उत्तराखंड वन एवं वन्यजीव नोट्स
करेंट अफेयर्स 2020–2025
18वीं वन रिपोर्ट (ISFR 2023) के सम्पूर्ण आंकड़े, जिलेवार वनावरण विश्लेषण तथा वन्यजीव एवं संरक्षण संबंधी करेंट अफेयर्स (2020–2025) — परीक्षा-दृष्टि से वर्गीकृत।
🌳 उत्तराखंड — 18वीं वन रिपोर्ट (ISFR 2023)
वृक्षावरण में परिवर्तन
- +230 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि।
वनावरण में परिवर्तन — विशेष ध्यान दें
- आधिकारिक व वास्तविक कमी: −22.95 वर्ग किमी।
- सामान्य तुलनात्मक कमी: −1.3 वर्ग किमी।
सर्वाधिक वनावरण — क्षेत्रफल के आधार पर
- 1. पौड़ी गढ़वाल
- 2. उत्तरकाशी
- 3. नैनीताल
सर्वाधिक वनावरण — प्रतिशत के आधार पर
- 1. चंपावत — 69.06%
- 2. नैनीताल — 67.43%
- 3. पौड़ी गढ़वाल — 63.07%
सबसे कम वनावरण — क्षेत्रफल के आधार पर
- 1. ऊधम सिंह नगर (अंतिम)
- 2. हरिद्वार
- 3. रुद्रप्रयाग
सबसे कम वनावरण — प्रतिशत के आधार पर
- 1. ऊधम सिंह नगर
- 2. हरिद्वार
- 3. पिथौरागढ़
📈 सर्वाधिक 'वृद्धि' वाले जिले
- टिहरी गढ़वाल — सर्वाधिक वृद्धि, ≈158 वर्ग किमी 1st
- ऊधम सिंह नगर 2nd
- टिहरी गढ़वाल — 8.87 वर्ग किमी 1st
- देहरादून — 4.67 वर्ग किमी 2nd
- अल्मोड़ा — 4.09 वर्ग किमी 3rd
📉 सर्वाधिक 'कमी' वाले जिले
- नैनीताल — सर्वाधिक कमी 1st
- चमोली 2nd
- ऊधम सिंह नगर — सर्वाधिक कमी 1st
- उत्तरकाशी 2nd
- चमोली 3rd
श्रेणी 1 · अत्यधिक सघन वन (VDF)
- नैनीताल 1st
- देहरादून 2nd
श्रेणी 2 · मध्यम सघन वन (MDF)
- पौड़ी गढ़वाल 1st
- उत्तरकाशी 2nd
श्रेणी 3 · खुले वन (OF)
- पौड़ी गढ़वाल 1st
- टिहरी गढ़वाल 2nd
श्रेणी 4 · झाड़ियाँ (Scrub)
- टिहरी गढ़वाल 1st
- पौड़ी गढ़वाल 2nd
मंडलवार वनावरण का योगदान
- गढ़वाल मंडल — 59.86%
- कुमाऊं मंडल — 40.14%
📰 करेंट अफेयर्स — वन एवं वन्यजीव
स्थिति एवं निर्माण
- स्थान: देहरादून; यमुना व आसन नदी के संगम पर।
- आसन बैराज निर्माण: वर्ष 1967।
संरक्षण इतिहास व रामसर दर्जा
- कंजर्वेशन रिज़र्व घोषित: 2005 (देश का पहला)।
- रामसर स्थल घोषित: 21 जुलाई 2020।
- उत्तराखंड का पहला व भारत का 38वां रामसर स्थल।
जिम कॉर्बेट टाइगर रिज़र्व
- 1 अप्रैल 1973 — भारत व उत्तराखंड का पहला टाइगर रिज़र्व।
- विस्तार: नैनीताल व पौड़ी गढ़वाल; क्षेत्रफल ≈1288 वर्ग किमी।
- उत्तराखंड में कुल बाघ (2022): 560; कॉर्बेट में: 260 (देश में सर्वाधिक)।
- बाघ-घनत्व में भारत का सबसे घना रिज़र्व; कुल बाघों में उत्तराखंड का तीसरा स्थान (1. मध्य प्रदेश, 2. कर्नाटक)।
- 2012 — चारों ओर 500 मी 'साइलेंट ज़ोन' घोषित।
- 2013 — 'स्पेशल टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स' (STPF) गठित।
राजाजी टाइगर रिज़र्व
- 20 अप्रैल 2015 को अधिसूचित — राज्य का दूसरा टाइगर रिज़र्व।
- विस्तार: हरिद्वार, देहरादून व पौड़ी गढ़वाल (3 जिले)।
नंधौर वन्यजीव अभयारण्य
- स्थापना: 2012; जिले: चंपावत व नैनीताल; क्षेत्रफल ≈270 वर्ग किमी।
बिनोग वन्यजीव अभयारण्य (मसूरी)
- स्थापना: 1993; क्षेत्रफल केवल 11 वर्ग किमी — राज्य का सबसे छोटा अभयारण्य।
- विलुप्तप्राय 'हिमालयन बटेर' (Mountain Quail) का अंतिम संभावित आवास।
नैनीताल
- भारत का पहला मॉस गार्डन — खुरपाताल (उद्घाटन: राजेंद्र सिंह, 'वाटरमैन ऑफ इंडिया')।
- भारत का पहला पॉलिनेटर पार्क — हल्द्वानी।
- देश का सबसे बड़ा सुगंधित उद्यान — लालकुआं।
- उत्तर भारत का पहला इको ब्रिज — कालाढूंगी रेंज।
- भारत का पहला (प्रस्तावित) कार्बन न्यूट्रल चिड़ियाघर — गौलापार, हल्द्वानी (राज्य का सबसे बड़ा चिड़ियाघर भी)।
- हल्द्वानी के पार्क: जैव विविधता पार्क, जुरासिक पार्क, रामायण वाटिका, नक्षत्र वाटिका, भारत वाटिका।
- गिद्ध संरक्षण व प्रजनन केंद्र — हल्द्वानी।
अल्मोड़ा (रानीखेत)
- भारत का पहला वन चिकित्सा केंद्र — कालिका रेंज।
- भारत का पहला घास संरक्षण केंद्र — रानीखेत।
- भारत की सबसे बड़ी ओपन एयर फर्नेरी — रानीखेत।
- भारत का पहला हिमालयन स्पाइस गार्डन — रानीखेत।
पिथौरागढ़ (मुनस्यारी)
- भारत का पहला लाइकेन पार्क — मुनस्यारी (वायु प्रदूषण के जैव संकेतक)।
- भारत का पहला रोडोडेंड्रोन (बुरांस) उद्यान — मुनस्यारी।
- उत्तराखंड का सबसे बड़ा ट्यूलिप गार्डन — पिथौरागढ़।
देहरादून
- भारत का पहला क्रिप्टोगेमिक गार्डन — देवबन (चकराता)।
- उत्तराखंड का पहला सिटी फॉरेस्ट — आनंद वन, झाझरा।
- कैक्टस गार्डन — कुठाल गेट।
चमोली एवं उत्तरकाशी
- उत्तर भारत का पहला ऑर्किड संरक्षण केंद्र — मंडल, चमोली।
- भारत का पहला हिम तेंदुआ संरक्षण केंद्र — भैरोंघाटी (लंका), उत्तरकाशी (नीदरलैंड व UNDP सहयोग)।
GEP इंडेक्स 2024
- घोषणा: अगस्त 2024, देहरादून — मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा।
- विश्व का पहला इंडेक्स जो इकोसिस्टम सर्विस व इकोसिस्टम ग्रोथ दोनों मापता है।
- निर्माता: डॉ. अनिल प्रकाश जोशी (HESCO संस्थापक)।
- 4 स्तंभ: Air GEP, Water GEP, Soil GEP, Forest GEP।
हिम तेंदुआ गणना 2024
- भारत में सर्वाधिक: लद्दाख (477)।
- उत्तराखंड का स्थान: दूसरा (124 हिम तेंदुए)।
बाघ गणना 2022 (दोहराव — महत्वपूर्ण)
- उत्तराखंड में कुल बाघ: 560 (भारत में तीसरा स्थान)।
- कॉर्बेट में बाघ: 260 (देश में सर्वाधिक)।
🗂️ उत्तराखंड वन संपदा: वर्गीकरण के आधार एवं प्रकार
