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🏛️   UKPSC / UKSSSC — सम्पूर्ण परीक्षा नोट्स
कुमाऊं कमिश्नरी  1815 → 1947  · 24 कमिश्नर

उत्तराखण्ड में ब्रिटिश शासन — कुमाऊं कमिश्नरी

1815 में गोरखा शासन की समाप्ति के साथ ही कुमाऊं कमिश्नरी की स्थापना हुई और 1947 तक चले 24 कमिश्नरों के कार्यकाल ने उत्तराखंड की प्रशासनिक संरचना — भूमि बंदोबस्त, पटवारी-व्यवस्था, वन-नीति व नगर-निर्माण — की नींव रखी। इसी कालखंड में होमरूल लीग (1914), कुली बेगार, कुमाऊं परिषद, सविनय अवज्ञा, व्यक्तिगत सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन के माध्यम से क्षेत्र का राजनीतिक जागरण भी हुआ। यह अध्याय दोनों धाराओं — शासन-तंत्र और स्वतंत्रता-संग्राम — को तिथिवार, परीक्षोपयोगी रूप में एक साथ प्रस्तुत करता है।

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ब्रिटिश प्रशासन
16 कमिश्नर · भूमि बंदोबस्त, पटवारी-राजस्व पुलिस, रेलवे व नगर-प्रशासन
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स्वतंत्रता संग्राम
9+ विशेष अध्याय · होमरूल लीग (1914) से भारत छोड़ो आंदोलन तक
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24
कुल कमिश्नर (23 ब्रिटिश + 1 भारतीय)
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1815
कुमाऊं कमिश्नरी की स्थापना
👤
ट्रेल
वास्तविक संस्थापक (1816–35)
🏳️
विंढम
जन-जागरण का स्वर्णिम काल (1914–24)
🚩
13
विशेष विषय — पूर्ण स्क्रीन नोट्स
1815
1856–84 रैमजे
1914 होमरूल लीग
1942 भारत छोड़ो
1947
खण्ड 1 — पृष्ठभूमि
कुमाऊं कमिश्नरी — सामान्य परिचय
गोरखा शासन की समाप्ति (27 अप्रैल 1815, लालमंडी संधि) के पश्चात् कुमाऊं में ब्रिटिश प्रशासन की स्थापना तथा उसके प्रथम तीन कमिश्नरों का संक्षिप्त परिचय
⚠️ महत्त्वपूर्ण तथ्य — संख्या याद रखें
उत्तराखंड में कुमाऊं कमिश्नरी के अंतर्गत कुल 23 ब्रिटिश कमिश्नर एवं 1 भारतीय कमिश्नर हुए — कुल मिलाकर 24 कमिश्नर। इस तथ्य से अनेक प्रश्न परीक्षाओं में पूछे जाते रहे हैं।
इस अध्याय में सम्मिलित कमिश्नर
क्रमकमिश्नरकार्यकालप्रमुख विशेषता
1एडवर्ड गार्डनर (Edward Gardner)3 मई 1815 (मात्र 9 माह)कुमाऊं के प्रथम ब्रिटिश कमिश्नर
2जॉर्ज विलियम ट्रेल (George William Traill)1816 – 1835'मनमाना प्रशासक'; उत्तराखंड में ब्रिटिश शासन का वास्तविक संस्थापक
3कर्नल गोवान (Colonel Gowan)1836 – 1838दास प्रथा का अंत; सदर अमीन पद का सृजन
4जॉर्ज थॉमस लुशिंगटन (George Thomas Lushington)1838 – 1848"शांति काल" (Era of Peace); प्रथम स्वतंत्र कमिश्नर; नैनीताल की खोज
5जॉन हैलेट बैटन (John Hallet Batten)1848 – 1856"स्वर्ण युग" (Golden Age); मुख्यालय नैनीताल स्थानांतरण
6सर हेनरी रैमजे (Sir Henry Ramsay)1856 – 1884"कुमाऊं का बेताज बादशाह"; 28 वर्षीय सर्वदीर्घ कार्यकाल
8एच.जी. रॉस (H.G. Ross)1885 – 1887भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की स्थापना इनके कार्यकाल में
9जे.आर. रीड (J.R. Reid)1887 – 1889गढ़वाल राइफल्स की स्थापना; हथियार लाइसेंस नीति
10जी.ई. अर्सकाइन (G.E. Erskine)1889 – 1892कुमाऊं जिले का अल्मोड़ा + नैनीताल में विभाजन; तराई विलय
13आर. ई. हैम्बलिन (R.E. Hamblin)1899 – 1902हरिद्वार–देहरादून रेलवे लाइन; गढ़वाल हितकारिणी सभा; नैनीताल जिला जेल
15जे. एस. कैम्पबेल (J.S. Campbell)1906 – 1914कुमाऊं भाबर खेतिहर निवासी विधि; ग्लोगी जलविद्युत परियोजना; अल्मोड़ा कांग्रेस
16पर्सी विंढम (Percy Wyndham)1914 – 1924"राजनीतिक जन-जागरण का स्वर्णिम काल"; कुमाऊं परिषद की स्थापना; कुली बेगार का अंत
17एन. सी. स्टिफ (N.C. Stiffe)1925 – 1931गैर-आईनी दर्जे की समाप्ति; कुमाऊं परिषद का INC में विलय; वन पंचायत की नींव; पेशावर कांड; तिलाड़ी नरसंहार
20ए.डब्ल्यू. इब्बटसन (A.W. Ibbotson)1935 – 1939चनौदा में गांधी आश्रम की स्थापना
21जी.एल. विवियन (G.L. Vivian)1939 – 1941द्वितीय विश्व युद्ध; व्यक्तिगत सत्याग्रह
22टी.जे.सी. एक्टन (T.J.C. Acton)1941 – 1943भारत छोड़ो आंदोलन — देघाट, सालम, सल्ट कांड
23डब्ल्यू.डब्ल्यू. फिनले (W.W. Finlay)1943 – 1947कुमाऊं रेजीमेंट की स्थापना; अंतिम ब्रिटिश कमिश्नर
पृष्ठभूमि — याद रखें
27 अप्रैल 1815 की लालमंडी संधि (एडवर्ड गार्डनर + बमशाह चौतरिया) से गोरखों ने कुमाऊं छोड़ा, जिसके पश्चात् 3 मई 1815 को गार्डनर ने कुमाऊं के प्रथम कमिश्नर के रूप में कार्यभार ग्रहण किया। यहीं से कुमाऊं कमिश्नरी (ब्रिटिश शासन) का आरम्भ माना जाता है।
खण्ड 2 — प्रथम कमिश्नर
1. एडवर्ड गार्डनर (Edward Gardner)
कार्यकाल: 3 मई 1815 से (मात्र 9 माह) — कुमाऊं के प्रथम ब्रिटिश कमिश्नर, सहायक: जॉर्ज विलियम ट्रेल
कार्यकाल
3 मई 1815 से — मात्र 9 माह का अल्पकालीन कार्यकाल
पद
ब्रिटिश कुमाऊं के प्रथम कमिश्नर
सहायक
जॉर्ज विलियम ट्रेल — जो आगे चलकर द्वितीय एवं सर्वाधिक प्रभावशाली कमिश्नर बने
गार्डनर के प्रमुख कार्य
3 मई 1815 कार्यभार ग्रहण — कुमाऊं का प्रथम कमिश्नर नियुक्त
  • 27 अप्रैल 1815 की लालमंडी संधि के पश्चात् गोरखों के कुमाऊं छोड़ने के तुरंत बाद, गार्डनर ने 3 मई 1815 को कुमाऊं के प्रथम ब्रिटिश कमिश्नर का कार्यभार ग्रहण किया।
  • इनका कार्यकाल मात्र 9 माह का रहा, परंतु इस अल्प अवधि में भी दो महत्त्वपूर्ण आरम्भिक सुधार हुए।
  • इनके सहायक जॉर्ज विलियम ट्रेल ही वास्तविक प्रशासनिक कार्यों की नींव रख रहे थे।
  • गार्डनर के कार्यकाल में ही बच्चों की खरीद-फरोख्त (बाल-विक्रय) पर पूर्ण रूप से रोक लगाई गई — यह उत्तराखंड में ब्रिटिश शासन का प्रथम सामाजिक सुधार-कार्य था।
◆ ध्यान दें — आगे चलकर कर्नल गोवान (1836) ने इसी दिशा में दास-प्रथा एवं महिला-विक्रय को भी पूर्णतः समाप्त किया। दोनों तथ्यों को न मिलाएँ।
  • गार्डनर के कमिश्नर-काल में ही कुमाऊं का प्रथम भूमि बंदोबस्त सम्पन्न हुआ, जिसे वास्तव में सहायक जॉर्ज विलियम ट्रेल ने किया।
  • यह घटना ट्रेल के सात भूमि-बंदोबस्तों की शृंखला (1815, 1817, 1818, 1820, 1823, 1828, 1833) की प्रथम कड़ी है।
PYQ — कनेक्शन
गार्डनर के मात्र 9 माह के कार्यकाल में ही भूमि बंदोबस्त की परंपरा का शुभारंभ हो गया था, जिसे ट्रेल ने अगले 19 वर्षों (1816–1835) में संस्थागत रूप दिया।
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तिथितथ्य / कार्य
3 मई 1815गार्डनर ने ब्रिटिश कुमाऊं के प्रथम कमिश्नर के रूप में कार्यभार ग्रहण किया।
1815बच्चों की खरीद-फरोख्त (बाल-विक्रय) पर पूर्ण रूप से रोक लगाई गई।
1815कुमाऊं का प्रथम भूमि बंदोबस्त — सहायक जॉर्ज विलियम ट्रेल द्वारा सम्पन्न।
9 माहगार्डनर का कुल कार्यकाल — अल्पकालीन परंतु महत्त्वपूर्ण।
खण्ड 3 — द्वितीय कमिश्नर (वास्तविक संस्थापक)
2. जॉर्ज विलियम ट्रेल (George William Traill)
कार्यकाल: 1816 से 1835 तक — उत्तराखंड में ब्रिटिश शासन का वास्तविक संस्थापक माना जाता है
🏷️ कथन एवं उपाधियाँ
  • इन्हें "मनमाना प्रशासक" भी कहा जाता है।
  • ट्रेल के शासनकाल को उत्तराखंड में "ना अपील, ना वकील, ना दलील" का काल माना जाता है।
  • उत्तराखंड में ब्रिटिश शासन का वास्तविक संस्थापक ट्रेल को ही माना जाता है।
  • प्रसिद्ध पुस्तक: "स्टैटिस्टिकल स्केच ऑफ कुमाऊं" (Statistical Sketch of Kumaon)।
ट्रेल के प्रमुख कार्य — कालक्रमानुसार
1815–1816 डाक व्यवस्था एवं जेल-निर्माण का आरम्भ
  • 1815: उत्तराखंड में पहली बार अल्मोड़ा से श्रीनगर के बीच डाक व्यवस्था शुरू हुई।
  • 1816: कुमाऊं में अल्मोड़ा जेल का निर्माण किया गया।
  • संबंधित तथ्य (1821): इसी क्रम में आगे पौड़ी में भी जेल का निर्माण किया गया।
साइड नोट — हरकारे एवं डाक चौकियां (1822)
1822 में हरकारे (Runners) नियुक्त किए गए। अल्मोड़ा से मैदानी क्षेत्रों (बरेली / मुरादाबाद) तक सरकारी पत्राचार के लिए 'डाक चौकियां' (Dak Chauki) स्थापित की गईं। हालाँकि, यह सेवा केवल सरकारी उपयोग के लिए थी, आम जनता के लिए नहीं।
  • 1817: देहरादून को सहारनपुर में शामिल किया गया।
  • 26 जून 1825: देहरादून को कुमाऊं कमिश्नरी में शामिल किया गया।
  • 1829: देहरादून को कुमाऊं कमिश्नरी से हटाकर मेरठ कमिश्नरी में मिला दिया गया।
परीक्षा जाल: देहरादून का प्रशासनिक हस्तांतरण तीन बार हुआ — सहारनपुर (1817) → कुमाऊं कमिश्नरी (1825) → मेरठ कमिश्नरी (1829)। क्रम और वर्ष न मिलाएँ।
  • 1819 में पटवारी के पदों का सृजन किया गया।
  • इस समय यह पद वंशानुगत (Hereditary) रखा गया था।
  • 1820 में कोर्ट फीस की जगह स्टाम्प पेपर जारी करना प्रारम्भ हुआ — वित्तीय प्रशासन में महत्त्वपूर्ण सुधार।
  • 1822 में आबकारी विभाग (Excise Department) की स्थापना हुई।
  • कुली बेगार के विकल्प के रूप में खच्चर सेना (Mule Army) की स्थापना की गई — यह सुझाव मिस्टर ग्लिन (Mr. Glyn) का था।
PYQ
खच्चर सेना की स्थापना (1822) कुली-बेगार प्रथा को कम करने का एक प्रशासनिक प्रयास था — सुझावकर्ता मिस्टर ग्लिन
  • 80 साला बंदोबस्त: 1823 ई० + 57 = 1880 विक्रम संवत होने के कारण इसे यह नाम मिला।
  • 7 भूमि बंदोबस्त: ट्रेल ने उत्तराखंड में कुल सात भूमि बंदोबस्त करवाए — वर्ष: 1815, 1817, 1818, 1820, 1823, 1828 और 1833
  • परगना विभाजन: डॉ. आर.एस. टोलिया के अनुसार, ट्रेल ने कुमाऊं को 22 से 26 परगनों में बांटा और कुमाऊं की सीमा का निर्धारण किया।
7 भूमि बंदोबस्त वर्ष: 1815 • 1817 • 1818 • 1820 • 1823 • 1828 • 1833 — ये सात वर्ष परीक्षा में बार-बार पूछे जाते हैं, क्रम से याद करें।
  • रंवाई (Rawain) का क्षेत्र राजा सुदर्शन शाह को वापस लौटा दिया गया।
  • सरकारी खजाने के नियंत्रण के लिए डबल लॉक व्यवस्था आरम्भ की गई — एक चाबी कलेक्टर के पास, दूसरी ट्रेजरर के पास।
  • 1827–28: हरिद्वार से बद्रीनाथ और केदारनाथ जाने वाली सड़क का निर्माण आरम्भ करवाया गया।
  • 1828: जन्म, मृत्यु और विवाह का पंजीकरण करने की प्रथा आरम्भ हुई।
  • 1828: यही वर्ष ट्रेल के सात भूमि-बंदोबस्तों में से छठे बंदोबस्त का भी वर्ष है।
  • तकनीकी विवरण: गोरखा और कत्यूरी/पंवार राजाओं के समय से चारधाम यात्रियों को मुफ्त भोजन और आश्रय देने के लिए कई गाँवों का राजस्व दान (Endowment) में दिया गया था, जिसे "सदाबर्त" कहते थे।
  • ट्रेल का सुधार (1829): पंडा और पुजारियों द्वारा इस निधि के भारी गबन को देखते हुए, ट्रेल ने 1829 में सदाबर्त गाँवों का प्रबंधन सीधे अपने हाथ में ले लिया
PYQ
सदाबर्त = चारधाम यात्रियों हेतु मुफ्त भोजन-आश्रय के लिए दान किए गए गाँवों की राजस्व-निधि; 1829 में पंडा-पुजारियों के गबन के कारण ट्रेल ने इसका प्रबंधन सीधे अपने हाथ में लिया।
  • 1829–30: नदियों पर लोहे के सस्पेंशन (झूला) पुलों का निर्माण आरम्भ हुआ।
  • 1830: मलाकतोली ग्लेशियर के पास ट्रेल पास (Traill Pass) दर्रे की खोज हुई — दर्रे का नामकरण इन्हीं के सम्मान में हुआ। इस अभियान में कुमाऊं के एक प्रसिद्ध स्थानीय गाइड मलक सिंह बूढ़ा (Malak Singh Buda) ने ट्रेल का मार्गदर्शन किया था।
PYQ — भौगोलिक तथ्य
ट्रेल पास = मलाकतोली ग्लेशियर के निकट स्थित दर्रा, जिसका नाम जॉर्ज विलियम ट्रेल के नाम पर पड़ा (खोज वर्ष 1830, स्थानीय गाइड — मलक सिंह बूढ़ा)।
  • 1833: अल्मोड़ा में देसी (Basic) चिकित्सकों की नियुक्ति की गई।
  • 1833: यह वर्ष ट्रेल के सात भूमि-बंदोबस्तों में अंतिम (सातवें) बंदोबस्त का भी वर्ष है।
