उत्तराखंड के लोक नृत्य: UKPSC एवं UKSSSC परीक्षा नोट्स
नृत्य 01 / 20
चौंफला (चौफुला) नृत्य — Chaufla Dance
चौंफला (चौफुला) नृत्य — गढ़वाल का श्रृंगार प्रधान नृत्य
वर्गीकरण: यह गढ़वाल क्षेत्र का अत्यंत प्रसिद्ध, प्राचीन और आनंद-प्रधान 'नृत्य-गीत' (Dance-Song) है, जिसे डॉ. गोविंद चातक व अन्य लोक-इतिहासकारों ने वर्णित किया है।
व्युत्पत्ति एवं अर्थ: 'चौं' (चार) + 'फला' (खिलना) — इसका शाब्दिक अर्थ है 'चारों ओर खिलना'। यह उल्लास, उमंग और वसंत के आगमन का प्रतीक है तथा चारों दिशाओं में प्रकृति के खिलने का भाव इसमें निहित है।
पौराणिक पृष्ठभूमि: यह नृत्य पहली बार पार्वती माँ ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए किया था।
क्षेत्र एवं प्रकृति: यह गढ़वाल क्षेत्र का एक प्रमुख श्रृंगार प्रधान नृत्य है।
प्रतिभागी: यह स्त्री-पुरुषों द्वारा एक साथ या अलग-अलग टोली बनाकर किया जाता है।
पुरुष नर्तकों को 'चौंफुला' कहा जाता है।
स्त्री नर्तकों को 'चौंफुलो' कहा जाता है।
वाद्य यंत्र (विशिष्ट तथ्य): इस नृत्य में किसी भी प्रकार के बाहरी वाद्य यंत्र का प्रयोग नहीं होता है — परीक्षा की दृष्टि से यह सबसे अहम बिंदु है।
ताल और लय का निर्माण नर्तकों द्वारा हाथों की ताली, पैरों की थाप (कदमों की आहट), झांझ-मंजीरों, चूड़ियों की खनक और पाजेब (पायल) की ध्वनि से किया जाता है।
वृत्ताकार नृत्य: स्त्री-पुरुष अलग-अलग टोलियां बनाकर या एक साथ वृत्ताकार (गोल) घेरे में नृत्य करते हैं, जिसमें नर्तक एक-दूसरे के हाथों को गूंथकर घेरा बनाते हैं।
तुलनात्मक समानता: यह नृत्य गुजरात के गरबा, असम के बिहु व मणिपुर के रास नृत्य के समान माना जाता है।
नृत्य की गति (Tempo): यह नृत्य 'विलंबित लय' (अत्यंत धीमी गति) से शुरू होता है और धीरे-धीरे 'द्रुत लय' (तीव्र गति) की ओर बढ़ता है।
विषय-वस्तु: इसमें वसंत ऋतु का आगमन, प्रकृति के सौंदर्य (फूलों का खिलना) का वर्णन, नायक-नायिका का मिलन और प्रेम-निवेदन जैसे विषय वर्णित होते हैं। इसका मुख्य स्थायी भाव 'शृंगार रस' है।
चौंफला नृत्य की प्रमुख शैलियाँ:
खड़ा चौंफला
मयूर चौंफला
लालुड़ी चौंफला
भंवर चौंफला (गोल घूमने की मुद्रा)
नृत्य 02 / 20
झुमैलो नृत्य — Jhumailo Dance
झुमैलो नृत्य — विरह रस का भावनात्मक नृत्य
वर्गीकरण एवं विद्वत् मत (अतिरिक्त तथ्य): डॉ. गोविंद चातक व अन्य विद्वानों के अनुसार झुमैलो एक 'नृत्य प्रधान लोकगीत' की श्रेणी में वर्णित है — गढ़वाल का अत्यंत लोकप्रिय सामूहिक नृत्य-गीत, जिसमें प्रकृति के उल्लास और नारी-हृदय की भावनाओं का अनूठा संगम मिलता है।
व्युत्पत्ति ('झूमना'): इसकी उत्पत्ति 'झूमने' (To Sway) की क्रिया से मानी जाती है। वसंत ऋतु के उल्लास में जब प्रकृति और मनुष्य दोनों झूम उठते हैं, तो उसे 'झुमैलो' कहा जाता है।
टेक (Refrain) — परीक्षा तथ्य: इन गीतों की हर पंक्ति के अंत में 'झुमैलो' शब्द टेक के रूप में बार-बार दोहराया जाता है — उदाहरणतः "भला झुमैलो... हो झुमैलो"।
क्षेत्र एवं प्रतिभागी: गढ़वाल क्षेत्र में यह गायन-प्रधान नृत्य मुख्य रूप से नव विवाहित कन्याओं (ध्याणियों) द्वारा मायके आने पर झूम-झूमकर किया जाता है। चैत्र मास में जब गढ़वाल की विवाहित युवतियां (धियाणियां) अपने मायके आती हैं, तो वे अपनी सहेलियों के साथ मिलकर इसे गाती हैं।
