'अल्मोड़ा अखबार' में कुमाऊं क्षेत्र की राजनीतिक एवं सामाजिक समस्याओं के समाधान हेतु एक संगठित मंच की आवश्यकता पर बिंदु प्रकाशित हुआ — यही आगे चलकर 'कुमाऊं परिषद' की परिकल्पना का आधार बना। यह विचार परिषद की वास्तविक स्थापना (1916) से पूरे 8 वर्ष पहले सामने आ चुका था।
उत्तराखण्ड में ब्रिटिश शासन — कुमाऊं कमिश्नरी
1815 में गोरखा शासन की समाप्ति के साथ ही कुमाऊं कमिश्नरी की स्थापना हुई और 1947 तक चले 24 कमिश्नरों के कार्यकाल ने उत्तराखंड की प्रशासनिक संरचना — भूमि बंदोबस्त, पटवारी-व्यवस्था, वन-नीति व नगर-निर्माण — की नींव रखी। इसी कालखंड में होमरूल लीग (1914), कुली बेगार, कुमाऊं परिषद, सविनय अवज्ञा, व्यक्तिगत सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन के माध्यम से क्षेत्र का राजनीतिक जागरण भी हुआ। यह अध्याय दोनों धाराओं — शासन-तंत्र और स्वतंत्रता-संग्राम — को तिथिवार, परीक्षोपयोगी रूप में एक साथ प्रस्तुत करता है।
| क्रम | कमिश्नर | कार्यकाल | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|---|
| 1 | एडवर्ड गार्डनर (Edward Gardner) | 3 मई 1815 (मात्र 9 माह) | कुमाऊं के प्रथम ब्रिटिश कमिश्नर |
| 2 | जॉर्ज विलियम ट्रेल (George William Traill) | 1816 – 1835 | 'मनमाना प्रशासक'; उत्तराखंड में ब्रिटिश शासन का वास्तविक संस्थापक |
| 3 | कर्नल गोवान (Colonel Gowan) | 1836 – 1838 | दास प्रथा का अंत; सदर अमीन पद का सृजन |
| 4 | जॉर्ज थॉमस लुशिंगटन (George Thomas Lushington) | 1838 – 1848 | "शांति काल" (Era of Peace); प्रथम स्वतंत्र कमिश्नर; नैनीताल की खोज |
| 5 | जॉन हैलेट बैटन (John Hallet Batten) | 1848 – 1856 | "स्वर्ण युग" (Golden Age); मुख्यालय नैनीताल स्थानांतरण |
| 6 | सर हेनरी रैमजे (Sir Henry Ramsay) | 1856 – 1884 | "कुमाऊं का बेताज बादशाह"; 28 वर्षीय सर्वदीर्घ कार्यकाल |
| 8 | एच.जी. रॉस (H.G. Ross) | 1885 – 1887 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की स्थापना इनके कार्यकाल में |
| 9 | जे.आर. रीड (J.R. Reid) | 1887 – 1889 | गढ़वाल राइफल्स की स्थापना; हथियार लाइसेंस नीति |
| 10 | जी.ई. अर्सकाइन (G.E. Erskine) | 1889 – 1892 | कुमाऊं जिले का अल्मोड़ा + नैनीताल में विभाजन; तराई विलय |
| 13 | आर. ई. हैम्बलिन (R.E. Hamblin) | 1899 – 1902 | हरिद्वार–देहरादून रेलवे लाइन; गढ़वाल हितकारिणी सभा; नैनीताल जिला जेल |
| 15 | जे. एस. कैम्पबेल (J.S. Campbell) | 1906 – 1914 | कुमाऊं भाबर खेतिहर निवासी विधि; ग्लोगी जलविद्युत परियोजना; अल्मोड़ा कांग्रेस |
| 16 | पर्सी विंढम (Percy Wyndham) | 1914 – 1924 | "राजनीतिक जन-जागरण का स्वर्णिम काल"; कुमाऊं परिषद की स्थापना; कुली बेगार का अंत |
| 17 | एन. सी. स्टिफ (N.C. Stiffe) | 1925 – 1931 | गैर-आईनी दर्जे की समाप्ति; कुमाऊं परिषद का INC में विलय; वन पंचायत की नींव; पेशावर कांड; तिलाड़ी नरसंहार |
| 20 | ए.डब्ल्यू. इब्बटसन (A.W. Ibbotson) | 1935 – 1939 | चनौदा में गांधी आश्रम की स्थापना |
| 21 | जी.एल. विवियन (G.L. Vivian) | 1939 – 1941 | द्वितीय विश्व युद्ध; व्यक्तिगत सत्याग्रह |
| 22 | टी.जे.सी. एक्टन (T.J.C. Acton) | 1941 – 1943 | भारत छोड़ो आंदोलन — देघाट, सालम, सल्ट कांड |
| 23 | डब्ल्यू.डब्ल्यू. फिनले (W.W. Finlay) | 1943 – 1947 | कुमाऊं रेजीमेंट की स्थापना; अंतिम ब्रिटिश कमिश्नर |
- 27 अप्रैल 1815 की लालमंडी संधि के पश्चात् गोरखों के कुमाऊं छोड़ने के तुरंत बाद, गार्डनर ने 3 मई 1815 को कुमाऊं के प्रथम ब्रिटिश कमिश्नर का कार्यभार ग्रहण किया।
- इनका कार्यकाल मात्र 9 माह का रहा, परंतु इस अल्प अवधि में भी दो महत्त्वपूर्ण आरम्भिक सुधार हुए।
- इनके सहायक जॉर्ज विलियम ट्रेल ही वास्तविक प्रशासनिक कार्यों की नींव रख रहे थे।
- गार्डनर के कार्यकाल में ही बच्चों की खरीद-फरोख्त (बाल-विक्रय) पर पूर्ण रूप से रोक लगाई गई — यह उत्तराखंड में ब्रिटिश शासन का प्रथम सामाजिक सुधार-कार्य था।
- गार्डनर के कमिश्नर-काल में ही कुमाऊं का प्रथम भूमि बंदोबस्त सम्पन्न हुआ, जिसे वास्तव में सहायक जॉर्ज विलियम ट्रेल ने किया।
- यह घटना ट्रेल के सात भूमि-बंदोबस्तों की शृंखला (1815, 1817, 1818, 1820, 1823, 1828, 1833) की प्रथम कड़ी है।
| तिथि | तथ्य / कार्य |
|---|---|
| 3 मई 1815 | गार्डनर ने ब्रिटिश कुमाऊं के प्रथम कमिश्नर के रूप में कार्यभार ग्रहण किया। |
| 1815 | बच्चों की खरीद-फरोख्त (बाल-विक्रय) पर पूर्ण रूप से रोक लगाई गई। |
| 1815 | कुमाऊं का प्रथम भूमि बंदोबस्त — सहायक जॉर्ज विलियम ट्रेल द्वारा सम्पन्न। |
| 9 माह | गार्डनर का कुल कार्यकाल — अल्पकालीन परंतु महत्त्वपूर्ण। |
- इन्हें "मनमाना प्रशासक" भी कहा जाता है।
- ट्रेल के शासनकाल को उत्तराखंड में "ना अपील, ना वकील, ना दलील" का काल माना जाता है।
- उत्तराखंड में ब्रिटिश शासन का वास्तविक संस्थापक ट्रेल को ही माना जाता है।
- प्रसिद्ध पुस्तक: "स्टैटिस्टिकल स्केच ऑफ कुमाऊं" (Statistical Sketch of Kumaon)।
- 1815: उत्तराखंड में पहली बार अल्मोड़ा से श्रीनगर के बीच डाक व्यवस्था शुरू हुई।
- 1816: कुमाऊं में अल्मोड़ा जेल का निर्माण किया गया।
- संबंधित तथ्य (1821): इसी क्रम में आगे पौड़ी में भी जेल का निर्माण किया गया।
- 1817: देहरादून को सहारनपुर में शामिल किया गया।
- 26 जून 1825: देहरादून को कुमाऊं कमिश्नरी में शामिल किया गया।
- 1829: देहरादून को कुमाऊं कमिश्नरी से हटाकर मेरठ कमिश्नरी में मिला दिया गया।
- 1819 में पटवारी के पदों का सृजन किया गया।
- इस समय यह पद वंशानुगत (Hereditary) रखा गया था।
- 1820 में कोर्ट फीस की जगह स्टाम्प पेपर जारी करना प्रारम्भ हुआ — वित्तीय प्रशासन में महत्त्वपूर्ण सुधार।
- 1822 में आबकारी विभाग (Excise Department) की स्थापना हुई।
- कुली बेगार के विकल्प के रूप में खच्चर सेना (Mule Army) की स्थापना की गई — यह सुझाव मिस्टर ग्लिन (Mr. Glyn) का था।
- 80 साला बंदोबस्त: 1823 ई० + 57 = 1880 विक्रम संवत होने के कारण इसे यह नाम मिला।
- 7 भूमि बंदोबस्त: ट्रेल ने उत्तराखंड में कुल सात भूमि बंदोबस्त करवाए — वर्ष: 1815, 1817, 1818, 1820, 1823, 1828 और 1833।
- परगना विभाजन: डॉ. आर.एस. टोलिया के अनुसार, ट्रेल ने कुमाऊं को 22 से 26 परगनों में बांटा और कुमाऊं की सीमा का निर्धारण किया।
- रंवाई (Rawain) का क्षेत्र राजा सुदर्शन शाह को वापस लौटा दिया गया।