यह विभाजन इस बात पर निर्भर करता है कि राज्य के वन क्षेत्र का प्रशासनिक रखरखाव और नियंत्रण किस विभाग या संस्था के पास है।
यह वर्गीकरण भारतीय वन अधिनियम, 1927 के तहत भूमि की कानूनी स्थिति, सरकारी नियंत्रण और आम जनता के अधिकारों के आधार पर किया जाता है।
आरक्षित वन (Reserved Forest) — सबसे सख्त
- क्षेत्रफल: 26,547 वर्ग किमी
- यहाँ लकड़ी काटना, पशु चराई सहित सभी मानवीय गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध।
- पूर्णतः वन विभाग के अधीन।
संरक्षित वन (Protected Forest)
- क्षेत्रफल: 9,885 वर्ग किमी
- भूमि पर सरकारी नियंत्रण होता है, किंतु स्थानीय निवासियों को नियमों के दायरे में रहकर दैनिक वन उत्पादों के सीमित उपयोग की छूट।
अवर्गीकृत वन (Unclassed Forest)
- क्षेत्रफल: 1,568 वर्ग किमी
- ये वन आरक्षित या संरक्षित की श्रेणी में नहीं आते।
- प्रबंधन: राजस्व विभाग, वन पंचायत या स्थानीय परिषदों द्वारा।
| वन श्रेणी | क्षेत्रफल (वर्ग किमी) | मानवीय गतिविधि | प्रबंधन |
|---|---|---|---|
| आरक्षित वन | 26,547 | पूर्ण प्रतिबंध | वन विभाग |
| संरक्षित वन | 9,885 | सीमित अनुमति | सरकार + सामुदायिक |
| अवर्गीकृत वन | 1,568 | अपेक्षाकृत खुला | राजस्व / वन पंचायत |
| कुल अभिलेखित वन क्षेत्र (Total RFA) | ~38,000 वर्ग किमी ≈ राज्य का 71% | ||
यह डेटा ISFR के Digital Elevation Model (DEM) पर आधारित है — ऊंचाई के अनुसार कुल वन आवरण का प्रतिशत वितरण:
| ऊंचाई ज़ोन | वन क्षेत्र (वर्ग किमी) | % हिस्सा |
|---|---|---|
| 0 – 500 मी. | 2,827.73 | 11.63% |
| 500 – 1000 मी. | 3,937.41 | 16.20% |
| 1000 – 2000 मी. ⭐ | 10,027.08 | 41.26% |
| 2000 – 3000 मी. | 5,738.04 | 23.61% |
| 3000 – 4000 मी. | 1,760.63 | 7.24% |
| > 4000 मी. | 12.94 | 0.05% |
| कुल योग | 24,303.83 | 100% |
🏔️ ऊंचाई के अनुसार वन-क्रम (Quick Recall)
| ऊंचाई | वर्षा | वन प्रकार | वृक्ष / प्रजातियां |
|---|---|---|---|
| < 1,000 मी | 70–100 सेमी | 1. उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन (Tropical Dry Deciduous) |
खैर, शीशम, गूलर, ढाक/पलाश, बेल, अमलतास |
| < 1,000 मी | 100–200 सेमी | 2. उष्णकटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन (Tropical Moist Deciduous) |
साल, सागौन*, सेमल, महुआ, जामुन, शहतूत, आंवला |
| 900 – 1,800 मी | 100–200 सेमी | 3. उपोष्ण कटिबंधीय चीड़ वन (Sub-Tropical Pine Forests) |
चीड़ (मुख्य), बांज ओक व काफल (मिश्रित) |
| 1,800 – 3,000 मी | 150–250 सेमी | 4. हिमालयी नम शीतोष्ण वन (Himalayan Moist Temperate) |
बांज, बुरांश, काफल, मेपल |
| 2,000 – 3,400 मी | 100–250 सेमी | 5. शीतोष्ण कोणधारी वन (Temperate Coniferous Forests) |
देवदार, फर, ब्लू पाइन, बुरांश, स्प्रूस, साइप्रस/सुरई |
| 2,900 – 3,500 मी | कम (हिम रूप) | 6. उप-अल्पाइन वन (Sub-Alpine Forests) |
भोजपत्र, जूनीपर, बौने रोडोडेंड्रोन, विलो |
| 3,500 – 4,500 मी | कम (हिम रूप) | 7. अल्पाइन झाड़ियां / बुग्याल (Alpine Scrub / Meadows) |
अल्पाइन घास, ब्रह्मकमल, कीड़ा जड़ी/यार्सागूंबा, जटामांसी, अतीस, कुटकी |
| 4,500+ मी | नगण्य | 8. 🧊 टुंड्रा तुल्य वनस्पति (Dry Alpine / Tundra-like) |
काई, लाइकेन |
🔑 वनों के प्रकार — परीक्षा के लिए अनिवार्य तथ्य
- उत्तराखंड में कुल 8 प्रकार के वन पाए जाते हैं (ऊंचाई के अनुसार वर्गीकृत)।
- ⚠️ Trap MCQ: उत्तराखंड में उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन (Tropical Evergreen) नहीं पाए जाते।
- सर्वाधिक वृक्ष-आच्छादन = चीड़ (लगभग 28.24% वन क्षेत्र), इसके बाद शिवालिक साल (~12.8%) — FSI डेटा।
- राज्य वृक्ष = बुरांश (Rhododendron arboreum) | राज्य पुष्प = ब्रह्मकमल (Saussurea obvallata) — दोनों अलग-अलग हैं।
- ⚠️ करेक्शन: क्रिकेट बैट विलो (Willow — Salix alba) की लकड़ी से बनता है — शहतूत से नहीं। शहतूत केवल रेशम पालन (पत्तियों) के लिए महत्वपूर्ण है।
- सागौन (Teak) उत्तराखंड का देशज वृक्ष नहीं है — यह मुख्यतः तराई-भाबर में वन विभाग का प्लांटेशन वृक्ष है।
- खैर: तने से 'कत्था' (Catechu) — हल्द्वानी प्रमुख केंद्र।
- शीशम: उच्च गुणवत्ता फर्नीचर व नक्काशी।
- शुष्क/पथरीली भाबर मिट्टी में अपरदन रोकते हैं।
- पत्ते जनवरी–मार्च में झड़ते हैं — घास मैदान जैसे दिखते हैं।
- अत्यधिक सूखे को सहने में सक्षम।
- कत्था उत्पादन का स्रोत = खैर वृक्ष।
- 'कंडी' क्षेत्र में मुख्य वन = शुष्क पर्णपाती।
- 'जंगल की आग' (Flame of the Forest) = ढाक / पलाश।
- सागौन: महंगे फर्नीचर — दीमक-प्रतिरोधी (termite-resistant)।
- शहतूत: पत्तियां रेशम पालन (Sericulture) में उपयोग।
- सघन कैनोपी — जैव विविधता में समृद्ध (राजाजी नेशनल पार्क का कोर क्षेत्र)।
- राज्य के प्रमुख National Parks का मुख्य हिस्सा।
- पत्तियां मार्च–अप्रैल (6–8 सप्ताह) गिरती हैं, मानसून में फिर हरे-भरे।
- 'मानसूनी वन' (Monsoon Forests) = आर्द्र पर्णपाती वन — MCQ में बहुत पूछा जाता है।
- दीमक-प्रतिरोधी मूल्यवान लकड़ी = सागौन (Teak)।
- लीसा (Resin) → तारपीन तेल व अन्य उत्पाद — चीड़ इसका एकमात्र स्रोत।
- इमारती लकड़ी — पैकेजिंग (फलों की पेटियां), दरवाजे-खिड़कियां।
- 'पिरूल' (सूखी पत्तियां) अत्यधिक ज्वलनशील — वनाग्नि का मुख्य कारण।