प्रदर्शन शैली (अतिरिक्त तथ्य): यद्यपि इसे स्त्री-पुरुष दोनों गा सकते हैं, मुख्य रूप से यह महिलाओं का सामूहिक नृत्य-गीत है।
वाद्य यंत्र: चौंफला की तरह इसे भी प्रायः बिना किसी वाद्य यंत्र के गाया जा सकता है, किंतु मेलों और उत्सवों में इसके साथ ढोल-दमाऊ का प्रयोग भी किया जाता है।
नृत्य की मुद्रा (अतिरिक्त तथ्य): महिलाएं एक-दूसरे की कमर या कंधों पर हाथ रखकर अर्ध-वृत्ताकार (Half-circle) घेरे में झूमते हुए नृत्य करती हैं; कभी-कभी पूर्ण वृत्ताकार घेरे में भी नृत्य किया जाता है।
भाव एवं रस (Emotional Aspect):
यह नृत्य मायके से अगाध प्रेम का परिचायक है।
यह एक अत्यंत भावनात्मक श्रेणी (Emotional) का नृत्य है। इसमें 'विरह रस' (Separation/Longing) की प्रधानता होती है, जिसमें ससुराल में मायके की याद या विदाई के दर्द को व्यक्त किया जाता है।
यह भी पूर्णतः जम्भालिका शैली का नृत्य है।
मुख्य अवसर (परीक्षा तथ्य): यह नृत्य विशेष रूप से वसंत ऋतु (चैत्र मास) के आगमन पर किया जाता है, जब चारों ओर फूल खिले होते हैं और प्रकृति अपने चरम सौंदर्य पर होती है।
विषयवस्तु: झुमैलो गीतों में नारी हृदय की वेदना (पीड़ा) के साथ-साथ प्रकृति प्रेम (Nature's beauty) का बहुत सुंदर और मार्मिक वर्णन मिलता है।
सामाजिक यथार्थ (अतिरिक्त तथ्य): वसंत के खिले हुए वातावरण के बीच नारी जीवन का यथार्थ भी प्रस्तुत होता है — नारी जीवन की कठिनाइयां, सास-ससुर का व्यवहार, तथा पति के परदेस जाने की पीड़ा इसमें झलकती है।
चौंफला बनाम झुमैलो (परीक्षा-उपयोगी अंतर): चौंफला विशुद्ध शृंगार-आनंद का गीत है, जबकि झुमैलो में आनंद के साथ करुणा-विरह का भाव भी गहराई से जुड़ा है।
नृत्य 03 / 20
तांदी नृत्य — Tandi Dance
तांदी नृत्य — उत्तरकाशी व टिहरी का शृंखला नृत्य
वर्गीकरण एवं क्षेत्र: यह जौनसार-बावर (देहरादून) और रवांई-जौनपुर (उत्तरकाशी व टिहरी का सीमावर्ती भाग) क्षेत्र का सामूहिक उल्लास-प्रधान वृत्ताकार नृत्य है।
व्युत्पत्ति एवं अर्थ: स्थानीय बोली में 'तांदी' का अर्थ 'लय' या 'ताल' से लिया जाता है — यह सामूहिक नृत्य की उस लय को दर्शाता है, जिसे लोग एक साथ मिलकर निभाते हैं।
समय एवं अवसर: यह किसी विशेष अवसर, उल्लास के मौके पर और मुख्य रूप से माघ मेला, बिस्सू (बैसाखी) जैसे शुभ अवसरों पर किया जाता है।
नृत्य मुद्रा (महत्वपूर्ण तथ्य): इसमें नर्तक एक-दूसरे का हाथ पकड़कर या बाँहों में बाँहें डालकर एक शृंखला (Chain) या कड़ी बनाते हैं और वृत्ताकार रूप में नृत्य करते हैं।
वाद्य यंत्र (महत्वपूर्ण तथ्य): इसमें 'ढोल' और 'दमाऊ' का अनिवार्य प्रयोग होता है — ढोल की थाप पर ही पूरा नृत्य संचालित होता है। परीक्षा-दृष्टि से चौंफला/झुमैलो के विपरीत तांदी में गीत गौण और नृत्य की ताल प्रमुख होती है, क्योंकि यहाँ ढोल-दमाऊ अनिवार्य है।
गायन व विषयवस्तु:
नर्तक दल स्वयं ही गाता है और नाचता है।
इस नृत्य में गाये जाने वाले गीत (तांदी गीत) तात्कालिक (समसामयिक) घटनाओं, स्थानीय महापुरुषों व पौराणिक कथाओं तथा समाज के प्रमुख व्यक्तियों के कार्यों पर रचित होते हैं।
सामाजिक समरसता: यह गीत किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज की खुशी के लिए होता है।
लय: यह अपनी द्रुत (तेज) लय और शारीरिक चपलता के लिए जाना जाता है।
