मास्टर नोट्स · अध्ययन सामग्री

उत्तराखंड वन एवं वन्यजीव नोट्स
करेंट अफेयर्स 2020–2025

18वीं वन रिपोर्ट (ISFR 2023) के सम्पूर्ण आंकड़े, जिलेवार वनावरण विश्लेषण तथा वन्यजीव एवं संरक्षण संबंधी करेंट अफेयर्स (2020–2025) — परीक्षा-दृष्टि से वर्गीकृत।

01

🌳 उत्तराखंड — 18वीं वन रिपोर्ट (ISFR 2023)

📐 भौगोलिक एवं आवरण आंकड़े
53,483
कुल क्षेत्रफल (वर्ग किमी)
24,303
वनावरण (45.44%)
1231.14
वृक्षावरण (2.03%)
25,534.14
कुल आवरण (≈47.47%)
🔁 आवरण में परिवर्तन (2021 बनाम 2023)

वृक्षावरण में परिवर्तन

  • +230 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि।

वनावरण में परिवर्तन — विशेष ध्यान दें

  • आधिकारिक व वास्तविक कमी: −22.95 वर्ग किमी।
  • सामान्य तुलनात्मक कमी: −1.3 वर्ग किमी।
एग्जाम ट्रैप: फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा नई उन्नत सैटेलाइट इमेजरी व मैप-तकनीकी सुधार के बाद −22.95 वर्ग किमी का आंकड़ा जारी हुआ — परीक्षा में यही पहला विकल्प होना चाहिए। −1.3 वर्ग किमी केवल सीधी तुलना से आता है।
🏆 जिलेवार वनावरण रैंकिंग

सर्वाधिक वनावरण — क्षेत्रफल के आधार पर

  • 1. पौड़ी गढ़वाल
  • 2. उत्तरकाशी
  • 3. नैनीताल

सर्वाधिक वनावरण — प्रतिशत के आधार पर

  • 1. चंपावत — 69.06%
  • 2. नैनीताल — 67.43%
  • 3. पौड़ी गढ़वाल — 63.07%

सबसे कम वनावरण — क्षेत्रफल के आधार पर

  • 1. ऊधम सिंह नगर (अंतिम)
  • 2. हरिद्वार
  • 3. रुद्रप्रयाग

सबसे कम वनावरण — प्रतिशत के आधार पर

  • 1. ऊधम सिंह नगर
  • 2. हरिद्वार
  • 3. पिथौरागढ़
📊 जिलेवार परिवर्तन (वृद्धि / कमी)
7
जिले — वनावरण में कमी
6
जिले — वनावरण में वृद्धि

📈 सर्वाधिक 'वृद्धि' वाले जिले

आधार A — सीधी तुलना (ISFR 2021 vs 2023, सीधा घटाव)
  1. टिहरी गढ़वाल — सर्वाधिक वृद्धि, ≈158 वर्ग किमी 1st
  2. ऊधम सिंह नगर 2nd
आधार B — ISFR 2023 आधिकारिक तकनीकी डेटा (सैटेलाइट/मैपिंग सुधार पश्चात्)
  1. टिहरी गढ़वाल — 8.87 वर्ग किमी 1st
  2. देहरादून — 4.67 वर्ग किमी 2nd
  3. अल्मोड़ा — 4.09 वर्ग किमी 3rd

📉 सर्वाधिक 'कमी' वाले जिले

आधार A — सीधी तुलना (ISFR 2021 vs 2023, सीधा घटाव)
  1. नैनीताल — सर्वाधिक कमी 1st
  2. चमोली 2nd
आधार B — ISFR 2023 आधिकारिक तकनीकी डेटा (सैटेलाइट/मैपिंग सुधार पश्चात्)
  1. ऊधम सिंह नगर — सर्वाधिक कमी 1st
  2. उत्तरकाशी 2nd
  3. चमोली 3rd
ध्यान दें: आधार A (सीधी संख्यात्मक तुलना) व आधार B (तकनीकी रूप से सुधारी हुई आधिकारिक रिपोर्ट) के परिणाम अलग-अलग हैं — परीक्षा में दोनों आधारों के 1st/2nd/3rd जिले अलग-अलग याद रखें।
🌲 कैनोपी घनत्व वर्गीकरण

श्रेणी 1 · अत्यधिक सघन वन (VDF)

घनत्व: >70% राज्य क्षेत्रफल का ≈9.85%
  1. नैनीताल 1st
  2. देहरादून 2nd

श्रेणी 2 · मध्यम सघन वन (MDF)

घनत्व: 40%–70% राज्य क्षेत्रफल का ≈23.40%
  1. पौड़ी गढ़वाल 1st
  2. उत्तरकाशी 2nd

श्रेणी 3 · खुले वन (OF)

घनत्व: 10%–40% राज्य क्षेत्रफल का ≈12.19%
  1. पौड़ी गढ़वाल 1st
  2. टिहरी गढ़वाल 2nd

श्रेणी 4 · झाड़ियाँ (Scrub)

घनत्व: <10% राज्य क्षेत्रफल का ≈0.77%
  1. टिहरी गढ़वाल 1st
  2. पौड़ी गढ़वाल 2nd
एग्जाम ट्रैप: पौड़ी गढ़वाल MDF में भी 1st और OF में भी 1st है — जबकि टिहरी गढ़वाल OF में 2nd और Scrub में 1st है। नैनीताल व देहरादून केवल VDF (अत्यधिक सघन वन) में टॉप पर हैं, बाकी श्रेणियों में नहीं।

मंडलवार वनावरण का योगदान

  • गढ़वाल मंडल — 59.86%
  • कुमाऊं मंडल — 40.14%
एग्जाम ट्रैप: कुल वनावरण में गढ़वाल मंडल का हिस्सा कुमाऊं मंडल से अधिक है।
02

📰 करेंट अफेयर्स — वन एवं वन्यजीव

🦆 आसन आर्द्रभूमि (Asan Wetland)

स्थिति एवं निर्माण

  • स्थान: देहरादून; यमुना व आसन नदी के संगम पर।
  • आसन बैराज निर्माण: वर्ष 1967।

संरक्षण इतिहास व रामसर दर्जा

  • कंजर्वेशन रिज़र्व घोषित: 2005 (देश का पहला)।
  • रामसर स्थल घोषित: 21 जुलाई 2020।
  • उत्तराखंड का पहला व भारत का 38वां रामसर स्थल।
बोनस तथ्य: "पक्षियों का स्वर्ग" — सर्दियों में मध्य एशिया व यूरोप से प्रवासी पक्षी (जैसे सुर्खाब / Ruddy Shelduck) आते हैं।
🐅 टाइगर रिज़र्व

जिम कॉर्बेट टाइगर रिज़र्व

  • 1 अप्रैल 1973 — भारत व उत्तराखंड का पहला टाइगर रिज़र्व।
  • विस्तार: नैनीताल व पौड़ी गढ़वाल; क्षेत्रफल ≈1288 वर्ग किमी।
  • उत्तराखंड में कुल बाघ (2022): 560; कॉर्बेट में: 260 (देश में सर्वाधिक)।
  • बाघ-घनत्व में भारत का सबसे घना रिज़र्व; कुल बाघों में उत्तराखंड का तीसरा स्थान (1. मध्य प्रदेश, 2. कर्नाटक)।
  • 2012 — चारों ओर 500 मी 'साइलेंट ज़ोन' घोषित।
  • 2013 — 'स्पेशल टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स' (STPF) गठित।
करेंट अफेयर्स: पाखरो सफारी विवाद — कालागढ़ वन प्रभाग में अवैध निर्माण व पेड़ कटान। सफारी नियम 2024 (SC निर्देश): टाइगर सफारी केवल 'बफर ज़ोन' में; 'कोर एरिया' में पूर्णतः प्रतिबंधित।

राजाजी टाइगर रिज़र्व

  • 20 अप्रैल 2015 को अधिसूचित — राज्य का दूसरा टाइगर रिज़र्व।
  • विस्तार: हरिद्वार, देहरादून व पौड़ी गढ़वाल (3 जिले)।
🦌 वन्यजीव अभयारण्य

नंधौर वन्यजीव अभयारण्य

  • स्थापना: 2012; जिले: चंपावत व नैनीताल; क्षेत्रफल ≈270 वर्ग किमी।
एग्जाम ट्रैप: क्षेत्रफल 70 नहीं, 270 वर्ग किमी याद रखें। प्रदेश का तीसरा टाइगर रिज़र्व बनाने की प्रक्रिया जारी।

बिनोग वन्यजीव अभयारण्य (मसूरी)

  • स्थापना: 1993; क्षेत्रफल केवल 11 वर्ग किमी — राज्य का सबसे छोटा अभयारण्य।
  • विलुप्तप्राय 'हिमालयन बटेर' (Mountain Quail) का अंतिम संभावित आवास।
करेंट अफेयर्स: 2024 का 8वां 'उत्तराखंड स्प्रिंग बर्ड फेस्टिवल' यहीं आयोजित हुआ।
📍 जिलेवार प्रथम / विशेष स्थल

नैनीताल

  • भारत का पहला मॉस गार्डन — खुरपाताल (उद्घाटन: राजेंद्र सिंह, 'वाटरमैन ऑफ इंडिया')।
  • भारत का पहला पॉलिनेटर पार्क — हल्द्वानी।
  • देश का सबसे बड़ा सुगंधित उद्यान — लालकुआं।
  • उत्तर भारत का पहला इको ब्रिज — कालाढूंगी रेंज।
  • भारत का पहला (प्रस्तावित) कार्बन न्यूट्रल चिड़ियाघर — गौलापार, हल्द्वानी (राज्य का सबसे बड़ा चिड़ियाघर भी)।
  • हल्द्वानी के पार्क: जैव विविधता पार्क, जुरासिक पार्क, रामायण वाटिका, नक्षत्र वाटिका, भारत वाटिका।
  • गिद्ध संरक्षण व प्रजनन केंद्र — हल्द्वानी।

अल्मोड़ा (रानीखेत)

  • भारत का पहला वन चिकित्सा केंद्र — कालिका रेंज।
  • भारत का पहला घास संरक्षण केंद्र — रानीखेत।
  • भारत की सबसे बड़ी ओपन एयर फर्नेरी — रानीखेत।
  • भारत का पहला हिमालयन स्पाइस गार्डन — रानीखेत।

पिथौरागढ़ (मुनस्यारी)

  • भारत का पहला लाइकेन पार्क — मुनस्यारी (वायु प्रदूषण के जैव संकेतक)।
  • भारत का पहला रोडोडेंड्रोन (बुरांस) उद्यान — मुनस्यारी।
  • उत्तराखंड का सबसे बड़ा ट्यूलिप गार्डन — पिथौरागढ़।

देहरादून

  • भारत का पहला क्रिप्टोगेमिक गार्डन — देवबन (चकराता)।
  • उत्तराखंड का पहला सिटी फॉरेस्ट — आनंद वन, झाझरा।
  • कैक्टस गार्डन — कुठाल गेट।

चमोली एवं उत्तरकाशी

  • उत्तर भारत का पहला ऑर्किड संरक्षण केंद्र — मंडल, चमोली।
  • भारत का पहला हिम तेंदुआ संरक्षण केंद्र — भैरोंघाटी (लंका), उत्तरकाशी (नीदरलैंड व UNDP सहयोग)।
📊 सूचकांक एवं नवीनतम वन्यजीव गणना