- मिट्टी को अम्लीय बनाता है — नीचे घास/चारा उगना घट जाता है।
- 'पायनियर' प्रजाति — बंजर चट्टान व सूखी मिट्टी पर भी सबसे पहले उगता है।
- राज्य के कुल वन क्षेत्र का सर्वाधिक भाग (लगभग 28.24%) चीड़ वनों से आच्छादित — FSI डेटा।
- लीसा (Resin) का स्रोत = चीड़।
- वनाग्नि का मुख्य मौसम = मध्य-फरवरी से मध्य-जून।
- ⚠️ TRAP: चीड़ 'उपोष्ण' (Sub-Tropical) है — इसे देवदार/फर के 'शीतोष्ण' (Temperate) कोणधारी वनों से कन्फ्यूज न करें।
👑 उत्तराखंड में बांज (Oak) की 5 प्रमुख प्रजातियां — 'हरा सोना'
| स्थानीय नाम | वैज्ञानिक नाम | ऊंचाई | पहचान |
|---|---|---|---|
| बांज | Q. leucotrichophora | 1,500–2,400 मी | सबसे आम — चारा/ईंधन |
| मोरू / तिलोंज | Q. floribunda | 2,000–2,700 मी | कठोर लकड़ी |
| खर्सू | Q. semecarpifolia | 2,500–3,300 मी | सबसे अधिक ऊंचाई पर |
| रियांज | Q. lanata (syn. Q. lanuginosa) | मध्य पट्टी | अपेक्षाकृत कम पाया जाता है |
| फल्यांट / हरींज | Q. glauca | नम घाटियां | नदी-नालों के किनारे |
- बांज: उत्तम चारा (Fodder) + कृषि उपकरणों (हल) की टिकाऊ लकड़ी।
- बुरांश: फूलों से जूस/स्क्वैश — हृदय रोगों में लाभदायक, स्थानीय रोजगार।
- चौड़ी पत्तियां गिरकर बेहतरीन खाद (Humus) बनाती हैं।
- बांज का फल 'एकॉर्न' — जंगली भालू व काकड़ का मुख्य भोजन।
- बुरांश रंग: 1,500–2,500 मी लाल, 2,500–3,000 मी गुलाबी, 3,000 मी+ सफेद।
- राज्य वृक्ष = बुरांश | राज्य पुष्प = ब्रह्मकमल — दोनों अलग-अलग हैं।
- रक्षा सूत्र आंदोलन (1994) — टिहरी की भिलंगना घाटी, नेतृत्व सुरेश भाई — बांज मिश्रित वन बचाने हेतु।
- मीरा बेन — 'चीड़ के स्थान पर बांज' उगाने का अभियान चलाया।
ऊंचाई के साथ वृक्ष-क्रम
- देवदार: टिकाऊ सुगंधित लकड़ी — मंदिर निर्माण, नक्काशी, रेलवे स्लीपर।
- औषधीय तेल — पारंपरिक चिकित्सा व कीट-प्रतिरोधी उपयोग।
- शंक्वाकार आकार — भारी बर्फ शाखाओं पर नहीं टिकती, पेड़ नहीं टूटते।
- ठंडी/बर्फीली हवाओं से पहाड़ों व वन्यजीवों का बचाव।
- सुई-पत्तियां — कम वाष्पोत्सर्जन, ठंड व सूखा सहनशील।
- देवदार = 'देवताओं का वृक्ष' (Tree of Gods)।
- जागेश्वर धाम (अल्मोड़ा) — पूरी तरह देवदार वनों से घिरा।
- ⚠️ TRAP: चीड़ उपोष्ण है, जबकि देवदार व फर शीतोष्ण कोणधारी — कन्फ्यूज न करें।
- भोजपत्र: छाल का ऐतिहासिक उपयोग — पांडुलिपि लेखन हेतु 'कागज़'।
- जूनीपर: धार्मिक धूप (Incense) व पारंपरिक औषधि।
- यह क्षेत्र 'टिम्बरलाइन' बनाता है — इससे ऊपर बड़े वृक्ष नहीं उगते।
- अत्यंत ठंडी व कठोर जलवायु के पूर्ण अनुकूलित प्रजातियां।
- प्राचीन काल में लेखन हेतु प्रयुक्त वृक्ष-छाल = भोजपत्र।
- टिम्बरलाइन (~3,500 मी) के समीप प्रमुख वन = उप-अल्पाइन वन।
- भोटिया व गुज्जर जनजातियों का ग्रीष्मकालीन चारागाह (Transhumance)।
- दुर्लभ व मूल्यवान औषधीय जड़ी-बूटियों का भंडार।
- 'प्रकृति के स्पंज' — नमी सोखकर गर्मियों में धीरे-धीरे नदियों में छोड़ते हैं।
- घनी घास परत मृदा को बांधे रखती है — भूस्खलन कम होता है।
- बुग्यालों को कहते हैं = 'मखमली गलीचा' (कश्मीर में 'मर्ग', जैसे गुलमर्ग)।
- ब्रह्मकमल = राज्य पुष्प, केवल बुग्यालों में जुलाई–सितंबर के बीच खिलता है।
- कीड़ा जड़ी को कहते हैं = 'हिमालयी सोना' — विश्व की सबसे महंगी फफूंद-आधारित औषधियों में से एक।
- नगण्य — इस ऊंचाई पर व्यावसायिक दोहन संभव नहीं, वृद्धि अत्यंत धीमी।
- प्राथमिक अनुक्रमण (Primary Succession) — लाइकेन नंगी चट्टानों को तोड़कर मिट्टी बनाते हैं।
- चरम जलवायु (अत्यधिक ठंड, कम ऑक्सीजन) में जीवन का प्रतीक।
- लाइकेन = वायु प्रदूषण (विशेषकर SO₂) का प्राकृतिक संकेतक।
- भारत का पहला लाइकेन पार्क = मुनस्यारी (पिथौरागढ़)।
- लाइकेन = कवक (Fungi) व शैवाल (Algae) का सहजीवी संबंध।
इस भाग में ऊपर वर्णित सभी वृक्ष प्रजातियों (शिवालिक से लेकर हिमरेखा तक) को उनके वैज्ञानिक नामों के साथ एक ही तालिका में संकलित किया गया है।
| स्थानीय नाम | वैज्ञानिक नाम | वन प्रकार / पेटी |
|---|---|---|
| खैर | Acacia catechu | भाबर — शुष्क पर्णपाती |
| शीशम | Dalbergia sissoo | भाबर — शुष्क पर्णपाती |
| गूलर | Ficus racemosa | भाबर — शुष्क पर्णपाती |
| ढाक / पलाश | Butea monosperma | भाबर — शुष्क पर्णपाती |
| साल | Shorea robusta | तराई — आर्द्र पर्णपाती (प्रमुख वृक्ष) |
| सागौन | Tectona grandis | तराई — प्लांटेशन (देशज नहीं) |
| सेमल | Bombax ceiba | तराई — आर्द्र पर्णपाती |
| महुआ | Madhuca longifolia | तराई — आर्द्र पर्णपाती |
| जामुन | Syzygium cumini | तराई — आर्द्र पर्णपाती |
| चीड़ | Pinus roxburghii | शिवालिक/मध्य हिमालय — चीड़ वन |
| बांज | Quercus leucotrichophora | मध्य हिमालय — बांज/शीतोष्ण वन |
| काफल | Myrica esculenta | मध्य हिमालय — मिश्रित पेटी |
| बुरांश | Rhododendron arboreum | मध्य हिमालय / उप-अल्पाइन |
| देवदार | Cedrus deodara | उप-अल्पाइन शंकुधारी वन |
| फर | Abies pindrow | उप-अल्पाइन शंकुधारी वन |
| ब्लू पाइन | Pinus wallichiana | उप-अल्पाइन शंकुधारी वन |
| भोजपत्र | Betula utilis | अल्पाइन झाड़ी सीमा (हिमरेखा के निकट) |
| जूनीपर | Juniperus macropoda | अल्पाइन झाड़ी सीमा |
🏡 उत्तराखंड वन पंचायत: सम्पूर्ण मास्टर नोट्स
वन पंचायत क्या है?