  • 1834: आधुनिक हल्द्वानी शहर की स्थापना की गई।
  • 1835: ट्रेल का दीर्घकालीन (19 वर्ष) कार्यकाल समाप्त हुआ — अगले कमिश्नर कर्नल गोवान बने।
साइड नोट — चेचक का टीकाकरण (Smallpox Vaccination, 1833)
तकनीकी पहल: चेचक (Smallpox) से पहाड़ में मृत्यु दर बहुत अधिक थी। ट्रेल ने 1833 में 'देसी टीकाकारों' (Native Vaccinators) का एक कैडर तैयार किया।
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तिथितथ्य / कार्य
1815अल्मोड़ा से श्रीनगर के बीच उत्तराखंड की प्रथम डाक व्यवस्था शुरू हुई।
1816ट्रेल कुमाऊं के द्वितीय कमिश्नर नियुक्त हुए; इसी वर्ष अल्मोड़ा जेल का निर्माण।
1817देहरादून को सहारनपुर में शामिल किया गया।
1819पटवारी पदों का सृजन (इस समय वंशानुगत पद)।
1820कोर्ट फीस की जगह स्टाम्प पेपर जारी करना प्रारम्भ।
1821पौड़ी में जेल का निर्माण।
1822आबकारी विभाग की स्थापना एवं कुली-बेगार के विकल्प हेतु खच्चर सेना (मिस्टर ग्लिन के सुझाव पर)।
182380 साला बंदोबस्त; परगना 22 से 26 में विभाजित (डॉ. आर.एस. टोलिया)।
1824रंवाई क्षेत्र राजा सुदर्शन शाह को वापस; डबल लॉक व्यवस्था आरम्भ।
26 जून 1825देहरादून को कुमाऊं कमिश्नरी में शामिल किया गया।
1827–28हरिद्वार से बद्रीनाथ एवं केदारनाथ मार्ग का निर्माण आरम्भ।
1828जन्म, मृत्यु, विवाह पंजीकरण की प्रथा आरम्भ; देहरादून मेरठ कमिश्नरी में मिला।
1829सदाबर्त निधि (चारधाम यात्री-भोजन हेतु दान गाँव) का प्रबंधन — पंडा-पुजारियों के गबन के कारण सीधे ट्रेल के हाथ में।
1829–30नदियों पर लोहे के सस्पेंशन (झूला) पुलों का निर्माण आरम्भ।
1830मलाकतोली ग्लेशियर के पास ट्रेल पास दर्रे की खोज (गाइड: मलक सिंह बूढ़ा)।
1833अल्मोड़ा में देसी चिकित्सकों की नियुक्ति।
1834आधुनिक हल्द्वानी शहर की स्थापना।
1835ट्रेल का 19 वर्षीय कार्यकाल समाप्त
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क्रमभूमि बंदोबस्त — वर्ष
प्रथम1815 — गार्डनर के कार्यकाल में, ट्रेल द्वारा सम्पन्न
द्वितीय1817
तृतीय1818
चतुर्थ1820
पंचम1823 — '80 साला बंदोबस्त' के नाम से प्रसिद्ध
षष्ठम1828
सप्तम (अंतिम)1833
खण्ड 4 — तृतीय कमिश्नर
3. कर्नल गोवान (Colonel Gowan)
कार्यकाल: 1836 से 1838 तक (पूर्व में 1835–36 का संक्षिप्त अंतराल) — दास प्रथा का अंत, न्याय व्यवस्था में सुधार, पुलिस-व्यवस्था का आरम्भ एवं "अक्षम" घोषित कर हटाया जाना
गोवान के प्रमुख कार्य — कालक्रमानुसार
  • दिसंबर 1835 में जब ट्रेल ने अचानक इस्तीफा दिया, तो उनके तुरंत बाद गोवान कमिश्नर नहीं बने — बीच में कुछ माह का एक "अंतराल" (Interregnum) रहा।
  • इस बीच के कुछ महीनों के लिए मोस्ले स्मिथ (Mosley Smith) को कार्यवाहक (Officiating) कमिश्नर बनाया गया था — यानी स्थायी नियुक्ति होने तक का एक अस्थायी प्रबंध।
  • मोस्ले स्मिथ के पश्चात् ही कर्नल गोवान ने नियमित तीसरे कमिश्नर के रूप में 1836 में कार्यभार संभाला।
गुप्त तथ्य — सावधान रहें
मोस्ले स्मिथ केवल कार्यवाहक कमिश्नर थे, इसलिए उन्हें कुमाऊं के 23 नियमित कमिश्नरों की क्रम-संख्या में नहीं गिना जाता — सूची में गोवान ही औपचारिक रूप से तृतीय कमिश्नर बने रहते हैं (देखें ऊपर खण्ड 1 की मास्टर सूची)। यदि परीक्षा में पूछा जाए "ट्रेल के इस्तीफे के तुरंत बाद कौन कमिश्नर बना", तो ध्यान दें — वास्तविक उत्तराधिकार में पहले मोस्ले स्मिथ (कार्यवाहक) आते हैं, और तभी गोवान (नियमित) आते हैं।
1836 दास प्रथा का अंत एवं न्याय व्यवस्था में सुधार
  • गोवान के समय उत्तराखंड में दास प्रथा, बाल-विक्रय एवं महिला-विक्रय का पूर्णतः अंत किया गया और इन्हें अपराध घोषित कर दिया गया।
  • 1836 में पदभार संभालते ही इन्होंने दासता पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया।
  • गोरखाकालीन न्याय व्यवस्थाओं (जैसे विभिन्न प्रकार की दिव्य परीक्षाएँ / 'दीप') को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया।
PYQ — महत्त्वपूर्ण तुलना
गार्डनर (1815) ने केवल बाल-विक्रय पर रोक लगाई थी; गोवान (1836) ने दास प्रथा, बाल-विक्रय एवं महिला-विक्रय — तीनों को पूर्णतः अपराध घोषित किया तथा गोरखाकालीन दिव्य-परीक्षाएँ भी समाप्त की।
  • न्याय व्यवस्था में सुधार करते हुए गोवान ने 'सदर अमीन' (Sadar Amin) पद का सृजन किया।
  • 1837: गोवान के समय कुमाऊं का पहला पुलिस थाना अल्मोड़ा में स्थापित किया गया।
  • 1843संबंधित तथ्य: आगे चलकर नैनीताल पुलिस थाना बना — यह कमिश्नर लुशिंगटन के कार्यकाल में बना था।
  • 1869संबंधित तथ्य: इसी क्रम में रानीखेत पुलिस थाना भी स्थापित किया गया।
  • एडवर्ड गार्डनर, जी.डब्ल्यू. ट्रेल अथवा उनके बाद आने वाले लुशिंगटन और बैटन — ये सभी प्रशासनिक सेवा (Civil Services) से थे, परन्तु गोवान पूरी तरह से सेना (Army) से उठाकर कमिश्नर बनाए गए थे।
  • इस सैनिक पृष्ठभूमि के कारण गोवान को पहाड़ी क्षेत्रों के जटिल राजस्व एवं भूमि-संबंधी मामलों का व्यावहारिक अनुभव नहीं था।
  • परिणामस्वरूप गोवान फाइलों और मुकदमों के बढ़ते बोझ को संभाल नहीं पाए।
  • आगरा बोर्ड (Board at Agra) उनके कामकाज से इतना अधिक असंतुष्ट हुआ कि उन्हें अक्षम (Inefficient) मानकर मात्र दो वर्षों के भीतर ही — 1838 में — पद से हटा दिया गया।
  • उनके स्थान पर अगले (चतुर्थ) कमिश्नर के रूप में जॉर्ज थॉमस लुशिंगटन को भेजा गया।
इतिहासकार की टिप्पणी — PYQ संभावित
इतिहासकार डॉ. आर.एस. तोलिया के अनुसार, गोवान के कार्यकाल को प्रशासनिक रूप से "सबसे कमजोर और अव्यवस्थित" कार्यकाल माना जाता है।
याद रखने की कड़ी (Chain): सैनिक पृष्ठभूमि → राजस्व/भूमि मामलों का अनुभव नहीं → फाइलों-मुकदमों का बोझ न संभल पाना → आगरा बोर्ड द्वारा "अक्षम" घोषित → मात्र 2 वर्ष (1836–38) में पद से हटाए गए — गोवान कुमाऊं के 23 कमिश्नरों में सबसे संक्षिप्त एवं सर्वाधिक आलोचित कार्यकालों में से एक रहे।
🎯 Self-Test — गोवान की तिथियाँ
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तिथितथ्य / कार्य
1835–36मोस्ले स्मिथ ट्रेल और गोवान के बीच कार्यवाहक (Officiating) कमिश्नर रहे — गोवान को इसी अंतराल के बाद नियमित तीसरे कमिश्नर का दायित्व मिला।
1836पदभार ग्रहण करते ही दास प्रथा पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया; बाल-विक्रय व महिला-विक्रय को अपराध घोषित किया।
1836गोरखाकालीन दिव्य परीक्षाओं (न्याय की परम्पराओं) को पूर्णतः समाप्त किया।
1837न्याय-सुधार हेतु 'सदर अमीन' पद का सृजन किया।
1837कुमाऊं का प्रथम पुलिस थाना — अल्मोड़ा में स्थापित किया।
  • 1843नैनीताल पुलिस थाना स्थापित — कमिश्नर लुशिंगटन के कार्यकाल में (गोवान का नहीं)।
  • 1869रानीखेत पुलिस थाना स्थापित (बहुत बाद का तथ्य)।
1838एकमात्र सैनिक पृष्ठभूमि वाले कमिश्नर होने के कारण राजस्व/भूमि-कार्यों का अनुभव नहीं; आगरा बोर्ड द्वारा "अक्षम" (Inefficient) मानकर हटाए गए — कार्यकाल अंत।
खण्ड 5 — चतुर्थ कमिश्नर
4. जॉर्ज थॉमस लुशिंगटन (George Thomas Lushington)
कार्यकाल: 1838 से 1848 तक — "शांति काल" (Era of Peace); कुमाऊं के प्रथम स्वतंत्र कमिश्नर; नैनीताल की खोज इन्हीं के काल में हुई
कार्यकाल
1838 से 1848 तक (10 वर्ष) — कार्यकाल में ही नैनीताल में मृत्यु
विशेषता
कार्यकाल को "शांति काल" (Era of Peace) कहा जाता है
ऐतिहासिक पद
कुमाऊं के प्रथम स्वतंत्र कमिश्नर (1839 से, जब कमिश्नरी स्वतंत्र निकाय बनी)
अन्य
कुमाउनी कवि गुमानी पंत ने इनकी प्रशंसा में छंद लिखे
लुशिंगटन के प्रमुख कार्य (कालक्रमानुसार)
1838 – 1839 महा-पुनर्गठन — स्वतंत्र निकाय · गढ़वाल पृथक्करण · केंद्रीय अभिलेखागार · हडलस्टन स्कूल
दिस॰ 1838
अधिनियम / कानून
रेगुलेशन 10 ऑफ 1838 पारित
कुमाऊं को 'बोर्ड ऑफ फर्रुखाबाद' (आगरा बोर्ड) के नियंत्रण से मुक्त कर NWP के अंतर्गत स्वतंत्र नॉन-रेगुलेशन निकाय का वैधानिक दर्जा दिया गया।
① स्वतंत्र निकाय — 1839
कमिश्नरी → Independent Body
∴ लुशिंगटन = कुमाऊं के प्रथम स्वतंत्र कमिश्नर
② गढ़वाल पृथक्करण — 1839
ब्रिटिश गढ़वाल जिला — नया निर्माण
प्रमुख: सीनियर असिस्टेंट / डिप्टी कमिश्नर
प्रथम: जे.एच. बैटन (श्रीनगर)
③ अभिलेखागार — 1839
केंद्रीय अभिलेखागार स्थापित
स्थान: अल्मोड़ा
Central Record Room
④ शिक्षा — 1839
हडलस्टन स्कूल स्थापित
स्थान: श्रीनगर
Huddleston School
📖 पृष्ठभूमि / सन्दर्भ पढ़ें — यह कैसे हुआ? (क्लिक करें)
1815–1835 · ट्रेल काल
कमिश्नरी 'बोर्ड ऑफ फर्रुखाबाद' के अधीन थी — पर ट्रेल ने इसे व्यावहारिक रूप से नकारा। प्रशासन मौखिक आदेशों व व्यक्तिगत विवेक (Paternalistic Rule) पर चला; कोई लिखित रिकॉर्ड नहीं।
1835–1838 · गोवान की विफलता
उत्तराधिकारी कर्नल गोवान दुर्बल प्रशासक सिद्ध हुए। आगरा बोर्ड ने मैदानी कानून व लिखित रिपोर्टें थोपीं — न्यायिक तंत्र ठप; मुकदमे वर्षों तक लंबित।
दिस॰ 1838 · समाधान
रेगुलेशन 10 ने कुमाऊं को बोर्ड के नियंत्रण से मुक्त किया। लुशिंगटन नए कमिश्नर बने और उन्होंने प्रशासन को 'व्यक्तिगत विवेक' से हटाकर 'लिखित नियमों व संस्थाओं' पर आधारित किया — Central Record Room इसी का परिणाम था।
परीक्षा ट्रिक — कमिश्नरों के प्रकार
प्रथम कमिश्नर    एडवर्ड गार्डनर
वास्तविक कमिश्नर    जॉर्ज विलियम ट्रेल
प्रथम स्वतंत्र कमिश्नर    जॉर्ज थॉमस लुशिंगटन
मुख्यालय
① पौड़ी जनपद गठन — मुख्यालय स्थानांतरण
श्रीनगर ✗ पौड़ी ✓
निर्णय: लुशिंगटन + जे.एच. बैटन (संयुक्त)  ·  यहीं से पौड़ी गढ़वाल जनपद का उदय
② यात्री स्वास्थ्य सेवा — 1840
बद्रीनाथ + केदारनाथ मार्ग पर असिस्टेंट सर्जन्स नियुक्त
तीर्थयात्रियों हेतु चिकित्सा सुविधा · Assistant Surgeons
📖 श्रीनगर से पौड़ी क्यों? — कारण पढ़ें (क्लिक करें)
श्रीनगर की समस्याएँ: अलकनंदा घाटी में गहरा — ग्रीष्मकाल में अत्यधिक गर्म; हैजा-मलेरिया महामारियों का केंद्र; जिले के सीमांत छोर पर — पूरे गढ़वाल पर नियंत्रण कठिन।
पौड़ी क्यों: अधिक ऊँचाई → ठंडी जलवायु; गढ़वाल का मध्यवर्ती क्षेत्र → प्रशासनिक नियंत्रण सुगम।
स्मरण सूत्र: 1839 → गढ़वाल जिला बना  →  1840 → पौड़ी मुख्यालय बना — क्रमिक घटनाएं, एक ही वर्ष नहीं।
  • पी. बैरन (P. Barron) द्वारा नैनीताल की खोज लुशिंगटन के कार्यकाल में ही की गई।
◆ नैनीताल की खोज लुशिंगटन के समय (1841) हुई — यह परीक्षा में अलग से पूछा जाता है।
  • तराई जिले का गठन किया गया।
📖 तराई को कुमाऊँ से अलग क्यों किया गया? (क्लिक करें)
कमिश्नर थॉमस लुशिंगटन के निर्णय से 1842 में तराई को कुमाऊँ कमिश्नरी से पृथक किया गया। इसे नया 'तराई जिला' बनाकर रुहेलखंड डिवीजन के मैदानी प्रशासन के अधीन सौंपा गया।
प्रमुख कारण:
  • डकैतों का आतंक: मैदानी डकैतों के आगे कुमाऊँ की निहत्थी 'पटवारी पुलिस' (राजस्व पुलिस) असमर्थ थी।
  • सशस्त्र पुलिस की ज़रूरत: डकैतों पर नकेल हेतु सशस्त्र पुलिस व सख्त मजिस्ट्रेट केवल रुहेलखंड डिवीजन के अधीन ही संभव थे।
  • मलेरिया का खौफ: तराई का जानलेवा मलेरिया अंग्रेज़ अफसरों के लिए बड़ा खतरा था, इसलिए पहाड़ से सीधा प्रशासन टाला गया।
1858 में वापसी: तराई-भाबर के चरागाहों (खत्तों) पर निर्भर कुमाऊँ के पशुपालकों व मैदानी अधिकारियों के विवाद समाप्त करने हेतु कमिश्नर हेनरी रैम्जे ने तराई को रुहेलखंड से हटाकर पुनः कुमाऊँ कमिश्नरी में मिला दिया।
  • नगरपालिका के गठन हेतु Act X of 1842 पारित हुआ और नैनीताल के विकास का आरंभ हुआ।