GEP इंडेक्स 2024

  • घोषणा: अगस्त 2024, देहरादून — मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा।
  • विश्व का पहला इंडेक्स जो इकोसिस्टम सर्विस व इकोसिस्टम ग्रोथ दोनों मापता है।
  • निर्माता: डॉ. अनिल प्रकाश जोशी (HESCO संस्थापक)।
  • 4 स्तंभ: Air GEP, Water GEP, Soil GEP, Forest GEP।

हिम तेंदुआ गणना 2024

  • भारत में सर्वाधिक: लद्दाख (477)।
  • उत्तराखंड का स्थान: दूसरा (124 हिम तेंदुए)।

बाघ गणना 2022 (दोहराव — महत्वपूर्ण)

  • उत्तराखंड में कुल बाघ: 560 (भारत में तीसरा स्थान)।
  • कॉर्बेट में बाघ: 260 (देश में सर्वाधिक)।
03

🗂️ उत्तराखंड वन संपदा: वर्गीकरण के आधार एवं प्रकार

🏛️ आधार 1 — प्रबंधन एवं नियंत्रण (प्रशासनिक विभाजन)

यह विभाजन इस बात पर निर्भर करता है कि राज्य के वन क्षेत्र का प्रशासनिक रखरखाव और नियंत्रण किस विभाग या संस्था के पास है।

🌲
वन विभाग (Forest Department)
सबसे बड़ा प्रशासनिक हिस्सा। मुख्य रूप से आरक्षित वनों का प्रबंधन करता है।
70.46%वन क्षेत्र
🏘️
वन पंचायतें (Van Panchayats)
स्थानीय समुदायों द्वारा प्रबंधित (शुरुआत: 1931)। यह अनूठी व्यवस्था केवल उत्तराखंड में है।
15.32%वन क्षेत्र
📋
राजस्व विभाग (Revenue Department)
इन्हें 'सिविल-सोयम वन' कहते हैं। ग्रामीणों को पारंपरिक अधिकार प्राप्त हैं।
13.76%वन क्षेत्र
🏙️
निजी, नगर पालिका एवं छावनी बोर्ड
व्यक्तिगत संपत्तियां, नगर पालिका क्षेत्र या सैन्य छावनी परिषदों के अधीन आने वाले छोटे वन।
0.46%वन क्षेत्र
📝 परीक्षा बिंदु: वन पंचायत व्यवस्था की शुरुआत 1931 में हुई और यह भारत में केवल उत्तराखंड में है — यह MCQ में बार-बार पूछा जाता है।
🏔️ आधार 3 — ऊंचाई के अनुसार भौगोलिक वितरण (ISFR डेटा)

यह डेटा ISFR के Digital Elevation Model (DEM) पर आधारित है — ऊंचाई के अनुसार कुल वन आवरण का प्रतिशत वितरण:

0 – 500 मीटर
11.63%
500 – 1000 मीटर
16.20%
1000 – 2000 मीटर ⭐
41.26%
2000 – 3000 मीटर
23.61%
3000 – 4000 मीटर
7.24%
> 4000 मीटर
0.05%
ऊंचाई ज़ोन वन क्षेत्र (वर्ग किमी) % हिस्सा
0 – 500 मी.2,827.7311.63%
500 – 1000 मी.3,937.4116.20%
1000 – 2000 मी. ⭐10,027.0841.26%
2000 – 3000 मी.5,738.0423.61%
3000 – 4000 मी.1,760.637.24%
> 4000 मी.12.940.05%
कुल योग24,303.83100%
🔑 सर्वाधिक वन: 1000–2000 मीटर की ऊंचाई पर सबसे अधिक वन — 41.26% (10,027 वर्ग किमी) — यह उत्तराखंड का मुख्य वन-पट्टा है जहाँ बाँज, बुरांस व चीड़ के घने जंगल हैं।
📝 परीक्षा बिंदु — ऊंचाई अनुसार वन वितरण का क्रम: 1000-2000m (41.26%) > 2000-3000m (23.61%) > 500-1000m (16.20%) > 0-500m (11.63%) > 3000-4000m (7.24%) > >4000m (0.05%)
41.26%
सर्वाधिक वन — 1000–2000 मी.
0.05%
न्यूनतम वन — 4000 मी. से ऊपर
6
ऊंचाई क्षेत्र (Altitude Zones)
🌲 आधार 4 — पारिस्थितिक / वनस्पति-प्रकार वर्गीकरण (ऊंचाई अनुसार 8 प्रकार)

🏔️ ऊंचाई के अनुसार वन-क्रम (Quick Recall)

ऊंचाई वर्षा वन प्रकार वृक्ष / प्रजातियां
< 1,000 मी 70–100 सेमी 1. उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन
(Tropical Dry Deciduous)
खैर, शीशम, गूलर, ढाक/पलाश, बेल, अमलतास
< 1,000 मी 100–200 सेमी 2. उष्णकटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन
(Tropical Moist Deciduous)
साल, सागौन*, सेमल, महुआ, जामुन, शहतूत, आंवला
900 – 1,800 मी 100–200 सेमी 3. उपोष्ण कटिबंधीय चीड़ वन
(Sub-Tropical Pine Forests)
चीड़ (मुख्य), बांज ओक व काफल (मिश्रित)
1,800 – 3,000 मी 150–250 सेमी 4. हिमालयी नम शीतोष्ण वन
(Himalayan Moist Temperate)
बांज, बुरांश, काफल, मेपल
2,000 – 3,400 मी 100–250 सेमी 5. शीतोष्ण कोणधारी वन
(Temperate Coniferous Forests)
देवदार, फर, ब्लू पाइन, बुरांश, स्प्रूस, साइप्रस/सुरई
2,900 – 3,500 मी कम (हिम रूप) 6. उप-अल्पाइन वन
(Sub-Alpine Forests)
भोजपत्र, जूनीपर, बौने रोडोडेंड्रोन, विलो
3,500 – 4,500 मी कम (हिम रूप) 7. अल्पाइन झाड़ियां / बुग्याल
(Alpine Scrub / Meadows)
अल्पाइन घास, ब्रह्मकमल, कीड़ा जड़ी/यार्सागूंबा, जटामांसी, अतीस, कुटकी
4,500+ मी नगण्य 8. 🧊 टुंड्रा तुल्य वनस्पति
(Dry Alpine / Tundra-like)
काई, लाइकेन
📝 परीक्षा युक्ति: ऊंचाई क्रम याद रखें: खैर/शीशम → साल/सागौन → चीड़ → बांज/बुरांश → देवदार/फर → भोजपत्र → ब्रह्मकमल → काई-लाइकेन। कुल 8 प्रकार — यही क्रम UKPSC/UKSSSC में सीधे पूछा जाता है। (*सागौन देशज नहीं, केवल प्लांटेशन वृक्ष है — नीचे देखें)

🔑 वनों के प्रकार — परीक्षा के लिए अनिवार्य तथ्य

  • उत्तराखंड में कुल 8 प्रकार के वन पाए जाते हैं (ऊंचाई के अनुसार वर्गीकृत)।
  • ⚠️ Trap MCQ: उत्तराखंड में उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन (Tropical Evergreen) नहीं पाए जाते।
  • सर्वाधिक वृक्ष-आच्छादन = चीड़ (लगभग 28.24% वन क्षेत्र), इसके बाद शिवालिक साल (~12.8%) — FSI डेटा।
  • राज्य वृक्ष = बुरांश (Rhododendron arboreum) | राज्य पुष्प = ब्रह्मकमल (Saussurea obvallata) — दोनों अलग-अलग हैं।
  • ⚠️ करेक्शन: क्रिकेट बैट विलो (Willow — Salix alba) की लकड़ी से बनता है — शहतूत से नहीं। शहतूत केवल रेशम पालन (पत्तियों) के लिए महत्वपूर्ण है।
  • सागौन (Teak) उत्तराखंड का देशज वृक्ष नहीं है — यह मुख्यतः तराई-भाबर में वन विभाग का प्लांटेशन वृक्ष है।
🍂 1. उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन (Tropical Dry Deciduous)
Dry Deciduous शुष्क पर्णपाती — भाबर शुष्क भाग, कंडी क्षेत्र < 1,000 मी
⛰️
ऊंचाई< 1,000 मी (सीमा: 1,200 मी)
🌧️
वर्षा70 – 100 सेमी
📍 क्षेत्र:
भाबर का शुष्क भाग शिवालिक निचली ढलानें यमुना–अगलार संगम कंडी क्षेत्र
कंडी क्षेत्र क्या है? शिवालिक और भाबर के मध्य का कंकरीला-पथरीला भाग — यहां मुख्यतः शुष्क पर्णपाती वन पाए जाते हैं।
🌟 मुख्य वृक्ष:
खैरअकेसिया कैटेचू
शीशमडालबर्जिया सिस्सू
गूलरफाइकस रेसीमोसा
ढाक / पलाशब्यूटिया मोनोस्पर्मा
अन्य प्रजातियां:
बेल अमलतास
💰 आर्थिक महत्व
  • खैर: तने से 'कत्था' (Catechu) — हल्द्वानी प्रमुख केंद्र।
  • शीशम: उच्च गुणवत्ता फर्नीचर व नक्काशी।
🌱 पारिस्थितिक महत्व
  • शुष्क/पथरीली भाबर मिट्टी में अपरदन रोकते हैं।
  • पत्ते जनवरी–मार्च में झड़ते हैं — घास मैदान जैसे दिखते हैं।
  • अत्यधिक सूखे को सहने में सक्षम।
एग्जाम पॉइंट्स:
  • कत्था उत्पादन का स्रोत = खैर वृक्ष
  • 'कंडी' क्षेत्र में मुख्य वन = शुष्क पर्णपाती
  • 'जंगल की आग' (Flame of the Forest) = ढाक / पलाश
🌧️ 2. उष्णकटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन (Tropical Moist Deciduous)
Moist Deciduous आर्द्र पर्णपाती (मानसूनी वन) — दून घाटी, तराई-भाबर < 1,000 मी
⛰️
ऊंचाई< 1,000 मी
🌧️
वर्षा100 – 200 सेमी
📍 क्षेत्र:
दून घाटी देहरादून नैनीताल (निचला भाग) ऊधमसिंह नगर
🌟 मुख्य वृक्ष:
सालशोरिया रोबस्टाप्राकृतिक प्रमुख वृक्ष
सागौनटेक्टोना ग्रैंडिसकेवल वन विभाग प्लांटेशन, देशज नहीं
सेमलबॉम्बैक्स सीबा
महुआमधुका लॉन्गिफोलिया
जामुनसाइज़ियम क्यूमिनी
अन्य प्रजातियां:
शहतूत आंवला
💰 आर्थिक महत्व
  • सागौन: महंगे फर्नीचर — दीमक-प्रतिरोधी (termite-resistant)।
  • शहतूत: पत्तियां रेशम पालन (Sericulture) में उपयोग।
🌱 पारिस्थितिक महत्व
  • सघन कैनोपी — जैव विविधता में समृद्ध (राजाजी नेशनल पार्क का कोर क्षेत्र)।
  • राज्य के प्रमुख National Parks का मुख्य हिस्सा।
  • पत्तियां मार्च–अप्रैल (6–8 सप्ताह) गिरती हैं, मानसून में फिर हरे-भरे।
एग्जाम पॉइंट्स:
  • 'मानसूनी वन' (Monsoon Forests) = आर्द्र पर्णपाती वन — MCQ में बहुत पूछा जाता है।
  • दीमक-प्रतिरोधी मूल्यवान लकड़ी = सागौन (Teak)
🌲 3. उपोष्ण कटिबंधीय चीड़ वन (Sub-Tropical Pine Forests)
Sub-Tropical Pine चीड़ वन — मध्य हिमालय, शिवालिक ऊपरी भाग (सर्वाधिक विस्तृत) 900 – 1,800 मी
⛰️
ऊंचाई900 – 1,800 मी (कुछ ढलानों पर 2,150 मी तक)
🌧️
वर्षा100 – 200 सेमी
📍 क्षेत्र:
मध्य हिमालय शिवालिक ऊपरी भाग राज्य के विशाल भूभाग में (सबसे व्यापक)
🌟 मुख्य वृक्ष:
चीड़पाइनस रॉक्सबर्गी
मिश्रित प्रजातियां:
बांज ओकक्वेरकस ल्यूकोट्राइकोफोरानम घाटी/ऊपरी सीमा पर मिश्रित
काफलमिरिका एस्कुलेंटानिचले हिस्सों में मिश्रित
💰 आर्थिक महत्व
  • लीसा (Resin) → तारपीन तेल व अन्य उत्पाद — चीड़ इसका एकमात्र स्रोत।
  • इमारती लकड़ी — पैकेजिंग (फलों की पेटियां), दरवाजे-खिड़कियां।
🌱 पारिस्थितिक महत्व
  • 'पिरूल' (सूखी पत्तियां) अत्यधिक ज्वलनशील — वनाग्नि का मुख्य कारण।
  • मिट्टी को अम्लीय बनाता है — नीचे घास/चारा उगना घट जाता है।
  • 'पायनियर' प्रजाति — बंजर चट्टान व सूखी मिट्टी पर भी सबसे पहले उगता है।
एग्जाम पॉइंट्स:
  • राज्य के कुल वन क्षेत्र का सर्वाधिक भाग (लगभग 28.24%) चीड़ वनों से आच्छादित — FSI डेटा।
  • लीसा (Resin) का स्रोत = चीड़
  • वनाग्नि का मुख्य मौसम = मध्य-फरवरी से मध्य-जून
  • ⚠️ TRAP: चीड़ 'उपोष्ण' (Sub-Tropical) है — इसे देवदार/फर के 'शीतोष्ण' (Temperate) कोणधारी वनों से कन्फ्यूज न करें।
🌳 4. हिमालयी नम शीतोष्ण वन (Himalayan Moist Temperate)
Moist Temperate नम शीतोष्ण (बांज-बुरांश) — चमोली, रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़ 1,800 – 3,000 मी
⛰️
ऊंचाई1,800 – 3,000 मी
🌧️
वर्षा150 – 250 सेमी
📍 क्षेत्र:
चमोली रुद्रप्रयाग पिथौरागढ़ अल्मोड़ा (ऊपरी भाग) नैनीताल (ऊपरी भाग)
🌟 मुख्य वृक्ष:
बांजक्वेरकस प्रजाति
बुरांशरोडोडेंड्रॉन आर्बोरियम
काफलमिरिका एस्कुलेंटानिचली/तटीय पट्टी
अन्य प्रजातियां:
मेपल