- यह 'सामुदायिक वन प्रबंधन' (Community Forest Management) का एशिया का सबसे पुराना और सफल मॉडल है।
- स्वामित्व: 'राज्य के स्वामित्व' और 'सामुदायिक जिम्मेदारी' का मिला-जुला अनूठा रूप।
- यह व्यवस्था पूरे भारत में केवल उत्तराखंड में है।
| वर्ष | घटना / विवरण |
|---|---|
| 1893 |
1893 की घोषणा
ब्रिटिश सरकार ने कुमाऊं की सभी 'बेनाप भूमि' (बिना रिकॉर्ड वाली भूमि) को 'जिला संरक्षित वन' घोषित कर दिया — ग्रामीणों के पारंपरिक अधिकार खतरे में।
|
| 1911–1917 |
नेल्सन का बंदोबस्त
नेल्सन का वन/भूमि बंदोबस्त लागू हुआ। जंगलों की घेराबंदी कर उन्हें 'आरक्षित वन' बनाया गया। ग्रामीणों के पारंपरिक अधिकार पूरी तरह छीन लिए गए।
|
| आंदोलन (1910–20) |
वन आंदोलन एवं प्रथम महिला गिरफ्तारी
अधिकारों के हनन के विरोध में व्यापक वन आंदोलन हुए। इन आंदोलनों में भाग लेने व गिरफ्तार होने वाली राज्य की पहली महिला — दुर्गा देवी थीं।
|
| 1921 |
कुमाऊं फॉरेस्ट ग्रीवांस कमेटी
जन-आंदोलनों के दबाव में शिकायतों के निवारण के लिए 'कुमाऊं फॉरेस्ट ग्रीवांस कमेटी' गठित की गई।
|
| ✅ 1931 |
प्रथम वन पंचायत नियम — ऐतिहासिक क्षण
उसी कमेटी की सिफारिश पर सबसे पहले 'कुमाऊं वन पंचायत नियम' लागू हुए — यह वन पंचायत व्यवस्था की आधिकारिक शुरुआत है।
|
| 1971→2012 |
नियमों में क्रमिक संशोधन
1931 के बाद नियम अपडेट होते रहे: 1971 → 1976 → 2001 → 2005 → 2012 — 2005 में 50% महिला आरक्षण जोड़ा गया।
|
- वन पंचायत नियम कब लागू हुए? → 1931
- किसकी सिफारिश पर? → कुमाऊं फॉरेस्ट ग्रीवांस कमेटी (1921)
- प्रथम गिरफ्तार महिला? → दुर्गा देवी
संख्या में पौड़ी गढ़वाल (1st) > अल्मोड़ा > पिथौरागढ़ > चमोली (4th)
क्षेत्रफल में चमोली (1st) > पिथौरागढ़ > अल्मोड़ा > पौड़ी गढ़वाल (4th)
यह उलटफेर MCQ में जानबूझकर गलत विकल्प बनाने के लिए उपयोग होता है।
कारण: वन पंचायत व्यवस्था मुख्य रूप से पर्वतीय क्षेत्रों (Hill areas) के वनों के प्रबंधन के लिए बनी है। हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर मैदानी जिले हैं।
🏵️ उत्तराखंड के राज्य प्रतीक
- औषधीय फूलों का रस — हृदय रोग (Heart Disease) में लाभकारी।
- फूलों से डाई (प्राकृतिक रंग) भी बनाई जाती है।
- मकर संक्रांति के बाद फूल आना शुरू।
- बैसाखी तक पूर्ण खिलाव (Full Bloom)।
- गर्मी बढ़ने के साथ सूखने लगते हैं।
- वन अधिनियम (Forest Act) 1974 के तहत अवैध कटाई रोकने हेतु संरक्षित वृक्ष घोषित।
- बुरांश नेपाल का राष्ट्रीय पुष्प और हिमाचल प्रदेश तथा नागालैंड का राज्य पुष्प भी है।
12,000–15,000 फीट
लगभग 3,500 से 4,800 मीटर
- उत्तराखंड में कुल 24 प्रजातियां पाई जाती हैं।
- विश्व स्तर पर कुल लगभग 300 प्रजातियां।
- बैंगनी रंग के फूल, पीली पत्तियों (bracts) पर गुच्छों में — अत्यंत सुगंधित।
- पुष्पन काल: जुलाई से सितंबर।
- वेदों में उल्लेख मिलता है।
- स्थानीय नाम: 'कौल पद्म'।
- महाभारत (वनपर्व) में इसे 'सौगन्धिक पुष्प' कहा गया है।
- केदारनाथ में भगवान शिव को विशेष 'प्रसाद' के रूप में अर्पित किया जाता है।
🌲 उत्तराखंड के प्रमुख वन आन्दोलन
💡 डिफ़ॉल्ट रूप से पूरी तालिका दिखाई देती है। सभी छुपाएं दबाने पर आन्दोलन (नाम) कॉलम को छोड़कर बाकी सभी कॉलम धुंधले (blur) हो जाते हैं — किसी सेल पर क्लिक कर उसका उत्तर देखें। शफल पंक्तियों का क्रम बदलकर सभी कॉलम फिर से छुपा देता है ताकि क्रम नहीं, तथ्य याद रहें। रीसेट मूल क्रम व पूर्ण दृश्यता वापस लाता है।
| आन्दोलन | वर्ष | स्थान | नेतृत्व | कारण / परिणाम |
|---|---|---|---|---|
1 · कुंजणी वन आन्दोलन |
1904 | स्यूड़ व पाथों गाँव, टिहरी रियासत | अमर सिंह | कीर्तिशाह के समय बढ़ाये गये टैक्स के विरोध में। |
2 · खास पट्टी वन आन्दोलन |
1906–07 | टिहरी रियासत | बेलमती देवी | परिणामस्वरूप बैंक ऑफ गढ़वाल का गठन। |
3 · असहयोग वन आन्दोलन |
1919–22 | चमोली व पौड़ी | गोपाल सिंह राणा ('आधुनिक किसान आन्दोलनों के जनक') | सौम्य सेर व बिसाऊ प्रथा के विरुद्ध। |
4 · राजगढ़ी → रवाँई / तिलाड़ी काण्ड |
1926–30 | राजगढ़ी (वर्तमान बड़कोट), उत्तरकाशी | दयाराम रवालटा ('आजाद पंचायत') | वन बन्दोबस्त 1929 का विरोध; 30 मई 1930 तिलाड़ी काण्ड में 200+ शहीद — 'उत्तराखण्ड का जलियाँवाला बाग'। |
5 · चिपको आन्दोलन |
1973 | मण्डल गाँव व रैणी गाँव, चमोली | चण्डी प्रसाद भट्ट, गौरा देवी, सुन्दरलाल बहुगुणा | वृक्ष कटान के ठेके के विरुद्ध — विश्वप्रसिद्ध वृक्ष-रक्षा आन्दोलन। |
6 · पर्वतीय वन संघर्ष समिति |
1974 | अल्मोड़ा | गोबिन्द सिंह | वनों की नीलामी के विरुद्ध; 1977 में नैनीताल शैलेहॉल दहन। |
7 · खीराकोट वन आन्दोलन |
1978 | खीराकोट गाँव, अल्मोड़ा | मालती देवी, राधा भट्ट | खड़िया खनन के विरुद्ध। |
8 · डुंगी-पैंतोली आन्दोलन |
1980 | डुंगी व पैंतोली गाँव, चमोली | मथुरा देवी | बाँज वनों के हस्तान्तरण के विरुद्ध। |
9 · पाणी राखो आन्दोलन |
1980 दशक | उपरेखाल गाँव, पौड़ी गढ़वाल | सच्चदानन्द भारती | 'चाल-खाल' पद्धति से जल संचयन। |
10 · बीज बचाओ आन्दोलन |
1986–89 | जधार गाँव, टिहरी गढ़वाल | विजय जड़धारी | 'बारनाजा' पद्धति से परम्परागत बीज संरक्षण। |
11 · रक्षासूत्र आन्दोलन |
1994 | मिलंगना घाटी, टिहरी गढ़वाल | सुरेश भाई | वृक्षों पर रक्षासूत्र बाँधकर संरक्षण का संकल्प। |
12 · मैती आन्दोलन |
1994–95 | ग्वालदम, चमोली | कल्याण सिंह रावत ('वृक्ष मानव') | विवाह पर मैती वृक्षारोपण की परम्परा। |
