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UKPSC · UKSSSC · कला एवं संस्कृति

उत्तराखंड के वाद्य यंत्र

अवनद्ध (चर्म), सुषिर (फूंक), घन (धातु) और तत् (तार) — चार पारंपरिक श्रेणियों में विभाजित उत्तराखंड के लोक वाद्ययंत्रों के परीक्षा-उपयोगी विस्तृत नोट्स।

श्रेणी 1 · Membranophone

अवनद्ध वाद्य (चर्म वाद्य)

एक नज़र में
  • ढोल — तांबे/पीतल/साल-बुरांश की लकड़ी का खोल; 2015 में भंडारी कमेटी की सिफारिश पर 'राज्य वाद्य यंत्र' घोषित।
  • दमाऊँ / दमामा — ढोल का अनिवार्य साथी।
  • हुड़का / हुडुक — युद्ध प्रेरक प्रसंगों और कृषि कार्यों में प्रयुक्त; भोटिया जनजाति में भी प्रसिद्ध।
  • साइत्या — हुड़के का ही एक छोटा रूप।
  • डौंर — भगवान शिव का वाद्य यंत्र माना जाता है (थाली पार्वती का रूप है)।
  • डोर — जगरिया जागर लगाते समय इसे घुटनों के बीच फंसाकर बजाता है।
  • नगाड़ा / निशान / धतिया — 15–20 किलो का भारी वाद्य; मंदिरों में या सूचना देने के लिए बजता है।
  • अन्य चर्म वाद्य — डफली, तबला, पखावज, और धुड़का।
1 ढोल (Dhol) — राज्य वाद्य यंत्र सर्वाधिक महत्वपूर्ण

उत्तराखंड के लोक जीवन में ढोल का स्थान सबसे ऊपर है। यह एक 'मांगलिक वाद्य' माना जाता है।

ढोल

ऐतिहासिक एवं परीक्षा उपयोगी तथ्य

  • राज्य वाद्य यंत्र: तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत की सरकार ने वर्ष 2015 में 'भंडारी कमेटी' की सिफारिश पर ढोल को उत्तराखंड का 'राज्य वाद्य यंत्र' घोषित किया था।
  • समुदाय: इसे पारंपरिक रूप से औजी, बाजगी और दास ('दास-ढोली') समुदाय के लोग बजाते हैं।
  • ग्रंथ: ढोल बजाने के नियमों, तालों और इसकी पवित्रता का वर्णन 'ढोल सागर' नामक ग्रंथ में मिलता है — यह उत्तराखंड का एकमात्र वाद्य है जिस पर पूरा एक ग्रंथ आधारित है। इसका पहला लिखित संकलन 1932 में पंडित ब्रह्मानंद थपलियाल ने पौड़ी से प्रकाशित किया; इसके अनुसार ढोल के जन्मदाता भगवान शिव और माता पार्वती माने जाते हैं।
  • ढोल सागर के जानकार: स्वर्गीय उत्तम दास को इसका सबसे बड़ा ज्ञाता माना जाता था, जिन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार भी मिल चुका था (टिहरी गढ़वाल के चम्बा ब्लॉक के साबली गांव के मूल निवासी)।

बनावट

  • खोल: तांबे, पीतल, या लकड़ी (साल, बुरांश, बांज) का। तांबे का ढोल सबसे शुद्ध और देव-कार्यों के लिए उत्तम माना जाता है।
  • मढ़ाई: दायीं तरफ (छड़ी से प्रहार) बकरी की खाल; बायीं तरफ (हाथ से बजाना) बारहसिंगे या हिरण की पतली खाल।

वादन शैली और ताल

  • खड़े होकर, गले में पट्टा लटकाकर, एक हाथ (प्रायः बायां) और एक लकड़ी की छड़ी से बजाया जाता है।
  • कुल 22 प्रकार के ताल बजाए जाते हैं, जिन्हें 'पड़ि' कहा जाता है।
  • नौबत: मांगलिक कार्यों, देव-पूजन, नंदा राज जात में सबसे पहले बजाई जाती है।
  • छपेलि / छोलिया ताल: छोलिया नृत्य (कुमाऊं का युद्ध नृत्य) के समय।
  • बधाई ताल: जन्म या विवाह के अवसर पर। मंडाण ताल: देवताओं को अवतरित करने (पश्वा पर देवता लाने) के लिए।
💡 गुरु मंत्र: 'ढोल सागर' के अनुसार ढोल के 9 मुख्य 'बोल' (Syllables) माने गए हैं, जिनसे सभी तालें बनती हैं।
2 दमामा / दमाऊँ (Damau)