👑 उत्तराखंड में बांज (Oak) की 5 प्रमुख प्रजातियां — 'हरा सोना'

स्थानीय नाम वैज्ञानिक नाम ऊंचाई पहचान
बांज Q. leucotrichophora 1,500–2,400 मी सबसे आम — चारा/ईंधन
मोरू / तिलोंज Q. floribunda 2,000–2,700 मी कठोर लकड़ी
खर्सू Q. semecarpifolia 2,500–3,300 मी सबसे अधिक ऊंचाई पर
रियांज Q. lanata (syn. Q. lanuginosa) मध्य पट्टी अपेक्षाकृत कम पाया जाता है
फल्यांट / हरींज Q. glauca नम घाटियां नदी-नालों के किनारे
💧 'जल बैंक' (Water Banks) — बांज की जड़ें स्पंज की तरह पानी सोखती हैं, जो गर्मियों में प्राकृतिक जलस्रोतों (नौले-धारे) को रीचार्ज करती हैं।
💰 आर्थिक महत्व
  • बांज: उत्तम चारा (Fodder) + कृषि उपकरणों (हल) की टिकाऊ लकड़ी।
  • बुरांश: फूलों से जूस/स्क्वैश — हृदय रोगों में लाभदायक, स्थानीय रोजगार।
🌱 पारिस्थितिक महत्व
  • चौड़ी पत्तियां गिरकर बेहतरीन खाद (Humus) बनाती हैं।
  • बांज का फल 'एकॉर्न' — जंगली भालू व काकड़ का मुख्य भोजन।
  • बुरांश रंग: 1,500–2,500 मी लाल, 2,500–3,000 मी गुलाबी, 3,000 मी+ सफेद।
एग्जाम पॉइंट्स:
  • राज्य वृक्ष = बुरांश | राज्य पुष्प = ब्रह्मकमल — दोनों अलग-अलग हैं।
  • रक्षा सूत्र आंदोलन (1994) — टिहरी की भिलंगना घाटी, नेतृत्व सुरेश भाई — बांज मिश्रित वन बचाने हेतु।
  • मीरा बेन — 'चीड़ के स्थान पर बांज' उगाने का अभियान चलाया।
🌲 5. शीतोष्ण कोणधारी वन (Temperate Coniferous Forests)
Temperate Coniferous देवदार-फर वन — उत्तरकाशी, चमोली, पिथौरागढ़, जागेश्वर 2,000 – 3,400 मी
⛰️
ऊंचाई2,000 – 3,400 मी
🌧️
वर्षा100 – 250 सेमी (भारी हिमपात)
📍 क्षेत्र:
उत्तरकाशी चमोली पिथौरागढ़ अल्मोड़ा (जागेश्वर धाम)

ऊंचाई के साथ वृक्ष-क्रम

2,000–2,700 मी देवदार (Deodar)
2,700–3,400 मी फर (Fir) — देवदार से भी ऊंचा
🌟 मुख्य वृक्ष:
देवदारसीड्रस देवदारा
फरएबीज़ पिंड्रो
ब्लू पाइनपाइनस वालिचियाना
बुरांशरोडोडेंड्रॉन आर्बोरियम
अन्य प्रजातियां:
स्प्रूस साइप्रस / सुरई
💰 आर्थिक महत्व
  • देवदार: टिकाऊ सुगंधित लकड़ी — मंदिर निर्माण, नक्काशी, रेलवे स्लीपर।
  • औषधीय तेल — पारंपरिक चिकित्सा व कीट-प्रतिरोधी उपयोग।
🌱 पारिस्थितिक महत्व
  • शंक्वाकार आकार — भारी बर्फ शाखाओं पर नहीं टिकती, पेड़ नहीं टूटते।
  • ठंडी/बर्फीली हवाओं से पहाड़ों व वन्यजीवों का बचाव।
  • सुई-पत्तियां — कम वाष्पोत्सर्जन, ठंड व सूखा सहनशील।
एग्जाम पॉइंट्स:
  • देवदार = 'देवताओं का वृक्ष' (Tree of Gods)।
  • जागेश्वर धाम (अल्मोड़ा) — पूरी तरह देवदार वनों से घिरा।
  • ⚠️ TRAP: चीड़ उपोष्ण है, जबकि देवदार व फर शीतोष्ण कोणधारी — कन्फ्यूज न करें।
🏔️ 6. उप-अल्पाइन वन (Sub-Alpine Forests)
Sub-Alpine उप-अल्पाइन वन — टिम्बरलाइन के ठीक नीचे 2,900 – 3,500 मी
⛰️
ऊंचाई2,900 – 3,500 मी
❄️
वर्षणकम — अधिकांश हिम रूप में
📍 क्षेत्र:
चमोली उत्तरकाशी पिथौरागढ़ (उच्च हिमालयी भाग)
🌟 मुख्य वृक्ष:
भोजपत्रबेटुला यूटिलिस
जूनीपरजूनिपेरस मैक्रोपोडा
अन्य प्रजातियां:
बौने रोडोडेंड्रोन विलो
💰 आर्थिक महत्व
  • भोजपत्र: छाल का ऐतिहासिक उपयोग — पांडुलिपि लेखन हेतु 'कागज़'।
  • जूनीपर: धार्मिक धूप (Incense) व पारंपरिक औषधि।
🌱 पारिस्थितिक महत्व
  • यह क्षेत्र 'टिम्बरलाइन' बनाता है — इससे ऊपर बड़े वृक्ष नहीं उगते।
  • अत्यंत ठंडी व कठोर जलवायु के पूर्ण अनुकूलित प्रजातियां।
एग्जाम पॉइंट्स:
  • प्राचीन काल में लेखन हेतु प्रयुक्त वृक्ष-छाल = भोजपत्र
  • टिम्बरलाइन (~3,500 मी) के समीप प्रमुख वन = उप-अल्पाइन वन
🌾 7. अल्पाइन झाड़ियां / बुग्याल (Alpine Scrub / Meadows)
Alpine Meadows बुग्याल — 'पहाड़ों का मखमली गलीचा' 3,500 – 4,500 मी
⛰️
ऊंचाई3,500 – 4,500 मी
❄️
Snow Coverवर्ष के 6–8 माह
📍 क्षेत्र:
चमोली — रूपकुंड, औली, वेदिनी उत्तरकाशी — दयारा बुग्याल पिथौरागढ़ — मुनस्यारी उच्च क्षेत्र
🌟 मुख्य वनस्पति:
अल्पाइन घासपूर्णतः वृक्ष-रहित क्षेत्र
ब्रह्मकमलसॉसुरिया ऑबवैलेटाराज्य पुष्प
कीड़ा जड़ी / यार्सागूंबाओफियोकॉर्डिसेप्स साइनेन्सिस
औषधीय जड़ी-बूटियां:
जटामांसी अतीस कुटकी
💰 आर्थिक महत्व
  • भोटिया व गुज्जर जनजातियों का ग्रीष्मकालीन चारागाह (Transhumance)।
  • दुर्लभ व मूल्यवान औषधीय जड़ी-बूटियों का भंडार।
🌱 पारिस्थितिक महत्व
  • 'प्रकृति के स्पंज' — नमी सोखकर गर्मियों में धीरे-धीरे नदियों में छोड़ते हैं।
  • घनी घास परत मृदा को बांधे रखती है — भूस्खलन कम होता है।
एग्जाम पॉइंट्स:
  • बुग्यालों को कहते हैं = 'मखमली गलीचा' (कश्मीर में 'मर्ग', जैसे गुलमर्ग)।
  • ब्रह्मकमल = राज्य पुष्प, केवल बुग्यालों में जुलाई–सितंबर के बीच खिलता है।
  • कीड़ा जड़ी को कहते हैं = 'हिमालयी सोना' — विश्व की सबसे महंगी फफूंद-आधारित औषधियों में से एक।
🧊 8. टुंड्रा तुल्य वनस्पति (Dry Alpine / Tundra-like) — अंतिम प्रकार
Tundra-type टुंड्रा तुल्य वनस्पति — हिमरेखा के ठीक नीचे 4,500 – 4,800+ मी
⛰️
ऊंचाई4,500 – 4,800+ मी
❄️
वर्षणनगण्य — अधिकांश हिम रूप में
📍 क्षेत्र:
स्थायी हिमरेखा के ठीक नीचे ऊंचे हिमालयी शिखरों के समीप चट्टानी भाग
🌟 मुख्य वनस्पति:
काई
लाइकेन
अन्य: सेज (Sedge), अत्यधिक छोटी कुशन-जैसी घासें (ज़मीन से चिपकी)
💰 आर्थिक महत्व
  • नगण्य — इस ऊंचाई पर व्यावसायिक दोहन संभव नहीं, वृद्धि अत्यंत धीमी।
🌱 पारिस्थितिक महत्व
  • प्राथमिक अनुक्रमण (Primary Succession) — लाइकेन नंगी चट्टानों को तोड़कर मिट्टी बनाते हैं।
  • चरम जलवायु (अत्यधिक ठंड, कम ऑक्सीजन) में जीवन का प्रतीक।
एग्जाम पॉइंट्स:
  • लाइकेन = वायु प्रदूषण (विशेषकर SO₂) का प्राकृतिक संकेतक
  • भारत का पहला लाइकेन पार्क = मुनस्यारी (पिथौरागढ़)
  • लाइकेन = कवक (Fungi) व शैवाल (Algae) का सहजीवी संबंध