  • लुशिंगटन के कार्यकाल में नैनीताल में पहले पुलिस थाने की स्थापना हुई।
परीक्षा जाल: अल्मोड़ा (1837) थाना गोवान के काल में बना; नैनीताल (1843) थाना लुशिंगटन के काल में — दोनों को न मिलाएँ।
  • खैरना से नैनीताल मार्ग का निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ।
  • अल्मोड़ा में डिस्पेंसरी कमेटी (Dispensary Committee) का गठन किया गया।
  • बागेश्वर में गोमती नदी पर पुल का निर्माण किया गया।
  • कमिश्नर के पद पर रहते हुए नैनीताल में इनकी मृत्यु हो गई।
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तिथितथ्य / कार्य
1815–1839कमिश्नरी 'बोर्ड ऑफ फर्रुखाबाद' (आगरा बोर्ड) के अधीन; ट्रेल काल में मौखिक आदेशों पर प्रशासन।
दिसंबर 1838रेगुलेशन 10 ऑफ 1838 पारित — कुमाऊं को आगरा बोर्ड से मुक्त कर स्वतंत्र नॉन-रेगुलेशन निकाय का दर्जा; कर्नल गोवान अपदस्थ।
1839कमिश्नरी स्वतंत्र निकाय बनी → लुशिंगटन = प्रथम स्वतंत्र कमिश्नर
1839प्रांत दो जिलों में विभक्त: कुमाऊं जिला (अल्मोड़ा) + ब्रिटिश गढ़वाल जिला (श्रीनगर); प्रमुख = सीनियर असिस्टेंट/डिप्टी कमिश्नर; प्रथम = जे.एच. बैटन
1839अल्मोड़ा में केंद्रीय अभिलेखागार (Central Record Room) स्थापित; श्रीनगर में हडलस्टन स्कूल की स्थापना।
1840पौड़ी जनपद गठन; गढ़वाल मुख्यालय श्रीनगर → पौड़ी (जलवायु/भौगोलिक कारण); बद्री–केदार मार्ग पर असिस्टेंट सर्जन्स नियुक्त।
1841पी. बैरन (P. Barron) द्वारा नैनीताल की खोज
1842तराई जिले का गठन; Act X of 1842 — नगरपालिका एक्ट; नैनीताल विकास आरंभ।
1843नैनीताल में प्रथम पुलिस थाना स्थापित (लुशिंगटन — गोवान नहीं)।
1845खैरना–नैनीताल सड़क निर्माण आरंभ।
1848अल्मोड़ा डिस्पेंसरी कमेटी; बागेश्वर में गोमती नदी पर पुल; नैनीताल में पद पर मृत्यु
खण्ड 6 — पंचम कमिश्नर
5. जॉन हैलेट बैटन (John Hallet Batten)
कार्यकाल: 1848 से 1856 तक — "स्वर्ण युग" (Golden Age) — मुख्यालय अल्मोड़ा से नैनीताल स्थानांतरित; पहली रेलगाड़ी व ऊपरी गंगा नहर
कार्यकाल
1848 से 1856 तक (कमिश्नर के रूप में)
विशेषता
कार्यकाल को "स्वर्ण युग" (Golden Age) कहा जाता है
पूर्व-सेवा
1836–1848 तक असिस्टेंट कमिश्नर के रूप में कार्य; इसी दौरान 20 साला बंदोबस्त किया
कमिश्नर बनने से पूर्व के कार्य (सहायक के रूप में)
1840 / 1844 20 साला बंदोबस्त (8वाँ भूमि बंदोबस्त) — गढ़वाल एवं कुमाऊं
  • असिस्टेंट के पद पर रहते हुए बैटन ने 1840 में गढ़वाल का और 1844 में कुमाऊं का भूमि बंदोबस्त किया। इसे '20 साला बंदोबस्त' (20-Year Settlement) भी कहा जाता है।
  • 1840 का यह बंदोबस्त गढ़वाल का प्रथम विस्तृत/20 साला भूमि बंदोबस्त था — परीक्षा में अलग से पूछा जाता है।
PYQ कनेक्शन
ट्रेल के 7 बंदोबस्त (1815–1833) → बैटन का 8वाँ बंदोबस्त (1840 गढ़वाल + 1844 कुमाऊं) — क्रम याद रखें।
कमिश्नर के रूप में बैटन के प्रमुख कार्य (कालक्रमानुसार)
  • बैटन ने कमिश्नर बनते ही अप्रशिक्षित पटवारियों की जगह शिक्षित पटवारियों की नियुक्ति की।
  • सरकारी डाक बंगलों (Dak Bungalows) को आम यात्रियों के ठहरने हेतु खोल दिया गया।
  • अल्मोड़ा दवाखाने (Dispensary) की एक शाखा पिथौरागढ़ में खोली गई।
  • अल्मोड़ा में रेवरेंड जे.एच. बडन (Rev. J.H. Budden) द्वारा लंदन मिशनरी सोसाइटी (London Missionary Society) की स्थापना की गई।
  • बमोरी से अल्मोड़ा मार्ग का सर्वेक्षण (Survey) किया गया।
  • ऊपरी गंगा नहर (Upper Ganga Canal) के निर्माण में मिट्टी व सामग्री ढोने हेतु 1851 में रुड़की से पिरान कलियर के बीच भारत (एवं उत्तराखंड) की प्रथम मालगाड़ी ट्रेन चली।
  • यह नहर लुशिंगटन के समय में प्रारंभ हुई थी, परंतु 1854 में बैटन के काल में पूर्ण हुई।
PYQ — परीक्षा में सर्वाधिक पूछा जाने वाला तथ्य
1851 — रुड़की–पिरान कलियर = भारत की प्रथम मालगाड़ी / उत्तराखंड की प्रथम ट्रेन। यह बैटन के कार्यकाल में हुई।
  • असिस्टेंट कमिश्नर जॉन स्ट्रेची द्वारा श्रीनगर (गढ़वाल) में अलकनंदा नदी पर प्रथम लोहे के सस्पेंशन पुल का निर्माण किया गया।
  • अक्टूबर 1854 में कुमाऊं कमिश्नरी का कार्यालय (मुख्यालय) आधिकारिक रूप से अल्मोड़ा से नैनीताल स्थानांतरित कर दिया गया।
PYQ कनेक्शन
कुमाऊं कमिश्नरी का मुख्यालय कब-कहाँ: अल्मोड़ा (1815–1854)नैनीताल (अक्टूबर 1854, बैटन के काल में)
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तिथितथ्य / कार्य
1836–1848बैटन — असिस्टेंट कमिश्नर के रूप में कार्य (कमिश्नर बनने से पूर्व)।
1840गढ़वाल का 20 साला बंदोबस्त — गढ़वाल का प्रथम विस्तृत भूमि बंदोबस्त।
1844कुमाऊं का 20 साला बंदोबस्त (8वाँ भूमि बंदोबस्त)।
1848शिक्षित पटवारियों की नियुक्ति।
1849डाक बंगले आम यात्रियों के लिए खोले गए।
1849अल्मोड़ा दवाखाने की शाखा पिथौरागढ़ में।
1850अल्मोड़ा में लंदन मिशनरी सोसाइटी (Rev. J.H. Budden) की स्थापना।
1850बमोरी–अल्मोड़ा मार्ग का सड़क सर्वेक्षण।
1851भारत की प्रथम मालगाड़ी — रुड़की से पिरान कलियर (ऊपरी गंगा नहर निर्माण के लिए)।
1853जॉन स्ट्रेची द्वारा श्रीनगर में अलकनंदा पर प्रथम लोहे का सस्पेंशन पुल
1854ऊपरी गंगा नहर (Upper Ganga Canal) पूर्ण।
अक्टूबर 1854कुमाऊं कमिश्नरी मुख्यालय अल्मोड़ा → नैनीताल स्थानांतरित।
खण्ड 7 — षष्ठम कमिश्नर
6. सर हेनरी रैमजे (Sir Henry Ramsay)
कार्यकाल: 1856 से 1884 तक — "कुमाऊं का बेताज बादशाह" / 'रामजी' — सर्वाधिक दीर्घ (28 वर्ष) कार्यकाल वाला कमिश्नर
कार्यकाल
1856 से 1884 तक (28 वर्ष — सबसे लंबा कार्यकाल)
मूल निवास
मूल रूप से स्कॉटलैंड के निवासी; भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी के चचेरे भाई थे
स्थानीय जुड़ाव
धाराप्रवाह कुमाउनी (पहाड़ी) भाषा बोलते थे; किसानों-मजदूरों के साथ बैठकर मडुवे (रागी) की रोटी भी खा लेते थे
उपाधियाँ
"कुमाऊं का बेताज बादशाह"; स्थानीय लोग प्यार से 'रामजी' कहते थे
बद्री दत्त पांडे की उपाधियाँ ('कुमाऊं का इतिहास' से)
तराई-भाबर सम्बन्धी उपाधियाँ "विश्वकर्मा", "शिल्पकार" एवं "PWD ऑफिसर"
  • कुमाऊं (तराई-भाबर) में नहरों व विकास कार्यों के कारण बद्री दत्त पांडे ने अपनी पुस्तक 'कुमाऊं का इतिहास' में रैमजे को — "तराई-भाबर का विश्वकर्मा", "तराई-भाबर का शिल्पकार" और "तराई-भाबर का PWD ऑफिसर" कहा है।
PYQ कनेक्शन
तीन उपाधियाँ एक साथ याद रखें — विश्वकर्मा / शिल्पकार / PWD ऑफिसर — सभी "तराई-भाबर" के सन्दर्भ में, लेखक: बद्री दत्त पांडे
कमिश्नर बनने से पूर्व का कार्य (सहायक कमिश्नर के रूप में)
  • रैमजे ~1840 के आसपास अल्मोड़ा में सिविल अधिकारी के रूप में नियुक्त हुए।
  • उस समय कुमाऊं में कुष्ठ रोग को लेकर भारी सामाजिक कलंक (stigma) था — रोगियों को गाँवों से बाहर निकाल दिया जाता था।
  • रोगियों की दुर्दशा से व्यथित होकर रैमजे ने व्यक्तिगत स्तर पर उनकी देखभाल का बीड़ा उठाया।
  • रैमजे ने अपने स्वयं के धन से अल्मोड़ा में कुष्ठ रोगियों हेतु पत्थर की छोटी झोपड़ियाँ बनवाईं।
  • इस प्रारंभिक बस्ती का स्थान "गणेश की गैर" कहलाता था।
    (कुमाउनी में 'गैर' = जमीन का एक टुकड़ा / सीढ़ीदार खेत)
  • यह कोई सरकारी पहल नहीं थी — यह रैमजे की व्यक्तिगत धर्मार्थ (personal charity) पहल थी।
  • 1848 के आसपास इसी स्थान पर कुष्ठ रोगियों के ठहरने की यह प्रारंभिक व्यवस्था की गई — ब्रिटिश प्रशासन के ऐतिहासिक ग्रंथों में सत्यापित।
  • ~1850–51: रैमजे ने इस आश्रम का प्रबंधन लंदन मिशनरी सोसाइटी (LMS) को सौंप दिया।
  • 1854: स्टेशन के दक्षिण-पूर्व की एक अलग पहाड़ी पर संगठित कुष्ठ आश्रम की औपचारिक स्थापना एवं स्थानांतरण पूर्ण हुआ — भारतीय चिकित्सा इतिहास में यही वर्ष आधिकारिक माना जाता है।
  • बाद में 'द मिशन टू लेपर्स' द्वारा सहायता प्राप्त हुई।
  • वर्तमान में यह संस्था 'द लेप्रोसी मिशन ट्रस्ट इंडिया' द्वारा स्नेहालय (House of Love) नाम से संचालित की जा रही है।
  • कमिश्नर बनने से पूर्व, सहायक कमिश्नर के रूप में कार्य करते हुए रैमजे ने रामनगर शहर की स्थापना की थी।
  • मूल स्थापना (1851): इसकी शुरुआत अगस्त 1851 में 'अल्मोड़ा मिशन स्कूल' के रूप में हुई थी।
  • संस्थापक: रेवरेंड जे.एच. बडेन (Rev. J.H. Budden)। यह 'लंदन मिशनरी सोसाइटी' द्वारा स्थापित किया गया था।
  • वर्तमान भवन (1871): 1871 में इसे वर्तमान भवन में स्थानांतरित किया गया। यह भवन उसी स्थान पर बना है जहाँ कभी चंद वंशीय राजाओं का महल हुआ करता था।
  • नामकरण (1886): 1886 में कलकत्ता विश्वविद्यालय (Calcutta University) से मान्यता मिलने पर, कुमाऊं के तत्कालीन कमिश्नर सर हेनरी रैमजे के नाम और सम्मान में इसका नाम बदलकर 'रैमजे कॉलेज' कर दिया गया।

रैमजे के काल में स्थापित अन्य प्रमुख विद्यालय (नैनीताल)

विद्यालय स्थापना वर्ष विशेष तथ्य
Sherwood College 1869 रैमजे के व्यक्तिगत निवास की भूमि पर निर्मित; उनके सक्रिय सहयोग से स्थापित।
All Saints' College 1869 बालिकाओं के लिए आवासीय विद्यालय के रूप में स्थापित।
St. Mary's Convent High School 1878 रैमजे से खरीदी गई संपत्ति (estate) पर स्थापित।
St. Joseph's College 1888 रैमजे के अंतिम दशक में मिशनरी आगमन की नींव तैयार हुई।
रैमजे के प्रमुख कार्य एवं घटनाएँ (कालक्रमानुसार)
  • मार्शल लॉ: क्रांति के दौरान कुमाऊं में शांति बनाए रखने हेतु विभिन्न स्थानों पर मार्शल लॉ लागू किया गया तथा न्यायालयों की स्थापना की गई।
  • हल्द्वानी पर कब्ज़ा: बरेली के खान बहादुर खान के सेनापति काले खां ने 17 सितंबर 1857 को हल्द्वानी पर कब्ज़ा कर लिया।
  • पुनः कब्ज़ा: ब्रिटिश अधिकारी कैप्टन मैक्सवेल (Captain Maxwell) एवं गोरखाओं की 'रणवीर सेना' द्वारा हल्द्वानी पर पुनः कब्ज़ा किया गया।
  • प्रथम स्वतंत्रता सेनानी: इसी क्रांति के दौरान चंपावत के कालू माहरा ने 'क्रांतिवीर' नामक गुप्त संगठन बनाया — इन्हें उत्तराखंड के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी होने का गौरव प्राप्त है।
PYQ — सर्वाधिक पूछा जाने वाला तथ्य
उत्तराखंड के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी = कालू माहरा (चंपावत), संगठन — 'क्रांतिवीर', हल्द्वानी पर कब्ज़ा — काले खां (17 सितंबर 1857), पुनः कब्ज़ा — कैप्टन मैक्सवेल + रणवीर सेना (गोरखा)
  • प्रथम चर्च: नैनीताल में पादरी विलियम बटलर द्वारा कुमाऊं के प्रथम (मेथोडिस्ट) चर्च की स्थापना की गई।
  • हिल रेजिमेंट: रैमजे के प्रयासों से 1858 में ही कुमाऊं में हिल रेजिमेंट (Hill Regiment) का गठन किया गया।
  • रैमजे के समय में कुमाऊं का 9वाँ भूमि बंदोबस्त हुआ, जिसके बंदोबस्त अधिकारी जी.ई. बैकेट (G.E. Beckett) थे — इसलिए इसे 'बैकेट बंदोबस्त' भी कहा जाता है।
  • इसमें पहली बार वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग कर भूमि को 5 भागों में बांटा गया — तलाव, उपराऊं अव्वल, उपराऊं दोयम, कटील (कंटीली), और इजरान
📋 5 भूमि श्रेणियां — विस्तृत वर्गीकरण (बैकेट बंदोबस्त, 1863–73)
वर्गीकरण का आधार था — उर्वरता (Fertility) और सिंचाई की सुविधा (Irrigation)। उत्कृष्टता के क्रम में पाँचों श्रेणियाँ:
  1. तलाव (Talao / Talaon)सर्वश्रेष्ठ श्रेणी। घाटी के निचले हिस्सों (Valley Bottoms) की सिंचित भूमि (Irrigated Land)। नदी-नाले के निकट होने के कारण पानी सदा सुलभ, फसल अत्यंत उत्तम।