नृत्य 04 / 20
छोपती नृत्य — Chhopati Dance
छोपती नृत्य — रवांई-जौनपुर का रोमांटिक संवाद नृत्य
प्रमुख क्षेत्र (अतिरिक्त तथ्य): यह गढ़वाल क्षेत्र का नृत्य है, लेकिन विशेष रूप से यह टिहरी और उत्तरकाशी के 'रवांई-जौनपुर' (Rawain-Jaunpur) क्षेत्र में अत्यधिक लोकप्रिय है।
प्रकृति एवं रस: यह विशुद्ध रूप से प्रेम एवं रूप (सौंदर्य) की भावना से युक्त एक रोमांटिक नृत्य है।
प्रतिभागी: यह स्त्री-पुरुषों द्वारा एक साथ किया जाने वाला संयुक्त नृत्य है।
'संवाद प्रधान' विशेषता (UKSSSC फैक्ट):
यह एक संवाद प्रधान (Dialogue-heavy) नृत्य है।
नृत्य के दौरान नर्तक-नर्तकियाँ (स्त्री-पुरुष) गीतों के माध्यम से एक-दूसरे से संवाद करते हैं, जो मुख्य रूप से प्रश्न-उत्तर (Question-Answer) शैली में होता है। एक पक्ष गाकर प्रश्न पूछता है और दूसरा पक्ष गाकर ही उसका उत्तर देता है।
वर्गीकरण एवं विद्वत् मत (अतिरिक्त तथ्य): डॉ. गोविंद चातक व डॉ. यशवंत सिंह कठोच के सांस्कृतिक वर्गीकरण के अनुसार 'छोपती' (छोपाती) एक 'नृत्य प्रधान लोकगीत' की श्रेणी में वर्णित है।
व्युत्पत्ति एवं अर्थ ('छोपना'): यह शब्द स्थानीय बोली के 'छोपना' (To Throw/To Retort — फेंकना) से बना है। इस कलात्मक व चंचल शैली में प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे पर प्रेम-भरे कटाक्ष, ताने या भाव गीतों के माध्यम से 'छोपते' (फेंकते/उछालते) हैं — अर्थात बातों को गीतों के जरिये एक-दूसरे पर उछालना ही इसका मूल अर्थ है।
प्रदर्शन शैली — युगल नृत्य-गायन (Duet): यह एक युगल (Duet) गीत है, जिसे स्त्री-पुरुष आमने-सामने होकर गाते हैं; गायन के साथ-साथ नृत्य भी किया जाता है।
वाद्य यंत्र (अतिरिक्त तथ्य): पहाड़ों, जंगलों या खेतों में यह प्रायः बिना किसी वाद्य यंत्र के (स्वतंत्र कंठ से) गाया जाता है; मेलों और विशेष आयोजनों में स्थानीय वाद्य यंत्रों का प्रयोग भी किया जाता है।
तत्कालिकता (Improvisation) — परीक्षा तथ्य: कुमाऊं के 'बैर' या गढ़वाल के 'बाजूबंद' की तरह इसमें भी 'प्रत्युत्पन्न मति' (Instant Wit) की आवश्यकता होती है — सामने वाला गायक क्या गा रहा है, उसे सुनकर तुरंत उसी लय में जवाब रचना इसकी सबसे बड़ी खूबी है।
प्रमुख रस एवं भाव-विस्तार: इसका स्थायी भाव पूर्णतः 'शृंगार रस' है — प्रेम का इज़हार, सौंदर्य का वर्णन, रूठना-मनाना और मिलन-विरह की भावनाएं इसमें पिरोई होती हैं।
सामाजिक स्वच्छंदता: यह गीत पहाड़ी समाज की उस नैसर्गिक और स्वच्छंद संस्कृति का प्रतीक है, जहां युवा निःसंकोच होकर अपनी भावनाओं को कला के माध्यम से व्यक्त करते हैं।
बाजूबंद बनाम छोपती (परीक्षा-उपयोगी अंतर): दोनों प्रश्न-उत्तर वाले प्रेम गीत हैं, पर 'बाजूबंद' बैठकर गाया जाने वाला (अनुभूति प्रधान) गीत है, जबकि 'छोपती' में नृत्य अनिवार्य (नृत्य प्रधान) है।
नृत्य 05 / 20
झोड़ा और चांचरी नृत्य — Jhora तथा Chanchari Dance
झोड़ा एवं चांचरी — कुमाऊँ के दो प्रमुख सामूहिक नृत्य
चांचरी नृत्य — Chanchari Dance
प्रकृति: चांचरी मूल रूप से कुमाऊं का एक अत्यंत गरिमापूर्ण, श्रृंगार एवं भक्ति प्रधान सामूहिक नृत्य है। इसे झोड़े का ही प्राचीन और मूल रूप माना जाता है।