13 · झपटो-छीनो आन्दोलन |
1998 | रैणी-लाता, चमोली | गोविन्द सिंह रावत (प्रेरणा) | नन्दा देवी उद्यान का प्रबन्धन ग्रामीणों को सौंपने की माँग। |
- कारण: अंग्रेज सरकार को सहायता हेतु बढ़ाया गया टैक्स।
- यह आन्दोलन कीर्तिशाह के समय अंग्रेज सरकार को सहायता देने के लिये बढ़ाये गये टैक्स के विरोध में हुआ।
- स्यूड़ व पाथों गाँव में हजारों किसानों ने घेरा डाला था।
- महिलाओं की सक्रिय भूमिका — बेलमती देवी प्रमुख नेत्री।
- इस आन्दोलन के परिणामस्वरूप कीर्तिशाह द्वारा किसानों हेतु बैंक ऑफ गढ़वाल का गठन किया गया।
- चमोली व पौड़ी में सौम्य सेर व बिसाऊ प्रथा के खिलाफ चलाया गया।
- 1915 में सौम्या सेर व बिसाऊ प्रथा के खिलाफ गोपाल सिंह राणा ने आन्दोलन शुरू किया था।
- 1919-22 का असहयोग वन आन्दोलन उसी का विस्तारित रूप था।
- गोपाल सिंह राणा को आधुनिक किसान आन्दोलनों का जनक माना जाता है।
1 · पृष्ठभूमि: कठोर वन कानूनों का निर्माण (1926–1928)
- कानून लागू: 1926 में टिहरी रियासत में 'वर्किंग प्लान ऑफ टिहरी गढ़वाल स्टेट' लागू किया गया। इसी कानून को बाद में 'वन बन्दोबस्त 1929' के नाम से जाना गया।
- सृजनकर्ता: इस वन कानून का मसौदा (Draft) तत्कालीन DFO पदमदत्त रतूड़ी ने तैयार किया था।
- वन नीति (1927-28): वनों का सीमाकरण (Demarcation) कर दिया गया। वनों में ग्रामीणों और उनके पशुओं का प्रवेश पूरी तरह वर्जित कर दिया गया।
- ऐतिहासिक संवाद: जब त्रस्त जनता ने तत्कालीन राजा नरेन्द्र शाह से पूछा कि "पशु कहाँ जाएंगे?", तो राजा का क्रूर उत्तर था — "ढंगार (खाई) में फेंक दो!"
2 · राजगढ़ी वन आन्दोलन (1926-30) व 'आजाद पंचायत' (1929)
- राजा के इस रवैये और वन कानूनों के विरोध में राजगढ़ी (बड़कोट) के ग्रामीणों ने रियासत के खिलाफ एक समानांतर व्यवस्था के रूप में 'आजाद पंचायत' का गठन किया।
- अध्यक्ष: दयाराम सिंह रवालटा।
- उपाध्यक्ष: राम सिंह।
- प्रमुख उपाधियाँ (परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण):
- हीरा सिंह को 'पांच सरकार' की उपाधि दी गई।
- बैजराम को 'तीन सरकार' की उपाधि दी गई।
- आन्दोलन का विस्तार: राजगढ़ी से शुरू हुई यही 'आजाद पंचायत' और आन्दोलन धीरे-धीरे पूरे रवाँई परगने में फैल गया, जिसकी परिणति अंततः तिलाड़ी काण्ड में हुई।
3 · आन्दोलन का उग्र रूप एवं शासक की कूटनीति (मई 1930)
- प्रथम हिंसक टकराव: आन्दोलन के दौरान ग्रामीणों ने SDM सुरेन्द्र दत्त को घेर लिया। बचाव में DFO पदमदत्त रतूड़ी ने गोली चला दी, जिससे 3 ग्रामीण मारे गए।
- धोखे से गिरफ्तारी: मई 1930 में राजा नरेन्द्र शाह ने वार्ता के बहाने आन्दोलनकारी नेताओं को बुलाया और उन्हें धोखे से गिरफ्तार कर लिया।
- राजा का यूरोप प्रवास: आन्दोलन जब अपने चरम पर था, तब महाराजा नरेन्द्र शाह स्वास्थ्य कारणों (इलाज) से यूरोप चले गए।
4 · तिलाड़ी काण्ड: भीषण नरसंहार (30 मई 1930)
- नेताओं की गिरफ्तारी और वन अधिकारों के हनन के विरोध में रवाँई की जनता ने एक विशाल महापंचायत बुलाई।
- स्थान: यमुना नदी के तट पर स्थित तिलाड़ी मैदान।
- नरसंहार: राजा नरेन्द्र शाह की अनुपस्थिति का फायदा उठाते हुए, टिहरी रियासत के दीवान (प्रधानमंत्री) चक्रधर जुयाल ने तिलाड़ी मैदान को चारों ओर से घेरकर निहत्थी भीड़ पर अंधाधुंध गोलियाँ चलवा दीं।
- हताहत: 200 से अधिक ग्रामीण शहीद हुए और 100 से अधिक घायल हुए। कई लोगों ने यमुना नदी में कूदकर अपनी जान बचाई।
- स्मृति: हर 30 मई को 'तिलाड़ी शहीद दिवस' मनाया जाता है।
'यमुना के बागी बेटे' — ऐतिहासिक उपन्यास
- लेखक (Author): विद्यासागर नौटियाल। (इन्हें 'उत्तराखंड का प्रेमचंद' भी कहा जाता है)।
- प्रकाशन: यह उपन्यास 2012 के आसपास प्रकाशित हुआ था।
- मुख्य विषय (Central Theme): यह उपन्यास पूरी तरह से टिहरी रियासत के रवाँई आन्दोलन और ऐतिहासिक तिलाड़ी काण्ड (30 मई 1930) की पृष्ठभूमि पर आधारित है।
पृष्ठभूमि एवं तात्कालिक कारण
- संस्थागत शुरुआत (1964): चण्डी प्रसाद भट्ट ने गोपेश्वर में 'दशोली ग्राम स्वराज्य मण्डल' (DGSM) की स्थापना की — आन्दोलन की वैचारिक व व्यावहारिक नींव।
- प्रकृति की चेतावनी: 1970 की अलकनन्दा बाढ़ (400 वर्गमील क्षेत्र जलमग्न) ने वन-कटान व बाढ़/भूस्खलन का सीधा संबंध उजागर किया।
- तात्कालिक कारण (अंगू वृक्ष विवाद): DGSM ने कृषि उपकरण (हल-जूआ) हेतु 'अंगू (Ash)' पेड़ों की माँग की — अस्वीकृत। इसके विपरीत इलाहाबाद की 'साइमण्ड' कम्पनी (खेल सामग्री निर्माता) को 300 अंगू पेड़ काटने का ठेका दे दिया गया।
प्रमुख नेतृत्वकर्ता
- 1973 में मण्डल घाटी के ग्रामीणों को 'पेड़ों से चिपकने' का मूल विचार व अहिंसक रणनीति दी।
- सम्मान: 1982 रेमन मैग्सेसे पुरस्कार (एशिया का नोबेल — उत्तराखण्ड से प्रथम)।
- 1986 पद्मश्री · 2005 पद्म भूषण · 2013 गाँधी शांति पुरस्कार।
- 25 मार्च 1974 मार्च को गाँव के पुरुषों को मुआवजे के बहाने चमोली बुला लिया गया।
- 26 मार्च 1974 को ठेकेदार जंगल काटने पहुँचे तो गौरा देवी ने 27 महिलाओं को एकत्रित किया।
- इन महिलाओं ने 2451 पेड़ों को अपनी बाहों में घेरकर कटने से बचा लिया।
- आन्दोलन को राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय (UNO आदि) मंचों तक पहुँचाया।
- 1981 में घोषित पद्मश्री ठुकराई; 2009 में पद्म विभूषण स्वीकारा।
- 1981–83: कश्मीर से कोहिमा तक 5,000 किमी लंबी 'ट्रांस-हिमालयन पदयात्रा' की।
अन्य विशिष्ट चेहरे