  2. उपराऊं अव्वल (Upraon Awwal) — पहाड़ियों के ढलानों (Hill Sides) पर स्थित प्रथम श्रेणी की असिंचित भूमि। मिट्टी उपजाऊ परंतु वर्षाजल पर निर्भर।
  3. उपराऊं दोयम (Upraon Doyam) — पहाड़ियों के ढलानों पर ही स्थित द्वितीय श्रेणी की असिंचित भूमि। अव्वल से कम उपजाऊ — पथरीलापन अधिक, मिट्टी पतली।
  4. इजरान (Ijran / Izraan) — घटिया किस्म की पथरीली या सीढ़ीनुमा भूमि जहाँ लगातार खेती संभव नहीं थी। कुछ वर्ष जोतने के बाद भूमि को परती छोड़ना पड़ता था।
  5. कटील / कंटीली (Katil / Kateel) — जंगलों के किनारे (Forest Edges) झाड़ियाँ काटकर बनाई गई नई या बंजर भूमि। सबसे निम्न श्रेणी — अभी हाल ही में कृषि योग्य बनाई गई, उत्पादकता न्यूनतम।
PYQ कनेक्शन
बंदोबस्त क्रम याद रखें: ट्रेल का 7वाँ → बैटन का 8वाँ (20 साला) → रैमजे/बैकेट का 9वाँ (1863–73) — पहली बार 5 श्रेणियों में वैज्ञानिक वर्गीकरण।
  • रैमजे के कार्यकाल के दौरान ही अल्मोड़ा नगरपालिका की स्थापना की गई।
  • नैनीताल में एक छोटा भूस्खलन आया, जिसके बाद सुरक्षा हेतु 'हिल सेफ्टी कमेटी' का गठन किया गया।
PYQ कनेक्शन
1867 — हिल सेफ्टी कमेटी = उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन का पहला प्रयास। इसे 1880 के शेर-का-डांडा भूस्खलन से अलग रखें (वह 13 साल बाद हुआ)।
  • नैनीताल से पत्रकार जयदत्त जोशी ने 1868 में 'समय विनोद' नामक पत्र निकाला, जो 1877 तक प्रकाशित होता रहा।
  • स्वरूप: यह एक द्विभाषी (Bilingual) पत्र था — हिंदी एवं उर्दू, दोनों भाषाओं में प्रकाशित होता था; पत्र का अंतिम पृष्ठ सदैव उर्दू में होता था।
  • महत्व: उत्तराखंड से प्रकाशित होने वाला प्रथम देशी भाषाई (वर्नाक्यूलर) समाचार पत्र। चूँकि यह आधा उर्दू में भी था, इसलिए इसे "प्रथम पूर्ण हिंदी पत्र" का दर्जा नहीं मिलता — वह सम्मान आगे चलकर 'अल्मोड़ा अखबार' (1871) को मिला (देखें नीचे 1870 की प्रविष्टि)।
PYQ ट्रैप — दो अलग-अलग 'जयदत्त जोशी', भ्रमित न हों
'समय विनोद' (1868) के संपादक जयदत्त जोशी (पत्रकार), & कुमाऊं परिषद (1916) के संस्थापक सदस्य एवं प्रथम अधिवेशन (1917, अल्मोड़ा) के अध्यक्ष जयदत्त जोशी (राजनेता) से पूर्णतः भिन्न व्यक्ति हैं — परीक्षा में इन दोनों को कभी एक न समझें।
प्रथम वर्नाक्यूलर (देशी भाषाई) पत्र    'समय विनोद' (1868)
प्रथम पूर्ण हिंदी साप्ताहिक पत्र    'अल्मोड़ा अखबार' (1871)
  • अल्मोड़ा में बुद्धि बल्लभ पंत द्वारा 'डिबेटिंग क्लब' की स्थापना की गई — साथ ही सदानंद सनवाल भी इसके सह-संस्थापकों में थे
    तत्कालीन North-Western Provinces के Lieutenant Governor सर विलियम म्योर (Sir William Muir) का भी इसे परोक्ष संरक्षण प्राप्त था।
  • उद्देश्य: स्थानीय जनता की समस्याओं पर विचार-विमर्श करना, प्रशासन तक जनता की आवाज़ पहुँचाना और समाज में राजनीतिक व बौद्धिक चेतना (Intellectual Awakening) जगाना।
  • इसी क्लब के प्रयासों से 1871 में अल्मोड़ा में एक प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना हुई, जिससे उसी वर्ष 'अल्मोड़ा अखबार' — कुमाऊं का पहला हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र — प्रारंभ हुआ; इसके प्रथम संपादक बुद्धि बल्लभ पंत ही थे।
आगे की कहानी — इल्बर्ट बिल समर्थन (1883)
जब पूरे देश में अंग्रेज 'इल्बर्ट बिल' (भारतीय जजों को अंग्रेजों के मुकदमे सुनने का अधिकार) का विरोध कर रहे थे, तब डिबेटिंग क्लब ने इसका खुलकर समर्थन किया — अल्मोड़ा में इसके समर्थन में एक विशाल जनसभा आयोजित हुई, जिसकी अध्यक्षता बुद्धि बल्लभ पंत ने की। इस जनसभा ने सिद्ध कर दिया कि कुमाऊं का बौद्धिक वर्ग अब राष्ट्रीय स्तर की राजनीति से जुड़ चुका था।
  • कुमाऊं में 'अधिसूचित जिला अधिनियम' (Scheduled District Act) लागू हुआ।
  • इसके तहत कुमाऊं को एक नॉन-रेगुलेशन प्रांत घोषित कर दिया गया, जिससे कमिश्नर को विशेष अधिकार मिल गए — किसी भी सामान्य कानून को यहाँ लागू होने से रोकने की शक्ति।
  • पुलिस एक्ट 1861 से बचाव: रैमजे का मानना था कि पहाड़ के लोग सीधे-सादे हैं, अपराध लगभग शून्य हैं, और 'रेगुलर पुलिस' (थाना-चौकी) के आने से भ्रष्टाचार व जनता का उत्पीड़न बढ़ेगा — इसलिए ग्रामीण कुमाऊं-गढ़वाल में 1861 का पुलिस एक्ट लागू नहीं किया गया
  • पटवारी को पुलिस शक्तियां: ट्रेल द्वारा 1819 में सृजित 'पटवारी' पद को इसी एक्ट (धारा 6) से मजबूत कानूनी मान्यता मिली — राजस्व अधिकारी (पटवारी, कानूनगो, नायब तहसीलदार, तहसीलदार, एसडीएम) ही FIR दर्ज करने, विवेचना करने व गिरफ्तारी का कानूनी अधिकार पाकर पुलिस का काम करने लगे।
PYQ — शक्तियों का केंद्रीकरण
सामान्यतः पुलिस (SP) व राजस्व (DM) शक्तियां अलग होती हैं, परंतु इस एक्ट से उत्तराखंड के पहाड़ों में दोनों एक ही अधिकारी में केंद्रित हुईं: पटवारी → दरोगा, कानूनगो → इंस्पेक्टर, SDM → डिप्टी एसपी, DM → SP के समकक्ष कार्य करने लगे।
  • नैनीताल की शेर-का-डांडा (Sher-Ka-Danda) पहाड़ी पर एक अत्यंत विनाशकारी भूस्खलन हुआ।
  • इसमें लगभग 151 लोगों की मृत्यु हो गई थी और नैना देवी का प्राचीन मंदिर भी नष्ट हो गया था।
PYQ — महत्वपूर्ण तिथि एवं आंकड़ा
18 सितंबर 1880 — शेर-का-डांडा भूस्खलन~151 मृत्यु + नैना देवी मंदिर नष्ट। यह 1867 की हिल सेफ्टी कमेटी के 13 साल बाद हुआ।
  • तराई-भाबर क्षेत्र के विकास एवं सुधार कार्यों हेतु रैमजे द्वारा 'तराई इम्प्रूवमेंट फंड' (Tarai Improvement Fund) की स्थापना की गई।
  • 24 अप्रैल 1884 को पहली बार लखनऊ से काठगोदाम रेलवे स्टेशन पर ट्रेन आई।
PYQ कनेक्शन
रेल कनेक्शन याद रखें: 1851 — रुड़की–पिरान कलियर (बैटन) = भारत/उत्तराखंड की प्रथम ट्रेन (मालगाड़ी) → 24 अप्रैल 1884 — लखनऊ–काठगोदाम (रैमजे) = कुमाऊं क्षेत्र को रेल से जोड़ने वाली प्रथम ट्रेन, रैमजे के 28 वर्षीय कार्यकाल का अंतिम वर्ष।
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तिथितथ्य / कार्य
1850सहायक कमिश्नर रहते हुए रामनगर की स्थापना।
1856–1884रैमजे का 28 वर्षीय कार्यकाल — कुमाऊं का 'बेताज बादशाह' / 'रामजी'।
17 सितंबर 1857काले खां द्वारा हल्द्वानी पर कब्ज़ा; पुनः कब्ज़ा — कैप्टन मैक्सवेल + रणवीर सेना; कालू माहरा — 'क्रांतिवीर', उत्तराखंड के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी।
1858विलियम बटलर — नैनीताल में प्रथम (मेथोडिस्ट) चर्च; हिल रेजिमेंट का गठन।
1863–18739वाँ भूमि बंदोबस्त (बैकेट बंदोबस्त) — भूमि को 5 भागों (तलाव, उपराऊं अव्वल/दोयम, कटील, इजरान) में विभाजित।
1864अल्मोड़ा नगरपालिका की स्थापना।
1867'हिल सेफ्टी कमेटी' गठित — उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन का प्रथम प्रयास (नैनीताल भूस्खलन के बाद)।
1868नैनीताल से जयदत्त जोशी (पत्रकार) का 'समय विनोद' — उत्तराखंड का प्रथम वर्नाक्यूलर पत्र (हिंदी-उर्दू), 1877 तक प्रकाशित।
1870अल्मोड़ा में बुद्धि बल्लभ पंत द्वारा 'डिबेटिंग क्लब'
1874अधिसूचित जिला अधिनियम — कुमाऊं नॉन-रेगुलेशन प्रांत घोषित।
18 सितंबर 1880शेर-का-डांडा भूस्खलन~151 मृत्यु; नैना देवी मंदिर नष्ट।
1883'तराई इम्प्रूवमेंट फंड' की स्थापना।
24 अप्रैल 1884लखनऊ से काठगोदाम — प्रथम ट्रेन; रैमजे का कार्यकाल समाप्त।
खण्ड 9 — अष्टम, नवम एवं दशम कमिश्नर
7–9. एच.जी. रॉस, जे.आर. रीड एवं जी.ई. अर्सकाइन (1885–1892)
INC की स्थापना, गढ़वाल राइफल्स का गठन, हथियार लाइसेंस नीति एवं कुमाऊं जिले का विभाजन — इन तीन कमिश्नरों के कार्यकाल की प्रमुख परीक्षोपयोगी घटनाएँ
8
एच.जी. रॉस — H.G. Ross
8वें कमिश्नर
1885–1887
28 दिसंबर 1885 भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की स्थापना
  • एच.जी. रॉस के कार्यकाल (1885–1887) में ही 28 दिसंबर 1885 को बॉम्बे (मुंबई) के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत महाविद्यालय में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की स्थापना हुई।
परीक्षा में पूछे जाने वाले नाम — INC स्थापना 1885
संस्थापक: ए.ओ. ह्यूम (A.O. Hume) — सेवानिवृत्त ब्रिटिश ICS अधिकारी; महासचिव (1885–1906)  |  दादाभाई नौरोजी  |  दीनशॉ वाचा
प्रथम अध्यक्ष: डब्ल्यू.सी. बनर्जी (W.C. Bonnerjee) — 1885, बॉम्बे (72 प्रतिनिधि)
वायसराय (INC स्थापना के समय): लॉर्ड डफरिन (Lord Dufferin, 1884–1888)
'INC' नाम किसने दिया: दादाभाई नौरोजी
प्रथम महिला अध्यक्ष: एनी बेसेंट (1917)  |  प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष: सरोजिनी नायडू (1925)
प्रथम विदेशी अध्यक्ष: जॉर्ज यूल (George Yule, 1888 — इलाहाबाद)
अति महत्त्वपूर्ण — परीक्षा केन्द्रित 1886 ई०
कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन (1886 — द्वितीय अधिवेशन): अध्यक्ष — दादाभाई नौरोजी (प्रथम पारसी अध्यक्ष; तीन बार अध्यक्ष — 1886, 1893, 1906)  |  प्रतिनिधि: 434  |  स्वागत समिति अध्यक्ष: राजेंद्रलाल मित्र। कुमाऊं से ज्वाला दत्त जोशी सहित कुछ नेताओं ने भाग लिया — यह कुमाऊं का राष्ट्रीय मुख्यधारा से पहला सीधा संपर्क था।
9
जे.आर. रीड — J.R. Reid
9वें कमिश्नर
1887–1889
5 मई 1887 39वीं गढ़वाल राइफल्स की स्थापना — अल्मोड़ा में
  • 5 मई 1887 को अल्मोड़ा में लेफ्टिनेंट कर्नल ई.पी. मेनवरिंग (E.P. Mainwaring) द्वारा 39वीं गढ़वाल राइफल्स की स्थापना की गई।
  • 4 नवंबर 1887 को इसका मुख्यालय अल्मोड़ा से कालोडांडा (जिसे 1890 में लैंसडाउन कहा गया- in honor of the then Viceroy of India, Lord Lansdowne) स्थानांतरित कर दिया गया।
PYQ कनेक्शन
गढ़वाल राइफल्स: 5 मई 1887 — अल्मोड़ा → 4 नवंबर 1887 — मुख्यालय कालोडांडा (लैंसडाउन); संस्थापक: ई.पी. मेनवरिंग; कमिश्नर: जे.आर. रीड
  • जे.आर. रीड के कार्यकाल के अंत में 1889 में कुमाऊं में हथियारों के लिए 'लाइसेंस नीति' (Arms License Policy) लागू की गई।
10
जी.ई. अर्सकाइन — G.E. Erskine
10वें कमिश्नर
1889–1892
1891 कुमाऊं जिले का विभाजन — अल्मोड़ा + नैनीताल
  • 1891 में कुमाऊं जिले को दो नए जनपदों — अल्मोड़ा और नैनीताल — में बाँट दिया गया।
High-Yield PYQ तथ्य
यह इस कार्यकाल का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है: 1891 में कुमाऊं → अल्मोड़ा + नैनीताल — कमिश्नर जी.ई. अर्सकाइन
  • 1892 में 'तराई जनपद' का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त कर उसे नैनीताल जिले का एक उप-मंडल (Sub-division) बना दिया गया।
1815
कुमाऊं कमिश्नरी का गठन (मुख्यालय: अल्मोड़ा)।
1817
देहरादून को सहारनपुर जिले में शामिल किया गया।
1825
देहरादून को कुमाऊं कमिश्नरी के अधीन किया गया।
1829
देहरादून को मेरठ मंडल में स्थानांतरित किया गया।
1839
कुमाऊं और ब्रिटिश गढ़वाल जिलों का निर्माण।
1840
ब्रिटिश गढ़वाल जिले का मुख्यालय श्रीनगर से 'पौड़ी' स्थानांतरित।
1842
तराई को एक अलग जिला बनाया गया।
1854
कुमाऊं कमिश्नरी (मंडल) का मुख्यालय अल्मोड़ा से नैनीताल स्थानांतरित।
1871
देहरादून को एक स्वतंत्र जिले का दर्जा मिला।
1891
कुमाऊं जिले का अल्मोड़ा और नैनीताल जिलों में विभाजन।
1892
तराई जिले का नैनीताल में विलय।
🎯 Self-Test — रॉस, रीड एवं अर्सकाइन (8वें–10वें कमिश्नर)
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तिथिकमिश्नरतथ्य / कार्य
── रॉस (1885–1887) — 8वें कमिश्नर ──
28 दिसंबर 1885रॉसबॉम्बे के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत महाविद्यालय में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की स्थापना।