🌳 सभी वृक्ष प्रजातियां — वैज्ञानिक नाम सूची (मास्टर टेबल)

इस भाग में ऊपर वर्णित सभी वृक्ष प्रजातियों (शिवालिक से लेकर हिमरेखा तक) को उनके वैज्ञानिक नामों के साथ एक ही तालिका में संकलित किया गया है।

स्थानीय नाम वैज्ञानिक नाम वन प्रकार / पेटी
खैरAcacia catechuभाबर — शुष्क पर्णपाती
शीशमDalbergia sissooभाबर — शुष्क पर्णपाती
गूलरFicus racemosaभाबर — शुष्क पर्णपाती
ढाक / पलाशButea monospermaभाबर — शुष्क पर्णपाती
सालShorea robustaतराई — आर्द्र पर्णपाती (प्रमुख वृक्ष)
सागौनTectona grandisतराई — प्लांटेशन (देशज नहीं)
सेमलBombax ceibaतराई — आर्द्र पर्णपाती
महुआMadhuca longifoliaतराई — आर्द्र पर्णपाती
जामुनSyzygium cuminiतराई — आर्द्र पर्णपाती
चीड़Pinus roxburghiiशिवालिक/मध्य हिमालय — चीड़ वन
बांजQuercus leucotrichophoraमध्य हिमालय — बांज/शीतोष्ण वन
काफलMyrica esculentaमध्य हिमालय — मिश्रित पेटी
बुरांशRhododendron arboreumमध्य हिमालय / उप-अल्पाइन
देवदारCedrus deodaraउप-अल्पाइन शंकुधारी वन
फरAbies pindrowउप-अल्पाइन शंकुधारी वन
ब्लू पाइनPinus wallichianaउप-अल्पाइन शंकुधारी वन
भोजपत्रBetula utilisअल्पाइन झाड़ी सीमा (हिमरेखा के निकट)
जूनीपरJuniperus macropodaअल्पाइन झाड़ी सीमा
📝 परीक्षा बिंदु: बांज की सभी उप-प्रजातियों (मोरू, खर्सू, रियांज आदि) का सामान्य वंश-नाम Quercus है — तालिका में इसे केवल बांज (Q. leucotrichophora) के रूप में एक बार दर्शाया गया है।
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🏡 उत्तराखंड वन पंचायत: सम्पूर्ण मास्टर नोट्स

📌 परिचय एवं प्रमुख आंकड़े
12,167+ कुल वन पंचायतें राज्य में वर्तमान
15.32% कुल वन क्षेत्र का हिस्सा ≈ 3,721 वर्ग किमी
1931 प्रथम नियम वर्ष कुमाऊं वन पंचायत नियम
एशिया सबसे पुराना CFM मॉडल Community Forest Mgmt.

वन पंचायत क्या है?

  • यह 'सामुदायिक वन प्रबंधन' (Community Forest Management) का एशिया का सबसे पुराना और सफल मॉडल है।
  • स्वामित्व: 'राज्य के स्वामित्व' और 'सामुदायिक जिम्मेदारी' का मिला-जुला अनूठा रूप।
  • यह व्यवस्था पूरे भारत में केवल उत्तराखंड में है।
📝 परीक्षा बिंदु: वन पंचायत = Community Forest Management का एशिया का सबसे पुराना मॉडल + केवल उत्तराखंड में = दोनों तथ्य MCQ में अलग-अलग पूछे जाते हैं।
📜 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: नेल्सन बंदोबस्त से वन पंचायत तक
वर्ष घटना / विवरण
1893
1893 की घोषणा
ब्रिटिश सरकार ने कुमाऊं की सभी 'बेनाप भूमि' (बिना रिकॉर्ड वाली भूमि) को 'जिला संरक्षित वन' घोषित कर दिया — ग्रामीणों के पारंपरिक अधिकार खतरे में।
1911–1917
नेल्सन का बंदोबस्त
नेल्सन का वन/भूमि बंदोबस्त लागू हुआ। जंगलों की घेराबंदी कर उन्हें 'आरक्षित वन' बनाया गया। ग्रामीणों के पारंपरिक अधिकार पूरी तरह छीन लिए गए।
आंदोलन
(1910–20)
वन आंदोलन एवं प्रथम महिला गिरफ्तारी
अधिकारों के हनन के विरोध में व्यापक वन आंदोलन हुए। इन आंदोलनों में भाग लेने व गिरफ्तार होने वाली राज्य की पहली महिला — दुर्गा देवी थीं।
1921
कुमाऊं फॉरेस्ट ग्रीवांस कमेटी
जन-आंदोलनों के दबाव में शिकायतों के निवारण के लिए 'कुमाऊं फॉरेस्ट ग्रीवांस कमेटी' गठित की गई।
✅ 1931
प्रथम वन पंचायत नियम — ऐतिहासिक क्षण
उसी कमेटी की सिफारिश पर सबसे पहले 'कुमाऊं वन पंचायत नियम' लागू हुए — यह वन पंचायत व्यवस्था की आधिकारिक शुरुआत है।
1971→2012
नियमों में क्रमिक संशोधन
1931 के बाद नियम अपडेट होते रहे: 1971 → 1976 → 2001 → 2005 → 2012 — 2005 में 50% महिला आरक्षण जोड़ा गया।
⚠️ परीक्षा में पूछा जाता है:
  • वन पंचायत नियम कब लागू हुए? → 1931
  • किसकी सिफारिश पर? → कुमाऊं फॉरेस्ट ग्रीवांस कमेटी (1921)
  • प्रथम गिरफ्तार महिला? → दुर्गा देवी
⚙️ संरचना एवं कार्यप्रणाली
🌿
सिविल/संरक्षित वन
भूमि का प्रकार (राजस्व अधीन)
👥
5 – 9 पंच
कुल सदस्य प्रति समिति
📅
5 वर्ष
समिति का कार्यकाल (Tenure)
🗓️
4 बैठकें/वर्ष
अनिवार्य (हर तिमाही एक)
👑
सरपंच
समिति प्रमुख (सदस्यों द्वारा)
🙋‍♀️ महिला एवं SC/ST आरक्षण
👩
50%
महिला आरक्षण
नियम 2005 के तहत समिति की 50% सीटें महिलाओं के लिए अनिवार्य हैं। 5–9 सदस्यों में से कम से कम 4–5 महिला सदस्य होना आवश्यक है।
🤝
SC/ST
जनसंख्या अनुपात आरक्षण
ग्राम सभा की जनसंख्या के अनुपात में SC और ST के लिए सीटें आरक्षित। कोई निश्चित % नहीं — जनसंख्या-आधारित।
🏆 जिलेवार रैंकिंग एवं अपवाद
🥇
पौड़ी गढ़वाल
2,212 वन पंचायतें
2
अल्मोड़ा
2,041 वन पंचायतें
3
पिथौरागढ़
1,516 वन पंचायतें
4
चमोली
1,345 वन पंचायतें
5
टिहरी गढ़वाल
1,290 वन पंचायतें
🥇
चमोली
3,18,477 हेक्टेयर
2
पिथौरागढ़
1,20,964 हेक्टेयर
3
अल्मोड़ा
50,597 हेक्टेयर
4
पौड़ी गढ़वाल
46,736 हेक्टेयर
5
चंपावत
30,834 हेक्टेयर
🔄 ध्यान दें — रैंकिंग पलट जाती है:
संख्या में पौड़ी गढ़वाल (1st) > अल्मोड़ा > पिथौरागढ़ > चमोली (4th)
क्षेत्रफल में चमोली (1st) > पिथौरागढ़ > अल्मोड़ा > पौड़ी गढ़वाल (4th)
यह उलटफेर MCQ में जानबूझकर गलत विकल्प बनाने के लिए उपयोग होता है।


⚠️ अपवाद — शून्य वन पंचायत वाले जिले
उत्तराखंड के हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर जिलों में एक भी वन पंचायत नहीं है।

कारण: वन पंचायत व्यवस्था मुख्य रूप से पर्वतीय क्षेत्रों (Hill areas) के वनों के प्रबंधन के लिए बनी है। हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर मैदानी जिले हैं।

05

🏵️ उत्तराखंड के राज्य प्रतीक

🌳 राज्य वृक्ष — बुरांश (State Tree)
🌳 राज्य वृक्ष — बुरांश (रोडोडेंड्रॉन आर्बोरियम) 1,500 – 4,000 मी
⛰️
ऊंचाई सीमा1,500 – 4,000 मी
📏
ऊंचाई (वृक्ष)20–25 फीट
🌸 फूलों का रंग (ऊंचाई अनुसार):
1,500–2,500 मी → लाल (Red) 2,500–3,000 मी → गुलाबी (Pink) — जैसे मुनस्यारी क्षेत्र 3,000 मी+ → सफेद (White)
विशेषताएं: सदाबहार पर्वतीय वृक्ष — मैदानों में नहीं उगाया जा सकता। लकड़ी मुलायम (ईंधन हेतु प्रयुक्त), पत्तियां मोटी (खाद/कम्पोस्ट हेतु प्रयुक्त)।
💰 उपयोग
  • औषधीय फूलों का रस — हृदय रोग (Heart Disease) में लाभकारी।
  • फूलों से डाई (प्राकृतिक रंग) भी बनाई जाती है।
🌱 पुष्पन काल (Blooming Season)
  • मकर संक्रांति के बाद फूल आना शुरू।
  • बैसाखी तक पूर्ण खिलाव (Full Bloom)।
  • गर्मी बढ़ने के साथ सूखने लगते हैं।
एग्जाम पॉइंट्स:
  • वन अधिनियम (Forest Act) 1974 के तहत अवैध कटाई रोकने हेतु संरक्षित वृक्ष घोषित।
  • बुरांश नेपाल का राष्ट्रीय पुष्प और हिमाचल प्रदेश तथा नागालैंड का राज्य पुष्प भी है।
🌸 राज्य पुष्प — ब्रह्मकमल (State Flower)
🌸 राज्य पुष्प — ब्रह्मकमल (सॉसुरिया ऑबवैलेटा) 3,500 से 4,800 मीटर
⛰️
आवासउच्च हिमालयी क्षेत्र,
12,000–15,000 फीट
लगभग 3,500 से 4,800 मीटर
🌿
कुल (Family)Asteraceae (ऐस्टरेसी)
📏
पौधे की ऊंचाई70–80 सेमी
📍 वितरण क्षेत्र:
वैली ऑफ फ्लावर्स केदारनाथ शिवलिंग बेस पिंडारी ग्लेशियर
🌟 प्रमुख उत्तराखंड प्रजातियां:
फेनकमलसॉसुरिया सिम्पसोनियाना
कस्तूरी कमलसॉसुरिया गॉसिपिफोरा
🗂️ वितरण संख्या
  • उत्तराखंड में कुल 24 प्रजातियां पाई जाती हैं।
  • विश्व स्तर पर कुल लगभग 300 प्रजातियां
🌱 भौतिक व सांस्कृतिक विशेषताएं
  • बैंगनी रंग के फूल, पीली पत्तियों (bracts) पर गुच्छों में — अत्यंत सुगंधित।
  • पुष्पन काल: जुलाई से सितंबर
एग्जाम पॉइंट्स:
  • वेदों में उल्लेख मिलता है।
  • स्थानीय नाम: 'कौल पद्म'
  • महाभारत (वनपर्व) में इसे 'सौगन्धिक पुष्प' कहा गया है।
  • केदारनाथ में भगवान शिव को विशेष 'प्रसाद' के रूप में अर्पित किया जाता है।
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🌲 उत्तराखंड के प्रमुख वन आन्दोलन