- कॉमरेड गोविन्द सिंह रावत (CPI नेता) — रैणी गाँव में पुरुषों की अनुपस्थिति में गौरा देवी का रणनीतिक साथ दिया; जोशीमठ–मलारी मार्ग जाम किया।
- धूम सिंह नेगी — अडवाणी वन (हेंवलघाटी) में वनों को बचाने हेतु आमरण अनशन किया।
- बचनी देवी — 1977 - अडवाणी वन क्षेत्र में पेड़ों का ठेका लेने वाले अपने ही ग्राम प्रधान पति के विरुद्ध विद्रोह; महिलाओं संग पेड़ों पर रक्षासूत्र बाँधे।
प्रमुख घटनाएँ — कालक्रम
| अप्रैल 1973 | मण्डल गाँव, चमोली — DGSM ने साइमण्ड का ठेका रद्द करवाया; पहला चिपको प्रतिरोध। |
| 26 मार्च 1974 | रैणी गाँव — गौरा देवी + 27 महिलाओं ने 2451 पेड़ों को बचाया (सर्वप्रसिद्ध घटना)। |
| 1975 | फाटा (रुद्रप्रयाग) — महिलाओं ने रात की ठण्ड में जंगलों में पहरा देकर वनों की रक्षा की। |
| 1977 | अडवाणी वन (टिहरी) — बचनी देवी का विद्रोह (पति के विरुद्ध); महिलाओं ने रक्षासूत्र बाँधे। |
| 1977 | टिहरी क्षेत्र — बहुगुणा ने 'हिमालय बचाओ यात्रा' प्रारम्भ की। |
| 1978 | पुलना गाँव (भ्यूंडार) — महिलाओं ने वन माफिया व ठेकेदारों के औजार जब्त किए। |
| 1980 | बहुगुणा — इन्दिरा गाँधी से मुलाकात; 15 वर्षीय हरे वृक्ष कटान पर प्रतिबन्ध। |
| 1981–83 | बहुगुणा की 5,000 किमी ट्रांस-हिमालयन पदयात्रा (कश्मीर से कोहिमा)। |
नारे एवं साहित्य
- प्रारम्भिक नारा (1973): "हिम पुत्रियों की ललकार, वन नीति बदले सरकार।"
- सर्वप्रसिद्ध नारा (1977, हेंवलघाटी): "क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार — मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार।"
- बहुगुणा जी का वैश्विक नारा: "पारिस्थितिकी ही स्थायी अर्थव्यवस्था है।" (Ecology is permanent economy)
- जनकवि घनश्याम रतूड़ी 'शैलानी': गीतों से आन्दोलन में प्राण फूंके — "गले लगाओ इन पेड़ों को, इन्हें न कटने देना" व "आज हिमालय जागेगा, क्रूर कुल्हाड़ा भागेगा।"
- ऐतिहासिक संदर्भ पुस्तक: 'The Unquiet Woods' — लेखक रामचन्द्र गुहा; चिपको व उत्तराखण्ड वन आन्दोलनों का सर्वाधिक प्रामाणिक दस्तावेज़।
जाँच समिति, परिणाम एवं वैश्विक प्रभाव
- वीरेन्द्र कुमार समिति: रैणी गाँव की घटना के बाद तत्कालीन CM हेमवती नन्दन बहुगुणा ने वनस्पति विज्ञानी डॉ. वीरेन्द्र कुमार की अध्यक्षता में जाँच समिति बनाई — इसी रिपोर्ट पर अलकनन्दा घाटी में वन कटान पर रोक लगी।
- 15 वर्षीय प्रतिबन्ध (1980): PM इन्दिरा गाँधी ने हिमालयी क्षेत्र में हरे वृक्षों की व्यावसायिक कटाई पर 15 वर्षों का पूर्ण प्रतिबन्ध लगाया।
- अप्पिको आन्दोलन (1983): कर्नाटक में पाण्डुरंग हेगड़े के नेतृत्व में चला यह आन्दोलन चिपको से ही प्रेरित था।
- वृक्ष मित्र पुरस्कार (1986): रैणी गाँव की 30 'महिला मंगल दल' सदस्याओं को इन्दिरा प्रियदर्शिनी वृक्ष मित्र पुरस्कार मिला।
- अल्टरनेटिव नोबेल (1987): चिपको आन्दोलन को Right Livelihood Award ('Alternative Nobel Prize') से सम्मानित किया गया।
- राष्ट्रीय वन नीति (1988): इसके निर्माण पर चिपको आन्दोलन का स्पष्ट प्रभाव पड़ा।
- वैश्विक मंच (1992): रियो डि जेनेरियो के 'पृथ्वी सम्मेलन' (Earth Summit) में चिपको की आधिकारिक वैश्विक सराहना हुई।
- इस समिति का गठन 4 सितम्बर 1974 को अल्मोड़ा में हुआ।
- प्रमुख आन्दोलन: 1977 में समिति द्वारा वनों की नीलामी के विरोध में नैनीताल के शैलेहॉल को फूंक दिया गया — यह इस समिति का सबसे बड़ा आन्दोलन था।
- अल्मोड़ा व कौसानी के बीच खीराकोट गाँव की महिलाओं ने देखा कि खड़िया खनन के कारण खेत लगातार कम हो रहे हैं।
- 1981: मूसलाधार बारिश में खड़िया युक्त पानी खेतों में बहकर आया — खेत बर्फ की तरह सफेद हो गये।
- मालती देवी के नेतृत्व में महिलाएं एकजुट हुईं; राधा भट्ट व चण्डी प्रसाद भट्ट ने भी साथ दिया।
- खनन बन्द कराने में सफल रहीं — ग्रामीणों की भूमि व आजीविका की रक्षा हुई।
- जन्म: 16 अक्टूबर 1931, धुर्का गाँव (अल्मोड़ा)
- लक्ष्मी आश्रम: 1951 में सरला बहन के सम्पर्क में आईं; कौसानी आश्रम की दीर्घकालीन संचालिका/अध्यक्षा
- भूदान आन्दोलन (1957): विनोबा भावे संग पदयात्राओं में सक्रिय
- शराबबंदी आन्दोलन (1960s): कुमाऊं में महिलाओं को संगठित किया
- चिपको आन्दोलन (1970s): वन रक्षा हेतु जमीनी कार्य
- नदी बचाओ आन्दोलन (2008): नदियों व नौलों की रक्षा हेतु नेतृत्व
- टिहरी बाँध विरोध: बड़े बाँधों व अनियंत्रित खनन के विरुद्ध मुखर आवाज़
- गांधी शांति प्रतिष्ठान: प्रथम महिला अध्यक्षा (नई दिल्ली)
- बाल शिक्षा: 25 बाल मंदिरों की स्थापना
- पद्मश्री: वर्ष 2025 में सम्मानित
- जमनालाल बजाज पुरस्कार: वर्ष 1991
- अन्य पुरस्कार: इंदिरा प्रियदर्शनी पर्यावरण पुरस्कार, स्वामी राम मानवता पुरस्कार (2024), कुमाऊं गौरव पुरस्कार
- कारण: बाँज वनों को उद्यान विभाग को हस्तान्तरित करना — ग्रामीणों के अधिकार खतरे में आ गये।
- मथुरा देवी के नेतृत्व में गाँव की महिलाओं ने सामूहिक विरोध किया।
- महिलाओं ने वन में प्रवेश कर कटान रोका — सरकार को निर्णय वापस लेना पड़ा।
- यह चिपको का ही कुमाऊँ-गढ़वाल क्षेत्र में विस्तार था।
- वन कटान से उपरेखाल के जलस्रोत सूखे; जुलाई 1980 में प्रथम पर्यावरण शिविर आयोजित हुआ।
- 1982 में दूधातोली लोक विकास संस्थान (DLVS) की स्थापना हुई।
- परम्परागत 'चाल-खाल' जल संचय संरचनाओं का निर्माण किया गया।
- 1993–98: 136 गाँवों में 12,000+ चाल-खाल बनाए गए।