── रीड (1887–1889) — 9वें कमिश्नर ──
5 मई 1887रीडई.पी. मेनवरिंग द्वारा अल्मोड़ा में 39वीं गढ़वाल राइफल्स की स्थापना।
4 नवंबर 1887रीडगढ़वाल राइफल्स का मुख्यालय अल्मोड़ा → कालोडांडा (लैंसडाउन) स्थानांतरित।
1889रीडकुमाऊं में हथियारों हेतु 'लाइसेंस नीति' (Arms License Policy) लागू।
── अर्सकाइन (1889–1892) — 10वें कमिश्नर ──
1891अर्सकाइनकुमाऊं जिले का दो जनपदों — अल्मोड़ा + नैनीताल — में विभाजन।
1892अर्सकाइनतराई जनपद का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त; नैनीताल जिले का Sub-division बना।
खण्ड 12 — त्रयोदश (13वें) कमिश्नर
13. आर. ई. हैम्बलिन — R.E. Hamblin
कार्यकाल: 1899 से 1902 तक — देहरादून में प्रथम यात्री ट्रेन एवं गढ़वाल यूनियन की स्थापना इन्हीं के काल की प्रमुख परीक्षोपयोगी घटनाएँ हैं
13
आर. ई. हैम्बलिन — R.E. Hamblin
13वें कमिश्नर
1899–1902
1 मार्च 1900 देहरादून में प्रथम यात्री ट्रेन — हरिद्वार-देहरादून रेलवे लाइन
  • कमिश्नर हैम्बलिन के कार्यकाल (1899–1902) में ही हरिद्वार-देहरादून रेलवे लाइन का निर्माण पूर्ण हुआ।
  • 1 मार्च 1900 को देहरादून में पहली बार यात्री ट्रेन पहुँची।
PYQ कनेक्शन
देहरादून में प्रथम यात्री ट्रेन: 1 मार्च 1900 → रेलवे लाइन: हरिद्वार–देहरादून → कमिश्नर: आर. ई. हैम्बलिन (13वें)।
19 अगस्त 1901 गढ़वाल यूनियन की स्थापना — देहरादून
  • 19 अगस्त 1901 को तारा दत्त गैरोला द्वारा देहरादून में 'गढ़वाल हितकारिणी सभा' की स्थापना की गई (जिसे 1904 में नामांतरित कर 'गढ़वाल यूनियन' किया गया)।
  • इस संस्था का उद्देश्य क्षेत्र का सामाजिक, शैक्षणिक एवं राजनीतिक उत्थान करना था।
  • तारा दत्त गैरोला को 'गढ़वाल का महर्षि' एवं 'गढ़वाल जन-जागरण का पितामह' कहा जाता है।
1904
'गढ़वाल हितकारिणी सभा' का नामांतरण → 'गढ़वाल यूनियन' (मुख्यालय: टिहरी); संस्थापक: तारादत्त गैरोला
मई 1905
गढ़वाल यूनियन के प्रयासों से देहरादून से 'गढ़वाली' नामक मासिक समाचार पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ।
संपादक
गिरिजा दत्त नैथानी — प्रथम संपादक; इन्हें 'गढ़वाल में पत्रकारिता का जनक' कहा जाता है।
  • ब्रिटिश प्रशासनिक सुधारों के अंतर्गत 1902–1903 के मध्य नैनीताल जिला जेल का निर्माण एवं स्थापना की गई।
1816
अल्मोड़ा जेल — कुमाऊं में गोरखा शासन की समाप्ति के तुरंत बाद स्थापित; ब्रिटिश काल की प्रथम जेल
1821
पौड़ी जेल — स्थापना 1821; 1840 में पौड़ी के नए ब्रिटिश गढ़वाल जिले का मुख्यालय बनने पर महत्व और बढ़ा।
1837
अल्मोड़ा थाना — राज्य के प्रारम्भिक एवं महत्वपूर्ण थानों में से एक; प्रशासनिक व्यवस्था सुदृढ़ करने हेतु स्थापित।
1843
नैनीताल थाना — नैनीताल के विकास एवं अंग्रेजों की ग्रीष्मकालीन राजधानी के रूप में स्थापना के प्रारम्भिक दौर में निर्मित।
1869
रानीखेत थाना — 1869 में रानीखेत छावनी (Cantonment) की स्थापना के साथ ही सुरक्षा व्यवस्था हेतु स्थापित।
1902–03
नैनीताल जिला जेल — ब्रिटिश प्रशासनिक सुधारों के अन्तर्गत निर्मित; कमिश्नर: हैम्बलिन
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तिथिघटना / तथ्य
── हैम्बलिन (1899–1902) — 13वें कमिश्नर ──
1 मार्च 1900हरिद्वार–देहरादून रेलवे लाइन पूर्ण; देहरादून में प्रथम यात्री ट्रेन पहुँची।
19 अगस्त 1901तारा दत्त गैरोला द्वारा देहरादून में 'गढ़वाल हितकारिणी सभा' की स्थापना (1904 में → 'गढ़वाल यूनियन')।
मई 1905'गढ़वाल यूनियन' मुखपत्र — 'गढ़वाली' मासिक पत्र; प्रथम संपादक: गिरिजा दत्त नैथानी ('पत्रकारिता का जनक')।
1902–1903नैनीताल जिला जेल की स्थापना — ब्रिटिश प्रशासनिक सुधारों के अन्तर्गत।
── ब्रिटिशकालीन जेल एवं थाने — क्रोनोलॉजी ──
1816अल्मोड़ा जेल — ब्रिटिश काल की प्रथम जेल।
1821पौड़ी जेल — 1840 में पौड़ी मुख्यालय बनने पर महत्व बढ़ा।
1837अल्मोड़ा थाना — राज्य के प्रारम्भिक थानों में से एक।
1843नैनीताल थाना — ग्रीष्मकालीन राजधानी के विकास के साथ स्थापित।
1869रानीखेत थाना — रानीखेत छावनी की स्थापना के साथ।
खण्ड 13 — पंचदश (15वें) कमिश्नर
15. जे. एस. कैम्पबेल — J.S. Campbell
कार्यकाल: 1906 से 1914 तक — कुली एजेंसी का गठन, अल्मोड़ा कांग्रेस की स्थापना, गवर्नमेंट गार्डन तथा होमरूल लीग व प्रेम सभा की स्थापना इन्हीं के काल की प्रमुख परीक्षोपयोगी घटनाएँ हैं
15
जे. एस. कैम्पबेल — J.S. Campbell
15वें कमिश्नर
1906–1914
1906 कुमाऊं भाबर खेतिहर निवासी विधि
  • कमिश्नर जे. एस. कैम्पबेल के कार्यकाल के शुरुआती वर्ष 1906 में कुमाऊं भाबर क्षेत्र के लिए 'खेतिहर निवासी विधि' (Agricultural Tenancy Rules) लागू की गई।
  • उद्देश्य: भाबर क्षेत्र में कृषि भूमि पर काश्तकारों के अधिकारों को सुरक्षित करना, जिससे मैदानी और पहाड़ी क्षेत्रों से आकर बसने वाले किसानों को कानूनी मान्यता मिली।
PYQ कनेक्शन
कुमाऊं भाबर खेतिहर निवासी विधि: 1906 → उद्देश्य: काश्तकार अधिकार सुरक्षा → कमिश्नर: जे. एस. कैम्पबेल (15वें)।
1906–1909 ग्लोगी जलविद्युत परियोजना, मसूरी
  • वर्ष 1906 में मसूरी में 'ग्लोगी जलविद्युत परियोजना' (Galogi Hydroelectric Project) का निर्माण कार्य शुरू हुआ।
  • पूर्ण होने का वर्ष: 1909 में इस परियोजना से बिजली का उत्पादन शुरू हुआ। यह दार्जिलिंग के बाद उत्तर भारत और देश के सबसे पुराने चालू पावर स्टेशनों में से एक है।
PYQ कनेक्शन
ग्लोगी जलविद्युत परियोजना: निर्माण आरम्भ 1906 → उत्पादन आरम्भ 1909 → स्थान: मसूरी → कमिश्नर: कैम्पबेल (15वें)।
1908 कुली एजेंसी का गठन, पौड़ी (द्वारिखाल)
  • वर्ष 1908 में गढ़वाल के द्वारिखाल (पौड़ी) में 'कुली एजेंसी' का गठन किया गया, जिसके संस्थापक जोध सिंह नेगी जी थे।
  • प्रथम अध्यक्ष: तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर वी. ए. स्टोवेल (V.A. Stowell) को इसका पहला अध्यक्ष बनाया गया था।
  • उद्देश्य: कुली बेगार प्रथा के कारण स्थानीय जनता के आर्थिक और शारीरिक शोषण को कम करना।
PYQ कनेक्शन
कुली एजेंसी: 1908 → स्थान: द्वारिखाल (पौड़ी) → संस्थापक: जोध सिंह नेगी → प्रथम अध्यक्ष: वी. ए. स्टोवेल → कमिश्नर: कैम्पबेल (15वें); पूर्ण समाधान बाद में बागेश्वर कुली बेगार आंदोलन (1921, विंढम-काल) से हुआ।
  • वर्ष 1909 में वन संपदा के व्यवस्थित संरक्षण हेतु तराई क्षेत्र में चराई (Grazing) के नए नियम और शुल्क लागू किए गए।
  • इसी वर्ष 1909 में 'कुमाऊं गवर्नमेंट गार्डन' की स्थापना (पुनर्गठन) की गई, जिसने राज्य में आधुनिक कृषि और बागवानी की नींव रखी।
  • प्रभारी: इसका प्रभार प्रसिद्ध वनस्पतिशास्त्री नॉर्मन गिल (Norman Gill) को सौंपा गया था, जिन्होंने उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में सेब और अन्य फलों की बागवानी को व्यावसायिक रूप दिया।
PYQ कनेक्शन
कुमाऊं गवर्नमेंट गार्डन: स्थापना 1909 → प्रभारी: नॉर्मन गिल (सेब-बागवानी के प्रवर्तक) → कमिश्नर: कैम्पबेल (15वें)।
1912 अल्मोड़ा कांग्रेस की स्थापना
संस्थापक
पं. गोविंद बल्लभ पंत · पं. हरगोविंद पंत · ज्वाला दत्त जोशी · सदानंद सनवाल · बद्री दत्त जोशी

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बांकीपुर (पटना) अधिवेशन से प्रेरित होकर वर्ष 1912 में अल्मोड़ा कांग्रेस की स्थापना की गई थी।

  • अल्मोड़ा कांग्रेस की रीढ़: पं. हरगोविंद पंत जी को अल्मोड़ा कांग्रेस की 'रीढ़' (Backbone) माना जाता है, जिन्होंने संगठन को जमीनी स्तर पर खड़ा किया।
PYQ कनेक्शन
अल्मोड़ा कांग्रेस: स्थापना 1912 → प्रेरणा: बांकीपुर (पटना) अधिवेशन → 'रीढ़': हरगोविंद पंत → कमिश्नर: कैम्पबेल (15वें)।
  • 23 दिसंबर 1912 को दिल्ली में वायसराय लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंका गया। इस ऐतिहासिक क्रांतिकारी घटना के मुख्य सूत्रधार रास बिहारी बोस थे।
  • देहरादून कनेक्शन: रास बिहारी बोस उस समय देहरादून स्थित वन अनुसंधान संस्थान (FRI) में हेड क्लर्क के पद पर कार्यरत थे। वे घटना को अंजाम देकर तुरंत रात की ट्रेन से देहरादून लौट आए थे।
  • सहयोगी क्रांतिकारी: इस पूरे नेटवर्क में उनके सबसे करीबी सहयोगी शचीन्द्रनाथ सान्याल थे। बम असल में बसंत कुमार बिस्वास ने फेंका था।
PYQ कनेक्शन
हार्डिंग बम कांड: 23 दिसंबर 1912 → सूत्रधार: रास बिहारी बोस (देहरादून FRI — हेड क्लर्क) → बम फेंका: बसंत कुमार बिस्वास → निकटतम सहयोगी: शचीन्द्रनाथ सान्याल
  • उत्तराखंड में होमरूल लीग की स्थापना 1914 में ही हो गई थी। इसकी स्थापना बद्री दत्त पांडे, विक्टर मोहन जोशी, चिरंजीलाल और हेमचंद्र द्वारा की गई थी।
  • बद्री दत्त पांडे जी का कथन: एनी बेसेंट की नीतियों का विरोध करते हुए पांडे जी ने स्पष्ट कहा था— "हमें छली बुढ़िया का नहीं, तिलक के होमरूल लीग की आवश्यकता है।"
1918
देहरादून में होमरूल लीग की स्थापना स्वामी विचारानंद सरस्वती द्वारा की गई।
1922
इसी वर्ष स्वामी विचारानंद सरस्वती ने देहरादून से 'अभय' समाचार पत्र का प्रकाशन भी शुरू किया।
PYQ कनेक्शन
उत्तराखंड होमरूल लीग: 1914 (संस्थापक: बद्री दत्त पांडे, विक्टर मोहन जोशी, चिरंजीलाल, हेमचंद्र) | देहरादून होमरूल लीग व 'अभय' पत्र: 1922 (स्वामी विचारानंद सरस्वती) — कमिश्नर-काल: कैम्पबेल (15वें)।
  • वर्ष 1914 में पंडित गोविन्द बल्लभ पंत जी द्वारा काशीपुर में 'प्रेम सभा' की स्थापना की गई। इसका मुख्य उद्देश्य समाज सुधार और हिंदी साहित्य को बढ़ावा देना था।
1903
हैप्पी क्लब — प्रेम सभा से पहले, वर्ष 1903 में पंत जी ने हरगोविंद पंत के साथ मिलकर अल्मोड़ा में स्थापित किया।
1914
प्रेम सभा — काशीपुर; समाज सुधार व हिंदी साहित्य प्रोत्साहन।
1918
खद्दर आश्रम — स्वदेशी आंदोलन को बढ़ावा देने हेतु काशीपुर में ही स्थापित।
PYQ कनेक्शन
गोविन्द बल्लभ पंत — हैप्पी क्लब: 1903 (अल्मोड़ा, हरगोविंद पंत के साथ) → प्रेम सभा: 1914 (काशीपुर) → खद्दर आश्रम: 1918 (काशीपुर)।
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तिथिघटना / तथ्य
── कैम्पबेल (1906–1914) — 15वें कमिश्नर ──
1906कुमाऊं भाबर खेतिहर निवासी विधि लागू।
1906–1909ग्लोगी जलविद्युत परियोजना (मसूरी) — निर्माण 1906, उत्पादन आरम्भ 1909।
1908कुली एजेंसी का गठन — द्वारिखाल (पौड़ी); संस्थापक: जोध सिंह नेगी; प्रथम अध्यक्ष: वी. ए. स्टोवेल।
1909तराई क्षेत्र में चराई नियम लागू; कुमाऊं गवर्नमेंट गार्डन की स्थापना — प्रभारी: नॉर्मन गिल।
1912अल्मोड़ा कांग्रेस की स्थापना — 'रीढ़': हरगोविंद पंत; अन्य संस्थापक: ज्वाला दत्त जोशी, सदानंद सनवाल, बद्री दत्त जोशी।
23 दिसंबर 1912लॉर्ड हार्डिंग बम कांड — सूत्रधार: रास बिहारी बोस (देहरादून FRI); बम फेंका: बसंत कुमार बिस्वास; सहयोगी: शचीन्द्रनाथ सान्याल।
1914उत्तराखंड होमरूल लीग की स्थापना — बद्री दत्त पांडे, विक्टर मोहन जोशी, चिरंजीलाल, हेमचंद्र।
1914काशीपुर में 'प्रेम सभा' की स्थापना — गोविन्द बल्लभ पंत।
── सन्दर्भ हेतु — कैम्पबेल-काल से सम्बद्ध घटनाएं ──
1903गोविन्द बल्लभ पंत — हैप्पी क्लब (अल्मोड़ा, हरगोविंद पंत के साथ); कैम्पबेल-काल से पूर्व।
1922 ** कैम्पबेल के पश्चात् — देहरादून होमरूल लीग व 'अभय' पत्र (स्वामी विचारानंद सरस्वती)।
खण्ड 11 — षोडश (16वें) कमिश्नर
16. पर्सी विंढम (Percy Wyndham)
कार्यकाल: 1914 से 1924 तक (10 वर्ष) — "राजनीतिक जन-जागरण का स्वर्णिम काल"; इसी काल में प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) लड़ा गया