- सरकारी खजाने के नियंत्रण के लिए डबल लॉक व्यवस्था आरम्भ की गई — एक चाबी कलेक्टर के पास, दूसरी ट्रेजरर के पास।
- 1827–28: हरिद्वार से बद्रीनाथ और केदारनाथ जाने वाली सड़क का निर्माण आरम्भ करवाया गया।
- 1828: जन्म, मृत्यु और विवाह का पंजीकरण करने की प्रथा आरम्भ हुई।
- 1828: यही वर्ष ट्रेल के सात भूमि-बंदोबस्तों में से छठे बंदोबस्त का भी वर्ष है।
- तकनीकी विवरण: गोरखा और कत्यूरी/पंवार राजाओं के समय से चारधाम यात्रियों को मुफ्त भोजन और आश्रय देने के लिए कई गाँवों का राजस्व दान (Endowment) में दिया गया था, जिसे "सदाबर्त" कहते थे।
- ट्रेल का सुधार (1829): पंडा और पुजारियों द्वारा इस निधि के भारी गबन को देखते हुए, ट्रेल ने 1829 में सदाबर्त गाँवों का प्रबंधन सीधे अपने हाथ में ले लिया।
- 1829–30: नदियों पर लोहे के सस्पेंशन (झूला) पुलों का निर्माण आरम्भ हुआ।
- 1830: मलाकतोली ग्लेशियर के पास ट्रेल पास (Traill Pass) दर्रे की खोज हुई — दर्रे का नामकरण इन्हीं के सम्मान में हुआ। इस अभियान में कुमाऊं के एक प्रसिद्ध स्थानीय गाइड मलक सिंह बूढ़ा (Malak Singh Buda) ने ट्रेल का मार्गदर्शन किया था।
- 1833: अल्मोड़ा में देसी (Basic) चिकित्सकों की नियुक्ति की गई।
- 1833: यह वर्ष ट्रेल के सात भूमि-बंदोबस्तों में अंतिम (सातवें) बंदोबस्त का भी वर्ष है।
- 1834: आधुनिक हल्द्वानी शहर की स्थापना की गई।
- 1835: ट्रेल का दीर्घकालीन (19 वर्ष) कार्यकाल समाप्त हुआ — अगले कमिश्नर कर्नल गोवान बने।
| तिथि | तथ्य / कार्य |
|---|---|
| 1815 | अल्मोड़ा से श्रीनगर के बीच उत्तराखंड की प्रथम डाक व्यवस्था शुरू हुई। |
| 1816 | ट्रेल कुमाऊं के द्वितीय कमिश्नर नियुक्त हुए; इसी वर्ष अल्मोड़ा जेल का निर्माण। |
| 1817 | देहरादून को सहारनपुर में शामिल किया गया। |
| 1819 | पटवारी पदों का सृजन (इस समय वंशानुगत पद)। |
| 1820 | कोर्ट फीस की जगह स्टाम्प पेपर जारी करना प्रारम्भ। |
| 1821 | पौड़ी में जेल का निर्माण। |
| 1822 | आबकारी विभाग की स्थापना एवं कुली-बेगार के विकल्प हेतु खच्चर सेना (मिस्टर ग्लिन के सुझाव पर)। |
| 1823 | 80 साला बंदोबस्त; परगना 22 से 26 में विभाजित (डॉ. आर.एस. टोलिया)। |
| 1824 | रंवाई क्षेत्र राजा सुदर्शन शाह को वापस; डबल लॉक व्यवस्था आरम्भ। |
| 26 जून 1825 | देहरादून को कुमाऊं कमिश्नरी में शामिल किया गया। |
| 1827–28 | हरिद्वार से बद्रीनाथ एवं केदारनाथ मार्ग का निर्माण आरम्भ। |
| 1828 | जन्म, मृत्यु, विवाह पंजीकरण की प्रथा आरम्भ; देहरादून मेरठ कमिश्नरी में मिला। |
| 1829 | सदाबर्त निधि (चारधाम यात्री-भोजन हेतु दान गाँव) का प्रबंधन — पंडा-पुजारियों के गबन के कारण सीधे ट्रेल के हाथ में। |
| 1829–30 | नदियों पर लोहे के सस्पेंशन (झूला) पुलों का निर्माण आरम्भ। |
| 1830 | मलाकतोली ग्लेशियर के पास ट्रेल पास दर्रे की खोज (गाइड: मलक सिंह बूढ़ा)। |
| 1833 | अल्मोड़ा में देसी चिकित्सकों की नियुक्ति। |
| 1834 | आधुनिक हल्द्वानी शहर की स्थापना। |
| 1835 | ट्रेल का 19 वर्षीय कार्यकाल समाप्त। |
| क्रम | भूमि बंदोबस्त — वर्ष |
|---|---|
| प्रथम | 1815 — गार्डनर के कार्यकाल में, ट्रेल द्वारा सम्पन्न |
| द्वितीय | 1817 |
| तृतीय | 1818 |
| चतुर्थ | 1820 |
| पंचम | 1823 — '80 साला बंदोबस्त' के नाम से प्रसिद्ध |
| षष्ठम | 1828 |
| सप्तम (अंतिम) | 1833 |
- दिसंबर 1835 में जब ट्रेल ने अचानक इस्तीफा दिया, तो उनके तुरंत बाद गोवान कमिश्नर नहीं बने — बीच में कुछ माह का एक "अंतराल" (Interregnum) रहा।
- इस बीच के कुछ महीनों के लिए मोस्ले स्मिथ (Mosley Smith) को कार्यवाहक (Officiating) कमिश्नर बनाया गया था — यानी स्थायी नियुक्ति होने तक का एक अस्थायी प्रबंध।
- मोस्ले स्मिथ के पश्चात् ही कर्नल गोवान ने नियमित तीसरे कमिश्नर के रूप में 1836 में कार्यभार संभाला।
- गोवान के समय उत्तराखंड में दास प्रथा, बाल-विक्रय एवं महिला-विक्रय का पूर्णतः अंत किया गया और इन्हें अपराध घोषित कर दिया गया।
- 1836 में पदभार संभालते ही इन्होंने दासता पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया।
- गोरखाकालीन न्याय व्यवस्थाओं (जैसे विभिन्न प्रकार की दिव्य परीक्षाएँ / 'दीप') को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया।
- न्याय व्यवस्था में सुधार करते हुए गोवान ने 'सदर अमीन' (Sadar Amin) पद का सृजन किया।
- 1837: गोवान के समय कुमाऊं का पहला पुलिस थाना अल्मोड़ा में स्थापित किया गया।
- 1843संबंधित तथ्य: आगे चलकर नैनीताल पुलिस थाना बना — यह कमिश्नर लुशिंगटन के कार्यकाल में बना था।
- 1869संबंधित तथ्य: इसी क्रम में रानीखेत पुलिस थाना भी स्थापित किया गया।
- एडवर्ड गार्डनर, जी.डब्ल्यू. ट्रेल अथवा उनके बाद आने वाले लुशिंगटन और बैटन — ये सभी प्रशासनिक सेवा (Civil Services) से थे, परन्तु गोवान पूरी तरह से सेना (Army) से उठाकर कमिश्नर बनाए गए थे।
- इस सैनिक पृष्ठभूमि के कारण गोवान को पहाड़ी क्षेत्रों के जटिल राजस्व एवं भूमि-संबंधी मामलों का व्यावहारिक अनुभव नहीं था।
- परिणामस्वरूप गोवान फाइलों और मुकदमों के बढ़ते बोझ को संभाल नहीं पाए।
- आगरा बोर्ड (Board at Agra) उनके कामकाज से इतना अधिक असंतुष्ट हुआ कि उन्हें अक्षम (Inefficient) मानकर मात्र दो वर्षों के भीतर ही — 1838 में — पद से हटा दिया गया।
- उनके स्थान पर अगले (चतुर्थ) कमिश्नर के रूप में जॉर्ज थॉमस लुशिंगटन को भेजा गया।
| तिथि | तथ्य / कार्य |
|---|---|
| 1835–36 | मोस्ले स्मिथ ट्रेल और गोवान के बीच कार्यवाहक (Officiating) कमिश्नर रहे — गोवान को इसी अंतराल के बाद नियमित तीसरे कमिश्नर का दायित्व मिला। |
| 1836 | पदभार ग्रहण करते ही दास प्रथा पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया; बाल-विक्रय व महिला-विक्रय को अपराध घोषित किया। |
| 1836 | गोरखाकालीन दिव्य परीक्षाओं (न्याय की परम्पराओं) को पूर्णतः समाप्त किया। |
| 1837 | न्याय-सुधार हेतु 'सदर अमीन' पद का सृजन किया। |
| 1837 | कुमाऊं का प्रथम पुलिस थाना — अल्मोड़ा में स्थापित किया।
|
| 1838 | एकमात्र सैनिक पृष्ठभूमि वाले कमिश्नर होने के कारण राजस्व/भूमि-कार्यों का अनुभव नहीं; आगरा बोर्ड द्वारा "अक्षम" (Inefficient) मानकर हटाए गए — कार्यकाल अंत। |
▶ 📖 पृष्ठभूमि / सन्दर्भ पढ़ें — यह कैसे हुआ? (क्लिक करें)
