र के गाया जाता है।
- कभी-कभी बांसुरी/अलगोजा की धुन के साथ भी गाया जाता है।
विषय-वस्तु और भाव
इन गीतों का मुख्य उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि युवा चरवाहों को जीवन का कठोर अनुभव देना है।
- इसमें उन्हें जंगली जानवरों (बाघ, भालू आदि) से पशुओं की रक्षा करने की सीख दी जाती है।
चूरा गीतों के माध्यम से वृद्ध चरवाहे युवाओं को अलिखित ज्ञान (Undocumented Knowledge) सौंपते हैं।
- मौसम के अचानक बदलाव को पहचानना।
- रास्तों की जानकारी।
- जड़ी-बूटियों की पहचान।
इसमें वात्सल्य (युवाओं के प्रति पिता तुल्य प्रेम) और शांत रस की प्रधानता होती है।
परीक्षा-उपयोगी तथ्य
कुलाचार (बिरुदावली)
वर्ग: संस्कार व वंश-स्तुति प्रधान गीत। विवाह अवसर पर यजमान के कुल-गौरव का गायन।
गायक समुदाय
ये गीत विशेष रूप से 'औजी' या 'दास' समुदाय द्वारा गाए जाते हैं।
- यह समुदाय पारंपरिक रूप से ढोल-दमाऊ बजाने वाला पेशेवर वाद्य-गायक समुदाय है।
गायन का अवसर
जब विवाह में बारात विदा हो रही होती है या घर पहुँचती है, तब यह गीत गाया जाता है।
विषय-वस्तु
इसमें यजमान (जिसके घर में शादी है) के पूर्वजों, उनके वंश और गोत्र की महिमा का बखान किया जाता है।
इसका उद्देश्य परिवार के गौरव को याद दिलाना और नव-दंपति को आशीर्वाद देना है।
गीत का प्रकार
परीक्षा-उपयोगी तथ्य
पटगीत
वर्ग: उपदेशात्मक एवं नीति-प्रधान लोकगीत। जीवन के कठोर यथार्थ, अनुभव व नैतिक शिक्षा पर आधारित सीख देने वाला गीत।
मुख्य विषय
यह गीत पूरी तरह से 'उपदेशात्मक' (सीख देने वाले) होते हैं।
- इनका मुख्य आधार जीवन का कठोर यथार्थ (Reality of Life), अनुभव और नैतिक शिक्षा है।
गायन का उद्देश्य
समाज और नई पीढ़ी को जीवन के सही-गलत का भान कराना और उन्हें नैतिकता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देना।
परीक्षा-उपयोगी तथ्य
चैती पसारा
वर्ग: ऋतु आगमन व आजीविका आधारित लोकगीत। गढ़वाल क्षेत्र में चैत्र मास (वसंत ऋतु) के आगमन पर गाया जाने वाला प्रमुख गीत।
अवसर और क्षेत्र
यह गढ़वाल क्षेत्र में चैत्र मास (वसंत ऋतु) के आगमन पर गाया जाने वाला प्रमुख गीत है।
प्रमुख गायक (VIMP)
इसे सामान्य जनता नहीं गाती, बल्कि यह विशेष रूप से 'बादी-बादिणी' (औजी/दास) समुदाय द्वारा गाया जाता है।
प्रदर्शन शैली
यह समुदाय नव-वर्ष और वसंत के उल्लास में घर-घर जाकर यजमानों के द्वार पर इस गीत का गायन करता है और बदले में अन्न या उपहार प्राप्त करता है।
परीक्षा-उपयोगी तथ्य
ऋतु रैण
वर्ग: प्रकृति एवं ऋतु गीत। प्रकृति और ऋतुओं के परिवर्तन पर आधारित शुद्ध काव्यात्मक गीत।
मुख्य विषय
जैसा कि नाम से स्पष्ट है, यह विशुद्ध रूप से 'प्रकृति और ऋतुओं के परिवर्तन' पर आधारित गीत है।
- इसमें बदलते मौसम की छटा और उसके साथ मानव-हृदय में उठने वाले भावों का काव्यात्मक वर्णन होता है।
पर्यावरण से जुड़ाव
उत्तराखंड का लोक-जीवन पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर है, इसलिए ऋतु-परिवर्तन का उल्लास या कठिनाई इन गीतों में स्पष्ट झलकती है।