कार्यकाल
1914 से 1924 तक (10 वर्ष)
ऐतिहासिक उपाधि
इनके कार्यकाल को "राजनीतिक जन-जागरण का स्वर्णिम काल" माना जाता है
वैश्विक संदर्भ
प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) इनके कार्यकाल में ही लड़ा गया था
1915 गांधी जी की प्रथम उत्तराखंड यात्रा — हरिद्वार कुंभ मेला
  • 1915 में गांधी जी ने पहली बार उत्तराखंड की यात्रा की और हरिद्वार कुंभ मेले में भाग लिया।
1916 देहरादून व हरिद्वार यात्रा — गुरुकुल कांगड़ी, स्वामी श्रद्धानंद से भेंट
  • 1916 में गांधी जी ने देहरादून और हरिद्वार की यात्रा की।
  • हरिद्वार में गुरुकुल कांगड़ी के संस्थापक स्वामी श्रद्धानंद से भेंट की, विश्वविद्यालय में व्याख्यान दिया एवं DAV के छात्रों से मुलाकात की।
30 सितंबर 1916 कुमाऊं परिषद की स्थापना — मझेड़ा (नैनीताल)
स्थापना
30 सितंबर 1916
स्थान
मझेड़ा, नैनीताल
प्रथम अध्यक्ष
रा.ब. नारायण दत्त छिल्वाल
प्रथम महासचिव
प्रेम वल्लभ पांडे
संस्थापक सदस्य
पं. गोविंद बल्लभ पंत  ·  हरगोविंद पंत  ·  बद्रीदत्त पांडे  ·  विक्टर मोहन जोशी  ·  जयदत्त जोशी
साइड नोट — कन्फ्यूजन से बचें: दो अलग-अलग 'जयदत्त जोशी'
कुमाऊं परिषद के संस्थापक सदस्य जयदत्त जोशी (राजनेता), 'समय विनोद' (1868, नैनीताल) के संपादक जयदत्त जोशी (पत्रकार) से भिन्न व्यक्ति हैं — दोनों को एक न समझें। ('समय विनोद' के विस्तृत तथ्यों हेतु देखें — खण्ड 6, रैमजे का कार्यकाल, वर्ष 1868)।
  • पर्सी विंढम ने घराटों (पनचक्कियों) और सिंचाई के पानी के उपयोग को नियंत्रित करने और उस पर कर (Tax) लगाने के लिए 1917 में 'कुमाऊं वाटर रूल्स' (Kumaon Water Rules) लागू किए, जिसका जनता ने भारी विरोध किया।
बाद में 1930 में 17वें कमिश्नर स्टिफे को इसमें भारी संशोधन करना पड़ा।
  • कुमाऊं परिषद की तर्ज पर ही गढ़वाल में राजनीतिक चेतना जगाने के लिए वर्ष 1918 में बैरिस्टर मुकुंदी लाल एवं अनुसूया प्रसाद बहुगुणा के प्रयासों से 'गढ़वाल कांग्रेस कमेटी' की स्थापना की गई।
  • बैरिस्टर मुकुंदी लाल एवं अनुसूया प्रसाद बहुगुणा — इन दोनों ही नेताओं ने 1919 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के ऐतिहासिक 'अमृतसर अधिवेशन' में भाग लिया और वहाँ से लौटकर गढ़वाल में आंदोलन को और तेज कर दिया।
13–14 जनवरी 1921 बागेश्वर — मकर संक्रांति पर सरयू तट पर रजिस्टर विसर्जन
  • 13–14 जनवरी 1921 (मकर संक्रांति) को बागेश्वर में सरयू नदी के तट पर बद्रीदत्त पांडे के नेतृत्व में 40,000 लोगों ने कुली बेगार के रजिस्टर नदी में बहा दिए।
  • कमिश्नर पर्सी विंढम वहीं मौजूद था, लेकिन गोली चलाने की हिम्मत नहीं जुटा सका।
  • इस आंदोलन में मार्च 1921 में कत्यूर घाटी से मोहन सिंह मेहता को गिरफ्तार किया गया — वे कुली बेगार आंदोलन में जेल जाने वाले उत्तराखंड के प्रथम व्यक्ति थे।
  • गांधी जी के असहयोग आंदोलन से प्रेरित होकर वर्ष 1921 में अल्मोड़ा के ताड़ीखेत में देवकीनंदन पांडे एवं भगीरथ पांडे द्वारा 'प्रेम विद्यालय' की स्थापना की गई थी।
⬆ इसी प्रेम विद्यालय में गांधी जी अपनी 14 जून – 2 जुलाई 1929 की कुमाऊं यात्रा के दौरान रुके थे (देखें ऊपर खण्ड 1 का साइड नोट)।
13 अप्रैल 1921 Kumaon Forest Grievances Committee - 1921
  • अंग्रेजों के कठोर वन कानूनों के विरोध में 1921 में कुमाऊं के जंगलों में भयंकर आग लगा दी गई थी (लगभग 2.7 लाख एकड़ वन क्षेत्र जल गया था)।
  • इस वन-विरोध में सक्रिय भूमिका निभाने पर सोमेश्वर/कौसानी क्षेत्र की दुर्गा देवी को 1921 में गिरफ्तार किया गया — वे वन कानूनों के विरोध में गिरफ्तार होने वाली उत्तराखंड की प्रथम महिला मानी जाती हैं।
  • इसी जन-आक्रोश को शांत करने के लिए 13 अप्रैल 1921 को यह कमेटी बनी।
  • अध्यक्ष: स्वयं कुमाऊं कमिश्नर पर्सी विंढम
  • एकमात्र गैर-सरकारी सदस्य: जोध सिंह नेगी (गढ़वाल एवं स्थानीय जनता का पक्ष रखने के लिए)।
  • कुमाऊं की वन समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर उजागर करने के लिए पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने 1922 में एक अत्यंत प्रसिद्ध पुस्तक लिखी थी — "द फॉरेस्ट प्रॉब्लम इन कुमाऊं"
  • इसी कमेटी की सिफारिशों पर 1931 में 'कुमाऊं फॉरेस्ट पंचायत रूल्स' बने और पूरे एशिया में पहली बार सामुदायिक 'वन पंचायतों' का गठन शुरू हुआ।
🎯 Self-Test — पर्सी विंढम (16वें कमिश्नर) की तिथियाँ
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तिथितथ्य / कार्य
31 मार्च 1908 †† विंढम से पूर्व — 'अल्मोड़ा अखबार' में कुमाऊं परिषद की परिकल्पना का सबसे प्रारंभिक उल्लेख (स्थापना से 8 वर्ष पूर्व)।
1914–1924पर्सी विंढम का 10 वर्षीय कार्यकाल — "राजनीतिक जन-जागरण का स्वर्णिम काल"; इसी काल में प्रथम विश्व युद्ध (1914–18) लड़ा गया।
1915गांधी जी की प्रथम उत्तराखंड यात्रा — हरिद्वार कुंभ मेला।
1916गांधी जी — देहरादून-हरिद्वार यात्रा, गुरुकुल कांगड़ी (स्वामी श्रद्धानंद से भेंट); इसी वर्ष INC का लखनऊ अधिवेशन — बद्रीदत्त पांडे की तिलक से मुलाकात ("चार धाम" वाला कथन)।
30 सितंबर 1916कुमाऊं परिषद की स्थापना — मझेड़ा (नैनीताल); अध्यक्ष — रा.ब. नारायण दत्त छिल्वाल; महासचिव — प्रेम वल्लभ पांडे; सदस्य — जयदत्त जोशी (राजनेता — 'समय विनोद' (1868) वाले पत्रकार जयदत्त जोशी से भिन्न व्यक्ति)।
1917'कुमाऊं वाटर रूल्स' लागू (1930 में संशोधन); प्रथम कुमाऊं परिषद अधिवेशन — अल्मोड़ा (जयदत्त जोशी)।
1918द्वितीय अधिवेशन — हल्द्वानी (तारादत्त गैरोला), कुली बेगार पर प्रथम प्रस्ताव; 'गढ़वाल कांग्रेस कमेटी' की स्थापना (मुकुंदी लाल + अनुसूया प्रसाद बहुगुणा)।
1919तृतीय अधिवेशन — कोटद्वार (रा.ब. बद्रीदत्त जोशी), गढ़वाल का एकमात्र अधिवेशन; मुकुंदी लाल व अनुसूया प्रसाद बहुगुणा — अमृतसर अधिवेशन में भागीदारी।
1920चतुर्थ अधिवेशन — काशीपुर (हरगोविंद पंत); कुली बेगार हेतु 'अंतिम अल्टीमेटम'।
13–14 जनवरी 1921बागेश्वर कुली बेगार आंदोलन — बद्रीदत्त पांडे के नेतृत्व में 40,000 लोगों द्वारा सरयू में रजिस्टर विसर्जन; कुली बेगार प्रथा का अंत
1921ताड़ीखेत 'प्रेम विद्यालय' की स्थापना (देवकीनंदन पांडे + भगीरथ पांडे); गढ़वाल आंदोलन — कनकोड़ाखाल (अनुसूया प्रसाद बहुगुणा) व चमेठाखाल (मुकुंदी लाल); 13 अप्रैल — फॉरेस्ट ग्रीवांस कमेटी गठित (अध्यक्ष विंढम, सदस्य जोध सिंह नेगी)।
1922फॉरेस्ट ग्रीवांस कमेटी रिपोर्ट — वनों का श्रेणी-1 (राजस्व विभाग) / श्रेणी-2 (वन विभाग) में विभाजन; जी.बी. पंत — "The Forest Problem in Kumaon"
1923पांचवां कुमाऊं परिषद अधिवेशन — टनकपुर (बद्रीदत्त पांडे); भूमि बंदोबस्त व वन अधिकारों पर चर्चा। विंढम का कार्यकाल समाप्त (1924)।
1926 ** विंढम के पश्चात् — छठा एवं अंतिम अधिवेशन — रानीखेत (गनियाद्योली), अध्यक्ष मुकुंदी लाल; कुमाऊं परिषद का INC में विलय
1929 ** विंढम के पश्चात् — गांधी जी की कुमाऊं यात्रा (14 जून–2 जुलाई); ताड़ीखेत प्रेम विद्यालय में निवास; 22 जून — बागेश्वर 'स्वराज भवन' का शिलान्यास।
1931 ** विंढम के पश्चात् — 'कुमाऊं फॉरेस्ट पंचायत रूल्स' लागू (एशिया की प्रथम वन पंचायतें); गांधी जी की नैनीताल यात्रा — गवर्नर सर मैल्कम हेली से भेंट।
† चिह्नित पंक्ति विंढम के कार्यकाल (1914–24) से पूर्व की तथा * चिह्नित पंक्तियाँ उनके पश्चात् की घटनाएं हैं, परन्तु ऊपर के साइड नोट्स से सीधा सम्बन्ध होने के कारण सन्दर्भ हेतु यहाँ जोड़ी गई हैं — परीक्षा में इन्हें विंढम के नाम से न जोड़ें।
खण्ड 17 — सप्तदश (17वें) कमिश्नर
17. एन. सी. स्टिफ (N.C. Stiffe)
कार्यकाल: 1925 से 1931 तक — गैर-आईनी दर्जे की समाप्ति, वन पंचायत की नींव, गांधी जी की प्रथम कुमाऊं यात्रा, पेशावर कांड तथा तिलाड़ी नरसंहार का ऐतिहासिक काल
कार्यकाल
1925 से 1931 तक
क्रम संख्या
17वें कुमाऊं कमिश्नर
1925 कुमाऊं का 'गैर-आईनी' (Non-Regulation) दर्जा समाप्त
  • 1815 से कुमाऊं एक 'नॉन-रेगुलेशन' प्रांत था — यहाँ गवर्नर-जनरल के सामान्य कानून लागू नहीं होते थे और कुमाऊं कमिश्नर को असीमित, तानाशाही अधिकार प्राप्त थे।
  • 'कुमाऊं परिषद' और विशेष रूप से पं. गोविंद बल्लभ पंत के लगातार दबाव और प्रांतीय परिषद में उठाए गए सवालों के कारण ब्रिटिश सरकार को 1925 में यह दर्जा समाप्त करना पड़ा।
1926 कुमाऊं परिषद का INC में विलय — गनियाद्योली, रानीखेत
  • 1926 में गनियाद्योली (रानीखेत) में कुमाऊं परिषद का 6वां और अंतिम अधिवेशन हुआ।
  • इस अधिवेशन की अध्यक्षता बैरिस्टर मुकंदी लाल ने की।
  • इसी अधिवेशन में कुमाऊं परिषद का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) में पूर्ण विलय किया गया।
  • पहले कुमाऊं कमिश्नर ही यहाँ का 'हाईकोर्ट' (सबसे बड़ा जज) होता था।
  • 1 अप्रैल 1926 को राजस्व और न्याय को अलग करते हुए कुमाऊं को सीधे 'इलाहाबाद उच्च न्यायालय' के अधिकार क्षेत्र में लाया गया।
  • साथ ही एक अलग 'डिस्ट्रिक्ट जज' बैठाया गया।
  • 1921 में पी. विंधम के समय बनी 'कुमाऊं वन कष्ट समिति' की रिपोर्ट को 1927 के वन अधिनियम में लागू किया गया।
  • जंगलों को दो हिस्सों में बांटा गया:
    • Class-I वन: व्यावसायिक महत्व कम — इन्हें ग्रामीणों के लिए राजस्व विभाग को सौंपा गया।
    • Class-II वन: व्यावसायिक महत्व अधिक — ये वन विभाग के पास रहे।
  • इसी के परिणामस्वरूप आगे चलकर 1931 में कुमाऊं में विधिवत 'वन पंचायत' नियमों की अधिसूचना जारी हुई।
वन पंचायतों को एशिया की प्रथम सामुदायिक वन पंचायतें माना जाता है — इनकी नींव स्टिफ के कार्यकाल में पड़ी, पर अधिसूचना 1931 में।
  • इब्बटसन द्वारा किया गया यह बंदोबस्त केवल ब्रिटिश गढ़वाल के लिए था।
  • यह ब्रिटिश काल का 11वां और बिल्कुल अंतिम बंदोबस्त था।
ध्यान रहे: कुमाऊं का अंतिम ब्रिटिश बंदोबस्त इससे पहले 1893–1915 में 'गूज' महोदय द्वारा किया गया था — दोनों को न मिलाएं।
  • नायक समाज की बालिकाओं को देवदासी/वेश्यावृत्ति प्रथा से बचाने के लिए 1924 में एक 'नायक सुधार समिति' बनी थी — अध्यक्ष: स्वयं एन. सी. स्टिफ
  • आर्य समाज और स्थानीय नेताओं के दबाव के बाद 1929 में प्रांतीय असेंबली ने इसे कानून बना दिया।
  • इससे जिला मजिस्ट्रेट को नाबालिग बच्चियों को देवदासी प्रथा से छुड़ाने का अधिकार मिल गया।
14 जून – 2 जुलाई 1929 गांधी जी की ऐतिहासिक प्रथम कुमाऊं यात्रा
  • सहयात्री: कस्तूरबा गांधी, मीरा बेन, देवदास गांधी और जमनालाल बजाज।
  • कौसानी प्रवास: गांधी जी 14 दिन (कुछ स्रोतों में 12 दिन) कौसानी में रुके — यहीं उन्होंने भगवद्गीता पर 'अनासक्ति योग' टीका लिखी और कौसानी को "भारत का स्विट्जरलैंड" कहा।
  • बागेश्वर: विक्टर मोहन जोशी ने गांधी जी को 'स्वराज भवन/मंदिर' के शिलान्यास के समय अभिनंदन पत्र सौंपा।
  • दुगड्डा (पौड़ी गढ़वाल) में धनीराम मिश्र के होटल में आयोजित यह गढ़वाल का पहला बड़ा राजनीतिक सम्मेलन था।
  • इस ऐतिहासिक सम्मेलन की अध्यक्षता पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने की थी।
23 अप्रैल 1930 पेशावर कांड — वीर चंद्र सिंह गढ़वाली
  • किस्सा ख्वानी बाजार, पेशावर2/18 रॉयल गढ़वाल राइफल्स
  • कैप्टन रिकेट्स के "Garhwalis, open fire!" आदेश पर वीर चंद्र सिंह गढ़वाली (मूल नाम: चंद्र सिंह भंडारी) ने राइफल नीचे कर कहा — "गढ़वाली निहत्थों पर गोली नहीं चलाते!"