🗓️ त्वरित पुनरावलोकन तालिका (कालक्रमानुसार)
52 / 52 दिखाए गए

💡 डिफ़ॉल्ट रूप से पूरी तालिका दिखाई देती है। सभी छुपाएं दबाने पर आन्दोलन (नाम) कॉलम को छोड़कर बाकी सभी कॉलम धुंधले (blur) हो जाते हैं — किसी सेल पर क्लिक कर उसका उत्तर देखें। शफल पंक्तियों का क्रम बदलकर सभी कॉलम फिर से छुपा देता है ताकि क्रम नहीं, तथ्य याद रहें। रीसेट मूल क्रम व पूर्ण दृश्यता वापस लाता है।

आन्दोलनवर्षस्थाननेतृत्वकारण / परिणाम
1 · कुंजणी वन आन्दोलन
1904 स्यूड़ व पाथों गाँव, टिहरी रियासत अमर सिंह
कीर्तिशाह के समय बढ़ाये गये टैक्स के विरोध में।
2 · खास पट्टी वन आन्दोलन
1906–07 टिहरी रियासत बेलमती देवी
परिणामस्वरूप बैंक ऑफ गढ़वाल का गठन।
3 · असहयोग वन आन्दोलन
1919–22 चमोली व पौड़ी गोपाल सिंह राणा ('आधुनिक किसान आन्दोलनों के जनक')
सौम्य सेर व बिसाऊ प्रथा के विरुद्ध।
4 · राजगढ़ी → रवाँई / तिलाड़ी काण्ड
1926–30 राजगढ़ी (वर्तमान बड़कोट), उत्तरकाशी दयाराम रवालटा ('आजाद पंचायत')
वन बन्दोबस्त 1929 का विरोध; 30 मई 1930 तिलाड़ी काण्ड में 200+ शहीद — 'उत्तराखण्ड का जलियाँवाला बाग'।
5 · चिपको आन्दोलन
1973 मण्डल गाँव व रैणी गाँव, चमोली चण्डी प्रसाद भट्ट, गौरा देवी, सुन्दरलाल बहुगुणा
वृक्ष कटान के ठेके के विरुद्ध — विश्वप्रसिद्ध वृक्ष-रक्षा आन्दोलन।
6 · पर्वतीय वन संघर्ष समिति
1974 अल्मोड़ा गोबिन्द सिंह
वनों की नीलामी के विरुद्ध; 1977 में नैनीताल शैलेहॉल दहन।
7 · खीराकोट वन आन्दोलन
1978 खीराकोट गाँव, अल्मोड़ा मालती देवी, राधा भट्ट
खड़िया खनन के विरुद्ध।
8 · डुंगी-पैंतोली आन्दोलन
1980 डुंगी व पैंतोली गाँव, चमोली मथुरा देवी
बाँज वनों के हस्तान्तरण के विरुद्ध।
9 · पाणी राखो आन्दोलन
1980 दशक उपरेखाल गाँव, पौड़ी गढ़वाल सच्चदानन्द भारती
'चाल-खाल' पद्धति से जल संचयन।
10 · बीज बचाओ आन्दोलन
1986–89 जधार गाँव, टिहरी गढ़वाल विजय जड़धारी
'बारनाजा' पद्धति से परम्परागत बीज संरक्षण।
11 · रक्षासूत्र आन्दोलन
1994 मिलंगना घाटी, टिहरी गढ़वाल सुरेश भाई
वृक्षों पर रक्षासूत्र बाँधकर संरक्षण का संकल्प।
12 · मैती आन्दोलन
1994–95 ग्वालदम, चमोली कल्याण सिंह रावत ('वृक्ष मानव')
विवाह पर मैती वृक्षारोपण की परम्परा।
13 · झपटो-छीनो आन्दोलन
1998 रैणी-लाता, चमोली गोविन्द सिंह रावत (प्रेरणा)
नन्दा देवी उद्यान का प्रबन्धन ग्रामीणों को सौंपने की माँग।
एग्जाम पॉइंट: क्रमांक 4 में दो सम्बन्धित आन्दोलन (राजगढ़ी व रवाँई/तिलाड़ी) एक साथ गिने गए हैं क्योंकि राजगढ़ी वन बन्दोबस्त के विरोध से ही तिलाड़ी काण्ड (1930) उपजा — कुल गिनती में दोनों मिलाकर 14 आन्दोलन होते हैं।
🌾 01 · कुंजणी वन आन्दोलन (1904)
नेतृत्व: अमर सिंह शासक: कीर्तिशाह क्षेत्र: स्यूड़ व पाथों गाँव, टिहरी रियासत · हेबल नदी घाटी
  • कारण: अंग्रेज सरकार को सहायता हेतु बढ़ाया गया टैक्स।
  • यह आन्दोलन कीर्तिशाह के समय अंग्रेज सरकार को सहायता देने के लिये बढ़ाये गये टैक्स के विरोध में हुआ।
  • स्यूड़ व पाथों गाँव में हजारों किसानों ने घेरा डाला था।
🌾 02 · खास पट्टी वन आन्दोलन (1906–07)
नेतृत्व: बेलमती देवी, भगवान सिंह बिष्ट, भरोसाराम क्षेत्र: टिहरी रियासत
  • महिलाओं की सक्रिय भूमिका — बेलमती देवी प्रमुख नेत्री।
  • इस आन्दोलन के परिणामस्वरूप कीर्तिशाह द्वारा किसानों हेतु बैंक ऑफ गढ़वाल का गठन किया गया।
एग्जाम पॉइंट: परिणाम — कीर्तिशाह द्वारा किसानों हेतु बैंक ऑफ गढ़वाल का गठन।
🌾 03 · असहयोग वन आन्दोलन (1919–22)
नेतृत्व: गोपाल सिंह राणा क्षेत्र: चमोली व पौड़ी उपाधि: आधुनिक किसान आन्दोलनों के जनक
  • चमोली व पौड़ी में सौम्य सेर व बिसाऊ प्रथा के खिलाफ चलाया गया।
  • 1915 में सौम्या सेर व बिसाऊ प्रथा के खिलाफ गोपाल सिंह राणा ने आन्दोलन शुरू किया था।
  • 1919-22 का असहयोग वन आन्दोलन उसी का विस्तारित रूप था।
  • गोपाल सिंह राणा को आधुनिक किसान आन्दोलनों का जनक माना जाता है।
🩸 4 · रवाँई / तिलाड़ी काण्ड कालखंड (1926–1930)
क्षेत्र: राजगढ़ी (बड़कोट) व रवाँई परगना, टिहरी रियासत प्रमुख घटना: तिलाड़ी काण्ड — 30 मई 1930 उपनाम: उत्तराखण्ड का जलियाँवाला बाग

1 · पृष्ठभूमि: कठोर वन कानूनों का निर्माण (1926–1928)

  • कानून लागू: 1926 में टिहरी रियासत में 'वर्किंग प्लान ऑफ टिहरी गढ़वाल स्टेट' लागू किया गया। इसी कानून को बाद में 'वन बन्दोबस्त 1929' के नाम से जाना गया।
  • सृजनकर्ता: इस वन कानून का मसौदा (Draft) तत्कालीन DFO पदमदत्त रतूड़ी ने तैयार किया था।
  • वन नीति (1927-28): वनों का सीमाकरण (Demarcation) कर दिया गया। वनों में ग्रामीणों और उनके पशुओं का प्रवेश पूरी तरह वर्जित कर दिया गया।
  • ऐतिहासिक संवाद: जब त्रस्त जनता ने तत्कालीन राजा नरेन्द्र शाह से पूछा कि "पशु कहाँ जाएंगे?", तो राजा का क्रूर उत्तर था — "ढंगार (खाई) में फेंक दो!"

2 · राजगढ़ी वन आन्दोलन (1926-30) व 'आजाद पंचायत' (1929)

  • राजा के इस रवैये और वन कानूनों के विरोध में राजगढ़ी (बड़कोट) के ग्रामीणों ने रियासत के खिलाफ एक समानांतर व्यवस्था के रूप में 'आजाद पंचायत' का गठन किया।
  • अध्यक्ष: दयाराम सिंह रवालटा
  • उपाध्यक्ष: राम सिंह
  • प्रमुख उपाधियाँ (परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण):
  • हीरा सिंह को 'पांच सरकार' की उपाधि दी गई।
  • बैजराम को 'तीन सरकार' की उपाधि दी गई।
  • आन्दोलन का विस्तार: राजगढ़ी से शुरू हुई यही 'आजाद पंचायत' और आन्दोलन धीरे-धीरे पूरे रवाँई परगने में फैल गया, जिसकी परिणति अंततः तिलाड़ी काण्ड में हुई।

3 · आन्दोलन का उग्र रूप एवं शासक की कूटनीति (मई 1930)

  • प्रथम हिंसक टकराव: आन्दोलन के दौरान ग्रामीणों ने SDM सुरेन्द्र दत्त को घेर लिया। बचाव में DFO पदमदत्त रतूड़ी ने गोली चला दी, जिससे 3 ग्रामीण मारे गए
  • धोखे से गिरफ्तारी: मई 1930 में राजा नरेन्द्र शाह ने वार्ता के बहाने आन्दोलनकारी नेताओं को बुलाया और उन्हें धोखे से गिरफ्तार कर लिया।
  • राजा का यूरोप प्रवास: आन्दोलन जब अपने चरम पर था, तब महाराजा नरेन्द्र शाह स्वास्थ्य कारणों (इलाज) से यूरोप चले गए।

4 · तिलाड़ी काण्ड: भीषण नरसंहार (30 मई 1930)

  • नेताओं की गिरफ्तारी और वन अधिकारों के हनन के विरोध में रवाँई की जनता ने एक विशाल महापंचायत बुलाई।
  • स्थान: यमुना नदी के तट पर स्थित तिलाड़ी मैदान
  • नरसंहार: राजा नरेन्द्र शाह की अनुपस्थिति का फायदा उठाते हुए, टिहरी रियासत के दीवान (प्रधानमंत्री) चक्रधर जुयाल ने तिलाड़ी मैदान को चारों ओर से घेरकर निहत्थी भीड़ पर अंधाधुंध गोलियाँ चलवा दीं।
  • हताहत: 200 से अधिक ग्रामीण शहीद हुए और 100 से अधिक घायल हुए। कई लोगों ने यमुना नदी में कूदकर अपनी जान बचाई।
  • स्मृति: हर 30 मई को 'तिलाड़ी शहीद दिवस' मनाया जाता है।