दमामा को ढोल का 'पूरक' या छोटा भाई माना जाता है। पहाड़ में कोई भी मांगलिक कार्य "ढोल-दमाऊँ" की जोड़ी के बिना संभव नहीं है।

ढोल-दमाऊँ की जोड़ी

ऐतिहासिक एवं परीक्षा उपयोगी तथ्य

  • प्राचीन काल में युद्ध के समय रणभूमि में बजाया जाता था — इसे 'रणवाद्य' भी कहते थे।
  • 'ढोल सागर' के अनुसार दमाऊँ को भगवान शिव का स्वरूप और ढोल को माता पार्वती (शक्ति) का स्वरूप माना गया है — इनकी जोड़ी "शिव-शक्ति" का प्रतीक है।
  • वर्तमान में यह मुख्य रूप से ढोल की ताल को सहारा (Base/Rhythm) देने के लिए बजता है।

बनावट

  • आकार: कटोरे/कड़ाही के आकार का (Hemispherical), ढोल से बहुत छोटा।
  • खोल: निचला हिस्सा प्रायः तांबे या पीतल की चादर का।
  • मढ़ाई: केवल एक ऊपरी हिस्से पर भैंसे/बैल की मोटी खाल; चमड़े की डोरियों से कसा जाता है।

वादन शैली और महत्व

  • हाथों से नहीं, बल्कि दो पतली बांस की डंडियों से बजाया जाता है।
  • जागर: जब जगरिया देव आवाहन करता है, ढोल-दमाऊँ की ताल से वातावरण तैयार होता है।
  • विशेष अवसर: नंदा राज जात यात्रा, पांडव लीला, भोटिया जनजाति का कंडाली उत्सव।
3 नगाड़ा / निशान / धतिया / धौंसा

उत्तराखंड के सबसे भारी और विशालकाय वाद्य यंत्रों में से एक।

नगाड़ा

ऐतिहासिक एवं परीक्षा उपयोगी तथ्य

  • निशान: देवताओं की यात्रा में उपयोग होने पर इसे 'निशान' कहा जाता है, साथ में लाल/सफेद ध्वजा चलती है।
  • धतिया: प्राचीन काल में खतरे की सूचना देने के लिए ऊंची चोटी से बजाया जाता था।
  • धौंसा: जब नगाड़ा आकार में बहुत विशाल (Large Kettledrum) हो और युद्ध/राजसी आयोजन में बजे, तो उसे 'धौंसा' कहते हैं।

बनावट और वादन

  • तांबे/लोहे की मोटी चादर से बड़े कटोरे के आकार का (वजन 15–20 किलो); भैंसे/बैल की मोटी खाल मढ़ी जाती है।
  • दो मोटी लकड़ी की डंडियों (नगाड़े की चोट) से पूरी ताकत से बजाया जाता है।
4 हुड़का / हुडुक (Hudka)

कुमाऊं क्षेत्र (विशेषकर पिथौरागढ़, चंपावत, अल्मोड़ा) का अत्यंत लोकप्रिय वाद्य — मनोरंजन, कृषि और युद्ध तीनों भावों से जुड़ा।

हुड़का

ऐतिहासिक एवं परीक्षा उपयोगी तथ्य

  • हुड़किया बौल: कुमाऊं में धान रोपाई (खरीफ) के समय गाए जाने वाले कृषि गीत — मुख्य गायक (हुड़किया) हुड़का बजाते हुए वीर गाथाएं गाता है।
  • छोलिया नृत्य: कुमाऊं के युद्ध-नृत्य 'छोलिया' में हुड़का अनिवार्य वाद्य है।

बनावट

  • आकार: डमरू के आकार (Hourglass) का, पर डमरू से बड़ा।
  • खोल: तूण, खड़िक या सानन की हल्की/गूंजने वाली लकड़ी का।
  • मढ़ाई: दोनों सिरों पर बकरे की झिल्ली (आमाशय की परत) को कसकर बांधा जाता है।