कमिश्नरी 'बोर्ड ऑफ फर्रुखाबाद' के अधीन थी — पर ट्रेल ने इसे व्यावहारिक रूप से नकारा। प्रशासन मौखिक आदेशों व व्यक्तिगत विवेक (Paternalistic Rule) पर चला; कोई लिखित रिकॉर्ड नहीं।
उत्तराधिकारी कर्नल गोवान दुर्बल प्रशासक सिद्ध हुए। आगरा बोर्ड ने मैदानी कानून व लिखित रिपोर्टें थोपीं — न्यायिक तंत्र ठप; मुकदमे वर्षों तक लंबित।
रेगुलेशन 10 ने कुमाऊं को बोर्ड के नियंत्रण से मुक्त किया। लुशिंगटन नए कमिश्नर बने और उन्होंने प्रशासन को 'व्यक्तिगत विवेक' से हटाकर 'लिखित नियमों व संस्थाओं' पर आधारित किया — Central Record Room इसी का परिणाम था।
▶ 📖 श्रीनगर से पौड़ी क्यों? — कारण पढ़ें (क्लिक करें)
- पी. बैरन (P. Barron) द्वारा नैनीताल की खोज लुशिंगटन के कार्यकाल में ही की गई।
- तराई जिले का गठन किया गया।
▶ 📖 तराई को कुमाऊँ से अलग क्यों किया गया? (क्लिक करें)
- डकैतों का आतंक: मैदानी डकैतों के आगे कुमाऊँ की निहत्थी 'पटवारी पुलिस' (राजस्व पुलिस) असमर्थ थी।
- सशस्त्र पुलिस की ज़रूरत: डकैतों पर नकेल हेतु सशस्त्र पुलिस व सख्त मजिस्ट्रेट केवल रुहेलखंड डिवीजन के अधीन ही संभव थे।
- मलेरिया का खौफ: तराई का जानलेवा मलेरिया अंग्रेज़ अफसरों के लिए बड़ा खतरा था, इसलिए पहाड़ से सीधा प्रशासन टाला गया।
- नगरपालिका के गठन हेतु Act X of 1842 पारित हुआ और नैनीताल के विकास का आरंभ हुआ।
- लुशिंगटन के कार्यकाल में नैनीताल में पहले पुलिस थाने की स्थापना हुई।
- खैरना से नैनीताल मार्ग का निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ।
- अल्मोड़ा में डिस्पेंसरी कमेटी (Dispensary Committee) का गठन किया गया।
- बागेश्वर में गोमती नदी पर पुल का निर्माण किया गया।
- कमिश्नर के पद पर रहते हुए नैनीताल में इनकी मृत्यु हो गई।
| तिथि | तथ्य / कार्य |
|---|---|
| 1815–1839 | कमिश्नरी 'बोर्ड ऑफ फर्रुखाबाद' (आगरा बोर्ड) के अधीन; ट्रेल काल में मौखिक आदेशों पर प्रशासन। |
| दिसंबर 1838 | रेगुलेशन 10 ऑफ 1838 पारित — कुमाऊं को आगरा बोर्ड से मुक्त कर स्वतंत्र नॉन-रेगुलेशन निकाय का दर्जा; कर्नल गोवान अपदस्थ। |
| 1839 | कमिश्नरी स्वतंत्र निकाय बनी → लुशिंगटन = प्रथम स्वतंत्र कमिश्नर। |
| 1839 | प्रांत दो जिलों में विभक्त: कुमाऊं जिला (अल्मोड़ा) + ब्रिटिश गढ़वाल जिला (श्रीनगर); प्रमुख = सीनियर असिस्टेंट/डिप्टी कमिश्नर; प्रथम = जे.एच. बैटन। |
| 1839 | अल्मोड़ा में केंद्रीय अभिलेखागार (Central Record Room) स्थापित; श्रीनगर में हडलस्टन स्कूल की स्थापना। |
| 1840 | पौड़ी जनपद गठन; गढ़वाल मुख्यालय श्रीनगर → पौड़ी (जलवायु/भौगोलिक कारण); बद्री–केदार मार्ग पर असिस्टेंट सर्जन्स नियुक्त। |
| 1841 | पी. बैरन (P. Barron) द्वारा नैनीताल की खोज। |
| 1842 | तराई जिले का गठन; Act X of 1842 — नगरपालिका एक्ट; नैनीताल विकास आरंभ। |
| 1843 | नैनीताल में प्रथम पुलिस थाना स्थापित (लुशिंगटन — गोवान नहीं)। |
| 1845 | खैरना–नैनीताल सड़क निर्माण आरंभ। |
| 1848 | अल्मोड़ा डिस्पेंसरी कमेटी; बागेश्वर में गोमती नदी पर पुल; नैनीताल में पद पर मृत्यु। |
- असिस्टेंट के पद पर रहते हुए बैटन ने 1840 में गढ़वाल का और 1844 में कुमाऊं का भूमि बंदोबस्त किया। इसे '20 साला बंदोबस्त' (20-Year Settlement) भी कहा जाता है।
- 1840 का यह बंदोबस्त गढ़वाल का प्रथम विस्तृत/20 साला भूमि बंदोबस्त था — परीक्षा में अलग से पूछा जाता है।
- बैटन ने कमिश्नर बनते ही अप्रशिक्षित पटवारियों की जगह शिक्षित पटवारियों की नियुक्ति की।
- सरकारी डाक बंगलों (Dak Bungalows) को आम यात्रियों के ठहरने हेतु खोल दिया गया।
- अल्मोड़ा दवाखाने (Dispensary) की एक शाखा पिथौरागढ़ में खोली गई।
- अल्मोड़ा में रेवरेंड जे.एच. बडन (Rev. J.H. Budden) द्वारा लंदन मिशनरी सोसाइटी (London Missionary Society) की स्थापना की गई।
- बमोरी से अल्मोड़ा मार्ग का सर्वेक्षण (Survey) किया गया।
- ऊपरी गंगा नहर (Upper Ganga Canal) के निर्माण में मिट्टी व सामग्री ढोने हेतु 1851 में रुड़की से पिरान कलियर के बीच भारत (एवं उत्तराखंड) की प्रथम मालगाड़ी ट्रेन चली।
- यह नहर लुशिंगटन के समय में प्रारंभ हुई थी, परंतु 1854 में बैटन के काल में पूर्ण हुई।
- असिस्टेंट कमिश्नर जॉन स्ट्रेची द्वारा श्रीनगर (गढ़वाल) में अलकनंदा नदी पर प्रथम लोहे के सस्पेंशन पुल का निर्माण किया गया।
- अक्टूबर 1854 में कुमाऊं कमिश्नरी का कार्यालय (मुख्यालय) आधिकारिक रूप से अल्मोड़ा से नैनीताल स्थानांतरित कर दिया गया।
| तिथि | तथ्य / कार्य |
|---|---|
| 1836–1848 | बैटन — असिस्टेंट कमिश्नर के रूप में कार्य (कमिश्नर बनने से पूर्व)। |
| 1840 | गढ़वाल का 20 साला बंदोबस्त — गढ़वाल का प्रथम विस्तृत भूमि बंदोबस्त। |
| 1844 | कुमाऊं का 20 साला बंदोबस्त (8वाँ भूमि बंदोबस्त)। |
| 1848 | शिक्षित पटवारियों की नियुक्ति। |
| 1849 | डाक बंगले आम यात्रियों के लिए खोले गए। |
| 1849 | अल्मोड़ा दवाखाने की शाखा पिथौरागढ़ में। |
| 1850 | अल्मोड़ा में लंदन मिशनरी सोसाइटी (Rev. J.H. Budden) की स्थापना। |
| 1850 | बमोरी–अल्मोड़ा मार्ग का सड़क सर्वेक्षण। |
| 1851 | भारत की प्रथम मालगाड़ी — रुड़की से पिरान कलियर (ऊपरी गंगा नहर निर्माण के लिए)। |
| 1853 | जॉन स्ट्रेची द्वारा श्रीनगर में अलकनंदा पर प्रथम लोहे का सस्पेंशन पुल। |
| 1854 | ऊपरी गंगा नहर (Upper Ganga Canal) पूर्ण। |
| अक्टूबर 1854 | कुमाऊं कमिश्नरी मुख्यालय अल्मोड़ा → नैनीताल स्थानांतरित। |
- कुमाऊं (तराई-भाबर) में नहरों व विकास कार्यों के कारण बद्री दत्त पांडे ने अपनी पुस्तक 'कुमाऊं का इतिहास' में रैमजे को — "तराई-भाबर का विश्वकर्मा", "तराई-भाबर का शिल्पकार" और "तराई-भाबर का PWD ऑफिसर" कहा है।
- रैमजे ~1840 के आसपास अल्मोड़ा में सिविल अधिकारी के रूप में नियुक्त हुए।
- उस समय कुमाऊं में कुष्ठ रोग को लेकर भारी सामाजिक कलंक (stigma) था — रोगियों को गाँवों से बाहर निकाल दिया जाता था।
- रोगियों की दुर्दशा से व्यथित होकर रैमजे ने व्यक्तिगत स्तर पर उनकी देखभाल का बीड़ा उठाया।
- रैमजे ने अपने स्वयं के धन से अल्मोड़ा में कुष्ठ रोगियों हेतु पत्थर की छोटी झोपड़ियाँ बनवाईं।
- इस प्रारंभिक बस्ती का स्थान "गणेश की गैर" कहलाता था।
(कुमाउनी में 'गैर' = जमीन का एक टुकड़ा / सीढ़ीदार खेत) - यह कोई सरकारी पहल नहीं थी — यह रैमजे की व्यक्तिगत धर्मार्थ (personal charity) पहल थी।
- 1848 के आसपास इसी स्थान पर कुष्ठ रोगियों के ठहरने की यह प्रारंभिक व्यवस्था की गई — ब्रिटिश प्रशासन के ऐतिहासिक ग्रंथों में सत्यापित।