  • पूरी बटालियन ने गोली चलाने से इंकार किया — 59 सैनिकों पर एबटाबाद छावनी में कोर्ट-मार्शल
  • वकील: बैरिस्टर मुकंदी लाल — फांसी को कारावास में बदलवाया।
  • चंद्र सिंह गढ़वाली को सजा: 11 वर्ष 3 माह 18 दिन — रिहाई 1941 में।
गांधी जी ने इन्हें 'गढ़वाली' उपाधि दी। मोतीलाल नेहरू ने 23 अप्रैल को "गढ़वाल दिवस" घोषित किया। भारत सरकार ने 23 अप्रैल 1994 को डाक टिकट जारी किया।
  • गांधी जी के 78 सत्याग्रहियों में उत्तराखंड के 3 वीर शामिल थे:
    • ज्योतिराम कांडपाल — अल्मोड़ा
    • भैरव दत्त जोशी — कुमाऊं
    • खड़क बहादुर (गोरखा वीर) — देहरादून / गोरखा समुदाय
30 मई 1930 रंवाई / तिलाड़ी कांड — उत्तराखंड का जलियांवाला बाग
मूल कारण
टिहरी रियासत (महाराजा नरेंद्र शाह) में 1927–28 में कठोर वन नीति लागू। किसानों के कृषि क्षेत्रों को 'रिजर्व फॉरेस्ट' में मिलाया गया और पुश्तैनी हकों (लकड़ी काटना, पशु चराना) पर टैक्स व रोक
  • आजाद पंचायत का गठन: रंवाई परगना के ग्रामीणों ने टिहरी रियासत के विरुद्ध समानांतर सरकार बनाई — रियासती अधिकारियों का बहिष्कार, स्वतंत्र फैसले।
  • 20 मई 1930 — प्रथम टकराव: रियासत की टीम (नेतृत्व: SDM सुरेन्द्र वर्मा + DFO पद्मदत्त रतूड़ी) ने निहत्थों पर गोली चलवाई — धूम सिंह नेगी शहीद।
  • 30 मई 1930 — तिलाड़ी मैदान (यमुना तट): 20 मई की शहादत के विरोध में हज़ारों किसान एकत्रित — शांतिपूर्ण जनसभा।
  • तत्कालीन राजा नरेंद्र शाह यूरोप यात्रा पर; रियासत की कमान दीवान चक्रधर जुयाल के हाथ।
  • जुयाल ने बिना चेतावनी मशीनगन से अंधाधुंध फायर का आदेश दिया — सैकड़ों लोग मारे गए, कई उफनती यमुना में कूदकर डूब गए
🎯 परीक्षा दृष्टि — तिलाड़ी कांड
उपाधि / तथ्यविवरण
उत्तराखंड का जलियांवाला बागतिलाड़ी / रंवाई कांड (30 मई 1930)
उत्तराखंड का जनरल डायरदीवान चक्रधर जुयाल
तत्कालीन राजामहाराजा नरेंद्र शाह (घटना के समय यूरोप में)
प्रथम शहीदधूम सिंह नेगी — 20 मई 1930
शहीद दिवसरंवाई क्षेत्र में प्रतिवर्ष 30 मई को
🎯 Self-Test — एन. सी. स्टिफ (17वें कमिश्नर) की प्रमुख तिथियाँ
तिथितथ्य / कार्य
1925–1931एन. सी. स्टिफ का कार्यकाल — 17वें कमिश्नर
1925कुमाऊं का गैर-आईनी (Non-Regulation) दर्जा समाप्त — G.B. पंत के दबाव का परिणाम।
1926कुमाऊं परिषद का INC में विलय — 6वां व अंतिम अधिवेशन, गनियाद्योली (रानीखेत); अध्यक्ष: मुकंदी लाल।
1 अप्रैल 1926न्यायिक पृथक्करण — कुमाऊं अब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अधीन; अलग डिस्ट्रिक्ट जज की नियुक्ति।
1927वन अधिनियम 1927 — Class-I (राजस्व विभाग) / Class-II (वन विभाग) विभाजन; वन पंचायत की नींव।
192811वां व अंतिम भूमि बंदोबस्त — इब्बटसन द्वारा, केवल ब्रिटिश गढ़वाल के लिए।
1924नायक सुधार समिति गठित — अध्यक्ष: स्वयं स्टिफ।
1929नायक बालिका रक्षा कानून — देवदासी प्रथा के विरुद्ध; DM को नाबालिग बच्चियों को छुड़ाने का अधिकार।
14 जून–2 जुलाई 1929गांधी जी की प्रथम कुमाऊं यात्रा — कौसानी (14 दिन), 'अनासक्ति योग' टीका, "भारत का स्विट्जरलैंड"; बागेश्वर — विक्टर मोहन जोशी का अभिनंदन।
1930गढ़वाल का प्रथम राजनीतिक सम्मेलन — दुगड्डा (धनीराम मिश्र के होटल में); अध्यक्ष: G.B. पंत।
12 मार्च–6 अप्रैल 1930दांडी यात्रा — उत्तराखंड के 3 वीर (ज्योतिराम कांडपाल, भैरव दत्त जोशी, खड़क बहादुर)।
23 अप्रैल 1930पेशावर कांड — किस्सा ख्वानी बाजार; वीर चंद्र सिंह गढ़वाली; 2/18 RGR; 59 सैनिकों का कोर्ट-मार्शल।
20 मई 1930रंवाई कांड प्रारंभ — धूम सिंह नेगी शहीद (प्रथम टकराव)।
30 मई 1930तिलाड़ी नरसंहार — दीवान चक्रधर जुयाल का मशीनगन आदेश; सैकड़ों शहीद।
1930कुमाऊं वाटर रूल्स (1917) में संशोधन — विंढम-कालीन इस कानून को स्टिफ ने संशोधित किया।
1931'वन पंचायत' नियमों की अधिसूचना — एशिया की प्रथम सामुदायिक वन पंचायतें।
खण्ड 10 — 20वें से 23वें (अंतिम) कमिश्नर
20–23. इब्बटसन, विवियन, एक्टन एवं फिनले (1935–1947)
गांधी आश्रम, द्वितीय विश्व युद्ध, व्यक्तिगत सत्याग्रह, भारत छोड़ो आंदोलन के प्रमुख कांड एवं कुमाऊं रेजीमेंट की स्थापना — ब्रिटिश शासन के अंतिम दशक की परीक्षोपयोगी घटनाएँ
20
ए.डब्ल्यू. इब्बटसन — A.W. Ibbotson
20वें कमिश्नर
1935–1939
1937 गांधी आश्रम की स्थापना — चनौदा (सोमेश्वर), अल्मोड़ा
  • इब्बटसन के कार्यकाल में 1937 में शांतिलाल त्रिवेदी द्वारा अल्मोड़ा के चनौदा (सोमेश्वर) में गांधी आश्रम की स्थापना की गई।
  • यही आश्रम बाद में 2 सितंबर 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान प्रशासन द्वारा सील (ताला लगाकर) कर दिया गया।
21
जी.एल. विवियन — G.L. Vivian
21वें कमिश्नर
1939–1941
1939 द्वितीय विश्व युद्ध का आरम्भ
  • विवियन के कार्यकाल में ही 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध प्रारंभ हुआ।
  • उत्तराखंड के प्रथम व्यक्तिगत सत्याग्रही (पुरुष): जगमोहन सिंह नेगी
  • उत्तराखंड की प्रथम व्यक्तिगत सत्याग्रही (महिला): भागीरथी देवी
अतिरिक्त परीक्षा तथ्य — महिला स्वतंत्रता सेनानी
बिश्नी देवी शाह: राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन (सविनय अवज्ञा) के दौरान जेल जाने वाली उत्तराखंड की प्रथम महिला25 मई 1930 को अल्मोड़ा नगरपालिका में तिरंगा फहराने पर गिरफ्तार। (नोट: वन कानूनों के विरोध में 1921 में गिरफ्तार होने वाली प्रथम महिला दुर्गा देवी थीं — दोनों को न जोड़ें)
सविनय अवज्ञा आंदोलन (दूसरा चरण): 8 महिलाओं को फतेहगढ़ जेल भेजा गया; पद्मा जोशी को लखनऊ जेल भेजा गया।
कुंती वर्मा: ब्रिटिश सरकार ने इन्हें 'जिंदा या मुर्दा' पकड़ने का आदेश जारी किया था।
22
टी.जे.सी. एक्टन — T.J.C. Acton
22वें कमिश्नर
1941–1943
18 अगस्त 1942 देघाट कांड — हरिकृष्ण उप्रेती एवं हीरामणि बडोला शहीद
  • भारत छोड़ो आंदोलन (1942) के दौरान 18 अगस्त 1942 को देघाट कांड हुआ।
  • इसमें हरिकृष्ण उप्रेती और हीरामणि बडोला शहीद हुए।
  • स्थान: धामद्यो, जैंती (सालम पट्टी, अल्मोड़ा) — कुमाऊं में सल्ट के बाद इस आंदोलन की दूसरी सबसे बड़ी घटना।
  • गोलीकांड का आदेशकर्ता: डिप्टी कलेक्टर मेहरबान सिंह — निहत्थी जनसभा पर गोली चलाने का आदेश।
  • पृष्ठभूमि: प्रशासन ने सालम के नेताओं (दुर्गादत्त शास्त्री, रेवाधर पांडे, नयन सिंह बिष्ट) को गिरफ्तार/नजरबंद कर दिया था, इसके विरोध में विशाल जनसभा बुलाई गई।
  • शहीद: नर सिंह धानक (गाँव: चौकुना) और टीका सिंह कन्याल (गाँव: कांडे)।
  • सूत्रधार: पं. मदन मोहन उपाध्याय — देघाट गोलीकांड के बाद रणनीति बदलकर आंदोलन को सालम (धामद्यो) में स्थानांतरित किया; पुलिस को दो बार चकमा दिया और बाद में मुंबई जाकर जयप्रकाश नारायणअरुणा आसफ अली के साथ गुप्त 'कांग्रेस रेडियो' से प्रसारण किया — इनाम ₹10,000
Deep Fact — राम सिंह 'आज़ाद' (सालम का शेर)
राम सिंह आज़ाद — सालम में आंदोलन को बिखरने से बचाने वाले प्रमुख नायक। 11 अगस्त 1942 को ब्रिटिश पुलिस इनके गाँव 'सांगड़' पहुँची; इन्होंने पुलिस को चाय-नाश्ता करवाया और शौच का बहाना बनाकर फरार हो गए — इसी साहस के कारण 'आज़ाद' कहलाए। बाद में प्रताप सिंह बोरा के साथ बसंतपुर में 'सांगड़ कैंप' का संचालन किया। अंततः बद्रीनाथ में गिरफ्तार; ब्रिटिश हुकूमत ने कालापानी (अंडमान) की सजा सुनाई। मुकदमा: वकील गोपाल स्वरूप पाठक; अपील: इंद्र सिंह नयाल (नैनीताल)।
  • 2 सितंबर 1942 को ब्रिटिश प्रशासन द्वारा चनौदा गांधी आश्रम पर ताला लगा दिया गया।
  • 5 सितंबर 1942 को सल्ट कांड हुआ, जिसमें गंगाराम, खीमदेव, चूड़ामणि और बहादुर सिंह शहीद हुए।
  • गांधी जी ने इसे "कुमाऊं का बारदोली" कहा था।
PYQ — भारत छोड़ो आंदोलन 1942 — क्रम याद रखें
18 अगस्त — देघाट कांड (उप्रेती + बडोला शहीद) → 25 अगस्त — सालम कांड (टीका सिंह + नरसिंह धानक शहीद) → 2 सितंबर — चनौदा आश्रम सील → 5 सितंबर — सल्ट कांड ("कुमाऊं का बारदोली"; गंगाराम, खीमदेव, चूड़ामणि, बहादुर सिंह शहीद)। सभी घटनाएं एक्टन के कार्यकाल में।
23
डब्ल्यू.डब्ल्यू. फिनले — W.W. Finlay
23वें एवं अंतिम ब्रिटिश कमिश्नर
1943–1947
27 अक्टूबर 1945 कुमाऊं रेजीमेंट की स्थापना — आगरा में
  • फिनले के कार्यकाल में 27 अक्टूबर 1945 को आगरा में कुमाऊं रेजीमेंट की स्थापना हुई।
  • मई 1948 में कुमाऊं रेजीमेंट का मुख्यालय आगरा से रानीखेत स्थानांतरित कर दिया गया।
अतिरिक्त परीक्षा तथ्य — कुमाऊं रेजीमेंट का इतिहास
1788 ई.: बरार के नवाब सलावत खान ने सेना की एक टुकड़ी गठित की → बाद में यह चौथी और पाँचवीं कुमाऊं रेजीमेंट बनी।
1797 ई.: हैदराबाद के निज़ाम ने द्वितीय कुमाऊं (2nd Kumaon) की स्थापना की।
1917 ई.: कर्नल लांगर (Col. Langer) ने प्रथम कुमाऊं राइफल्स की स्थापना की → बाद में यह तीसरी कुमाऊं बनी।
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तिथिकमिश्नरतथ्य / कार्य
── इब्बटसन (1935–1939) — 20वें कमिश्नर ──
1937इब्बटसनशांतिलाल त्रिवेदी द्वारा चनौदा (सोमेश्वर), अल्मोड़ा में गांधी आश्रम की स्थापना।
── विवियन (1939–1941) — 21वें कमिश्नर ──
1939विवियनद्वितीय विश्व युद्ध प्रारम्भ।
1940–41विवियनउत्तराखंड के प्रथम व्यक्तिगत सत्याग्रही (पुरुष): जगमोहन सिंह नेगी; (महिला): भागीरथी देवी
── एक्टन (1941–1943) — 22वें कमिश्नर — भारत छोड़ो आंदोलन ──
18 अगस्त 1942एक्टनदेघाट कांडहरिकृष्ण उप्रेती + हीरामणि बडोला शहीद।
25 अगस्त 1942एक्टनसालम कांडटीका सिंह + नरसिंह धानक शहीद; सूत्रधार: पं. मदन मोहन उपाध्याय (₹10,000 ईनाम)।
2 सितंबर 1942एक्टनचनौदा गांधी आश्रम सील (ताला)।
5 सितंबर 1942एक्टनसल्ट कांड — गंगाराम, खीमदेव, चूड़ामणि, बहादुर सिंह शहीद; गांधी जी: "कुमाऊं का बारदोली"
── फिनले (1943–1947) — 23वें एवं अंतिम ब्रिटिश कमिश्नर ──
27 अक्टूबर 1945फिनलेआगरा में कुमाऊं रेजीमेंट की स्थापना।
मई 1948फिनले (पश्चात्)कुमाऊं रेजीमेंट मुख्यालय आगरा → रानीखेत स्थानांतरित।
खण्ड 8 — संयुक्त तालिका
📊 मास्टर तालिका — 16 कमिश्नरों की सम्पूर्ण कालानुक्रमिक सूची
एडवर्ड गार्डनर, जॉर्ज विलियम ट्रेल, कर्नल गोवान, जॉर्ज थॉमस लुशिंगटन, जॉन हैलेट बैटन, सर हेनरी रैमजे (1815–1884), एच.जी. रॉस, जे.आर. रीड, जी.ई. अर्सकाइन (1885–1892), आर. ई. हैम्बलिन (1899–1902), जे. एस. कैम्पबेल (1906–1914), पर्सी विंढम (1914–1924) तथा ए.डब्ल्यू. इब्बटसन, जी.एल. विवियन, टी.जे.सी. एक्टन, डब्ल्यू.डब्ल्यू. फिनले (1935–1947) के कार्यकाल के सभी तथ्य एक ही तालिका में, कालक्रमानुसार — Self-Test के साथ
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तिथिकमिश्नरघटना / कार्य
3 मई 1815गार्डनरप्रथम कमिश्नर के रूप में कार्यभार ग्रहण (कार्यकाल — मात्र 9 माह)।
1815गार्डनरबाल-विक्रय पर पूर्ण रोक।
1815गार्डनर / ट्रेलकुमाऊं का प्रथम भूमि बंदोबस्त (ट्रेल द्वारा सम्पन्न) तथा अल्मोड़ा–श्रीनगर डाक व्यवस्था का आरम्भ।
1816ट्रेलद्वितीय कमिश्नर नियुक्त; अल्मोड़ा जेल का निर्माण।
1817ट्रेलदेहरादून सहारनपुर में शामिल। (भूमि बंदोबस्त — द्वितीय वर्ष)
1818ट्रेलभूमि बंदोबस्त — तृतीय वर्ष
1819ट्रेलपटवारी पद का सृजन (वंशानुगत)।
1820ट्रेलस्टाम्प पेपर की शुरुआत; भूमि बंदोबस्त — चतुर्थ वर्ष
1821ट्रेलपौड़ी जेल का निर्माण।