वादन शैली

  • बाएं कंधे पर पट्टे से लटकाया जाता है; बाएं हाथ से पकड़कर 'कसन' दबाने/ढीला छोड़ने से सुर नियंत्रित होता है।
  • किसी छड़ी का प्रयोग नहीं — केवल दाएं हाथ की उंगलियों की थाप से बजता है।
5 डौंर (Daur)

गढ़वाल क्षेत्र में देव-आवाहन (जागर) का सबसे प्रमुख और पवित्र वाद्य। दिखने में हुड़के जैसा, पर वादन शैली बिल्कुल अलग।

डौंर

ऐतिहासिक एवं परीक्षा उपयोगी तथ्य

  • धार्मिक मान्यता: डौंर को भगवान शिव का वाद्य यंत्र माना जाता है।
  • वाद्य युग्म: डौंर कभी अकेला नहीं बजता — साथ में कांस्य थाली अनिवार्य (डौंर = शिव, थाली = पार्वती)।
  • अवसर: गढ़वाल में जागर, नागराजा पूजा, घंडियाल देवता के अनुष्ठान।

बनावट

  • डमरू के आकार का, तूण की लकड़ी से बना खोखला खोल; दोनों सिरों पर पतली खाल।

वादन शैली

  • कंधे पर नहीं लटकाया जाता — जगरिया जमीन पर बैठकर घुटनों/जांघ के बीच दबाकर रखता है।
  • एक हाथ की उंगलियों और दूसरे हाथ में एक पतली छड़ी ('गज') से बजाया जाता है।
  • जगरिया डौंर बजाता है, सहायक (भांभरू) कांसे की थाली बजाता है — प्रायः 'भीमल' की लकड़ी की डंडी से, ताकि गूंज तेज हो।
💡 गुरु मंत्र: "गज (छड़ी) और हाथ दोनों से घुटनों पर रखकर बजाया जाने वाला वाद्य?" → डौंर। "बाएं हाथ से डोरियां खींचकर स्वर बदलने वाला वाद्य?" → हुड़का।
6 साईंती (Sainti) / साइत्या / डौंनका (Daunka)

सांस्कृतिक ग्रंथों में इसे साइत्या के बजाय डौंनका या साईंती के नाम से अधिक जाना जाता है। यह मूल रूप से हुड़के का ही एक बहुत छोटा रूप (Miniature version) है — मुख्यतः कुमाऊं में घुमंतू गायकों या विशिष्ट लोक नृत्यों में इस्तेमाल होता है। इसकी ध्वनि हुड़के से अधिक तीक्ष्ण (High pitch) होती है और इसे भी उंगलियों की थाप से बजाया जाता है।

7 धुड़का (Dhudka)

यह वाद्य भी हुड़के से मिलता-जुलता है। कुमाऊं के कुछ हिस्सों, विशेषकर तराई क्षेत्र (जैसे ऊधमसिंह नगर की जनजातियों) में इसके लोक-स्वरूप का प्रयोग मिलता है। यह हुड़के से थोड़ा बड़ा होता है और इसकी ध्वनि में गूंज (Resonance) अधिक होती है।

अन्य चर्म वाद्य

डफली, तबला, पखावज, और धुड़का भी इसी श्रेणी में आते हैं।

श्रेणी 2 · Aerophone

सुषिर वाद्य (फूंक वाद्य)

एक नज़र में — इस श्रेणी से आयोग सबसे ज्यादा सवाल पूछता है
  • रणसिंघा / रमतुल्ला — तांबे/पीतल का सींग-आकार का वाद्य; जौनसार के 'हारुल नृत्य' में अनिवार्य।
  • भंकोरा / भोंकर — सीधे पाइप जैसा, लंबाई ~36 इंच; धार्मिक कार्यों में प्रयुक्त।
  • मशकबीन — मूल रूप से स्कॉटलैंड का वाद्य (बैगपाइप); ब्रिटिश सेना के जरिए संस्कृति में शामिल।
  • अलगोजा / बांसुरी — दो बांसुरियों का जोड़ा; स्थानीय नाम 'जोया मुरली' या 'रामसोर'; चरवाहों का पसंदीदा वाद्य।
  • मोछंग / मोरचंग — लोहे का छोटा वाद्य, दांतों-होंठों के बीच दबाकर बजाया जाता है; चरवाहों में प्रचलित।
  • नागफणी — सांप के फन के आकार का धातु वाद्य, फूंककर बजाया जाता है।
  • अन्य — तुरही/तुरी, शंख, उर्दोमुखी।
1 रणसिंघा / रमतुल्ला परीक्षा में अति महत्वपूर्ण