- ~1850–51: रैमजे ने इस आश्रम का प्रबंधन लंदन मिशनरी सोसाइटी (LMS) को सौंप दिया।
- 1854: स्टेशन के दक्षिण-पूर्व की एक अलग पहाड़ी पर संगठित कुष्ठ आश्रम की औपचारिक स्थापना एवं स्थानांतरण पूर्ण हुआ — भारतीय चिकित्सा इतिहास में यही वर्ष आधिकारिक माना जाता है।
- बाद में 'द मिशन टू लेपर्स' द्वारा सहायता प्राप्त हुई।
- वर्तमान में यह संस्था 'द लेप्रोसी मिशन ट्रस्ट इंडिया' द्वारा स्नेहालय (House of Love) नाम से संचालित की जा रही है।
- कमिश्नर बनने से पूर्व, सहायक कमिश्नर के रूप में कार्य करते हुए रैमजे ने रामनगर शहर की स्थापना की थी।
- मूल स्थापना (1851): इसकी शुरुआत अगस्त 1851 में 'अल्मोड़ा मिशन स्कूल' के रूप में हुई थी।
- संस्थापक: रेवरेंड जे.एच. बडेन (Rev. J.H. Budden)। यह 'लंदन मिशनरी सोसाइटी' द्वारा स्थापित किया गया था।
- वर्तमान भवन (1871): 1871 में इसे वर्तमान भवन में स्थानांतरित किया गया। यह भवन उसी स्थान पर बना है जहाँ कभी चंद वंशीय राजाओं का महल हुआ करता था।
- नामकरण (1886): 1886 में कलकत्ता विश्वविद्यालय (Calcutta University) से मान्यता मिलने पर, कुमाऊं के तत्कालीन कमिश्नर सर हेनरी रैमजे के नाम और सम्मान में इसका नाम बदलकर 'रैमजे कॉलेज' कर दिया गया।
रैमजे के काल में स्थापित अन्य प्रमुख विद्यालय (नैनीताल)
| विद्यालय | स्थापना वर्ष | विशेष तथ्य |
|---|---|---|
| Sherwood College | 1869 | रैमजे के व्यक्तिगत निवास की भूमि पर निर्मित; उनके सक्रिय सहयोग से स्थापित। |
| All Saints' College | 1869 | बालिकाओं के लिए आवासीय विद्यालय के रूप में स्थापित। |
| St. Mary's Convent High School | 1878 | रैमजे से खरीदी गई संपत्ति (estate) पर स्थापित। |
| St. Joseph's College | 1888 | रैमजे के अंतिम दशक में मिशनरी आगमन की नींव तैयार हुई। |
- मार्शल लॉ: क्रांति के दौरान कुमाऊं में शांति बनाए रखने हेतु विभिन्न स्थानों पर मार्शल लॉ लागू किया गया तथा न्यायालयों की स्थापना की गई।
- हल्द्वानी पर कब्ज़ा: बरेली के खान बहादुर खान के सेनापति काले खां ने 17 सितंबर 1857 को हल्द्वानी पर कब्ज़ा कर लिया।
- पुनः कब्ज़ा: ब्रिटिश अधिकारी कैप्टन मैक्सवेल (Captain Maxwell) एवं गोरखाओं की 'रणवीर सेना' द्वारा हल्द्वानी पर पुनः कब्ज़ा किया गया।
- प्रथम स्वतंत्रता सेनानी: इसी क्रांति के दौरान चंपावत के कालू माहरा ने 'क्रांतिवीर' नामक गुप्त संगठन बनाया — इन्हें उत्तराखंड के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी होने का गौरव प्राप्त है।
- प्रथम चर्च: नैनीताल में पादरी विलियम बटलर द्वारा कुमाऊं के प्रथम (मेथोडिस्ट) चर्च की स्थापना की गई।
- हिल रेजिमेंट: रैमजे के प्रयासों से 1858 में ही कुमाऊं में हिल रेजिमेंट (Hill Regiment) का गठन किया गया।
- रैमजे के समय में कुमाऊं का 9वाँ भूमि बंदोबस्त हुआ, जिसके बंदोबस्त अधिकारी जी.ई. बैकेट (G.E. Beckett) थे — इसलिए इसे 'बैकेट बंदोबस्त' भी कहा जाता है।
- इसमें पहली बार वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग कर भूमि को 5 भागों में बांटा गया — तलाव, उपराऊं अव्वल, उपराऊं दोयम, कटील (कंटीली), और इजरान।
- तलाव (Talao / Talaon) — सर्वश्रेष्ठ श्रेणी। घाटी के निचले हिस्सों (Valley Bottoms) की सिंचित भूमि (Irrigated Land)। नदी-नाले के निकट होने के कारण पानी सदा सुलभ, फसल अत्यंत उत्तम।
- उपराऊं अव्वल (Upraon Awwal) — पहाड़ियों के ढलानों (Hill Sides) पर स्थित प्रथम श्रेणी की असिंचित भूमि। मिट्टी उपजाऊ परंतु वर्षाजल पर निर्भर।
- उपराऊं दोयम (Upraon Doyam) — पहाड़ियों के ढलानों पर ही स्थित द्वितीय श्रेणी की असिंचित भूमि। अव्वल से कम उपजाऊ — पथरीलापन अधिक, मिट्टी पतली।
- इजरान (Ijran / Izraan) — घटिया किस्म की पथरीली या सीढ़ीनुमा भूमि जहाँ लगातार खेती संभव नहीं थी। कुछ वर्ष जोतने के बाद भूमि को परती छोड़ना पड़ता था।
- कटील / कंटीली (Katil / Kateel) — जंगलों के किनारे (Forest Edges) झाड़ियाँ काटकर बनाई गई नई या बंजर भूमि। सबसे निम्न श्रेणी — अभी हाल ही में कृषि योग्य बनाई गई, उत्पादकता न्यूनतम।
- रैमजे के कार्यकाल के दौरान ही अल्मोड़ा नगरपालिका की स्थापना की गई।
- नैनीताल में एक छोटा भूस्खलन आया, जिसके बाद सुरक्षा हेतु 'हिल सेफ्टी कमेटी' का गठन किया गया।
- नैनीताल से पत्रकार जयदत्त जोशी ने 1868 में 'समय विनोद' नामक पत्र निकाला, जो 1877 तक प्रकाशित होता रहा।
- स्वरूप: यह एक द्विभाषी (Bilingual) पत्र था — हिंदी एवं उर्दू, दोनों भाषाओं में प्रकाशित होता था; पत्र का अंतिम पृष्ठ सदैव उर्दू में होता था।
- महत्व: उत्तराखंड से प्रकाशित होने वाला प्रथम देशी भाषाई (वर्नाक्यूलर) समाचार पत्र। चूँकि यह आधा उर्दू में भी था, इसलिए इसे "प्रथम पूर्ण हिंदी पत्र" का दर्जा नहीं मिलता — वह सम्मान आगे चलकर 'अल्मोड़ा अखबार' (1871) को मिला (देखें नीचे 1870 की प्रविष्टि)।
- अल्मोड़ा में बुद्धि बल्लभ पंत द्वारा 'डिबेटिंग क्लब' की स्थापना की गई — साथ ही सदानंद सनवाल भी इसके सह-संस्थापकों में थे
तत्कालीन North-Western Provinces के Lieutenant Governor सर विलियम म्योर (Sir William Muir) का भी इसे परोक्ष संरक्षण प्राप्त था। - उद्देश्य: स्थानीय जनता की समस्याओं पर विचार-विमर्श करना, प्रशासन तक जनता की आवाज़ पहुँचाना और समाज में राजनीतिक व बौद्धिक चेतना (Intellectual Awakening) जगाना।
- इसी क्लब के प्रयासों से 1871 में अल्मोड़ा में एक प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना हुई, जिससे उसी वर्ष 'अल्मोड़ा अखबार' — कुमाऊं का पहला हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र — प्रारंभ हुआ; इसके प्रथम संपादक बुद्धि बल्लभ पंत ही थे।
- कुमाऊं में 'अधिसूचित जिला अधिनियम' (Scheduled District Act) लागू हुआ।
- इसके तहत कुमाऊं को एक नॉन-रेगुलेशन प्रांत घोषित कर दिया गया, जिससे कमिश्नर को विशेष अधिकार मिल गए — किसी भी सामान्य कानून को यहाँ लागू होने से रोकने की शक्ति।
- पुलिस एक्ट 1861 से बचाव: रैमजे का मानना था कि पहाड़ के लोग सीधे-सादे हैं, अपराध लगभग शून्य हैं, और 'रेगुलर पुलिस' (थाना-चौकी) के आने से भ्रष्टाचार व जनता का उत्पीड़न बढ़ेगा — इसलिए ग्रामीण कुमाऊं-गढ़वाल में 1861 का पुलिस एक्ट लागू नहीं किया गया।
