ऐपण (Aipan)
उत्तराखण्ड की धरातलीय चित्रकला — गेरू और बिस्वार का अद्भुत संगम
ऐपण केवल एक चित्रकला नहीं, अपितु देवी-देवताओं का आह्वान, स्थान का पवित्रीकरण और मांगलिक भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति है।
शाब्दिक अर्थ एवं उत्पत्ति
'ऐपण' शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के 'अर्पण' से हुई है, जिसका अर्थ है — देवताओं को कुछ अर्पित करना या लीपना। यह अर्पण भाव ही इस कला की आत्मा है।
प्रकार एवं स्थान
यह मुख्य रूप से धरातलीय चित्रकला (Floor Art / अल्पना) है। इसे निम्नलिखित स्थानों पर बनाया जाता है:
- घर की देहरी (चौखट)
- आंगन
- सीढ़ियां
- तुलसी का थाला
- पूजा स्थल (मंदिर) का फर्श
सामग्री
गेरू (Geru) — पृष्ठभूमि
लाल मिट्टी का लेप, जिससे पृष्ठभूमि (Base) तैयार की जाती है। यह पृथ्वी और मंगल का प्रतीक माना जाता है।
बिस्वार (Biswar) — अंकन
भीगे हुए चावलों को पीसकर बनाया गया सफेद गाढ़ा घोल, जो पवित्रता का प्रतीक है। इसी से लाल गेरू पर सफेद आकृतियां उकेरी जाती हैं।
निर्माण विधि
इस कला में किसी ब्रश का उपयोग नहीं होता। दाहिने हाथ की उंगलियों के पोरों को बिस्वार में डुबोकर लाल गेरू से लिपे धरातल पर स्वतंत्र रूप से उकेरा जाता है।
- अनामिका उंगली
- मध्यमा उंगली
- तर्जनी उंगली
अवसर एवं प्रकार
- दीपावली: देहली ऐपण तथा लक्ष्मी के पगलिए (पैरों के चिह्न)।
- शिवरात्रि: शिवपीठ।
- सरस्वती पूजा: सरस्वती पीठ।
- नवरात्रि: चामुंडा पीठ, नवदुर्गा पीठ।
- विवाह: वर के स्वागत हेतु 'धूलि अर्घ्य' का ऐपण।
विषय एवं शैली
यह मूल रूप से ज्यामितीय (Geometric) शैली की कला है। इसमें आड़ी-तिरछी रेखाओं और बिंदुओं का बारीक संयोजन होता है। प्रमुख आकृतियां निम्नलिखित हैं:
- शंख
- कलश
- सूर्य एवं चंद्रमा
- बेल-बूटे
उद्देश्य
देवी-देवताओं का आह्वान व स्वागत करना, घर को बुरी शक्तियों से बचाना तथा स्थान को पवित्र व मंगलमय बनाना।
ज्यूँति / मातृका (Jyuti)
पारंपरिक भित्ति चित्रकला — जीवन प्रदान करने वाली मातृकाओं का चित्रण
'ज्यूँति' का अर्थ है — जीव मातृकाओं, अर्थात् जीवन प्रदान करने वाली या रक्षा करने वाली देवियों का समूह।
स्थान
यह मुख्य रूप से घर के पूजा कक्ष या मुख्य कमरे की सबसे साफ और पवित्र दीवार पर बनाई जाती है। इसके अतिरिक्त, अन्न-धन में बरकत के लिए इसे रसोई घर (चूल्हे के पास) और अनाज भंडारण कक्ष में भी विशेष रूप से बनाया जाता है।
सामग्री
- गेरू — लाल पृष्ठभूमि
- बिस्वार — सफेद घोल
- हल्दी — पीला रंग
- पिठ्या / कुमकुम
निर्माण विधि एवं प्रमुख तत्व
दीवार के एक हिस्से को गेरू से लीपकर देवियों की आकृतियां उकेरी जाती हैं। इस चित्रकला के तीन अत्यंत महत्वपूर्ण तत्व निम्नलिखित हैं:
1. टुपुक (बिंदु)
चित्र की रेखाओं को शुभ बनाने और उन्हें पूर्णता देने के लिए उंगली से जो बिंदु लगाए जाते हैं, उन्हें 'टुपुक' कहते हैं।
2. बरबूंद
मुख्य चित्र के चारों ओर इन्हीं बिंदुओं (टुपुक) से एक आकर्षक बॉर्डर बनाया जाता है, जिसे 'बरबूंद' कहते हैं।
3. नाटा