नामकरण एवं उत्पत्ति: 'चांचरी' शब्द की उत्पत्ति 'चंचरीक' (भौंरे) की गति से मानी जाती है। इसमें नर्तक भौंरे की भांति वृत्ताकार घेरे में घूमते हुए नृत्य करते हैं।
प्रमुख क्षेत्र: यह नृत्य मुख्य रूप से बागेश्वर के दानपुर क्षेत्र में सर्वाधिक लोकप्रिय है, इसलिए इसे 'दानपुरिया चांचरी' भी कहा जाता है।
क्षेत्रीय उपनाम: मुनस्यारी (पिथौरागढ़) क्षेत्र में चांचरी नृत्य को 'दुस्का' कहा जाता है।
घेरे का विन्यास (अनिवार्य नियम): चांचरी में सभी नर्तकों का एक पूर्ण वृत्ताकार शृंखला में बंधना अनिवार्य है। नर्तक एक-दूसरे से जुड़कर आगे बढ़ते हुए घेरे को छोटा करते हैं और पीछे हटते हुए पुनः बड़ा कर देते हैं।
मुख्य गायक: घेरे के बिल्कुल बीच में मुख्य गायक खड़ा होता है, जिसे 'हुड़किया' कहा जाता है। वह हुड़का बजाते हुए गीत की पंक्ति उठाता है, जिसे घेरे के अन्य लोग दोहराते हैं।
गति एवं लय: झोड़े की तुलना में इसका पद-संचालन अत्यंत मंद (धीमा) होता है और लय अधिक जटिल होती है।
विषय-वस्तु: इसमें मुख्य रूप से धार्मिक भावों (शिव, भैरव, भुम्याल देवता की स्तुति) और श्रृंगार रस की प्रधानता होती है।
झोड़ा नृत्य — Jhora Dance
प्रकृति: झोड़ा कुमाऊं का सर्वाधिक लोकप्रिय और द्रुत गति का विशाल सामूहिक नृत्य-गीत है, जिसमें सभी जातियों के स्त्री-पुरुष उल्लास के साथ एक साथ भाग लेते हैं।
नामकरण एवं उत्पत्ति: 'झोड़ा' शब्द संस्कृत के 'झटित' शब्द से उत्पन्न माना जाता है, जिसका अर्थ है — अत्यंत तेज़ गति। कुछ विद्वान इसे 'जोड़ा' (साथ मिलने) से भी जोड़ते हैं।
घेरे का विन्यास (मुख्य अंतर): चांचरी के विपरीत, झोड़े में घेरे का पूर्ण वृत्ताकार होना अनिवार्य नहीं होता। इसमें नर्तक प्रायः दो दल बनाकर, आमने-सामने की पंक्तियों में विभाजित होकर या स्थान बदलते हुए भी नृत्य करते हैं।
गायन शैली: दो दलों में बंटे होने के कारण इसमें गीत प्रायः प्रश्न-उत्तर शैली में गाए जाते हैं।
गति एवं लय: इसकी लय और पद-संचालन द्रुत (तेज) होता है। शुरुआत धीमी होती है, लेकिन जैसे-जैसे नर्तकों का उत्साह बढ़ता है, गति अत्यंत तीव्र हो जाती है।
बहुमंजिला संरचना: ऐतिहासिक रूप से मेलों में बहुमंजिला झोड़े आयोजित होते थे। अल्मोड़ा के मासी स्थित 'सोमनाथ मेले' में सात-सात मंजिलों वाले झोड़ों का उल्लेख लोक-इतिहास में मिलता है।
विषय-वस्तु का वर्गीकरण:
धार्मिक झोड़े: देवी-देवताओं का स्मरण और वंदना।
भाव-प्रधान झोड़े: हास्य-व्यंग्य, प्रेम-सौंदर्य और कल्याण की भावना।
सामयिक झोड़े: सामाजिक यथार्थ, राजनैतिक चेतना, स्वतंत्रता आंदोलन (गांधी जी, भगत सिंह का उल्लेख), राजस्व अधिकारियों (अमीन) द्वारा शोषण और कुरीतियों पर व्यंग्य।
परीक्षा दृष्टि: झोड़ा और चांचरी में प्रमुख अंतर
मूल उत्पत्ति शब्द: चांचरी — चंचरीक (भौंरे की गति) | झोड़ा — झटित (अत्यंत तेज़ गति)
घेरे की अनिवार्यता: चांचरी — पूर्ण वृत्ताकार होना अनिवार्य है | झोड़ा — पूर्ण वृत्ताकार होना अनिवार्य नहीं (दो दल भी संभव)
नृत्य की गति: चांचरी — मंद (धीमी) एवं जटिल लय | झोड़ा — द्रुत (तेज) एवं उल्लासपूर्ण लय
विशेष क्षेत्र: चांचरी — दानपुर क्षेत्र (बागेश्वर) | झोड़ा — संपूर्ण कुमाऊँ अंचल (विशेषकर सोमनाथ मेला)
रस व भाव: चांचरी — श्रृंगार रस और गंभीर भक्ति भाव | झोड़ा — उल्लास, हास्य-व्यंग्य व सामयिक भाव
नृत्य 06 / 20
थड़िया (थडिया/थड्या) नृत्य — Thadiya Dance