- पटवारी को पुलिस शक्तियां: ट्रेल द्वारा 1819 में सृजित 'पटवारी' पद को इसी एक्ट (धारा 6) से मजबूत कानूनी मान्यता मिली — राजस्व अधिकारी (पटवारी, कानूनगो, नायब तहसीलदार, तहसीलदार, एसडीएम) ही FIR दर्ज करने, विवेचना करने व गिरफ्तारी का कानूनी अधिकार पाकर पुलिस का काम करने लगे।
- नैनीताल की शेर-का-डांडा (Sher-Ka-Danda) पहाड़ी पर एक अत्यंत विनाशकारी भूस्खलन हुआ।
- इसमें लगभग 151 लोगों की मृत्यु हो गई थी और नैना देवी का प्राचीन मंदिर भी नष्ट हो गया था।
- तराई-भाबर क्षेत्र के विकास एवं सुधार कार्यों हेतु रैमजे द्वारा 'तराई इम्प्रूवमेंट फंड' (Tarai Improvement Fund) की स्थापना की गई।
- 24 अप्रैल 1884 को पहली बार लखनऊ से काठगोदाम रेलवे स्टेशन पर ट्रेन आई।
| तिथि | तथ्य / कार्य |
|---|---|
| 1850 | सहायक कमिश्नर रहते हुए रामनगर की स्थापना। |
| 1856–1884 | रैमजे का 28 वर्षीय कार्यकाल — कुमाऊं का 'बेताज बादशाह' / 'रामजी'। |
| 17 सितंबर 1857 | काले खां द्वारा हल्द्वानी पर कब्ज़ा; पुनः कब्ज़ा — कैप्टन मैक्सवेल + रणवीर सेना; कालू माहरा — 'क्रांतिवीर', उत्तराखंड के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी। |
| 1858 | विलियम बटलर — नैनीताल में प्रथम (मेथोडिस्ट) चर्च; हिल रेजिमेंट का गठन। |
| 1863–1873 | 9वाँ भूमि बंदोबस्त (बैकेट बंदोबस्त) — भूमि को 5 भागों (तलाव, उपराऊं अव्वल/दोयम, कटील, इजरान) में विभाजित। |
| 1864 | अल्मोड़ा नगरपालिका की स्थापना। |
| 1867 | 'हिल सेफ्टी कमेटी' गठित — उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन का प्रथम प्रयास (नैनीताल भूस्खलन के बाद)। |
| 1868 | नैनीताल से जयदत्त जोशी (पत्रकार) का 'समय विनोद' — उत्तराखंड का प्रथम वर्नाक्यूलर पत्र (हिंदी-उर्दू), 1877 तक प्रकाशित। |
| 1870 | अल्मोड़ा में बुद्धि बल्लभ पंत द्वारा 'डिबेटिंग क्लब'। |
| 1874 | अधिसूचित जिला अधिनियम — कुमाऊं नॉन-रेगुलेशन प्रांत घोषित। |
| 18 सितंबर 1880 | शेर-का-डांडा भूस्खलन — ~151 मृत्यु; नैना देवी मंदिर नष्ट। |
| 1883 | 'तराई इम्प्रूवमेंट फंड' की स्थापना। |
| 24 अप्रैल 1884 | लखनऊ से काठगोदाम — प्रथम ट्रेन; रैमजे का कार्यकाल समाप्त। |
- एच.जी. रॉस के कार्यकाल (1885–1887) में ही 28 दिसंबर 1885 को बॉम्बे (मुंबई) के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत महाविद्यालय में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की स्थापना हुई।
प्रथम अध्यक्ष: डब्ल्यू.सी. बनर्जी (W.C. Bonnerjee) — 1885, बॉम्बे (72 प्रतिनिधि)
वायसराय (INC स्थापना के समय): लॉर्ड डफरिन (Lord Dufferin, 1884–1888)
'INC' नाम किसने दिया: दादाभाई नौरोजी
प्रथम महिला अध्यक्ष: एनी बेसेंट (1917) | प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष: सरोजिनी नायडू (1925)
प्रथम विदेशी अध्यक्ष: जॉर्ज यूल (George Yule, 1888 — इलाहाबाद)
- 5 मई 1887 को अल्मोड़ा में लेफ्टिनेंट कर्नल ई.पी. मेनवरिंग (E.P. Mainwaring) द्वारा 39वीं गढ़वाल राइफल्स की स्थापना की गई।
- 4 नवंबर 1887 को इसका मुख्यालय अल्मोड़ा से कालोडांडा (जिसे 1890 में लैंसडाउन कहा गया- in honor of the then Viceroy of India, Lord Lansdowne) स्थानांतरित कर दिया गया।
- जे.आर. रीड के कार्यकाल के अंत में 1889 में कुमाऊं में हथियारों के लिए 'लाइसेंस नीति' (Arms License Policy) लागू की गई।
- 1891 में कुमाऊं जिले को दो नए जनपदों — अल्मोड़ा और नैनीताल — में बाँट दिया गया।
- 1892 में 'तराई जनपद' का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त कर उसे नैनीताल जिले का एक उप-मंडल (Sub-division) बना दिया गया।
| तिथि | कमिश्नर | तथ्य / कार्य |
|---|---|---|
| ── रॉस (1885–1887) — 8वें कमिश्नर ── | ||
| 28 दिसंबर 1885 | रॉस | बॉम्बे के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत महाविद्यालय में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की स्थापना। |
| ── रीड (1887–1889) — 9वें कमिश्नर ── | ||
| 5 मई 1887 | रीड | ई.पी. मेनवरिंग द्वारा अल्मोड़ा में 39वीं गढ़वाल राइफल्स की स्थापना। |
| 4 नवंबर 1887 | रीड | गढ़वाल राइफल्स का मुख्यालय अल्मोड़ा → कालोडांडा (लैंसडाउन) स्थानांतरित। |
| 1889 | रीड | कुमाऊं में हथियारों हेतु 'लाइसेंस नीति' (Arms License Policy) लागू। |
| ── अर्सकाइन (1889–1892) — 10वें कमिश्नर ── | ||
| 1891 | अर्सकाइन | कुमाऊं जिले का दो जनपदों — अल्मोड़ा + नैनीताल — में विभाजन। |
| 1892 | अर्सकाइन | तराई जनपद का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त; नैनीताल जिले का Sub-division बना। |
- कमिश्नर हैम्बलिन के कार्यकाल (1899–1902) में ही हरिद्वार-देहरादून रेलवे लाइन का निर्माण पूर्ण हुआ।
- 1 मार्च 1900 को देहरादून में पहली बार यात्री ट्रेन पहुँची।
- 19 अगस्त 1901 को तारा दत्त गैरोला द्वारा देहरादून में 'गढ़वाल हितकारिणी सभा' की स्थापना की गई (जिसे 1904 में नामांतरित कर 'गढ़वाल यूनियन' किया गया)।
- इस संस्था का उद्देश्य क्षेत्र का सामाजिक, शैक्षणिक एवं राजनीतिक उत्थान करना था।
- तारा दत्त गैरोला को 'गढ़वाल का महर्षि' एवं 'गढ़वाल जन-जागरण का पितामह' कहा जाता है।
- ब्रिटिश प्रशासनिक सुधारों के अंतर्गत 1902–1903 के मध्य नैनीताल जिला जेल का निर्माण एवं स्थापना की गई।
| तिथि | घटना / तथ्य |
|---|---|
| ── हैम्बलिन (1899–1902) — 13वें कमिश्नर ── | |
| 1 मार्च 1900 | हरिद्वार–देहरादून रेलवे लाइन पूर्ण; देहरादून में प्रथम यात्री ट्रेन पहुँची। |
| 19 अगस्त 1901 | तारा दत्त गैरोला द्वारा देहरादून में 'गढ़वाल हितकारिणी सभा' की स्थापना (1904 में → 'गढ़वाल यूनियन')। |
| मई 1905 | 'गढ़वाल यूनियन' मुखपत्र — 'गढ़वाली' मासिक पत्र; प्रथम संपादक: गिरिजा दत्त नैथानी ('पत्रकारिता का जनक')। |
| 1902–1903 | नैनीताल जिला जेल की स्थापना — ब्रिटिश प्रशासनिक सुधारों के अन्तर्गत। |
| ── ब्रिटिशकालीन जेल एवं थाने — क्रोनोलॉजी ── | |
| 1816 | अल्मोड़ा जेल — ब्रिटिश काल की प्रथम जेल। |
| 1821 | पौड़ी जेल — 1840 में पौड़ी मुख्यालय बनने पर महत्व बढ़ा। |
| 1837 | अल्मोड़ा थाना — राज्य के प्रारम्भिक थानों में से एक। |
| 1843 | नैनीताल थाना — ग्रीष्मकालीन राजधानी के विकास के साथ स्थापित। |
| 1869 | रानीखेत थाना — रानीखेत छावनी की स्थापना के साथ। |
- कमिश्नर जे. एस. कैम्पबेल के कार्यकाल के शुरुआती वर्ष 1906 में कुमाऊं भाबर क्षेत्र के लिए 'खेतिहर निवासी विधि' (Agricultural Tenancy Rules) लागू की गई।