- सूखी नदी 'सुखराउला' 2001 तक पुनर्जीवित हुई; 150 गाँवों की महिलाएं सक्रिय रहीं।
- हरित क्रान्ति के बाद परम्परागत बीजों का ह्रास हुआ; गढ़वाल में धान की प्रजातियाँ 3000 से घटकर 320 रह गईं।
- 'बारनाजा' (12 अनाजों की साथ बुआई) पद्धति का पुनर्जीवन किया गया।
- बारनाजा = धान, मडुवा, ज्वार, सोयाबीन, तिल, राजमा आदि 12 अनाज एक साथ बोना।
- 700+ परम्परागत बीजों का संरक्षण किया गया; 2002 में अरुन्धती राय ने आन्दोलन को 1.5 लाख रु. दान दिए।
- मिलंगना घाटी में वृक्षों पर पवित्र 'रक्षासूत्र' बाँधकर रक्षा का संकल्प लिया गया।
- रक्षाबन्धन की परम्परा से प्रेरित — पेड़ को भाई मानकर सुरक्षा का वचन।
- यह चिपको का अगला चरण था — वन संरक्षण को सांस्कृतिक-धार्मिक आधार दिया गया।
- 'मैती' का अर्थ गढ़वाली में 'माँ का घर' = मायका।
- विवाह के समय वर-वधू द्वारा एक 'मैती वृक्ष' लगाने की परम्परा शुरू की गई।
- 'मैती दीदियाँ' — गाँव की अविवाही युवतियाँ जो उस वृक्ष की देखभाल करती हैं।
- 18 राज्यों के 6,000+ गाँवों में विस्तार; USA, UK, कनाडा, नेपाल, इण्डोनेशिया में भी अपनाया गया।
- UNEP ने प्रशंसा की; कल्याण सिंह रावत को 'वृक्ष मानव' की उपाधि दी गई।
- जन्म: 19 अक्टूबर 1953, बैनोली गाँव, कर्णप्रयाग (चमोली)
- पिता: परिमल सिंह रावत
- पेशा: राजकीय विद्यालय में जीव विज्ञान शिक्षक; छात्राओं के प्रकृति प्रेम से प्रेरित होकर मैती आन्दोलन की रूपरेखा तैयार की
- हिमालय वन्य जीव संस्थान: मैती आन्दोलन से पूर्व, वर्ष 1974 में स्थापना
- पुरातात्विक खोज: कर्णप्रयाग के समीप चांदपुर डूंगरी में आदिमानव कालीन सलेटी चित्रों वाली प्राचीन गुफा की खोज
- पद्मश्री: वर्ष 2020 में पर्यावरण संरक्षण हेतु सम्मानित
- विशेष उपाधि: पर्यावरण के प्रति समर्पण हेतु 'वृक्ष मानव' की उपाधि
- 1982 में नन्दा देवी राष्ट्रीय उद्यान घोषित होने से ग्रामीणों के परम्परागत अधिकार समाप्त हो गये थे।
- 21 जून 1998: लाता-रैणी में धरना; नन्दा देवी उद्यान का प्रबन्धन ग्रामीणों को सौंपने की माँग रखी गई।
- 15 जुलाई: ग्रामीण पशुओं सहित राष्ट्रीय उद्यान में प्रवेश कर गए।
- 2006 के वन अधिकार अधिनियम की पृष्ठभूमि इसी आन्दोलन से बनी।
🌍 उत्तराखंड के प्रमुख पर्यावरणविद्
- HESCO — हिमालय पर्यावरण अध्ययन और संरक्षण संगठन; स्थापना वर्ष 1983, देहरादून के शुक्लापुर गाँव में।
- उद्देश्य: स्थानीय संसाधनों के वैज्ञानिक उपयोग से पर्वतीय ग्रामीण आर्थिकी को मजबूत व आत्मनिर्भर बनाना।
- सकल पर्यावरण उत्पाद (GEP): इनकी सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा — GDP के साथ पर्यावरण संरक्षण व नुकसान मापने का पैमाना; इन्हीं के प्रयासों से उत्तराखण्ड GEP लागू करने वाला देश का पहला राज्य बना (लागू तिथि: 19 जुलाई 2024)।
- वृत्तचित्र (Documentary): इनके जीवन पर आधारित 'A Son of Himalaya' नामक वृत्तचित्र बनाई गई है।
- घराट पुनरुद्धार: पारंपरिक जल चक्कियों (घराट) को उन्नत तकनीक से जोड़कर बिजली उत्पादन व आजीविका का साधन बनाया।
- संसाधनों का सदुपयोग: पिरूल (चीड़ पत्तियाँ) व लैंटाना जैसी झाड़ियों से धूपबत्ती व फर्नीचर निर्माण कर स्वरोजगार से जोड़ा।
- गाँव बचाओ आन्दोलन: पर्वतीय पलायन रोकने व ग्रामीण अर्थव्यवस्था सुदृढ़ करने हेतु सफल नेतृत्व।
- पद्मश्री: वर्ष 2006 में पर्यावरण संरक्षण हेतु सम्मानित
- पद्म भूषण: वर्ष 2020 में भारत के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान से अलंकृत
- जमनालाल बजाज पुरस्कार: वर्ष 2006, ग्रामीण विकास में विज्ञान व तकनीक के अनुप्रयोग हेतु
- जन्म: 9 जनवरी 1927 को टिहरी गढ़वाल जिले के मरोड़ा गाँव में।
- संस्था: पत्नी विमला बहुगुणा के साथ मिलकर पर्वतीय नवजीवन मण्डल की स्थापना की।
- उपनाम: वृक्षमित्र व हिमालय के रक्षक के रूप में जाने जाते हैं।
- निधन: 21 मई 2021 को एम्स ऋषिकेश में।
- चिपको आन्दोलन: 1970 के दशक में वनों की कटाई रोकने हेतु गौरा देवी व चण्डी प्रसाद भट्ट के साथ नेतृत्व किया।
- प्रसिद्ध नारा: चिपको आन्दोलन के दौरान इन्होंने ऐतिहासिक नारा दिया — "पारिस्थितिकी स्थायी अर्थव्यवस्था है।"
- टिहरी बाँध विरोध: भागीरथी नदी पर बन रहे टिहरी बाँध का मुखर विरोध किया; प्रमुख अनशन:
- 1989: बाँध निर्माण के विरोध में 74 दिनों का उपवास
- 1995: पुनः 45 दिनों का अनशन
- 2001: पुनः 74 दिनों तक अनशन
- हिमालयी पदयात्रा: 1981–1983 के मध्य हिमालयी पारिस्थितिकी समझने व वनों की रक्षा हेतु कश्मीर से कोहिमा तक लगभग 4800 किमी लंबी ऐतिहासिक पदयात्रा की।
- सामाजिक सुधार: टिहरी में दलितों के मंदिर प्रवेश व छुआछूत के विरुद्ध भी सफलतापूर्वक कार्य किया।
- पद्मश्री: वर्ष 1981 में प्रदान किया गया, परन्तु हिमालय में पेड़ों की कटाई के विरोध में सम्मान लेने से इनकार किया।
- जमनालाल बजाज पुरस्कार: रचनात्मक सामाजिक कार्यों हेतु वर्ष 1986 में प्रदान।
- राइट लाइवलीहुड पुरस्कार: वर्ष 1987 में चिपको आन्दोलन हेतु सम्मानित; इसे 'वैकल्पिक नोबेल' भी कहा जाता है।
- पद्म विभूषण: वर्ष 2009 में भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान से अलंकृत।
- जन्म: 23 जून 1934 को चमोली जिले के गोपेश्वर में हुआ।
- पहचान: देश के प्रख्यात गांधीवादी पर्यावरणविद् व सामाजिक कार्यकर्ता, जिन्होंने जीवन वनों की रक्षा व ग्रामीण विकास में लगाया।
- दशोली ग्राम स्वराज्य मण्डल: वर्ष 1964 में गोपेश्वर में स्थापना की।
- उद्देश्य: स्थानीय लोगों को रोजगार देने व वनों पर आधारित कुटीर उद्योग लगाने हेतु स्थापना।