'यमुना के बागी बेटे' — ऐतिहासिक उपन्यास

  • लेखक (Author): विद्यासागर नौटियाल। (इन्हें 'उत्तराखंड का प्रेमचंद' भी कहा जाता है)।
  • प्रकाशन: यह उपन्यास 2012 के आसपास प्रकाशित हुआ था।
  • मुख्य विषय (Central Theme): यह उपन्यास पूरी तरह से टिहरी रियासत के रवाँई आन्दोलन और ऐतिहासिक तिलाड़ी काण्ड (30 मई 1930) की पृष्ठभूमि पर आधारित है।
🌳 5 · चिपको आन्दोलन (1973)
प्रारम्भ: अप्रैल 1973, मण्डल गाँव, चमोली प्रसिद्ध घटना: 26 मार्च 1974, रैणी गाँव पुरस्कार 1987: Right Livelihood Award प्रेरणा: खेजड़ली/विश्नोई आन्दोलन (1730, राजस्थान)

पृष्ठभूमि एवं तात्कालिक कारण

  • संस्थागत शुरुआत (1964): चण्डी प्रसाद भट्ट ने गोपेश्वर में 'दशोली ग्राम स्वराज्य मण्डल' (DGSM) की स्थापना की — आन्दोलन की वैचारिक व व्यावहारिक नींव।
  • प्रकृति की चेतावनी: 1970 की अलकनन्दा बाढ़ (400 वर्गमील क्षेत्र जलमग्न) ने वन-कटान व बाढ़/भूस्खलन का सीधा संबंध उजागर किया।
  • तात्कालिक कारण (अंगू वृक्ष विवाद): DGSM ने कृषि उपकरण (हल-जूआ) हेतु 'अंगू (Ash)' पेड़ों की माँग की — अस्वीकृत। इसके विपरीत इलाहाबाद की 'साइमण्ड' कम्पनी (खेल सामग्री निर्माता) को 300 अंगू पेड़ काटने का ठेका दे दिया गया।

प्रमुख नेतृत्वकर्ता

चण्डी प्रसाद भट्ट
मुख्य रणनीतिकार
  • 1973 में मण्डल घाटी के ग्रामीणों को 'पेड़ों से चिपकने' का मूल विचार व अहिंसक रणनीति दी।
  • सम्मान: 1982 रेमन मैग्सेसे पुरस्कार (एशिया का नोबेल — उत्तराखण्ड से प्रथम)।
  • 1986 पद्मश्री · 2005 पद्म भूषण · 2013 गाँधी शांति पुरस्कार।
गौरा देवी
रैणी गाँव की 'महिला मंगल दल' अध्यक्षा — 'चिपको वुमन'
  • 25 मार्च 1974 मार्च को गाँव के पुरुषों को मुआवजे के बहाने चमोली बुला लिया गया।
  • 26 मार्च 1974 को ठेकेदार जंगल काटने पहुँचे तो गौरा देवी ने 27 महिलाओं को एकत्रित किया।
  • इन महिलाओं ने 2451 पेड़ों को अपनी बाहों में घेरकर कटने से बचा लिया।
साहसिक कथन: "यह जंगल हमारा मायका है, पहले हमें गोली मारो, फिर कुल्हाड़ी चलाओ।"
सुन्दरलाल बहुगुणा
वैश्विक प्रचारक
  • आन्दोलन को राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय (UNO आदि) मंचों तक पहुँचाया।
  • 1981 में घोषित पद्मश्री ठुकराई; 2009 में पद्म विभूषण स्वीकारा।
  • 1981–83: कश्मीर से कोहिमा तक 5,000 किमी लंबी 'ट्रांस-हिमालयन पदयात्रा' की।
पद्मश्री ठुकराते हुए कथन: "जब तक पेड़ कट रहे हैं, मैं सम्मान के योग्य नहीं हूँ।"

अन्य विशिष्ट चेहरे

  • कॉमरेड गोविन्द सिंह रावत (CPI नेता) — रैणी गाँव में पुरुषों की अनुपस्थिति में गौरा देवी का रणनीतिक साथ दिया; जोशीमठ–मलारी मार्ग जाम किया।
  • धूम सिंह नेगी — अडवाणी वन (हेंवलघाटी) में वनों को बचाने हेतु आमरण अनशन किया।
  • बचनी देवी — 1977 - अडवाणी वन क्षेत्र में पेड़ों का ठेका लेने वाले अपने ही ग्राम प्रधान पति के विरुद्ध विद्रोह; महिलाओं संग पेड़ों पर रक्षासूत्र बाँधे।

प्रमुख घटनाएँ — कालक्रम

अप्रैल 1973
मण्डल गाँव, चमोली — DGSM ने साइमण्ड का ठेका रद्द करवाया; पहला चिपको प्रतिरोध।
26 मार्च 1974
रैणी गाँव — गौरा देवी + 27 महिलाओं ने 2451 पेड़ों को बचाया (सर्वप्रसिद्ध घटना)।
1975
फाटा (रुद्रप्रयाग) — महिलाओं ने रात की ठण्ड में जंगलों में पहरा देकर वनों की रक्षा की।
1977
अडवाणी वन (टिहरी) — बचनी देवी का विद्रोह (पति के विरुद्ध); महिलाओं ने रक्षासूत्र बाँधे।
1977
टिहरी क्षेत्र — बहुगुणा ने 'हिमालय बचाओ यात्रा' प्रारम्भ की।
1978
पुलना गाँव (भ्यूंडार) — महिलाओं ने वन माफिया व ठेकेदारों के औजार जब्त किए।
1980
बहुगुणा — इन्दिरा गाँधी से मुलाकात; 15 वर्षीय हरे वृक्ष कटान पर प्रतिबन्ध।
1981–83
बहुगुणा की 5,000 किमी ट्रांस-हिमालयन पदयात्रा (कश्मीर से कोहिमा)।

नारे एवं साहित्य

  • प्रारम्भिक नारा (1973): "हिम पुत्रियों की ललकार, वन नीति बदले सरकार।"
  • सर्वप्रसिद्ध नारा (1977, हेंवलघाटी): "क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार — मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार।"
  • बहुगुणा जी का वैश्विक नारा: "पारिस्थितिकी ही स्थायी अर्थव्यवस्था है।" (Ecology is permanent economy)
  • जनकवि घनश्याम रतूड़ी 'शैलानी': गीतों से आन्दोलन में प्राण फूंके — "गले लगाओ इन पेड़ों को, इन्हें न कटने देना" व "आज हिमालय जागेगा, क्रूर कुल्हाड़ा भागेगा।"
  • ऐतिहासिक संदर्भ पुस्तक: 'The Unquiet Woods' — लेखक रामचन्द्र गुहा; चिपको व उत्तराखण्ड वन आन्दोलनों का सर्वाधिक प्रामाणिक दस्तावेज़।