- उद्देश्य: भाबर क्षेत्र में कृषि भूमि पर काश्तकारों के अधिकारों को सुरक्षित करना, जिससे मैदानी और पहाड़ी क्षेत्रों से आकर बसने वाले किसानों को कानूनी मान्यता मिली।
- वर्ष 1906 में मसूरी में 'ग्लोगी जलविद्युत परियोजना' (Galogi Hydroelectric Project) का निर्माण कार्य शुरू हुआ।
- पूर्ण होने का वर्ष: 1909 में इस परियोजना से बिजली का उत्पादन शुरू हुआ। यह दार्जिलिंग के बाद उत्तर भारत और देश के सबसे पुराने चालू पावर स्टेशनों में से एक है।
- वर्ष 1908 में गढ़वाल के द्वारिखाल (पौड़ी) में 'कुली एजेंसी' का गठन किया गया, जिसके संस्थापक जोध सिंह नेगी जी थे।
- प्रथम अध्यक्ष: तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर वी. ए. स्टोवेल (V.A. Stowell) को इसका पहला अध्यक्ष बनाया गया था।
- उद्देश्य: कुली बेगार प्रथा के कारण स्थानीय जनता के आर्थिक और शारीरिक शोषण को कम करना।
- वर्ष 1909 में वन संपदा के व्यवस्थित संरक्षण हेतु तराई क्षेत्र में चराई (Grazing) के नए नियम और शुल्क लागू किए गए।
- इसी वर्ष 1909 में 'कुमाऊं गवर्नमेंट गार्डन' की स्थापना (पुनर्गठन) की गई, जिसने राज्य में आधुनिक कृषि और बागवानी की नींव रखी।
- प्रभारी: इसका प्रभार प्रसिद्ध वनस्पतिशास्त्री नॉर्मन गिल (Norman Gill) को सौंपा गया था, जिन्होंने उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में सेब और अन्य फलों की बागवानी को व्यावसायिक रूप दिया।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बांकीपुर (पटना) अधिवेशन से प्रेरित होकर वर्ष 1912 में अल्मोड़ा कांग्रेस की स्थापना की गई थी।
- अल्मोड़ा कांग्रेस की रीढ़: पं. हरगोविंद पंत जी को अल्मोड़ा कांग्रेस की 'रीढ़' (Backbone) माना जाता है, जिन्होंने संगठन को जमीनी स्तर पर खड़ा किया।
- 23 दिसंबर 1912 को दिल्ली में वायसराय लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंका गया। इस ऐतिहासिक क्रांतिकारी घटना के मुख्य सूत्रधार रास बिहारी बोस थे।
- देहरादून कनेक्शन: रास बिहारी बोस उस समय देहरादून स्थित वन अनुसंधान संस्थान (FRI) में हेड क्लर्क के पद पर कार्यरत थे। वे घटना को अंजाम देकर तुरंत रात की ट्रेन से देहरादून लौट आए थे।
- सहयोगी क्रांतिकारी: इस पूरे नेटवर्क में उनके सबसे करीबी सहयोगी शचीन्द्रनाथ सान्याल थे। बम असल में बसंत कुमार बिस्वास ने फेंका था।
- उत्तराखंड में होमरूल लीग की स्थापना 1914 में ही हो गई थी। इसकी स्थापना बद्री दत्त पांडे, विक्टर मोहन जोशी, चिरंजीलाल और हेमचंद्र द्वारा की गई थी।
- बद्री दत्त पांडे जी का कथन: एनी बेसेंट की नीतियों का विरोध करते हुए पांडे जी ने स्पष्ट कहा था— "हमें छली बुढ़िया का नहीं, तिलक के होमरूल लीग की आवश्यकता है।"
- वर्ष 1914 में पंडित गोविन्द बल्लभ पंत जी द्वारा काशीपुर में 'प्रेम सभा' की स्थापना की गई। इसका मुख्य उद्देश्य समाज सुधार और हिंदी साहित्य को बढ़ावा देना था।
| तिथि | घटना / तथ्य |
|---|---|
| ── कैम्पबेल (1906–1914) — 15वें कमिश्नर ── | |
| 1906 | कुमाऊं भाबर खेतिहर निवासी विधि लागू। |
| 1906–1909 | ग्लोगी जलविद्युत परियोजना (मसूरी) — निर्माण 1906, उत्पादन आरम्भ 1909। |
| 1908 | कुली एजेंसी का गठन — द्वारिखाल (पौड़ी); संस्थापक: जोध सिंह नेगी; प्रथम अध्यक्ष: वी. ए. स्टोवेल। |
| 1909 | तराई क्षेत्र में चराई नियम लागू; कुमाऊं गवर्नमेंट गार्डन की स्थापना — प्रभारी: नॉर्मन गिल। |
| 1912 | अल्मोड़ा कांग्रेस की स्थापना — 'रीढ़': हरगोविंद पंत; अन्य संस्थापक: ज्वाला दत्त जोशी, सदानंद सनवाल, बद्री दत्त जोशी। |
| 23 दिसंबर 1912 | लॉर्ड हार्डिंग बम कांड — सूत्रधार: रास बिहारी बोस (देहरादून FRI); बम फेंका: बसंत कुमार बिस्वास; सहयोगी: शचीन्द्रनाथ सान्याल। |
| 1914 | उत्तराखंड होमरूल लीग की स्थापना — बद्री दत्त पांडे, विक्टर मोहन जोशी, चिरंजीलाल, हेमचंद्र। |
| 1914 | काशीपुर में 'प्रेम सभा' की स्थापना — गोविन्द बल्लभ पंत। |
| ── सन्दर्भ हेतु — कैम्पबेल-काल से सम्बद्ध घटनाएं ── | |
| 1903 | गोविन्द बल्लभ पंत — हैप्पी क्लब (अल्मोड़ा, हरगोविंद पंत के साथ); कैम्पबेल-काल से पूर्व। |
| 1922 * | * कैम्पबेल के पश्चात् — देहरादून होमरूल लीग व 'अभय' पत्र (स्वामी विचारानंद सरस्वती)। |
- 1915 में गांधी जी ने पहली बार उत्तराखंड की यात्रा की और हरिद्वार कुंभ मेले में भाग लिया।
- 1916 में गांधी जी ने देहरादून और हरिद्वार की यात्रा की।
- हरिद्वार में गुरुकुल कांगड़ी के संस्थापक स्वामी श्रद्धानंद से भेंट की, विश्वविद्यालय में व्याख्यान दिया एवं DAV के छात्रों से मुलाकात की।
- पर्सी विंढम ने घराटों (पनचक्कियों) और सिंचाई के पानी के उपयोग को नियंत्रित करने और उस पर कर (Tax) लगाने के लिए 1917 में 'कुमाऊं वाटर रूल्स' (Kumaon Water Rules) लागू किए, जिसका जनता ने भारी विरोध किया।
- कुमाऊं परिषद की तर्ज पर ही गढ़वाल में राजनीतिक चेतना जगाने के लिए वर्ष 1918 में बैरिस्टर मुकुंदी लाल एवं अनुसूया प्रसाद बहुगुणा के प्रयासों से 'गढ़वाल कांग्रेस कमेटी' की स्थापना की गई।
- बैरिस्टर मुकुंदी लाल एवं अनुसूया प्रसाद बहुगुणा — इन दोनों ही नेताओं ने 1919 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के ऐतिहासिक 'अमृतसर अधिवेशन' में भाग लिया और वहाँ से लौटकर गढ़वाल में आंदोलन को और तेज कर दिया।
- 13–14 जनवरी 1921 (मकर संक्रांति) को बागेश्वर में सरयू नदी के तट पर बद्रीदत्त पांडे के नेतृत्व में 40,000 लोगों ने कुली बेगार के रजिस्टर नदी में बहा दिए।
- कमिश्नर पर्सी विंढम वहीं मौजूद था, लेकिन गोली चलाने की हिम्मत नहीं जुटा सका।
- इस आंदोलन में मार्च 1921 में कत्यूर घाटी से मोहन सिंह मेहता को गिरफ्तार किया गया — वे कुली बेगार आंदोलन में जेल जाने वाले उत्तराखंड के प्रथम व्यक्ति थे।
- गांधी जी के असहयोग आंदोलन से प्रेरित होकर वर्ष 1921 में अल्मोड़ा के ताड़ीखेत में देवकीनंदन पांडे एवं भगीरथ पांडे द्वारा 'प्रेम विद्यालय' की स्थापना की गई थी।
- अंग्रेजों के कठोर वन कानूनों के विरोध में 1921 में कुमाऊं के जंगलों में भयंकर आग लगा दी गई थी (लगभग 2.7 लाख एकड़ वन क्षेत्र जल गया था)।
- इस वन-विरोध में सक्रिय भूमिका निभाने पर सोमेश्वर/कौसानी क्षेत्र की दुर्गा देवी को 1921 में गिरफ्तार किया गया — वे वन कानूनों के विरोध में गिरफ्तार होने वाली उत्तराखंड की प्रथम महिला मानी जाती हैं।