उत्तराखंड के लोक और सैन्य इतिहास का सबसे शक्तिशाली वाद्य — नाम ही 'रण' (युद्ध) और 'सींग' (Horn) से बना है।

रणसिंघा

ऐतिहासिक एवं परीक्षा उपयोगी तथ्य

  • युद्ध वाद्य: कत्यूरी और चंद राजाओं के समय सेना में युद्ध का बिगुल फूंकने (हमले का संकेत) के लिए बजाया जाता था।
  • हारुल नृत्य: जौनसार भाबर (देहरादून) के प्रसिद्ध नृत्य 'हारुल' में अनिवार्य रूप से बजाया जाता है — वहां इसे 'रमतुल्ला' भी कहा जाता है।
  • वर्तमान महत्व: देवताओं की डोली यात्रा (नंदा राज जात), छोलिया नृत्य, और बारात के आगे 'मांगलिक वाद्य' के रूप में बजाया जाता है।

बनावट

  • तांबे या पीतल की पतली चादर को मोड़कर बना — 'S' या 'C' अक्षर के आकार में मुड़ी लंबी नली।
  • शुरुआत में असली जानवरों के सींगों से बनाया जाता था (इसीलिए नाम रण-'सिंघा'), बाद में धातु का बनने लगा। अक्सर दो हिस्सों में, जिन्हें बजाते समय जोड़ा जाता है।

वादन शैली

  • बजाने के लिए बहुत अधिक दम चाहिए — पतले सिरे (Mouthpiece) पर मुंह रखकर जोर से हवा फूंकी जाती है।
  • ध्वनि तेज, गूंजने वाली और चेतावनी देने जैसी — कोई मधुर राग नहीं, केवल एक शक्तिशाली स्वर।
2 मशकबीन (Mashakbeen / Bagpipes)

उत्तराखंड में इसका प्रवेश अंग्रेजों के जरिए हुआ, पर आज यह कुमाऊं-गढ़वाल की वाद्य परंपरा का अभिन्न अंग बन चुका है।

मशकबीन

ऐतिहासिक एवं परीक्षा उपयोगी तथ्य

  • मूल उत्पत्ति: यह मूल रूप से स्कॉटलैंड का वाद्य यंत्र (बैगपाइप) है।
  • उत्तराखंड में प्रवेश: 19वीं सदी के अंत/20वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश गढ़वाल राइफल्स और कुमाऊं रेजीमेंट द्वारा लाया गया; रिटायर सैनिकों ने इसे पहाड़ी विवाहों में लोकप्रिय बनाया।
  • वर्तमान महत्व: छोलिया नृत्य और पहाड़ी शादियों की बारात मशकबीन के बिना अधूरी मानी जाती है।

बनावट

  • एयर बैग: चमड़े/सिंथेटिक थैला (Bag/Mashak) जिसमें हवा भरी जाती है।
  • ब्लोपाइप: जिससे हवा फूंकी जाती है। चैंटर: बांसुरी जैसा पाइप जिससे धुन निकलती है। ड्रोन: लंबे पाइप जो लगातार एक ही स्वर देते हैं।

वादन शैली

  • 'पाइपर' ब्लोपाइप से थैले में हवा भरता है, फिर बगल (Armpit) के नीचे दबाता है — दबाव से हवा चैंटर व ड्रोन में जाती है, जिससे लगातार ध्वनि बनती है।
  • चैंटर पर उंगलियों से कुमाउनी/गढ़वाली धुनें (छपेली, न्योली) बजाई जाती हैं।
3 भंकोरा / भोंकर (Bhankora)

गढ़वाल क्षेत्र का अत्यंत पवित्र और भव्य वाद्य — मुख्यतः धार्मिक अनुष्ठानों और देव-यात्राओं में प्रयुक्त।