थडिया (थड्या) नृत्य — लास्य शैली का कोमल नृत्य
शाब्दिक अर्थ: गढ़वाली भाषा में 'थड़' का अर्थ 'घर का आँगन या चौक' होता है।
प्रमुख विशेषताएँ:
यह पूर्णतः लास्य शैली (कोमल भाव) का नृत्य है।
यह विवाहित लड़कियों (ध्याणियों) के पहली बार मायके आने पर किया जाता है।
समय एवं अवसर: यह नृत्य वसंत पंचमी से लेकर विषुवत संक्रांति (बिखौती/बैसाखी) तक घर के आँगन/चौक पर किया जाता है।
नृत्य मुद्रा: इसमें नर्तक एक-दूसरे का हाथ पकड़कर एक अर्द्ध-वृत्ताकार (Semi-circle) घेरा बनाते हैं और पद-संचालन करते हैं।
परंपरा: थड्या गीत और नृत्य का प्रारंभ हमेशा इष्ट देवताओं की वंदना (स्तुति) के साथ होता है, उसके पश्चात ही अन्य गीत गाये जाते हैं।
नृत्य 07 / 20
लांगवीर (लंगवीर) नृत्य — Langvir Dance
लंगवीर नृत्य — गढ़वाल का नट नृत्य
नृत्य की प्रकृति: यह एक प्रकार का नट नृत्य (Acrobatic Dance/करतब) है, जिसमें शारीरिक संतुलन का प्रदर्शन होता है।
प्रतिभागी: यह पूर्णतः पुरुषों द्वारा किया जाने वाला नृत्य है।
प्रमुख क्षेत्र: यह नृत्य मुख्य रूप से गढ़वाल क्षेत्र (विशेषकर टिहरी) में किया जाता है।
प्रदर्शन का तरीका:
इसमें पुरुष नर्तक एक ऊंचे खम्भे (प्रायः बांस के खम्भे) के शिखर पर चढ़ जाता है।
वह खम्भे के ऊपर अपने पेट के बल संतुलन (Balance) बनाता है।
नीचे बज रहे ढोल व नगाड़े की थाप पर वह खम्भे के ऊपर ही हाथ-पैरों से करतब दिखाते हुए नृत्य करता है।
धार्मिक/सांस्कृतिक मान्यता (अतिरिक्त तथ्य): चूंकि इसमें अत्यधिक स्फूर्ति, बल और कलाबाजी की आवश्यकता होती है, इसलिए इस नृत्य को अक्सर वीर रस और भगवान हनुमान (वानर रूप) की चपलता से जोड़कर देखा जाता है।
नृत्य 08 / 20
छोलिया नृत्य — Chholiya Dance / Choliya
छोलिया नृत्य (हुड़केली) — कुमाऊँ का प्राचीन युद्ध नृत्य
अन्य नाम व प्रकृति: इसे 'हुड़केली' नाम से भी जाना जाता है। यह कुमाऊँ क्षेत्र का सबसे प्रमुख और प्राचीन युद्ध नृत्य (Martial Dance) है।
वेशभूषा व प्रदर्शन:
यह विशेष प्रकार की पारंपरिक वेशभूषा पहनकर, ढाल व तलवार के साथ किया जाता है।
(सांस्कृतिक तथ्य) यह मुख्य रूप से राजपूतों द्वारा विवाह समारोहों (बारात में) बुरी आत्माओं को दूर भगाने की मान्यताओं के तहत किया जाता है।
प्रमुख अवसर: यह शादी-विवाह, धार्मिक अवसरों और विशेष रूप से किर्जी कुंभ मेले के समय किया जाता है। (नोट: किर्जी कुंभ मेला पिथौरागढ़ में प्रत्येक 12 वर्ष बाद लगता है)।
कलाकारों की संख्या (UKSSSC विशिष्ट तथ्य): छोलिया दल में कुल 22 कलाकार होते हैं।
14 संगीतकार (रणसिंघा, तुरी, ढोल-दमाऊ और मशकबीन बजाने वाले)
8 नर्तक (तलवार-ढाल वाले)
विषयवस्तु: यह नृत्य मुख्य रूप से पांडव, नरसिंह एवं नागराज लीलाओं (कथाओं) पर आधारित होता है।
प्रमुख व्यक्तित्व: जुगल किशोर पेटशाली (इन्हें छोलिया और लोक संस्कृति के लिए 2023 का संगीत नाट्य अकादमी पुरस्कार मिला है। इनकी प्रसिद्ध पुस्तक 'राजुला-मालूशाही' है)।
छोलिया के समान अन्य युद्ध नृत्य — सर्रों/सरौं (Saron Dance) व पौणा भोटिया नृत्य
सर्रों नृत्य: यह गढ़वाल क्षेत्र (विशेषकर टिहरी व उत्तरकाशी) का युद्ध गीत नृत्य है। यह बिल्कुल कुमाऊँ के छोलिया नृत्य के समान ही ढाल-तलवार के साथ किया जाता है।