जाँच समिति, परिणाम एवं वैश्विक प्रभाव

  • वीरेन्द्र कुमार समिति: रैणी गाँव की घटना के बाद तत्कालीन CM हेमवती नन्दन बहुगुणा ने वनस्पति विज्ञानी डॉ. वीरेन्द्र कुमार की अध्यक्षता में जाँच समिति बनाई — इसी रिपोर्ट पर अलकनन्दा घाटी में वन कटान पर रोक लगी।
  • 15 वर्षीय प्रतिबन्ध (1980): PM इन्दिरा गाँधी ने हिमालयी क्षेत्र में हरे वृक्षों की व्यावसायिक कटाई पर 15 वर्षों का पूर्ण प्रतिबन्ध लगाया।
  • अप्पिको आन्दोलन (1983): कर्नाटक में पाण्डुरंग हेगड़े के नेतृत्व में चला यह आन्दोलन चिपको से ही प्रेरित था।
  • वृक्ष मित्र पुरस्कार (1986): रैणी गाँव की 30 'महिला मंगल दल' सदस्याओं को इन्दिरा प्रियदर्शिनी वृक्ष मित्र पुरस्कार मिला।
  • अल्टरनेटिव नोबेल (1987): चिपको आन्दोलन को Right Livelihood Award ('Alternative Nobel Prize') से सम्मानित किया गया।
  • राष्ट्रीय वन नीति (1988): इसके निर्माण पर चिपको आन्दोलन का स्पष्ट प्रभाव पड़ा।
  • वैश्विक मंच (1992): रियो डि जेनेरियो के 'पृथ्वी सम्मेलन' (Earth Summit) में चिपको की आधिकारिक वैश्विक सराहना हुई।
एग्जाम ट्रैप: दो अलग संख्याएँ न मिलाएँ — साइमण्ड कम्पनी को ठेका 300 अंगू पेड़ों का मिला था (मण्डल गाँव, 1973), जबकि रैणी गाँव (1974) में गौरा देवी की टीम ने 2451 पेड़ों को बचाया।
🌿 6 · पर्वतीय वन संघर्ष समिति (1974)
गठन: 4 सितम्बर 1974, अल्मोड़ा अध्यक्ष: गोबिन्द सिंह
  • इस समिति का गठन 4 सितम्बर 1974 को अल्मोड़ा में हुआ।
  • प्रमुख आन्दोलन: 1977 में समिति द्वारा वनों की नीलामी के विरोध में नैनीताल के शैलेहॉल को फूंक दिया गया — यह इस समिति का सबसे बड़ा आन्दोलन था।
🌿 7 · खीराकोट वन आन्दोलन (1978)
नेतृत्व: मालती देवी | राधा भट्ट (लक्ष्मी आश्रम) स्थान: खीराकोट गाँव, अल्मोड़ा-कौसानी के बीच विरोध: कटियार मिनरल्स कम्पनी, कानपुर — खड़िया खनन
  • अल्मोड़ा व कौसानी के बीच खीराकोट गाँव की महिलाओं ने देखा कि खड़िया खनन के कारण खेत लगातार कम हो रहे हैं।
  • 1981: मूसलाधार बारिश में खड़िया युक्त पानी खेतों में बहकर आया — खेत बर्फ की तरह सफेद हो गये।
  • मालती देवी के नेतृत्व में महिलाएं एकजुट हुईं; राधा भट्ट व चण्डी प्रसाद भट्ट ने भी साथ दिया।
  • खनन बन्द कराने में सफल रहीं — ग्रामीणों की भूमि व आजीविका की रक्षा हुई।
📌 राधा भट्ट — सम्पूर्ण जीवन व परीक्षा तथ्य
प्रारंभिक जीवन एवं आश्रम
  • जन्म: 16 अक्टूबर 1931, धुर्का गाँव (अल्मोड़ा)
  • लक्ष्मी आश्रम: 1951 में सरला बहन के सम्पर्क में आईं; कौसानी आश्रम की दीर्घकालीन संचालिका/अध्यक्षा
अन्य आन्दोलनों में भूमिका
  • भूदान आन्दोलन (1957): विनोबा भावे संग पदयात्राओं में सक्रिय
  • शराबबंदी आन्दोलन (1960s): कुमाऊं में महिलाओं को संगठित किया
  • चिपको आन्दोलन (1970s): वन रक्षा हेतु जमीनी कार्य
  • नदी बचाओ आन्दोलन (2008): नदियों व नौलों की रक्षा हेतु नेतृत्व
  • टिहरी बाँध विरोध: बड़े बाँधों व अनियंत्रित खनन के विरुद्ध मुखर आवाज़
संस्थागत योगदान
  • गांधी शांति प्रतिष्ठान: प्रथम महिला अध्यक्षा (नई दिल्ली)
  • बाल शिक्षा: 25 बाल मंदिरों की स्थापना
पुरस्कार एवं सम्मान
  • पद्मश्री: वर्ष 2025 में सम्मानित
  • जमनालाल बजाज पुरस्कार: वर्ष 1991
  • अन्य पुरस्कार: इंदिरा प्रियदर्शनी पर्यावरण पुरस्कार, स्वामी राम मानवता पुरस्कार (2024), कुमाऊं गौरव पुरस्कार
🌿 8 · डुंगी-पैंतोली आन्दोलन (1980)
नेतृत्व: मथुरा देवी क्षेत्र: डुंगी व पैंतोली गाँव, चमोली
  • कारण: बाँज वनों को उद्यान विभाग को हस्तान्तरित करना — ग्रामीणों के अधिकार खतरे में आ गये।
  • मथुरा देवी के नेतृत्व में गाँव की महिलाओं ने सामूहिक विरोध किया।
  • महिलाओं ने वन में प्रवेश कर कटान रोका — सरकार को निर्णय वापस लेना पड़ा।
  • यह चिपको का ही कुमाऊँ-गढ़वाल क्षेत्र में विस्तार था।
🌿 9 · पाणी राखो आन्दोलन (1980 का दशक)
सूत्रधार: सच्चदानन्द भारती (शिक्षक) क्षेत्र: उपरेखाल गाँव, पौड़ी गढ़वाल संस्था: DLVS (1982)
  • वन कटान से उपरेखाल के जलस्रोत सूखे; जुलाई 1980 में प्रथम पर्यावरण शिविर आयोजित हुआ।
  • 1982 में दूधातोली लोक विकास संस्थान (DLVS) की स्थापना हुई।
  • परम्परागत 'चाल-खाल' जल संचय संरचनाओं का निर्माण किया गया।
  • 1993–98: 136 गाँवों में 12,000+ चाल-खाल बनाए गए।
  • सूखी नदी 'सुखराउला' 2001 तक पुनर्जीवित हुई; 150 गाँवों की महिलाएं सक्रिय रहीं।
करेंट अफेयर्स: PM नरेन्द्र मोदी ने 'मन की बात' (27 जून 2021) में सच्चदानन्द भारती के कार्यों की प्रशंसा की।
🌿 10 · बीज बचाओ आन्दोलन (1986–89)
संस्थापक: विजय जड़धारी (किसान-कार्यकर्ता) क्षेत्र: जधार गाँव, टिहरी गढ़वाल पुरस्कार: इन्दिरा गाँधी पर्यावरण पुरस्कार (2009)
  • हरित क्रान्ति के बाद परम्परागत बीजों का ह्रास हुआ; गढ़वाल में धान की प्रजातियाँ 3000 से घटकर 320 रह गईं।
  • 'बारनाजा' (12 अनाजों की साथ बुआई) पद्धति का पुनर्जीवन किया गया।
  • बारनाजा = धान, मडुवा, ज्वार, सोयाबीन, तिल, राजमा आदि 12 अनाज एक साथ बोना।
  • 700+ परम्परागत बीजों का संरक्षण किया गया; 2002 में अरुन्धती राय ने आन्दोलन को 1.5 लाख रु. दान दिए।
🌿 11 · रक्षासूत्र आन्दोलन (1994)
प्रवर्तक: सुरेश भाई क्षेत्र:टिहरी, भिलंगना घाटी, खव्वाड़ा गाँव
  • मिलंगना घाटी में वृक्षों पर पवित्र 'रक्षासूत्र' बाँधकर रक्षा का संकल्प लिया गया।
  • रक्षाबन्धन की परम्परा से प्रेरित — पेड़ को भाई मानकर सुरक्षा का वचन।
  • यह चिपको का अगला चरण था — वन संरक्षण को सांस्कृतिक-धार्मिक आधार दिया गया।
"ऊँचाई पर पेड़ रहेंगे, नदी ग्लेशियर टिके रहेंगे, पेड़ कटेंगे पहाड़ टूटेंगे, जंगल बचेगा देश बचेगा"
🌿 12 · मैती आन्दोलन (1994–95)
संस्थापक: कल्याण सिंह रावत ('वृक्ष मानव') क्षेत्र: ग्वालदम, चमोली
  • 'मैती' का अर्थ गढ़वाली में 'माँ का घर' = मायका।
  • विवाह के समय वर-वधू द्वारा एक 'मैती वृक्ष' लगाने की परम्परा शुरू की गई।
  • 'मैती दीदियाँ' — गाँव की अविवाही युवतियाँ जो उस वृक्ष की देखभाल करती हैं।
  • 18 राज्यों के 6,000+ गाँवों में विस्तार; USA, UK, कनाडा, नेपाल, इण्डोनेशिया में भी अपनाया गया।
  • UNEP ने प्रशंसा की; कल्याण सिंह रावत को 'वृक्ष मानव' की उपाधि दी गई।
📌 कल्याण सिंह रावत — प्रारंभिक जीवन व परीक्षा तथ्य
प्रारंभिक जीवन एवं पृष्ठभूमि
  • जन्म: 19 अक्टूबर 1953, बैनोली गाँव, कर्णप्रयाग (चमोली)
  • पिता: परिमल सिंह रावत
  • पेशा: राजकीय विद्यालय में जीव विज्ञान शिक्षक; छात्राओं के प्रकृति प्रेम से प्रेरित होकर मैती आन्दोलन की रूपरेखा तैयार की
संस्थागत एवं अन्य योगदान
  • हिमालय वन्य जीव संस्थान: मैती आन्दोलन से पूर्व, वर्ष 1974 में स्थापना
  • पुरातात्विक खोज: कर्णप्रयाग के समीप चांदपुर डूंगरी में आदिमानव कालीन सलेटी चित्रों वाली प्राचीन गुफा की खोज
प्रमुख सम्मान
  • पद्मश्री: वर्ष 2020 में पर्यावरण संरक्षण हेतु सम्मानित
  • विशेष उपाधि: पर्यावरण के प्रति समर्पण हेतु 'वृक्ष मानव' की उपाधि
🌿 13 · झपटो-छीनो आन्दोलन (1998)
प्रारम्भ: 21 जून 1998 प्रेरणा: गोविन्द सिंह रावत (कामरेड) क्षेत्र: रैणी व लाता गाँव, चमोली — नन्दा देवी राष्ट्रीय उद्यान
  • 1982 में नन्दा देवी राष्ट्रीय उद्यान घोषित होने से ग्रामीणों के परम्परागत अधिकार समाप्त हो गये थे।
  • 21 जून 1998: लाता-रैणी में धरना; नन्दा देवी उद्यान का प्रबन्धन ग्रामीणों को सौंपने की माँग रखी गई।
  • 15 जुलाई: ग्रामीण पशुओं सहित राष्ट्रीय उद्यान में प्रवेश कर गए।
  • 2006 के वन अधिकार अधिनियम की पृष्ठभूमि इसी आन्दोलन से बनी।
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🌍 उत्तराखंड के प्रमुख पर्यावरणविद्