भंकोरा

ऐतिहासिक एवं परीक्षा उपयोगी तथ्य

  • देवताओं की पूजा, जागर, और विशेष रूप से देव डोलियों की यात्रा के समय बजाया जाता है।
  • इसे विशेष रूप से औजी या बाजगी समुदाय के लोग मंदिरों में आरती/देव कार्यों के समय बजाते हैं।

बनावट

  • तांबे की बिल्कुल सीधी पाइप (तुरही) — लंबाई लगभग 36 इंच (3 फीट) या उससे भी अधिक। अगला हिस्सा (Bell) चौड़ा, मुंह वाला हिस्सा पतला।

वादन शैली एवं रणसिंघा से अंतर

  • मुंह से जोर से हवा फूंककर बजाया जाता है — ध्वनि गंभीर, भारी, गूंजती हुई (Deep resonant)।
  • रणसिंघा युद्ध/चेतावनी का प्रतीक और मुड़ा हुआ होता है, जबकि भंकोरा पूरी तरह सीधी नली है और देव उपासना का प्रतीक है।
4 अलगोजा (Algoza)

एक सुरीला (Melodious) और लोक-जीवन से जुड़ा वाद्य — पशुचारकों का सबसे पसंदीदा वाद्य, कई लोकगीतों में इसका जिक्र मिलता है।

अलगोजा

ऐतिहासिक एवं परीक्षा उपयोगी तथ्य

  • अन्य नाम: कुमाऊं-गढ़वाल में इसे 'जोया मुरली' (जुड़वा मुरली) या 'रामसोर' भी कहा जाता है (एग्जाम में अक्सर 'जोया मुरली' पूछकर फंसाया जाता है)।
  • भेंड़-बकरी चराने वाले पशुचारकों द्वारा बुग्यालों (High altitude meadows) में अकेलापन दूर करने के लिए बजाया जाता है — मुख्यतः 'न्योली' और 'छपेली' (प्रेम-विरह के गीत) के साथ।

बनावट

  • बांस या रिंगाल (पहाड़ी बांस) से निर्मित — दो बांसुरियां धागे से एक साथ बांधी जाती हैं (इसीलिए 'जोया' यानी जुड़वा)। दोनों में फिंगर होल्स होते हैं।

वादन शैली

  • दोनों बांसुरियां एक साथ मुंह में रखकर एक साथ हवा फूंकी जाती है।
  • एक बांसुरी से लगातार एक ही स्वर (Drone) निकलता है, दूसरी के छेदों से धुन (Melody) निकलती है — मशकबीन के सिद्धांत जैसा, पर बिना एयर-बैग के। इसके लिए Circular breathing की कठिन कला चाहिए।
5 नागफणी (Nagphani)

दिखने में सबसे अलग सुषिर वाद्य — नाम और आकार दोनों सांप (नाग) से प्रेरित।

नागफणी

ऐतिहासिक एवं परीक्षा उपयोगी तथ्य

  • नाग पूजा और तांत्रिक अनुष्ठानों (जागर) में विशेष रूप से प्रयुक्त।
  • प्राचीन काल में युद्ध के समय सेना में जोश भरने और दुश्मनों में भय पैदा करने के लिए बजाया जाता था।
  • छोलिया नृत्य में रौद्र और वीर रस पैदा करने वाले वाद्य के रूप में प्रयुक्त।

बनावट और वादन शैली

  • तांबे/पीतल की सर्पाकार नली, अंतिन सिरा कोबरा के फन (Hood) के आकार का; अक्सर सांप की आंखें/धारियां उकेरी या रंगी जाती हैं।
  • मुंह से तेज फूंक मारकर बजाई जाती है — ध्वनि कर्कश, डरावनी और गूंजने वाली, वीर/भयानक रस का अहसास कराती है।
6 तुरी / तुरही (Turhi)

भंकोरे और रणसिंघे के ही परिवार का वाद्य, पर आकार/उपयोग में थोड़ा भिन्न। राजसी वाद्य: राजाओं की सवारी, देव-डोलियों के मंदिर से निकलने, या बड़ी राजकीय घोषणा के समय बजाना अनिवार्य होता था; परंपरागत रूप से औजी या दास समुदाय द्वारा बजाया जाता है। तांबे/पीतल की बनी, भंकोरे जितनी लंबी नहीं (सीधी या हल्की घुमावदार, Bugle के आकार की), अंतिम सिरा धतूरे के फूल की तरह चौड़ा। होठों को सिकोड़कर ताकत से फूंक मारकर बजाई जाती है।