पौणा नृत्य: यह भोटिया जनजाति (Bhotiya Tribe) का एक प्रमुख युद्ध नृत्य है। यह नृत्य भी अस्त्र-शस्त्रों (ढाल-तलवार) के साथ वीर रस में किया जाता है, विशेष रूप से पिथौरागढ़ के सीमांत क्षेत्रों में।
नृत्य 09 / 20
मंडाण नृत्य — Mandaan Dance / केदार नृत्य
मंडाण नृत्य (केदार नृत्य) — शुद्ध देव नृत्य
क्षेत्र एवं उपनाम: यह मुख्य रूप से टिहरी व उत्तरकाशी जनपदों (केदार घाटी) में खुले मैदानों या देव प्रांगण में किया जाता है। इसे 'केदार नृत्य' भी कहा जाता है।
प्रकृति व रस:
यह एक शुद्ध देव नृत्य / अनुष्ठानिक नृत्य है।
'एकाग्रता' (Concentration) इस नृत्य की सबसे मुख्य विशेषता है (यह शांत व भक्ति रस से शुरू होता है)।
नृत्य की तकनीक:
यह नृत्य चार तालों पर किया जाता है, जिसमें नर्तक के शरीर का हर अंग सक्रिय रहता है।
(सांस्कृतिक तथ्य) इस नृत्य में गायन नहीं होता, यह केवल ढोल-दमाऊ की थाप पर किया जाता है।
ढोल-सागर का महत्व: मंडाण पूरी तरह से ढोल की ताल पर निर्भर है। (उत्तराखंड में 'ढोल-सागर' के एकमात्र ज्ञात ज्ञाता श्री उत्तम दास जी हैं)।
नृत्य का समापन (अति महत्वपूर्ण तथ्य): इस नृत्य की गति धीरे-धीरे बढ़ती है और इसका अंत अत्यधिक तीव्र गति की 'चाली' और 'भौंर' (भंवर) से होता है।
कुमाऊँ में: इसे कुमाऊँ क्षेत्र में 'केदार नृत्य' के नाम से जाना जाता है।
नृत्य 10 / 20
सिपैया नृत्य
सिपैया नृत्य — कुमाऊँ का देशभक्ति नृत्य
प्रमुख क्षेत्र (अतिरिक्त तथ्य): यह मुख्य रूप से कुमाऊँ क्षेत्र का एक प्रसिद्ध लोकनृत्य है।
विषयवस्तु: यह विशुद्ध रूप से देश प्रेम (Patriotism) और राष्ट्रभक्ति की भावना से ओत-प्रोत नृत्य है।
उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य नव-युवकों (स्थानीय युवाओं) में जोश भरना और उन्हें सेना में जाने (भर्ती होने) हेतु प्रेरित करना है।
नृत्य 11 / 20
रणभूत नृत्य — Ranbhoot Dance
रणभूत नृत्य — वीरगति प्राप्त योद्धाओं का सम्मान
क्षेत्र: यह मुख्य रूप से गढ़वाल क्षेत्र और विशेषकर भैलचामी पट्टी (टिहरी) में किया जाता है।
सांस्कृतिक मान्यता: युद्ध भूमि में वीरगति (शहादत) प्राप्त करने वाले वीरों (जिन्हें उत्तराखंड में 'भड़' कहा जाता है) को देवता के समान आदर व सम्मान देने के लिए यह नृत्य किया जाता है।
'देवता घिरना' (महत्वपूर्ण तथ्य): जब वीरगति प्राप्त किसी योद्धा की आत्मा किसी व्यक्ति (पस्वा) के शरीर में प्रवेश करती है, तो उस स्थिति को स्थानीय भाषा में 'देवता घिरना' कहा जाता है।
नृत्य की शैली: यह एक अस्त्र-शस्त्र प्रधान नृत्य है (यह वीर रस में तलवार या अन्य हथियारों के साथ किया जाता है)।
उत्तराखंड के प्रमुख रणभूत (वीर):
कफू चौहान
माधो सिंह भंडारी
कालू भंडारी
भानु पोंपेला
नृत्य 12 / 20
बुड़ियात नृत्य — जौनसारी लोक नृत्य
बुड़ियात नृत्य — जौनसारी जनजाति का उल्लासपरक नृत्य
जनजाति: यह जौनसारी जनजाति (चकराता, देहरादून क्षेत्र) का एक पारंपरिक उल्लासपरक नृत्य है।
प्रमुख अवसर: यह मुख्य रूप से खुशी के मौकों जैसे — जन्मोत्सव, शादी-ब्याह और अन्य मांगलिक अवसरों पर किया जाता है।
नृत्य 13 / 20
भैला-भैलो नृत्य
भैला-भैला (भैलो) नृत्य — दीपावली विशेष
क्षेत्र व अवसर: यह गढ़वाल क्षेत्र में दीपावली (स्थानीय भाषा में 'बग्वाल') के दिन किया जाने वाला विशिष्ट लोकनृत्य है।
'भैला' का अर्थ एवं प्रदर्शन (UKSSSC का विशिष्ट तथ्य):