- इसी जन-आक्रोश को शांत करने के लिए 13 अप्रैल 1921 को यह कमेटी बनी।
- अध्यक्ष: स्वयं कुमाऊं कमिश्नर पर्सी विंढम।
- एकमात्र गैर-सरकारी सदस्य: जोध सिंह नेगी (गढ़वाल एवं स्थानीय जनता का पक्ष रखने के लिए)।
- कुमाऊं की वन समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर उजागर करने के लिए पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने 1922 में एक अत्यंत प्रसिद्ध पुस्तक लिखी थी — "द फॉरेस्ट प्रॉब्लम इन कुमाऊं"।
- इसी कमेटी की सिफारिशों पर 1931 में 'कुमाऊं फॉरेस्ट पंचायत रूल्स' बने और पूरे एशिया में पहली बार सामुदायिक 'वन पंचायतों' का गठन शुरू हुआ।
| तिथि | तथ्य / कार्य |
|---|---|
| 31 मार्च 1908 † | † विंढम से पूर्व — 'अल्मोड़ा अखबार' में कुमाऊं परिषद की परिकल्पना का सबसे प्रारंभिक उल्लेख (स्थापना से 8 वर्ष पूर्व)। |
| 1914–1924 | पर्सी विंढम का 10 वर्षीय कार्यकाल — "राजनीतिक जन-जागरण का स्वर्णिम काल"; इसी काल में प्रथम विश्व युद्ध (1914–18) लड़ा गया। |
| 1915 | गांधी जी की प्रथम उत्तराखंड यात्रा — हरिद्वार कुंभ मेला। |
| 1916 | गांधी जी — देहरादून-हरिद्वार यात्रा, गुरुकुल कांगड़ी (स्वामी श्रद्धानंद से भेंट); इसी वर्ष INC का लखनऊ अधिवेशन — बद्रीदत्त पांडे की तिलक से मुलाकात ("चार धाम" वाला कथन)। |
| 30 सितंबर 1916 | कुमाऊं परिषद की स्थापना — मझेड़ा (नैनीताल); अध्यक्ष — रा.ब. नारायण दत्त छिल्वाल; महासचिव — प्रेम वल्लभ पांडे; सदस्य — जयदत्त जोशी (राजनेता — 'समय विनोद' (1868) वाले पत्रकार जयदत्त जोशी से भिन्न व्यक्ति)। |
| 1917 | 'कुमाऊं वाटर रूल्स' लागू (1930 में संशोधन); प्रथम कुमाऊं परिषद अधिवेशन — अल्मोड़ा (जयदत्त जोशी)। |
| 1918 | द्वितीय अधिवेशन — हल्द्वानी (तारादत्त गैरोला), कुली बेगार पर प्रथम प्रस्ताव; 'गढ़वाल कांग्रेस कमेटी' की स्थापना (मुकुंदी लाल + अनुसूया प्रसाद बहुगुणा)। |
| 1919 | तृतीय अधिवेशन — कोटद्वार (रा.ब. बद्रीदत्त जोशी), गढ़वाल का एकमात्र अधिवेशन; मुकुंदी लाल व अनुसूया प्रसाद बहुगुणा — अमृतसर अधिवेशन में भागीदारी। |
| 1920 | चतुर्थ अधिवेशन — काशीपुर (हरगोविंद पंत); कुली बेगार हेतु 'अंतिम अल्टीमेटम'। |
| 13–14 जनवरी 1921 | बागेश्वर कुली बेगार आंदोलन — बद्रीदत्त पांडे के नेतृत्व में 40,000 लोगों द्वारा सरयू में रजिस्टर विसर्जन; कुली बेगार प्रथा का अंत। |
| 1921 | ताड़ीखेत 'प्रेम विद्यालय' की स्थापना (देवकीनंदन पांडे + भगीरथ पांडे); गढ़वाल आंदोलन — कनकोड़ाखाल (अनुसूया प्रसाद बहुगुणा) व चमेठाखाल (मुकुंदी लाल); 13 अप्रैल — फॉरेस्ट ग्रीवांस कमेटी गठित (अध्यक्ष विंढम, सदस्य जोध सिंह नेगी)। |
| 1922 | फॉरेस्ट ग्रीवांस कमेटी रिपोर्ट — वनों का श्रेणी-1 (राजस्व विभाग) / श्रेणी-2 (वन विभाग) में विभाजन; जी.बी. पंत — "The Forest Problem in Kumaon"। |
| 1923 | पांचवां कुमाऊं परिषद अधिवेशन — टनकपुर (बद्रीदत्त पांडे); भूमि बंदोबस्त व वन अधिकारों पर चर्चा। विंढम का कार्यकाल समाप्त (1924)। |
| 1926 * | * विंढम के पश्चात् — छठा एवं अंतिम अधिवेशन — रानीखेत (गनियाद्योली), अध्यक्ष मुकुंदी लाल; कुमाऊं परिषद का INC में विलय। |
| 1929 * | * विंढम के पश्चात् — गांधी जी की कुमाऊं यात्रा (14 जून–2 जुलाई); ताड़ीखेत प्रेम विद्यालय में निवास; 22 जून — बागेश्वर 'स्वराज भवन' का शिलान्यास। |
| 1931 * | * विंढम के पश्चात् — 'कुमाऊं फॉरेस्ट पंचायत रूल्स' लागू (एशिया की प्रथम वन पंचायतें); गांधी जी की नैनीताल यात्रा — गवर्नर सर मैल्कम हेली से भेंट। |
- 1815 से कुमाऊं एक 'नॉन-रेगुलेशन' प्रांत था — यहाँ गवर्नर-जनरल के सामान्य कानून लागू नहीं होते थे और कुमाऊं कमिश्नर को असीमित, तानाशाही अधिकार प्राप्त थे।
- 'कुमाऊं परिषद' और विशेष रूप से पं. गोविंद बल्लभ पंत के लगातार दबाव और प्रांतीय परिषद में उठाए गए सवालों के कारण ब्रिटिश सरकार को 1925 में यह दर्जा समाप्त करना पड़ा।
- 1926 में गनियाद्योली (रानीखेत) में कुमाऊं परिषद का 6वां और अंतिम अधिवेशन हुआ।
- इस अधिवेशन की अध्यक्षता बैरिस्टर मुकंदी लाल ने की।
- इसी अधिवेशन में कुमाऊं परिषद का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) में पूर्ण विलय किया गया।
- पहले कुमाऊं कमिश्नर ही यहाँ का 'हाईकोर्ट' (सबसे बड़ा जज) होता था।
- 1 अप्रैल 1926 को राजस्व और न्याय को अलग करते हुए कुमाऊं को सीधे 'इलाहाबाद उच्च न्यायालय' के अधिकार क्षेत्र में लाया गया।
- साथ ही एक अलग 'डिस्ट्रिक्ट जज' बैठाया गया।
- 1921 में पी. विंधम के समय बनी 'कुमाऊं वन कष्ट समिति' की रिपोर्ट को 1927 के वन अधिनियम में लागू किया गया।
- जंगलों को दो हिस्सों में बांटा गया:
- Class-I वन: व्यावसायिक महत्व कम — इन्हें ग्रामीणों के लिए राजस्व विभाग को सौंपा गया।
- Class-II वन: व्यावसायिक महत्व अधिक — ये वन विभाग के पास रहे।
- इसी के परिणामस्वरूप आगे चलकर 1931 में कुमाऊं में विधिवत 'वन पंचायत' नियमों की अधिसूचना जारी हुई।
- इब्बटसन द्वारा किया गया यह बंदोबस्त केवल ब्रिटिश गढ़वाल के लिए था।
- यह ब्रिटिश काल का 11वां और बिल्कुल अंतिम बंदोबस्त था।
- नायक समाज की बालिकाओं को देवदासी/वेश्यावृत्ति प्रथा से बचाने के लिए 1924 में एक 'नायक सुधार समिति' बनी थी — अध्यक्ष: स्वयं एन. सी. स्टिफ।
- आर्य समाज और स्थानीय नेताओं के दबाव के बाद 1929 में प्रांतीय असेंबली ने इसे कानून बना दिया।
- इससे जिला मजिस्ट्रेट को नाबालिग बच्चियों को देवदासी प्रथा से छुड़ाने का अधिकार मिल गया।
- सहयात्री: कस्तूरबा गांधी, मीरा बेन, देवदास गांधी और जमनालाल बजाज।
- कौसानी प्रवास: गांधी जी 14 दिन (कुछ स्रोतों में 12 दिन) कौसानी में रुके — यहीं उन्होंने भगवद्गीता पर 'अनासक्ति योग' टीका लिखी और कौसानी को "भारत का स्विट्जरलैंड" कहा।
- बागेश्वर: विक्टर मोहन जोशी ने गांधी जी को 'स्वराज भवन/मंदिर' के शिलान्यास के समय अभिनंदन पत्र सौंपा।
- दुगड्डा (पौड़ी गढ़वाल) में धनीराम मिश्र के होटल में आयोजित यह गढ़वाल का पहला बड़ा राजनीतिक सम्मेलन था।
- इस ऐतिहासिक सम्मेलन की अध्यक्षता पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने की थी।
- किस्सा ख्वानी बाजार, पेशावर — 2/18 रॉयल गढ़वाल राइफल्स।
- कैप्टन रिकेट्स के "Garhwalis, open fire!" आदेश पर वीर चंद्र सिंह गढ़वाली (मूल नाम: चंद्र सिंह भंडारी) ने राइफल नीचे कर कहा — "गढ़वाली निहत्थों पर गोली नहीं चलाते!"