- विशेष तथ्य: यही संस्था ऐतिहासिक चिपको आन्दोलन की मातृ संस्था मानी जाती है।
- शराब बंदी आन्दोलन: वर्ष 1965 में गोपेश्वर व चमोली क्षेत्र में महिलाओं को साथ लेकर शराब के ठेकों के विरुद्ध सफल जन आन्दोलन शुरू किया।
- चिपको आन्दोलन: 24 अप्रैल 1973 को चमोली के मण्डल गाँव से विधिवत शुरुआत; पेड़ों से चिपकने का अहिंसक विचार इन्हीं की रणनीति का हिस्सा था।
- महिला मंगल दल: गाँव-गाँव में महिला मंगल दलों का गठन कर महिलाओं को वन सुरक्षा व अधिकारों हेतु सशक्त किया।
- पारिस्थितिकी विकास शिविर: चिपको की सफलता के पश्चात, वर्ष 1982 से बंजर भूमि पर वृक्षारोपण हेतु शिविरों का नियमित आयोजन शुरू किया; चौड़ी पत्ती वाले वृक्षों के रोपण पर सर्वाधिक जोर।
- 1982: रेमन मैग्सेसे पुरस्कार — सामुदायिक नेतृत्व हेतु यह अंतरराष्ट्रीय सम्मान पाने वाले उत्तराखण्ड के प्रथम व्यक्ति।
- 1986: पर्यावरण संरक्षण में उत्कृष्ट कार्यों हेतु पद्मश्री सम्मान।
- 1987: संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम द्वारा ग्लोबल 500 रोल ऑफ ऑनर सम्मान।
- 2005: देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से अलंकृत।
- 2013: अहिंसा व गांधीवादी तरीकों से पर्यावरण सेवा हेतु गांधी शांति पुरस्कार।
- 2014: राष्ट्रीय एकता व सद्भावना हेतु इंदिरा गांधी राष्ट्रीय एकता पुरस्कार।
- पर्यावरण व हिमालयी सरोकारों पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं, जिनमें 'पर्वत पर्वत बस्ती बस्ती' व 'हिमालय की पुकार' प्रमुख हैं।
- उपनाम: पर्यावरण के प्रति समर्पण के कारण इन्हें उत्तराखण्ड का वृक्ष मानव कहा जाता है।
- प्रमुख कार्य: सकलाना घाटी के आसपास की बंजर भूमि पर लाखों पेड़ लगाकर नागेन्द्र वन नामक विशाल जंगल तैयार किया।
- प्रमुख सम्मान: 19 नवम्बर 1986 को भारत सरकार द्वारा इन्हें इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्ष मित्र पुरस्कार प्रदान किया गया।
- निधन: जनवरी 2019 में 96 वर्ष की आयु में निधन हुआ।
- प्रारंभिक जीवन: जन्म 1958 में उत्तराखण्ड में हुआ; कौसानी स्थित गांधीवादी संस्था लक्ष्मी आश्रम से जुड़ी रहीं।
- प्रमुख कार्य: कोसी नदी को सूखने से बचाने व जंगलों के संरक्षण हेतु स्थानीय महिलाओं को संगठित किया; प्रयासों से वन कटाई रुकी व कोसी घाटी के जलस्रोत पुनर्जीवित हुए।
- नारी शक्ति पुरस्कार: महिला सशक्तिकरण व पर्यावरण संरक्षण हेतु वर्ष 2016 में भारत के सर्वोच्च महिला सम्मान से नवाजा गया।
- पद्मश्री: पर्यावरण संरक्षण व सामाजिक कार्य में योगदान हेतु वर्ष 2022 में सम्मानित।
- जन्म: 16 अक्टूबर 1931 को धुर्का गाँव, अल्मोड़ा में हुआ।
- लक्ष्मी आश्रम: वर्ष 1951 में सरला बहन के सम्पर्क में आईं; कौसानी स्थित लक्ष्मी आश्रम की दीर्घकालीन संचालिका/अध्यक्षा रहीं।
- खीराकोट वन आन्दोलन (1978): मालती देवी के साथ नेतृत्व; खड़िया खनन (कटियार मिनरल्स कम्पनी, कानपुर) से खेत बर्बाद होने के विरुद्ध खीराकोट गाँव (अल्मोड़ा-कौसानी) में महिलाओं को एकजुट कर खनन बन्द कराया।
- भूदान आन्दोलन (1957): विनोबा भावे संग पदयात्राओं में सक्रिय भागीदारी।
- शराबबंदी आन्दोलन (1960s): कुमाऊं क्षेत्र में महिलाओं को संगठित कर नशामुक्ति अभियान चलाया।
- चिपको आन्दोलन (1970s): वनों की रक्षा हेतु जमीनी स्तर पर कार्य किया।
- नदी बचाओ आन्दोलन (2008): उत्तराखण्ड की नदियों व पारंपरिक जलस्रोतों (नौलों) की रक्षा हेतु नेतृत्व किया।
- टिहरी बाँध विरोध: बड़े बाँधों व अनियंत्रित खनन के विरुद्ध मुखर आवाज़ उठाई।
- गांधी शांति प्रतिष्ठान: नई दिल्ली स्थित इस प्रतिष्ठित संस्थान की प्रथम महिला अध्यक्षा बनने का गौरव प्राप्त हुआ।
- बाल शिक्षा: ग्रामीण क्षेत्रों में बाल शिक्षा हेतु 25 बाल मंदिरों की स्थापना की।
- पद्मश्री: समाज सेवा में उत्कृष्ट योगदान हेतु वर्ष 2025 में सम्मानित।
- जमनालाल बजाज पुरस्कार: गांधीवादी मूल्यों के प्रसार हेतु वर्ष 1991 में प्राप्त हुआ।
- अन्य पुरस्कार: इंदिरा प्रियदर्शनी पर्यावरण पुरस्कार, स्वामी राम मानवता पुरस्कार (2024), व कुमाऊं गौरव पुरस्कार।
- जन्म: 19 अक्टूबर 1953 को चमोली जिले के कर्णप्रयाग स्थित बैनोली गाँव में।
- पिता: परिमल सिंह रावत।
- पेशा: राजकीय विद्यालय में जीव विज्ञान के शिक्षक रहे; छात्राओं के प्रकृति प्रेम से प्रेरित होकर मैती आन्दोलन की रूपरेखा तैयार की।
- संस्थापक: ग्वालदम, चमोली में मैती आन्दोलन की स्थापना व नेतृत्व किया।
- 'मैती' का अर्थ गढ़वाली में 'माँ का घर' = मायका; विवाह के समय वर-वधू द्वारा 'मैती वृक्ष' लगाने की परम्परा शुरू की।
- 'मैती दीदियाँ' — गाँव की अविवाही युवतियाँ जो उस वृक्ष की देखभाल करती हैं।
- 18 राज्यों के 6,000+ गाँवों में विस्तार; USA, UK, कनाडा, नेपाल, इण्डोनेशिया में भी अपनाया गया; UNEP ने प्रशंसा की।
- हिमालय वन्य जीव संस्थान: मैती आन्दोलन से पूर्व, पर्यावरण व वन्यजीवों के संरक्षण हेतु वर्ष 1974 में स्थापना की।
- पुरातात्विक खोज: कर्णप्रयाग के समीप चांदपुर डूंगरी में एक विशाल प्राचीन गुफा की खोज की, जिसमें सलेटी रंग के आदिमानव कालीन चित्र उकेरे गए हैं।
- पद्मश्री: पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अद्वितीय कार्य हेतु भारत सरकार द्वारा वर्ष 2020 में सम्मानित।
- विशेष उपाधि: पर्यावरण के प्रति समर्पण के कारण इन्हें 'वृक्ष मानव' की उपाधि दी गई।