'भैला' दरअसल चीड़ (Pine) या भीमल की सूखी लकड़ी से बनी एक मशाल होती है।
दीपावली की रात को गढ़वाल के लोग इस मशाल (भैला) में आग लगाकर उसे एक रस्सी के सहारे अपने सिर के ऊपर गोल-गोल घुमाते हुए नृत्य करते हैं और खुशियाँ मनाते हैं।
नृत्य 14 / 20
पांडव नृत्य / पांडव लीला — Pandav Nritya
पांडव नृत्य (पण्डवार्त) — धार्मिक नृत्य-नाटिका
प्रकृति एवं उपनाम: इसे 'पण्डवार्त' भी कहा जाता है। यह केवल एक नृत्य नहीं, बल्कि एक धार्मिक नृत्य-नाटिका (Dance-Drama) है।
क्षेत्र एवं अवसर:
यह मुख्य रूप से गढ़वाल क्षेत्र (केदार घाटी) में किया जाता है।
यह माघ मेले के अवसर पर तथा विशेष रूप से नवरात्रों में 9 दिन तक आयोजित किया जाता है।
विषयवस्तु: यह पूरी तरह से महाभारत की कथाओं और पांडवों के जीवन पर आधारित है।
प्रमुख लोक नाट्य (अति महत्वपूर्ण तथ्य):
9 दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में विभिन्न प्रसंगों के 20 लोक नाट्य प्रस्तुत किए जाते हैं।
इनमें 'चक्रव्यूह', 'कमल व्यूह' और विशेष रूप से 'गैंडी-गैंडा वध' (Gaindi Vadh) सबसे अधिक प्रसिद्ध और परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रसंग हैं।
संगीत, ताल व गायन:
इस नृत्य में 32 तालों व सैकड़ों स्वर लिपियों का प्रयोग होता है (जो इसे बहुत जटिल और शास्त्रीय बनाता है)।
इसके अंतर्गत पांडवों की वीरगाथाओं के लगभग 1 हजार घंटे तक के गीत गाये जा सकते हैं।
नृत्य 15 / 20
नरसिंह नृत्य
नरसिंह नृत्य — भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार को समर्पित
उपास्य देवता: यह नृत्य भगवान विष्णु के 'नरसिंह अवतार' को समर्पित है (यह प्रायः जागर के रूप में किया जाता है)।
नृत्य के दो प्रमुख रूप (अति महत्वपूर्ण तथ्य):
डौंडिया नरसिंह (रौद्र रूप): यह देवता का उग्र और भयंकर रूप है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, इस रूप को शांत करने के लिए तामसिक पूजा (बलि आदि) की आवश्यकता होती है।
दूधिया नरसिंह (कोमल/शांत रूप): यह देवता का सौम्य और शांत रूप है। इसमें किसी प्रकार की बलि नहीं दी जाती, बल्कि देवता को केवल दूध, खीर और सात्विक नैवेद्य अर्पित किया जाता है।
नृत्य 16 / 20
नागर्जा (नागराज/नागराजा) नृत्य
नागर्जा (नागराज) नृत्य — भगवान कृष्ण की लीलाओं पर आधारित
मान्यता: उत्तराखंड में नागराज (जैसे टिहरी का 'सेम मुखेम नागराज' मंदिर) को साक्षात भगवान श्रीकृष्ण का ही रूप माना जाता है।
विषयवस्तु: इस नृत्य-गायन में मुख्य रूप से भगवान कृष्ण की लीलाओं (जैसे कालिया नाग मर्दन, गोकुल की कथाएँ) और नाग देवता की महिमा का वर्णन किया जाता है।
वाद्य यंत्र: इसमें विशेष रूप से ढोल-दमाऊ और रणसिंघा का प्रयोग होता है।
नृत्य 17 / 20
निरंकारी नृत्य
निरंकारी नृत्य — भगवान शिव (निराकार) की आराधना
उपास्य देवता व उपनाम: यह विशुद्ध रूप से भगवान शिव (निराकार रूप) की आराधना से संबंधित है। स्थानीय लोक-संस्कृति में इन्हें 'बड़ा देवता' या 'अलख देवता' के नाम से भी पूजा जाता है।
पवित्र वृक्ष (UKSSSC विशिष्ट तथ्य): इस अनुष्ठान और नृत्य में पदम वृक्ष (पय्याँ / Himalayan Cherry) की डालियों का विशेष महत्व है। पूजा स्थल पर पय्याँ की डाली को गाड़कर उसकी परिक्रमा करते हुए यह नृत्य किया जाता है।