7 शंख (Shankh)

कोई धातु/लकड़ी का नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक वाद्य यंत्र — समुद्री जीव का प्राकृतिक खोल (Conch Shell)। हिंदू धर्म व उत्तराखंड संस्कृति में सबसे शुद्ध और मांगलिक वाद्य माना जाता है; किसी भी शुभ कार्य या 'जागर' की शुरुआत शंख ध्वनि से होती है। लोक मान्यता है कि इसकी ध्वनि से वातावरण पवित्र होता है और नकारात्मक शक्तियां दूर भागती हैं। नुकीले सिरे पर छोटा छेद कर, होठों को विशेष तरीके से सिकोड़कर फूंका जाता है — इसके लिए फेफड़ों की अच्छी ताकत चाहिए।

अन्य सुषिर वाद्य

तुरही/तुरी, शंख, और उर्दोमुखी भी इसी श्रेणी में आते हैं।

श्रेणी 3 · Idiophone

घन वाद्य (धातु वाद्य)

एक नज़र में
  • बिनाई — लोहे का बहुत छोटा वाद्य, अक्सर महिलाएं होठों पर रखकर बजाती हैं।
  • कांस्य थाली — डौंर के साथ अनिवार्य रूप से बजती है; जागर में विशेष लकड़ी से बजाई जाती है।
  • भाणु — अष्टधातु से बना देवोपासना का वाद्य, अब गढ़वाल में लुप्तप्राय।
  • अन्य — चिमटा, मंजीरा, झांझ, घुंघरू, घंटा, करताल।
1 बिणाई (Binai) आयोग का पसंदीदा सवाल

उत्तराखंड के सबसे छोटे और विशिष्ट वाद्य यंत्रों में से एक। बजाने के तरीके के कारण छात्र अक्सर इसे 'सुषिर' (हवा वाला) वाद्य मान लेते हैं, जबकि यह एक घन वाद्य है।

बिणाई / मोछंग

वर्गीकरण एवं उपयोग

  • वर्गीकरण: होठों के बीच दबाकर बजाया जाता है, पर ध्वनि धातु के कंपन से निकलती है — इसलिए यह घन वाद्य (अंग्रेज़ी में Jew's harp) की श्रेणी में आता है।
  • समुदाय / उपयोग: मुख्यतः महिलाओं और पशुचारकों का वाद्य — जंगलों में घास काटते या पशु चराते समय अकेलापन दूर करने के लिए बजाया जाता है।

बनावट और वादन शैली

  • पूरी तरह लोहे का, लगभग 2–3 इंच का — बीच में लोहे की एक पतली जीभी (कांटा)।
  • वादक इसे दोनों होठों/दांतों के बीच हल्का दबाता है और तर्जनी उंगली से बीच की जीभी को खींचकर (प्लक करके) छोड़ता है — सांस के उतार-चढ़ाव और धातु के कंपन से सुरीली गूंज निकलती है।
💡 गुरु मंत्र: "दांतों/होठों के बीच रखकर बजाया जाने वाला, पर सुषिर वाद्य नहीं" → बिणाई पर टिक लगाइए। यह आर्ट एंड कल्चर सेक्शन का बहुत क्लासिक सवाल है।
2 कांसे की थाली (Kanse ki Thali)

थाली एक सामान्य बर्तन है, पर उत्तराखंड के लोक अनुष्ठानों में इसे एक अत्यंत महत्वपूर्ण वाद्य यंत्र का दर्जा प्राप्त है।

कांसे की थाली

ऐतिहासिक एवं परीक्षा उपयोगी तथ्य

  • वाद्य युग्म: कांसे की थाली 'डौंर' के साथ अनिवार्य रूप से बजाई जाती है (डौंर = शिव, थाली = पार्वती)।
  • अवसर: कुमाऊं और गढ़वाल दोनों में 'जागर' (देव-आवाहन) के समय प्रयोग होता है।