1822ट्रेलआबकारी विभाग की स्थापना; खच्चर सेना (मिस्टर ग्लिन का सुझाव)।
1823ट्रेल80 साला बंदोबस्त (भूमि बंदोबस्त — पंचम वर्ष); परगना 22 से 26 में विभाजित।
1824ट्रेलरंवाई राजा सुदर्शन शाह को वापस; डबल लॉक व्यवस्था आरम्भ।
26 जून 1825ट्रेलदेहरादून कुमाऊं कमिश्नरी में शामिल।
1827–28ट्रेलहरिद्वार–बद्रीनाथ/केदारनाथ मार्ग निर्माण आरम्भ।
1828ट्रेलजन्म-मृत्यु-विवाह पंजीकरण आरम्भ; देहरादून मेरठ कमिश्नरी में मिला; भूमि बंदोबस्त — षष्ठम वर्ष
1829ट्रेलसदाबर्त निधि (चारधाम यात्री भोजन-दान गाँव) का प्रबंधन पंडा-पुजारियों के गबन के कारण सीधे ट्रेल के हाथ में।
1829–30ट्रेलसस्पेंशन (झूला) पुलों का निर्माण आरम्भ।
1830ट्रेलमलाकतोली ग्लेशियर के पास ट्रेल पास की खोज (गाइड: मलक सिंह बूढ़ा)।
1833ट्रेलअल्मोड़ा में देसी चिकित्सकों की नियुक्ति; भूमि बंदोबस्त — सप्तम (अंतिम) वर्ष
1834ट्रेलआधुनिक हल्द्वानी शहर की स्थापना।
1835ट्रेलट्रेल का 19 वर्षीय कार्यकाल समाप्त (इस्तीफा); बीच में मोस्ले स्मिथ कार्यवाहक कमिश्नर रहे, फिर गोवान नियमित कमिश्नर बने।
1836गोवानदास प्रथा, बाल-विक्रय, महिला-विक्रय का अंत — अपराध घोषित; गोरखाकालीन दिव्य परीक्षाएँ समाप्त।
1837गोवान'सदर अमीन' पद का सृजन; कुमाऊं का प्रथम पुलिस थाना — अल्मोड़ा में स्थापित।
1838गोवानसैनिक पृष्ठभूमि से आने के कारण राजस्व-अनुभव की कमी; "अक्षम" मानकर आगरा बोर्ड द्वारा हटाए गए — कार्यकाल समाप्त (1836–1838)।
── लुशिंगटन (1838–1848) — शांति काल ──
1839लुशिंगटनकमिश्नरी स्वतंत्र निकाय बनी; प्रथम स्वतंत्र कमिश्नर; ब्रिटिश गढ़वाल जिला गठित; श्रीनगर में हडलस्टन स्कूल
1840लुशिंगटनपौड़ी जनपद गठन; गढ़वाल मुख्यालय श्रीनगर → पौड़ी; बद्री–केदार मार्ग पर असिस्टेंट सर्जन्स नियुक्त।
1841लुशिंगटनपी. बैरन द्वारा नैनीताल की खोज
1842लुशिंगटनतराई जिले का गठन; Act X of 1842 — नगरपालिका एक्ट।
1843लुशिंगटननैनीताल पुलिस थाना स्थापित (गोवान के पश्चात्)।
1845लुशिंगटनखैरना–नैनीताल सड़क निर्माण आरंभ।
1848लुशिंगटनअल्मोड़ा डिस्पेंसरी कमेटी; बागेश्वर में गोमती नदी पर पुल; नैनीताल में पद पर मृत्यु
── बैटन (1848–1856) — स्वर्ण युग ──
1840बैटन (सहायक)गढ़वाल का 20 साला बंदोबस्त — गढ़वाल का प्रथम विस्तृत भूमि बंदोबस्त।
1844बैटन (सहायक)कुमाऊं का 20 साला बंदोबस्त (8वाँ भूमि बंदोबस्त)।
1848बैटनशिक्षित पटवारियों की नियुक्ति।
1849बैटनडाक बंगले आम यात्रियों के लिए खोले गए।
1849बैटनअल्मोड़ा दवाखाने की शाखा पिथौरागढ़ में।
1850बैटनअल्मोड़ा में लंदन मिशनरी सोसाइटी (Rev. J.H. Budden) की स्थापना।
1850बैटनबमोरी–अल्मोड़ा मार्ग का सड़क सर्वेक्षण।
1851बैटनभारत की प्रथम मालगाड़ीरुड़की से पिरान कलियर (ऊपरी गंगा नहर निर्माण)।
1853बैटनजॉन स्ट्रेची — श्रीनगर में अलकनंदा पर प्रथम लोहे का सस्पेंशन पुल
1854बैटनऊपरी गंगा नहर (Upper Ganga Canal) पूर्ण।
अक्टूबर 1854बैटनकुमाऊं कमिश्नरी मुख्यालय अल्मोड़ा → नैनीताल स्थानांतरित।
1869रानीखेत पुलिस थाना स्थापित।
── रैमजे (1856–1884) — कुमाऊं का बेताज बादशाह ──
1850रैमजे (सहायक)सहायक कमिश्नर रहते हुए रामनगर शहर की स्थापना।
1857रैमजे1857 की क्रांति — मार्शल लॉ लागू; 17 सितंबर को काले खां द्वारा हल्द्वानी पर कब्ज़ा; कैप्टन मैक्सवेल व गोरखा रणवीर सेना द्वारा पुनः कब्ज़ा; कालू माहरा (चंपावत) — 'क्रांतिवीर' संगठन, उत्तराखंड के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी।
1858रैमजेनैनीताल में विलियम बटलर द्वारा प्रथम (मेथोडिस्ट) चर्च की स्थापना; हिल रेजिमेंट का गठन।
1863–1873रैमजे9वाँ भूमि बंदोबस्त (बैकेट बंदोबस्त) — जी.ई. बैकेट; भूमि को 5 भागों (तलाव, उपराऊं अव्वल, उपराऊं दोयम, कटील, इजरान) में विभाजित।
1864रैमजेअल्मोड़ा नगरपालिका की स्थापना।
1867रैमजेनैनीताल में भूस्खलन के बाद 'हिल सेफ्टी कमेटी' गठित — उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन का प्रथम प्रयास
1870रैमजेअल्मोड़ा में बुद्धि बल्लभ पंत द्वारा 'डिबेटिंग क्लब' की स्थापना।
1874रैमजेअधिसूचित जिला अधिनियम (Scheduled District Act) लागू — कुमाऊं नॉन-रेगुलेशन प्रांत घोषित।
18 सितंबर 1880रैमजेशेर-का-डांडा भूस्खलन (नैनीताल) — लगभग 151 मृत्यु; नैना देवी मंदिर नष्ट।
1883रैमजेतराई इम्प्रूवमेंट फंड की स्थापना।
24 अप्रैल 1884रैमजेलखनऊ से काठगोदाम — पहली ट्रेन पहुँची; रैमजे का कार्यकाल समाप्त (1856–1884)।
── रॉस (1885–1887) — 8वें कमिश्नर ──
28 दिसंबर 1885रॉसबॉम्बे के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत महाविद्यालय में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की स्थापना।
── रीड (1887–1889) — 9वें कमिश्नर ──
5 मई 1887रीडई.पी. मेनवरिंग द्वारा अल्मोड़ा में 39वीं गढ़वाल राइफल्स की स्थापना।
4 नवंबर 1887रीडगढ़वाल राइफल्स का मुख्यालय अल्मोड़ा → कालोडांडा (लैंसडाउन) स्थानांतरित।
1889रीडकुमाऊं में हथियारों हेतु 'लाइसेंस नीति' (Arms License Policy) लागू।
── अर्सकाइन (1889–1892) — 10वें कमिश्नर ──
1891अर्सकाइनकुमाऊं जिले का दो जनपदों — अल्मोड़ा + नैनीताल — में विभाजन।
1892अर्सकाइनतराई जनपद का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त; नैनीताल जिले का Sub-division बना।
── हैम्बलिन (1899–1902) — 13वें कमिश्नर ──
1 मार्च 1900हैम्बलिनदेहरादून में प्रथम यात्री ट्रेन; हरिद्वार–देहरादून रेलवे लाइन पूर्ण।
19 अगस्त 1901हैम्बलिनतारादत्त गैरोला द्वारा गढ़वाल हितकारिणी सभा की स्थापना (1904 — 'गढ़वाल यूनियन'; मुखपत्र: 'गढ़वाली', मई 1905; प्रथम संपादक: गिरिजा दत्त नैथानी)।
1902–03हैम्बलिननैनीताल जिला जेल का निर्माण।
── कैम्पबेल (1906–1914) — 15वें कमिश्नर ──
1906कैम्पबेलकुमाऊं भाबर हेतु 'खेतिहर निवासी विधि' (Agricultural Tenancy Rules) लागू।
1906–1909कैम्पबेलग्लोगी जलविद्युत परियोजना — निर्माण आरम्भ 1906; उत्पादन आरम्भ 1909 (मसूरी)।
1908कैम्पबेलकुली एजेंसी — द्वारिखाल (पौड़ी); संस्थापक: जोध सिंह नेगी; प्रथम अध्यक्ष: वी. ए. स्टोवेल।
1909कैम्पबेलकुमाऊं गवर्नमेंट गार्डन की स्थापना; प्रभारी: नॉर्मन गिल (सेब-बागवानी के प्रवर्तक)।
1912कैम्पबेलअल्मोड़ा कांग्रेस की स्थापना; प्रेरणा: बांकीपुर (पटना) अधिवेशन; 'रीढ़': हरगोविंद पंत।
1914कैम्पबेलउत्तराखंड होमरूल लीग की स्थापना (बद्री दत्त पांडे, विक्टर मोहन जोशी, चिरंजीलाल, हेमचंद्र)।
── पर्सी विंढम (1914–1924) — 16वें कमिश्नर — राजनीतिक जन-जागरण का स्वर्णिम काल ──
1915विंढमगांधी जी की प्रथम उत्तराखंड यात्रा — हरिद्वार कुंभ मेला।
1916विंढमगांधी जी — देहरादून-हरिद्वार यात्रा, गुरुकुल कांगड़ी (स्वामी श्रद्धानंद से भेंट)।
1916विंढमINC का लखनऊ अधिवेशन — बद्रीदत्त पांडे की लोकमान्य तिलक से मुलाकात, उन्हें "राजनीतिक गुरु" माना ("चार धाम" कथन)।
30 सितंबर 1916विंढमकुमाऊं परिषद की स्थापना — मझेड़ा (नैनीताल); अध्यक्ष — रा.ब. नारायण दत्त छिल्वाल; महासचिव — प्रेम वल्लभ पांडे।
1917विंढम'कुमाऊं वाटर रूल्स' लागू; प्रथम कुमाऊं परिषद अधिवेशन — अल्मोड़ा (जयदत्त जोशी)।
1918विंढमद्वितीय अधिवेशन — हल्द्वानी (तारादत्त गैरोला), कुली बेगार पर प्रथम प्रस्ताव; 'गढ़वाल कांग्रेस कमेटी' स्थापित (मुकुंदी लाल + अनुसूया प्रसाद बहुगुणा)।
1919विंढमतृतीय अधिवेशन — कोटद्वार (रा.ब. बद्रीदत्त जोशी), गढ़वाल का एकमात्र अधिवेशन; मुकुंदी लाल व अनुसूया प्रसाद बहुगुणा — अमृतसर अधिवेशन में भागीदारी।
1920विंढमचतुर्थ अधिवेशन — काशीपुर (हरगोविंद पंत); कुली बेगार हेतु 'अंतिम अल्टीमेटम'।
13–14 जनवरी 1921विंढमबागेश्वर कुली बेगार आंदोलन — बद्रीदत्त पांडे के नेतृत्व में 40,000 लोगों द्वारा सरयू में रजिस्टर विसर्जन; कुली बेगार प्रथा का अंत
1921विंढमताड़ीखेत 'प्रेम विद्यालय' स्थापित (देवकीनंदन पांडे + भगीरथ पांडे); गढ़वाल आंदोलन — कनकोड़ाखाल (अनुसूया प्रसाद बहुगुणा) व चमेठाखाल (मुकुंदी लाल); 13 अप्रैल — फॉरेस्ट ग्रीवांस कमेटी गठित (अध्यक्ष विंढम, सदस्य जोध सिंह नेगी)।
1922विंढमफॉरेस्ट ग्रीवांस कमेटी रिपोर्ट — वनों का श्रेणी-1 (राजस्व विभाग) / श्रेणी-2 (वन विभाग) में विभाजन; जी.बी. पंत — "The Forest Problem in Kumaon"
1923विंढमपांचवां कुमाऊं परिषद अधिवेशन — टनकपुर (बद्रीदत्त पांडे); भूमि बंदोबस्त व वन अधिकारों पर चर्चा।
1924विंढमपर्सी विंढम का 10 वर्षीय कार्यकाल समाप्त (1914–1924)।
── एन. सी. स्टिफ (1925–1931) — 17वें कमिश्नर — गैर-आईनी दर्जे की समाप्ति, वन पंचायत, तिलाड़ी कांड ──
1925स्टिफकुमाऊं का गैर-आईनी (Non-Regulation) दर्जा समाप्त — G.B. पंत के दबाव का परिणाम।
1926स्टिफकुमाऊं परिषद का INC में विलय — 6वां व अंतिम अधिवेशन, गनियाद्योली (रानीखेत); अध्यक्ष: मुकंदी लाल।
1 अप्रैल 1926स्टिफन्यायिक पृथक्करण — कुमाऊं अब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अधीन; अलग डिस्ट्रिक्ट जज।
1927स्टिफवन अधिनियम 1927 — Class-I (राजस्व विभाग) / Class-II (वन विभाग) विभाजन; वन पंचायत की नींव।
1928स्टिफ11वां व अंतिम भूमि बंदोबस्त — इब्बटसन द्वारा, केवल ब्रिटिश गढ़वाल के लिए।
1929स्टिफनायक बालिका रक्षा कानून — देवदासी प्रथा के विरुद्ध (सुधार समिति: 1924, अध्यक्ष: स्टिफ)।
14 जून–2 जुलाई 1929स्टिफगांधी जी की प्रथम कुमाऊं यात्रा — कौसानी (14 दिन), 'अनासक्ति योग', "भारत का स्विट्जरलैंड"; बागेश्वर — विक्टर मोहन जोशी का अभिनंदन।
1930स्टिफगढ़वाल का प्रथम राजनीतिक सम्मेलन — दुगड्डा; अध्यक्ष: G.B. पंत।
12 मार्च–6 अप्रैल 1930स्टिफदांडी यात्रा — उत्तराखंड के 3 वीर: ज्योतिराम कांडपाल, भैरव दत्त जोशी, खड़क बहादुर।
23 अप्रैल 1930स्टिफपेशावर कांड — किस्सा ख्वानी बाजार; वीर चंद्र सिंह गढ़वाली; 2/18 RGR; 59 सैनिकों का कोर्ट-मार्शल (वकील: मुकंदी लाल)।
20 मई 1930स्टिफरंवाई प्रथम टकराव — धूम सिंह नेगी शहीद।
30 मई 1930स्टिफतिलाड़ी नरसंहार — "उत्तराखंड का जलियांवाला बाग"; दीवान चक्रधर जुयाल का मशीनगन आदेश; सैकड़ों शहीद।
1930स्टिफकुमाऊं वाटर रूल्स (1917) में संशोधन
1931स्टिफ'वन पंचायत' नियमों की अधिसूचना — एशिया की प्रथम सामुदायिक वन पंचायतें।
── इब्बटसन (1935–1939) — 20वें कमिश्नर ──
1937इब्बटसनशांतिलाल त्रिवेदी द्वारा चनौदा (सोमेश्वर), अल्मोड़ा में गांधी आश्रम की स्थापना।
── विवियन (1939–1941) — 21वें कमिश्नर ──
1939विवियनद्वितीय विश्व युद्ध प्रारम्भ।
1940–41विवियनउत्तराखंड के प्रथम व्यक्तिगत सत्याग्रही (पुरुष): जगमोहन सिंह नेगी; (महिला): भागीरथी देवी
── एक्टन (1941–1943) — 22वें कमिश्नर — भारत छोड़ो आंदोलन ──
18 अगस्त 1942एक्टनदेघाट कांडहरिकृष्ण उप्रेती + हीरामणि बडोला शहीद।
25 अगस्त 1942एक्टनसालम कांडटीका सिंह + नरसिंह धानक शहीद; सूत्रधार: पं. मदन मोहन उपाध्याय (₹10,000 ईनाम)।
2 सितंबर 1942एक्टनचनौदा गांधी आश्रम सील (ताला)।
5 सितंबर 1942एक्टनसल्ट कांड — गंगाराम, खीमदेव, चूड़ामणि, बहादुर सिंह शहीद; गांधी जी: "कुमाऊं का बारदोली"
── फिनले (1943–1947) — 23वें एवं अंतिम ब्रिटिश कमिश्नर ──
27 अक्टूबर 1945फिनलेआगरा में कुमाऊं रेजीमेंट की स्थापना।
मई 1948फिनले (पश्चात्)कुमाऊं रेजीमेंट मुख्यालय आगरा → रानीखेत स्थानांतरित।