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पवाड़ा / भड़ौ नृत्य
पवाड़ा / भड़ौ नृत्य — वीरगाथा नृत्य
'भड़' का अर्थ: उत्तराखंड के लोक इतिहास में शूरवीर और महान योद्धाओं को 'भड़' कहा जाता है (जैसे — माधो सिंह भंडारी, कालू भंडारी, कफू चौहान आदि)।
विषयवस्तु: यह नृत्य कुमाऊँ और गढ़वाल की वीरगाथाओं (पवाड़ों) पर आधारित है। इसमें वीरों के अदम्य साहस और युद्ध भूमि की कहानियों को प्रस्तुत किया जाता है।
पस्वा (Paswa): वह व्यक्ति जिसके शरीर में इन वीर योद्धाओं (जिन्हें 'रणभूत' भी कहा जाता है) की आत्मा प्रवेश करती है। आत्मा के प्रवेश करने पर पस्वा वीर रस में भरकर ढाल-तलवार या अस्त्र-शस्त्र के साथ नृत्य करता है।
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जागर नृत्य
जागर नृत्य — उत्तराखंड की आत्मा
शाब्दिक अर्थ: 'जागर' का अर्थ है सुप्त (सोई हुई) आत्माओं या देवताओं को 'जागृत' (जगाना) करना।
उद्देश्य व क्षेत्र: यह कुमाऊँ और गढ़वाल दोनों मंडलों की सबसे प्रमुख अनुष्ठानिक कला है। इसका मुख्य उद्देश्य पौराणिक गाथाओं को गाकर इष्ट देवताओं, कुल देवताओं या ग्राम देवताओं (जैसे गोलू देवता, ग्वेल, महासू, नरसिंह) को प्रसन्न करना और संकटों का निवारण करना है।
प्रमुख शब्दावली (Exam Facts):
जगरिया (Jagariya): यह मुख्य गायक और अनुष्ठान का संचालक होता है। जगरिया डौर-थाली, डमरू या हुड़का बजाते हुए विशेष लय में गाथाएं गाता है।
पस्वा / डंगरिया (Paswa/Dangariya): वह व्यक्ति (Medium) जिस पर देवता अवतरित होता है (देवता आता है)। जगरिया के गायन और वाद्य यंत्रों की तीव्र ध्वनि से पस्वा धूनी (आग) के पास कांपते हुए नृत्य करने लगता है।
स्याया (Syaya) / भंकोरिया: जगरिया के गायन में पीछे से सुर मिलाने वाले या हुंकारा भरने वाले सहायक व्यक्तियों को 'स्याया' कहा जाता है।
मूल वर्गीकरण (Nature): इसे मुख्य रूप से एक 'नृत्य-गीत' (Nritya-Geet) या 'प्रणय गीत' (Romantic Song) के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
अन्य नाम (Alternative Names): इसे 'दूड़ा नृत्य' (Duda Nritya) या 'पटबंद गीत' (Patband Geet) भी कहा जाता है।
विषयवस्तु (Theme): यह एक संवाद-प्रधान (Dialogue-based) लोक विधा है। इसमें अक्सर चरवाहों और घसियारिनों (घास काटने वाली महिलाओं) के बीच जंगलों या चरागाहों में होने वाले प्रणय-संवाद (Romantic conversation) को गीतों के माध्यम से व्यक्त किया जाता है।
सांस्कृतिक विशेषताएँ (Cultural Features):
आशु काव्य (Impromptu Poetry): इन्हें आशु कवियों (Impromptu poets) की रचना माना जाता है, जिनमें माटी की सोंधी गंध और सहज भावनाएँ होती हैं।
पटबंद शैली (Patband Style): इसमें अक्सर पहला तुकांत पद निरर्थक होता है, जिसका उपयोग केवल दूसरे सार्थक पद के साथ लय या तुक (Rhyme) बैठाने के लिए किया जाता है।
नृत्य-गीत का संबंध: यद्यपि यह मूलतः एक संवाद गीत है, लेकिन सांस्कृतिक पुस्तकों और लोक-व्यवहार में, जब इसे सामूहिक रूप से या मेलों के अवसर पर गाया जाता है, तो गायक लयबद्ध तरीके से शरीर में विशिष्ट गति (Movement) और झंकार लाते हैं, जिसे 'दूड़ा नृत्य' की श्रेणी में रखा जाता है।
क्षेत्र (Region): यह मुख्य रूप से गढ़वाल के रवांई-जौनपुर (टिहरी-उत्तरकाशी) क्षेत्र में अत्यधिक लोकप्रिय है।