🌱 1 · डॉ. अनिल प्रकाश जोशी
जन्म: 6 अप्रैल 1955, कोटद्वार (पौड़ी गढ़वाल) पेशा: वनस्पति विज्ञान के पूर्व प्राध्यापक, पर्यावरणविद् व ग्रामीण अर्थशास्त्री संस्था: HESCO (1983)
संस्थागत स्थापना
  • HESCO — हिमालय पर्यावरण अध्ययन और संरक्षण संगठन; स्थापना वर्ष 1983, देहरादून के शुक्लापुर गाँव में।
  • उद्देश्य: स्थानीय संसाधनों के वैज्ञानिक उपयोग से पर्वतीय ग्रामीण आर्थिकी को मजबूत व आत्मनिर्भर बनाना।
प्रमुख अवधारणाएं एवं कार्य
  • सकल पर्यावरण उत्पाद (GEP): इनकी सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा — GDP के साथ पर्यावरण संरक्षण व नुकसान मापने का पैमाना; इन्हीं के प्रयासों से उत्तराखण्ड GEP लागू करने वाला देश का पहला राज्य बना (लागू तिथि: 19 जुलाई 2024)।
  • वृत्तचित्र (Documentary): इनके जीवन पर आधारित 'A Son of Himalaya' नामक वृत्तचित्र बनाई गई है।
  • घराट पुनरुद्धार: पारंपरिक जल चक्कियों (घराट) को उन्नत तकनीक से जोड़कर बिजली उत्पादन व आजीविका का साधन बनाया।
  • संसाधनों का सदुपयोग: पिरूल (चीड़ पत्तियाँ) व लैंटाना जैसी झाड़ियों से धूपबत्ती व फर्नीचर निर्माण कर स्वरोजगार से जोड़ा।
  • गाँव बचाओ आन्दोलन: पर्वतीय पलायन रोकने व ग्रामीण अर्थव्यवस्था सुदृढ़ करने हेतु सफल नेतृत्व।
प्रमुख पुरस्कार एवं सम्मान
  • पद्मश्री: वर्ष 2006 में पर्यावरण संरक्षण हेतु सम्मानित
  • पद्म भूषण: वर्ष 2020 में भारत के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान से अलंकृत
  • जमनालाल बजाज पुरस्कार: वर्ष 2006, ग्रामीण विकास में विज्ञान व तकनीक के अनुप्रयोग हेतु
🌱 2 · सुंदरलाल बहुगुणा
जन्म: 9 जनवरी 1927, मरोड़ा गाँव (टिहरी गढ़वाल) उपनाम: वृक्षमित्र · हिमालय के रक्षक निधन: 21 मई 2021, एम्स ऋषिकेश
प्रारंभिक जीवन एवं परिचय
  • जन्म: 9 जनवरी 1927 को टिहरी गढ़वाल जिले के मरोड़ा गाँव में।
  • संस्था: पत्नी विमला बहुगुणा के साथ मिलकर पर्वतीय नवजीवन मण्डल की स्थापना की।
  • उपनाम: वृक्षमित्र व हिमालय के रक्षक के रूप में जाने जाते हैं।
  • निधन: 21 मई 2021 को एम्स ऋषिकेश में।
प्रमुख आन्दोलन एवं कार्य
  • चिपको आन्दोलन: 1970 के दशक में वनों की कटाई रोकने हेतु गौरा देवी व चण्डी प्रसाद भट्ट के साथ नेतृत्व किया।
  • प्रसिद्ध नारा: चिपको आन्दोलन के दौरान इन्होंने ऐतिहासिक नारा दिया — "पारिस्थितिकी स्थायी अर्थव्यवस्था है।"
  • टिहरी बाँध विरोध: भागीरथी नदी पर बन रहे टिहरी बाँध का मुखर विरोध किया; प्रमुख अनशन:
    • 1989: बाँध निर्माण के विरोध में 74 दिनों का उपवास
    • 1995: पुनः 45 दिनों का अनशन
    • 2001: पुनः 74 दिनों तक अनशन
  • हिमालयी पदयात्रा: 1981–1983 के मध्य हिमालयी पारिस्थितिकी समझने व वनों की रक्षा हेतु कश्मीर से कोहिमा तक लगभग 4800 किमी लंबी ऐतिहासिक पदयात्रा की।
  • सामाजिक सुधार: टिहरी में दलितों के मंदिर प्रवेश व छुआछूत के विरुद्ध भी सफलतापूर्वक कार्य किया।
प्रमुख पुरस्कार एवं सम्मान
  • पद्मश्री: वर्ष 1981 में प्रदान किया गया, परन्तु हिमालय में पेड़ों की कटाई के विरोध में सम्मान लेने से इनकार किया।
  • जमनालाल बजाज पुरस्कार: रचनात्मक सामाजिक कार्यों हेतु वर्ष 1986 में प्रदान।
  • राइट लाइवलीहुड पुरस्कार: वर्ष 1987 में चिपको आन्दोलन हेतु सम्मानित; इसे 'वैकल्पिक नोबेल' भी कहा जाता है।
  • पद्म विभूषण: वर्ष 2009 में भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान से अलंकृत।
🌱 3 · चण्डी प्रसाद भट्ट
जन्म: 23 जून 1934, गोपेश्वर (चमोली) पहचान: गांधीवादी पर्यावरणविद् व सामाजिक कार्यकर्ता संस्था: दशोली ग्राम स्वराज्य मण्डल (1964)
प्रारंभिक जीवन एवं पृष्ठभूमि
  • जन्म: 23 जून 1934 को चमोली जिले के गोपेश्वर में हुआ।
  • पहचान: देश के प्रख्यात गांधीवादी पर्यावरणविद् व सामाजिक कार्यकर्ता, जिन्होंने जीवन वनों की रक्षा व ग्रामीण विकास में लगाया।
संस्थागत स्थापना
  • दशोली ग्राम स्वराज्य मण्डल: वर्ष 1964 में गोपेश्वर में स्थापना की।
  • उद्देश्य: स्थानीय लोगों को रोजगार देने व वनों पर आधारित कुटीर उद्योग लगाने हेतु स्थापना।
  • विशेष तथ्य: यही संस्था ऐतिहासिक चिपको आन्दोलन की मातृ संस्था मानी जाती है।
प्रमुख आन्दोलन एवं कार्य
  • शराब बंदी आन्दोलन: वर्ष 1965 में गोपेश्वर व चमोली क्षेत्र में महिलाओं को साथ लेकर शराब के ठेकों के विरुद्ध सफल जन आन्दोलन शुरू किया।
  • चिपको आन्दोलन: 24 अप्रैल 1973 को चमोली के मण्डल गाँव से विधिवत शुरुआत; पेड़ों से चिपकने का अहिंसक विचार इन्हीं की रणनीति का हिस्सा था।
  • महिला मंगल दल: गाँव-गाँव में महिला मंगल दलों का गठन कर महिलाओं को वन सुरक्षा व अधिकारों हेतु सशक्त किया।
  • पारिस्थितिकी विकास शिविर: चिपको की सफलता के पश्चात, वर्ष 1982 से बंजर भूमि पर वृक्षारोपण हेतु शिविरों का नियमित आयोजन शुरू किया; चौड़ी पत्ती वाले वृक्षों के रोपण पर सर्वाधिक जोर।
प्रमुख पुरस्कार एवं सम्मान (तिथियों सहित)
  • 1982: रेमन मैग्सेसे पुरस्कार — सामुदायिक नेतृत्व हेतु यह अंतरराष्ट्रीय सम्मान पाने वाले उत्तराखण्ड के प्रथम व्यक्ति।
  • 1986: पर्यावरण संरक्षण में उत्कृष्ट कार्यों हेतु पद्मश्री सम्मान।
  • 1987: संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम द्वारा ग्लोबल 500 रोल ऑफ ऑनर सम्मान।
  • 2005: देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से अलंकृत।
  • 2013: अहिंसा व गांधीवादी तरीकों से पर्यावरण सेवा हेतु गांधी शांति पुरस्कार।
  • 2014: राष्ट्रीय एकता व सद्भावना हेतु इंदिरा गांधी राष्ट्रीय एकता पुरस्कार।
प्रमुख रचनाएँ (पुस्तकें)
  • पर्यावरण व हिमालयी सरोकारों पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं, जिनमें 'पर्वत पर्वत बस्ती बस्ती''हिमालय की पुकार' प्रमुख हैं।
🌱 4 · विश्वेश्वर दत्त सकलानी
उपनाम: वृक्ष मानव (Tree Man of Uttarakhand) क्षेत्र: सकलाना घाटी, टिहरी गढ़वाल निधन: जनवरी 2019 (96 वर्ष)
  • उपनाम: पर्यावरण के प्रति समर्पण के कारण इन्हें उत्तराखण्ड का वृक्ष मानव कहा जाता है।
  • प्रमुख कार्य: सकलाना घाटी के आसपास की बंजर भूमि पर लाखों पेड़ लगाकर नागेन्द्र वन नामक विशाल जंगल तैयार किया।
  • प्रमुख सम्मान: 19 नवम्बर 1986 को भारत सरकार द्वारा इन्हें इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्ष मित्र पुरस्कार प्रदान किया गया।
  • निधन: जनवरी 2019 में 96 वर्ष की आयु में निधन हुआ।
🌱 5 · बसंती देवी
जन्म: 1958, उत्तराखण्ड संस्था: लक्ष्मी आश्रम, कौसानी कार्यक्षेत्र: कोसी नदी घाटी
  • प्रारंभिक जीवन: जन्म 1958 में उत्तराखण्ड में हुआ; कौसानी स्थित गांधीवादी संस्था लक्ष्मी आश्रम से जुड़ी रहीं।
  • प्रमुख कार्य: कोसी नदी को सूखने से बचाने व जंगलों के संरक्षण हेतु स्थानीय महिलाओं को संगठित किया; प्रयासों से वन कटाई रुकी व कोसी घाटी के जलस्रोत पुनर्जीवित हुए।
  • नारी शक्ति पुरस्कार: महिला सशक्तिकरण व पर्यावरण संरक्षण हेतु वर्ष 2016 में भारत के सर्वोच्च महिला सम्मान से नवाजा गया।
  • पद्मश्री: पर्यावरण संरक्षण व सामाजिक कार्य में योगदान हेतु वर्ष 2022 में सम्मानित।
🌱 6 · राधा भट्ट
जन्म: 16 अक्टूबर 1931, धुर्का गाँव (अल्मोड़ा) संस्था: लक्ष्मी आश्रम, कौसानी सम्बद्ध आन्दोलन: खीराकोट वन आन्दोलन
प्रारंभिक जीवन एवं आश्रम
  • जन्म: 16 अक्टूबर 1931 को धुर्का गाँव, अल्मोड़ा में हुआ।
  • लक्ष्मी आश्रम: वर्ष 1951 में सरला बहन के सम्पर्क में आईं; कौसानी स्थित लक्ष्मी आश्रम की दीर्घकालीन संचालिका/अध्यक्षा रहीं।
अन्य आन्दोलनों में भूमिका
  • खीराकोट वन आन्दोलन (1978): मालती देवी के साथ नेतृत्व; खड़िया खनन (कटियार मिनरल्स कम्पनी, कानपुर) से खेत बर्बाद होने के विरुद्ध खीराकोट गाँव (अल्मोड़ा-कौसानी) में महिलाओं को एकजुट कर खनन बन्द कराया।
  • भूदान आन्दोलन (1957): विनोबा भावे संग पदयात्राओं में सक्रिय भागीदारी।
  • शराबबंदी आन्दोलन (1960s): कुमाऊं क्षेत्र में महिलाओं को संगठित कर नशामुक्ति अभियान चलाया।
  • चिपको आन्दोलन (1970s): वनों की रक्षा हेतु जमीनी स्तर पर कार्य किया।
  • नदी बचाओ आन्दोलन (2008): उत्तराखण्ड की नदियों व पारंपरिक जलस्रोतों (नौलों) की रक्षा हेतु नेतृत्व किया।
  • टिहरी बाँध विरोध: बड़े बाँधों व अनियंत्रित खनन के विरुद्ध मुखर आवाज़ उठाई।
संस्थागत योगदान
  • गांधी शांति प्रतिष्ठान: नई दिल्ली स्थित इस प्रतिष्ठित संस्थान की प्रथम महिला अध्यक्षा बनने का गौरव प्राप्त हुआ।
  • बाल शिक्षा: ग्रामीण क्षेत्रों में बाल शिक्षा हेतु 25 बाल मंदिरों की स्थापना की।
प्रमुख पुरस्कार एवं सम्मान
  • पद्मश्री: समाज सेवा में उत्कृष्ट योगदान हेतु वर्ष 2025 में सम्मानित।
  • जमनालाल बजाज पुरस्कार: गांधीवादी मूल्यों के प्रसार हेतु वर्ष 1991 में प्राप्त हुआ।
  • अन्य पुरस्कार: इंदिरा प्रियदर्शनी पर्यावरण पुरस्कार, स्वामी राम मानवता पुरस्कार (2024), व कुमाऊं गौरव पुरस्कार।
🌱 7 · कल्याण सिंह रावत
जन्म: 19 अक्टूबर 1953, बैनोली गाँव, कर्णप्रयाग (चमोली) उपनाम: वृक्ष मानव सम्बद्ध आन्दोलन: मैती आन्दोलन
प्रारंभिक जीवन एवं पृष्ठभूमि
  • जन्म: 19 अक्टूबर 1953 को चमोली जिले के कर्णप्रयाग स्थित बैनोली गाँव में।
  • पिता: परिमल सिंह रावत।
  • पेशा: राजकीय विद्यालय में जीव विज्ञान के शिक्षक रहे; छात्राओं के प्रकृति प्रेम से प्रेरित होकर मैती आन्दोलन की रूपरेखा तैयार की।
मैती आन्दोलन में भूमिका (1994–95)
  • संस्थापक: ग्वालदम, चमोली में मैती आन्दोलन की स्थापना व नेतृत्व किया।
  • 'मैती' का अर्थ गढ़वाली में 'माँ का घर' = मायका; विवाह के समय वर-वधू द्वारा 'मैती वृक्ष' लगाने की परम्परा शुरू की।
  • 'मैती दीदियाँ' — गाँव की अविवाही युवतियाँ जो उस वृक्ष की देखभाल करती हैं।
  • 18 राज्यों के 6,000+ गाँवों में विस्तार; USA, UK, कनाडा, नेपाल, इण्डोनेशिया में भी अपनाया गया; UNEP ने प्रशंसा की।
संस्थागत एवं अन्य योगदान
  • हिमालय वन्य जीव संस्थान: मैती आन्दोलन से पूर्व, पर्यावरण व वन्यजीवों के संरक्षण हेतु वर्ष 1974 में स्थापना की।
  • पुरातात्विक खोज: कर्णप्रयाग के समीप चांदपुर डूंगरी में एक विशाल प्राचीन गुफा की खोज की, जिसमें सलेटी रंग के आदिमानव कालीन चित्र उकेरे गए हैं।
प्रमुख सम्मान
  • पद्मश्री: पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अद्वितीय कार्य हेतु भारत सरकार द्वारा वर्ष 2020 में सम्मानित।
  • विशेष उपाधि: पर्यावरण के प्रति समर्पण के कारण इन्हें 'वृक्ष मानव' की उपाधि दी गई।
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