बनावट और वादन शैली

  • शुद्ध कांसे (Bronze) की बनी — गूंज के लिए सबसे उत्तम धातु मानी जाती है।
  • एक विशेष लकड़ी की डंडी से बजाई जाती है — प्रायः 'भीमल' या किसी कठोर लकड़ी की। थाली बजाने वाले सहायक को 'भांभरू' कहा जाता है।
3 मंजीरा (Manjira)
मंजीरा

बहुत सामान्य पर महत्वपूर्ण वाद्य — सभी प्रकार के मांगलिक कार्यों, भजन-कीर्तन और लोकगीतों में ताल देने के लिए प्रयुक्त। कांसे या पीतल की दो छोटी कटोरीनुमा आकृतियों से बना, जिन्हें डोरी से आपस में जोड़ा जाता है।

4 झांझ (Jhanjh)

मंजीरे का ही एक बड़ा और भारी रूप — ध्वनि बहुत गूंजदार और रौद्र।

झांझ

ऐतिहासिक एवं परीक्षा उपयोगी तथ्य

  • अवसर: कुमाऊं के 'छोलिया नृत्य' (युद्ध नृत्य) में सबसे प्रमुख उपयोग — इसकी तेज ध्वनि वीर रस दर्शाती है। देव-डोलियों की यात्रा और आरती में भी प्रयुक्त।
  • जोड़ी: यह हमेशा जोड़े (Pair) में बजाया जाता है।

बनावट और वादन शैली

  • तांबे, कांसे या पीतल की दो बड़ी गोल-चपटी प्लेटों (Discs) से बना; बीच में रस्सी फंसाने का छेद।
  • दोनों हाथों में एक-एक प्लेट पकड़कर आपस में रगड़ते/टकराते हुए बजाया जाता है।
5 चिमटा (Chimta)

मूल रूप से एक उपकरण, पर नाथ संप्रदाय और लोक गायन में इसे वाद्य यंत्र के रूप में विकसित किया गया है।

ऐतिहासिक एवं परीक्षा उपयोगी तथ्य

  • मुख्यतः नाथ जोगियों, साधु-संतों और जगरियों द्वारा भजन-कीर्तन में बजाया जाता है — ताल और लय देने का काम करता है।

बनावट

  • लोहे का लंबा चिमटा (Tongs) जिसकी दोनों भुजाओं पर छोटे पीतल/कांसे के घुंघरू लगे होते हैं। हाथों या शरीर पर पीटने से लोहे की खनक और घुंघरू की झंकार मिलकर ध्वनि बनाती है।
6 करताल (Kartal)

एक पारंपरिक घन वाद्य, जिसका उपयोग मुख्यतः भक्ति संगीत, कीर्तन और जागरण में ताल देने के लिए किया जाता है।

करताल

ऐतिहासिक एवं परीक्षा उपयोगी तथ्य

  • भक्ति वाद्य: कुमाऊं और गढ़वाल दोनों मंडलों में भजन-कीर्तन, रामायण पाठ, और ग्रामीण हरि-कीर्तन (विशेषकर कार्तिक महीने में) में अनिवार्य रूप से प्रयुक्त।
  • चिमटे की तरह, नाथ संप्रदाय के योगियों, संन्यासियों और घुमंतू भिक्षा मांगने वाले गायकों का प्रमुख वाद्य।

बनावट

  • लकड़ी और धातु के मिश्रण से बना — दो छोटे आयताकार लकड़ी के ब्लॉक। बीच में खांचों (Slits) में पीतल/कांसे की छोटी गोल प्लेट्स (मंजीरे जैसी) ढीले तौर पर लगी होती हैं।

वादन शैली

  • दोनों लकड़ी के ब्लॉक्स एक ही हाथ की उंगलियों में फंसाए जाते हैं। हाथ हिलाने/मुट्ठी खोलने-बंद करने से लकड़ी टकराकर 'खट-खट' और प्लेट्स से 'छन-छन' ध्वनि निकलती है — तीव्र गति के भजनों के लिए उपयुक्त।

अन्य घन वाद्य

चिमटा, मंजीरा, झांझ, घुंघरू, घंटा, और करताल भी इसी श्रेणी में आते हैं।

श्रेणी 4 · Chordophone

तत् वाद्य (तार वाद्य)