चित्र के सबसे निचले हिस्से (आधार) में बिस्वार से दो मानव आकृतियां बनाई जाती हैं, जिन्हें 'नाटा' (छोटे कद का व्यक्ति) कहा जाता है।
अवसर
जीवन के विशेष मांगलिक संस्कारों पर यह कला अनिवार्य रूप से की जाती है:
- नामकरण संस्कार
- उपनयन (जनेऊ) संस्कार
- विवाह संस्कार
विषय
मुख्य रूप से तीन मातृकाओं का चित्रण किया जाता है:
- ब्रह्माणी
- माहेश्वरी
- वैष्णवी
इनके अतिरिक्त कुल देवियों का भी चित्रण किया जाता है। नीचे बने 'नाटा' को शिव-पार्वती (या मांगलिक कार्यों के साक्षी व रक्षक) का प्रतीक माना जाता है।
उद्देश्य
घर-परिवार (विशेषकर नवजात शिशु या नव-दंपति) तथा घर के अन्न-धन को बुरी नजर व नकारात्मक शक्तियों से बचाना, साथ ही सुख-शांति, समृद्धि और बरकत का आशीर्वाद प्राप्त करना।
थापा (Thapa)
हाथों की छाप से निर्मित उन्मुक्त भित्ति चित्रकला
'थापा' का अर्थ हाथों की 'छाप' (Handprint / Stamp) से है। यह ऐपण या ज्यूँति की तरह कठोर ज्यामितीय नहीं, बल्कि एक उन्मुक्त (Freehand) चित्रण शैली है।
निर्माण विधि
इसमें ब्रश का प्रयोग नहीं होता। हाथों की हथेलियों, उंगलियों और मुट्ठी की छाप से दीवार पर चित्र उकेरे जाते हैं।
सामग्री
- गेरू
- बिस्वार
- हल्दी
- पिठ्या (कुमकुम)
अवसर
थापा मुख्य रूप से निम्नलिखित त्योहारों पर बनाई जाती है:
- दशहरा: नवरात्रों पर बनने वाला 'दशहरा थापा'।
- दीपावली: 'दीपावली थापा'।
विषय
इस चित्रकला में विविध प्रकार के विषयों का चित्रण किया जाता है:
- त्योहारों से जुड़े प्रतीक
- लोक जीवन के सामान्य दृश्य
- पशु-पक्षी
- पूजा-अनुष्ठान से जुड़ी आकृतियां
वसुधारा (Vasudhara)
ऐपण कला का ऊर्ध्वाधर विस्तार — समृद्धि के निरंतर प्रवाह का प्रतीक
यह 'ऐपण' कला का ही एक विशिष्ट और अनिवार्य ऊर्ध्वाधर (Vertical) विस्तार या बॉर्डर डिज़ाइन है।
स्थान
- घर की देहरी
- दरवाजों के दोनों किनारों पर
- सीढ़ियों पर
- पूजा घर की वेदी पर
- तुलसी के थाले पर
सामग्री
- गेरू — पृष्ठभूमि
- बिस्वार — सफेद चित्रण
निर्माण विधि
गेरू से लिपे स्थान पर बिस्वार में उंगलियां डुबोकर ऊपर से नीचे की ओर टपकती हुई (Dripping) सीधी खड़ी रेखाएं खींची जाती हैं।
विशेष नियम
इसकी रेखाओं की संख्या कभी सम (Even) नहीं होती। यह अनिवार्य रूप से विषम संख्या (5, 7, 9 या 11) में ही खींची जाती हैं।
अवसर
सभी प्रमुख अनुष्ठानों, त्योहारों और मंगल कार्यों में ऐपण को पूर्णता देने के लिए वसुधारा अनिवार्य रूप से बनाई जाती है।
विषय
ऊपर से नीचे की ओर गिरती हुई सफेद लंबवत रेखाएं।
उद्देश्य
'वसु' का अर्थ है धन। ये रेखाएं ईश्वरीय कृपा, सुख-शांति, समृद्धि और देव-आशीर्वाद के निरंतर प्रवाह का प्रतीक हैं।
प्रकीर्ण (Prakirn)
चलायमान चित्रकला — विविध धरातलों पर निर्मित मांगलिक कला
'प्रकीर्ण' का अर्थ है — 'विविध' (Miscellaneous) या 'छिटपुट'। यह चलायमान (Movable / Portable) चित्रकला की श्रेणी है।
यह ज़मीन या दीवार की तरह किसी एक जगह स्थिर नहीं होती, बल्कि विभिन्न चलायमान धरातलों पर बनाई जाती है।
धरातल (Base)
- कागज़
- कपड़े
- लकड़ी के पट्टे (पीढ़े)
- भोजपत्र
- सूप (डलिया)
सामग्री
- प्राकृतिक रंग
- स्थानीय स्याही
- पिठ्या
- हल्दी
- गेरू
- बिस्वार
प्रमुख उदाहरण (विषय)
1. जन्म-कुंडलियां
कुंडलियों (कागज़/भोजपत्र) के चारों ओर बनाए जाने वाले मांगलिक चिह्न।
2. हस्तलिखित पोथियां
धार्मिक ग्रंथों और पोथियों के आवरण (Covers) व पृष्ठों पर की गई सूक्ष्म चित्रकारी।
3. सूप अलंकरण
विवाह, जनेऊ या नामकरण के समय सूप (अनाज फटकने की डलिया) पर पारंपरिक डिज़ाइन।
4. पट्टे
पूजा में देवताओं को स्थापित करने वाले लकड़ी के पट्टों (पीढ़ों) पर चित्रांकन।
उद्देश्य
दैनिक और कर्मकांडीय उपयोग की वस्तुओं को मांगलिक व कलात्मक बनाना, ताकि अनुष्ठान के बाद कलाकृति को लंबे समय तक सहेज कर रखा जा सके।
डिकारे / डिकार (Dikare)
पारंपरिक लोक मूर्तिकला — हरेला पर्व पर शिव परिवार की स्थापना
यह चित्रकला नहीं, अपितु पारंपरिक लोक मूर्तिकला का रूप है, जो उत्तराखण्ड के हरेला पर्व से अविभाज्य रूप से जुड़ी हुई है।
सामग्री
- रुई (Cotton) या शुद्ध चिकनी मिट्टी
- गेरू
- बिस्वार
- पिठ्या
- हल्दी
निर्माण विधि
मिट्टी से देवी-देवताओं की 3D मूर्तियां गढ़कर, सूखने पर प्राकृतिक रंगों से सजाना। यह एक पूर्णतः पारंपरिक और हस्तनिर्मित प्रक्रिया है।
अवसर
यह विशेष रूप से श्रावण मास में मनाए जाने वाले 'हरेला' पर्व पर बनाई जाती है।
विषय
इसमें शिव परिवार की मूर्तियां बनाई जाती हैं:
- भगवान शिव
- माता पार्वती
- भगवान गणेश
- भगवान कार्तिकेय
उद्देश्य
हरेला पर्व पर अच्छी फसल और परिवार के कल्याण की कामना हेतु पूजा करना। बाद में इन मूर्तियों को जल में विसर्जित किया जाता है।
उत्तराखण्ड की अन्य विशिष्ट लोक चित्रकलाएं
स्थानीय शब्दावली में विद्यमान अन्य महत्वपूर्ण लोक कलाएं
ऐपण, ज्यूँति, थापा, वसुधारा, प्रकीर्ण और डिकारे के अतिरिक्त उत्तराखण्ड में अनेक अन्य स्थानीय लोक चित्रकलाएं प्रचलित हैं, जिनका उद्देश्य समान रूप से मांगलिक एवं रक्षात्मक है।
1. सेली (Seli)
पूजा या आरती की थाली में किया गया पारंपरिक चित्रांकन।
2. स्यो (Syo)
विवाह या अन्य शुभ कार्यों के दौरान, घर-परिवार को बुरी आत्माओं और नकारात्मक शक्तियों से बचाने के लिए बनाए गए विशेष रक्षा-चित्र।
3. खोड़िया (Khodiya)
विवाह या मांगलिक अवसरों पर मंडप (वेदी) पर किया गया पारंपरिक चित्रांकन।
4. म्वाली (Mwali)
घर के प्रवेश द्वारों (Entrance doors) पर विभिन्न रंगों से बनाए गए सजावटी एवं मांगलिक चित्र।
सामान्य विशेषताएं
- सभी कलाओं में प्राकृतिक रंगों का प्रयोग।
- गेरू एवं बिस्वार की सार्वभौमिक उपस्थिति।
- हर कला का धार्मिक-मांगलिक उद्देश्य।
- औरतों द्वारा पारंपरिक रूप से निर्मित।
- ब्रश के स्थान पर उंगलियों का उपयोग।
उत्तराखण्ड में चित्रकला का इतिहास
History of Chitrakala in Uttarakhand
गढ़वाली चित्रशैली, पहाड़ी चित्रकला की प्रमुख उपशैलियों में से एक है, जिसने 16वीं से 19वीं शताब्दी के मध्य अपने चरमोत्कर्ष को प्राप्त किया।
गढ़वाली चित्रशैली का उद्गम
वर्गीकरण
गढ़वाली चित्रशैली पहाड़ी चित्रकला का एक अभिन्न अंग है, जो निम्नलिखित तीन शैलियों में वर्गीकृत है:
- कांगड़ा शैली
- गढ़वाली शैली
- बसोहली शैली
संस्थापक
- वर्ष 1658 ई. — राजा पृथ्वीपति शाह का शासनकाल