एक नज़र में
  • सारंगी — पारंपरिक लोक गाथाओं (पवाड़ों) को गाने के लिए 'बद्दी' और 'मिरासी' जाति के लोग सबसे अधिक प्रयोग करते हैं।
  • अन्य — एकतारा, दोतारा, सितार, वीणा।

तत् वाद्य वे होते हैं जिनमें ध्वनि तारों (Strings) के कंपन से पैदा होती है। उत्तराखंड की लोक गाथाओं (Folklore) और वीर गाथाओं (Ballads) का पूरा इतिहास इन्हीं वाद्यों पर टिका है।

1 सारंगी (Sarangi)

उत्तराखंड का सबसे प्रमुख और सुरीला तार वाद्य — लोक गायन का आधार (Base), शास्त्रीय व लोक दोनों रूपों में प्रयुक्त।

सारंगी

ऐतिहासिक एवं परीक्षा उपयोगी तथ्य

  • पारंपरिक गायक: उत्तराखंड में सारंगी को पारंपरिक रूप से 'बद्दी', 'मिरासी' और 'दास' जाति के घुमंतू गायक बजाते थे, जो गांव-गांव जाकर कला दिखाते थे।
  • प्रमुख अवसर: उत्तराखंड की वीर गाथाओं ('पवाड़े' या 'भड़ौ') और लोक गाथाओं (राजुला-मालूशाही, गोपीचंद-भर्तृहरि) को गाने में सबसे अधिक प्रयुक्त।
  • संगति: हुड़के के साथ मिलकर कुमाउनी-गढ़वाली लोकगीतों (न्योली, झोड़ा, छपेली) में सबसे अधिक प्रयोग होता है।

बनावट

  • खोल: तूण/खड़िक जैसी हल्की लकड़ी के एक ही ठोस टुकड़े को खोखला करके बनाया जाता है।
  • मढ़ाई: निचले खोखले हिस्से (साउंड बॉक्स) पर प्रायः बकरी की पतली खाल मढ़ी जाती है।
  • तार: पारंपरिक रूप से जानवरों की आंत (Gut) से, अब नायलॉन/स्टील से बनते हैं — 3–4 मुख्य तार व कई सहायक गूंजने वाले 'तरब' तार।
  • गज (Bow): पारंपरिक गज के तार घोड़े की पूंछ के बालों (Horsehair) से बनाए जाते हैं।

वादन शैली

  • वादक सारंगी को गोद में या घुटनों के बीच लंबवत रखता है।
  • एक हाथ से गज को तारों पर रगड़ता है (Bowing), दूसरे हाथ की उंगलियों के नाखूनों से तार दबाकर सुर/राग निकालता है।
2 एकतारा (Ektara) और दोतारा (Dotara)

नाम से ही स्पष्ट है — एकतारा में 1 तार और दोतारा में 2 तार होते हैं। बहुत प्राचीन और सरल वाद्य यंत्र।

एकतारा

ऐतिहासिक एवं परीक्षा उपयोगी तथ्य

  • भक्ति और वैराग्य का वाद्य: मुख्यतः नाथ संप्रदाय के योगियों, संन्यासियों, साधु-संतों और भिक्षाटन करने वाले घुमंतू जोगियों का प्रमुख वाद्य।
  • उपयोग: पौराणिक भजन, निर्गुण गीत, और ईश्वरीय आराधना में स्वर को आधार (Drone) देने के लिए।

बनावट

  • ध्वनि-यंत्र: निचला हिस्सा प्रायः सूखी लौकी (Tumba) से या लकड़ी को खोखला कर बनाया जाता है, ऊपर खाल मढ़ी होती है।
  • डंडी: तुम्बे के आर-पार एक लंबी बांस की डंडी डाली जाती है; ऊपरी सिरे पर खूंटी (Peg) से तार बांधकर नीचे तुम्बे तक खींचा जाता है।

वादन शैली

  • एक ही हाथ से पकड़कर, उसी हाथ की तर्जनी उंगली से तार झंकृत (Pluck) किया जाता है।
  • सारंगी की तरह कई धुनें नहीं निकाली जा सकतीं — केवल एक लगातार बजने वाला सुर (Drone) और ताल मिलता है।

अन्य तार वाद्य

एकतारा, दोतारा, सितार, और वीणा भी इसी श्रेणी में आते हैं।

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