- मुगल राजकुमार सुलेमान शिकोह गढ़वाल आए
- उनके साथ चित्रकार श्याम दास और हरिदास भी गढ़वाल आए
- इन दोनों को गढ़वाली चित्रशैली का संस्थापक माना जाता है
चित्रकार वंशावली
गढ़वाली चित्रशैली की परंपरा निम्नलिखित क्रम में आगे बढ़ी:
मोलाराम — जीवन परिचय
अन्य तथ्य
- समकालीन शासक (वंशावली) — प्रदीप शाह → ललित शाह → जयकीर्ति शाह → प्रद्युम्न शाह → सुदर्शन शाह
- राजकवि का दर्जा — कभी आधिकारिक रूप से प्राप्त नहीं हुआ
- मोलाराम चित्र संग्रहालय — श्रीनगर में स्थित
मोलाराम की रचनाएं
प्रमुख ग्रंथ
- गढ़राजवंश (ब्रजभाषा)
- गढ़गीता संग्राम (नाटक)
- श्रीनगर दुर्दशा
- मनमथ सागर — इनका सबसे बड़ा ग्रंथ
- ऋतु-वर्णन
- कालिदास के 'अभिज्ञान शाकुंतलम्' का हिंदी अनुवाद
ऐतिहासिक काव्य
- गोरखाली-अमल
- दीवाने-मोलाराम
- रणबहादुर चंद्रिका — गोरखा सूबेदार रणबहादुर थापा की प्रशंसा में
'रणबहादुर चंद्रिका' में रणजोर सिंह थापा को 'दानवीर कर्ण' की उपाधि से संबोधित किया गया है।
नोट: मोलाराम ने अपनी रचनाओं में स्वयं के लिए 'संत' और 'साधु' शब्दों का प्रयोग किया है।
प्रमुख चित्रकलाएं
प्रमुख चित्र
- दंपति चित्र — प्रद्युम्न शाह व रानी का चित्र
- कांगड़ा शैली में निर्मित चित्र — कांगड़ा नरेश संसार चंद के लिए बनाया गया
- राधा-कृष्ण मिलन
- महादेव-पार्वती के चित्र
प्रिया श्रृंखला
मोर प्रिया, सितार प्रिया, चकोर प्रिया, कदली प्रिया।
अन्य चित्रण
- मयंक मुखी, चंद्र मुखी
- अभिसार नायिका, उत्कंठा नायिका, विप्रलभा नायिका
- कालिया दमन, मस्तानी, हिंडोला
विशेष टिप्पणी: 'जयदेव वजीर' नामक चित्र पर मोलाराम का नाम अंकित है।
अकादमिक विरासत एवं शोध
बैरिस्टर मुकुंदीलाल ने सर्वप्रथम मोलाराम के चित्रों को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।
मुकुंदीलाल की प्रमुख कृतियां
- Some Notes on Molaram
- Garhwal Paintings
- Garhwal School of Paintings
अन्य विद्वान और कृतियाँ
- J.C. French — Himalayan Arts
- W. Archer — Garhwal Painting
- किशोरी लाल वैद्य — पहाड़ी चित्रकला
- रणबीर सिंह बिष्ट — पहाड़ी चित्रकारों का चित्र
- कुमार स्वामी — राजपूत पेंटिंग्स
- अजीत घोष — The School of Rajput Paintings
यशवंत सिंह कठौच की प्रमुख कृतियां
- मध्य हिमालय की कला
- मध्य हिमालय का पुरातत्व
- गढ़वाली चित्र शैली: एक सर्वेक्षण
- उत्तराखंड का नवीन इतिहास
- संस्कृति के पद चिह्न
- सैन्य परंपरा
यशोधर मठपाल की प्रमुख कृतियां
- कुमाऊं की चित्रकला
- Rock Art in Kumaun Himalayas
- कुमाऊं की लोककला
- संस्कृति परंपरा
संग्रहालय
- मोलाराम चित्र संग्रहालय — श्रीनगर
- मुकुन्दी लाल संग्रहालय — कोटद्वार, भारती भवन
मोलाराम के समकालीन दरबारी चित्रकार
चैतू और माणकू मोलाराम के शिष्य थे तथा राजा सुदर्शन शाह के दरबार में सक्रिय चित्रकार रहे।
चैतू
- प्रसिद्ध चित्रण — कृष्णलीला
- संरक्षित कृति — 'रुक्मिणी हरण' (वाराणसी कलाभवन)
माणकू
- प्रसिद्ध चित्रण — जयदेव की गीतगोविंद
- प्रसिद्ध चित्रण — आंख मिचौनी
नोट: इस कालखंड में माधाराम बैरागी भी एक सक्रिय चित्रकार थे।