- पूरी बटालियन ने गोली चलाने से इंकार किया — 59 सैनिकों पर एबटाबाद छावनी में कोर्ट-मार्शल।
- वकील: बैरिस्टर मुकंदी लाल — फांसी को कारावास में बदलवाया।
- चंद्र सिंह गढ़वाली को सजा: 11 वर्ष 3 माह 18 दिन — रिहाई 1941 में।
- गांधी जी के 78 सत्याग्रहियों में उत्तराखंड के 3 वीर शामिल थे:
- ज्योतिराम कांडपाल — अल्मोड़ा
- भैरव दत्त जोशी — कुमाऊं
- खड़क बहादुर (गोरखा वीर) — देहरादून / गोरखा समुदाय
- आजाद पंचायत का गठन: रंवाई परगना के ग्रामीणों ने टिहरी रियासत के विरुद्ध समानांतर सरकार बनाई — रियासती अधिकारियों का बहिष्कार, स्वतंत्र फैसले।
- 20 मई 1930 — प्रथम टकराव: रियासत की टीम (नेतृत्व: SDM सुरेन्द्र वर्मा + DFO पद्मदत्त रतूड़ी) ने निहत्थों पर गोली चलवाई — धूम सिंह नेगी शहीद।
- 30 मई 1930 — तिलाड़ी मैदान (यमुना तट): 20 मई की शहादत के विरोध में हज़ारों किसान एकत्रित — शांतिपूर्ण जनसभा।
- तत्कालीन राजा नरेंद्र शाह यूरोप यात्रा पर; रियासत की कमान दीवान चक्रधर जुयाल के हाथ।
- जुयाल ने बिना चेतावनी मशीनगन से अंधाधुंध फायर का आदेश दिया — सैकड़ों लोग मारे गए, कई उफनती यमुना में कूदकर डूब गए।
| उपाधि / तथ्य | विवरण |
|---|---|
| उत्तराखंड का जलियांवाला बाग | तिलाड़ी / रंवाई कांड (30 मई 1930) |
| उत्तराखंड का जनरल डायर | दीवान चक्रधर जुयाल |
| तत्कालीन राजा | महाराजा नरेंद्र शाह (घटना के समय यूरोप में) |
| प्रथम शहीद | धूम सिंह नेगी — 20 मई 1930 |
| शहीद दिवस | रंवाई क्षेत्र में प्रतिवर्ष 30 मई को |
| तिथि | तथ्य / कार्य |
|---|---|
| 1925–1931 | एन. सी. स्टिफ का कार्यकाल — 17वें कमिश्नर। |
| 1925 | कुमाऊं का गैर-आईनी (Non-Regulation) दर्जा समाप्त — G.B. पंत के दबाव का परिणाम। |
| 1926 | कुमाऊं परिषद का INC में विलय — 6वां व अंतिम अधिवेशन, गनियाद्योली (रानीखेत); अध्यक्ष: मुकंदी लाल। |
| 1 अप्रैल 1926 | न्यायिक पृथक्करण — कुमाऊं अब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अधीन; अलग डिस्ट्रिक्ट जज की नियुक्ति। |
| 1927 | वन अधिनियम 1927 — Class-I (राजस्व विभाग) / Class-II (वन विभाग) विभाजन; वन पंचायत की नींव। |
| 1928 | 11वां व अंतिम भूमि बंदोबस्त — इब्बटसन द्वारा, केवल ब्रिटिश गढ़वाल के लिए। |
| 1924 | नायक सुधार समिति गठित — अध्यक्ष: स्वयं स्टिफ। |
| 1929 | नायक बालिका रक्षा कानून — देवदासी प्रथा के विरुद्ध; DM को नाबालिग बच्चियों को छुड़ाने का अधिकार। |
| 14 जून–2 जुलाई 1929 | गांधी जी की प्रथम कुमाऊं यात्रा — कौसानी (14 दिन), 'अनासक्ति योग' टीका, "भारत का स्विट्जरलैंड"; बागेश्वर — विक्टर मोहन जोशी का अभिनंदन। |
| 1930 | गढ़वाल का प्रथम राजनीतिक सम्मेलन — दुगड्डा (धनीराम मिश्र के होटल में); अध्यक्ष: G.B. पंत। |
| 12 मार्च–6 अप्रैल 1930 | दांडी यात्रा — उत्तराखंड के 3 वीर (ज्योतिराम कांडपाल, भैरव दत्त जोशी, खड़क बहादुर)। |
| 23 अप्रैल 1930 | पेशावर कांड — किस्सा ख्वानी बाजार; वीर चंद्र सिंह गढ़वाली; 2/18 RGR; 59 सैनिकों का कोर्ट-मार्शल। |
| 20 मई 1930 | रंवाई कांड प्रारंभ — धूम सिंह नेगी शहीद (प्रथम टकराव)। |
| 30 मई 1930 | तिलाड़ी नरसंहार — दीवान चक्रधर जुयाल का मशीनगन आदेश; सैकड़ों शहीद। |
| 1930 | कुमाऊं वाटर रूल्स (1917) में संशोधन — विंढम-कालीन इस कानून को स्टिफ ने संशोधित किया। |
| 1931 | 'वन पंचायत' नियमों की अधिसूचना — एशिया की प्रथम सामुदायिक वन पंचायतें। |
- इब्बटसन के कार्यकाल में 1937 में शांतिलाल त्रिवेदी द्वारा अल्मोड़ा के चनौदा (सोमेश्वर) में गांधी आश्रम की स्थापना की गई।
- यही आश्रम बाद में 2 सितंबर 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान प्रशासन द्वारा सील (ताला लगाकर) कर दिया गया।
- विवियन के कार्यकाल में ही 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध प्रारंभ हुआ।
- उत्तराखंड के प्रथम व्यक्तिगत सत्याग्रही (पुरुष): जगमोहन सिंह नेगी
- उत्तराखंड की प्रथम व्यक्तिगत सत्याग्रही (महिला): भागीरथी देवी
सविनय अवज्ञा आंदोलन (दूसरा चरण): 8 महिलाओं को फतेहगढ़ जेल भेजा गया; पद्मा जोशी को लखनऊ जेल भेजा गया।
कुंती वर्मा: ब्रिटिश सरकार ने इन्हें 'जिंदा या मुर्दा' पकड़ने का आदेश जारी किया था।
- भारत छोड़ो आंदोलन (1942) के दौरान 18 अगस्त 1942 को देघाट कांड हुआ।
- इसमें हरिकृष्ण उप्रेती और हीरामणि बडोला शहीद हुए।
- स्थान: धामद्यो, जैंती (सालम पट्टी, अल्मोड़ा) — कुमाऊं में सल्ट के बाद इस आंदोलन की दूसरी सबसे बड़ी घटना।
- गोलीकांड का आदेशकर्ता: डिप्टी कलेक्टर मेहरबान सिंह — निहत्थी जनसभा पर गोली चलाने का आदेश।
- पृष्ठभूमि: प्रशासन ने सालम के नेताओं (दुर्गादत्त शास्त्री, रेवाधर पांडे, नयन सिंह बिष्ट) को गिरफ्तार/नजरबंद कर दिया था, इसके विरोध में विशाल जनसभा बुलाई गई।
- शहीद: नर सिंह धानक (गाँव: चौकुना) और टीका सिंह कन्याल (गाँव: कांडे)।
- सूत्रधार: पं. मदन मोहन उपाध्याय — देघाट गोलीकांड के बाद रणनीति बदलकर आंदोलन को सालम (धामद्यो) में स्थानांतरित किया; पुलिस को दो बार चकमा दिया और बाद में मुंबई जाकर जयप्रकाश नारायण व अरुणा आसफ अली के साथ गुप्त 'कांग्रेस रेडियो' से प्रसारण किया — इनाम ₹10,000।
- 2 सितंबर 1942 को ब्रिटिश प्रशासन द्वारा चनौदा गांधी आश्रम पर ताला लगा दिया गया।
- 5 सितंबर 1942 को सल्ट कांड हुआ, जिसमें गंगाराम, खीमदेव, चूड़ामणि और बहादुर सिंह शहीद हुए।
- गांधी जी ने इसे "कुमाऊं का बारदोली" कहा था।
- फिनले के कार्यकाल में 27 अक्टूबर 1945 को आगरा में कुमाऊं रेजीमेंट की स्थापना हुई।
- मई 1948 में कुमाऊं रेजीमेंट का मुख्यालय आगरा से रानीखेत स्थानांतरित कर दिया गया।
1797 ई.: हैदराबाद के निज़ाम ने द्वितीय कुमाऊं (2nd Kumaon) की स्थापना की।
1917 ई.: कर्नल लांगर (Col. Langer) ने प्रथम कुमाऊं राइफल्स की स्थापना की → बाद में यह तीसरी कुमाऊं बनी।
| तिथि | कमिश्नर | तथ्य / कार्य |
|---|---|---|
| ── इब्बटसन (1935–1939) — 20वें कमिश्नर ── | ||
| 1937 | इब्बटसन | शांतिलाल त्रिवेदी द्वारा चनौदा (सोमेश्वर), अल्मोड़ा में गांधी आश्रम की स्थापना। |
| ── विवियन (1939–1941) — 21वें कमिश्नर ── | ||
| 1939 | विवियन | द्वितीय विश्व युद्ध प्रारम्भ। |
| 1940–41 | विवियन | उत्तराखंड के प्रथम व्यक्तिगत सत्याग्रही (पुरुष): जगमोहन सिंह नेगी; (महिला): भागीरथी देवी। |
| ── एक्टन (1941–1943) — 22वें कमिश्नर — भारत छोड़ो आंदोलन ── | ||
| 18 अगस्त 1942 | एक्टन | देघाट कांड — हरिकृष्ण उप्रेती + हीरामणि बडोला शहीद। |
| 25 अगस्त 1942 | एक्टन | सालम कांड — टीका सिंह + नरसिंह धानक शहीद; सूत्रधार: पं. मदन मोहन उपाध्याय (₹10,000 ईनाम)। |
| 2 सितंबर 1942 | एक्टन | चनौदा गांधी आश्रम सील (ताला)। |
| 5 सितंबर 1942 | एक्टन | सल्ट कांड — गंगाराम, खीमदेव, चूड़ामणि, बहादुर सिंह शहीद; गांधी जी: "कुमाऊं का बारदोली"। |
| ── फिनले (1943–1947) — 23वें एवं अंतिम ब्रिटिश कमिश्नर ── | ||
| 27 अक्टूबर 1945 | फिनले | आगरा में कुमाऊं रेजीमेंट की स्थापना। |
| मई 1948 | फिनले (पश्चात्) | कुमाऊं रेजीमेंट मुख्यालय आगरा → रानीखेत स्थानांतरित। |
| तिथि | कमिश्नर | घटना / कार्य |
|---|---|---|
| 3 मई 1815 | गार्डनर | प्रथम कमिश्नर के रूप में कार्यभार ग्रहण (कार्यकाल — मात्र 9 माह)। |
| 1815 | गार्डनर | बाल-विक्रय पर पूर्ण रोक। |
| 1815 | गार्डनर / ट्रेल | कुमाऊं का प्रथम भूमि बंदोबस्त (ट्रेल द्वारा सम्पन्न) तथा अल्मोड़ा–श्रीनगर डाक व्यवस्था का आरम्भ। |
| 1816 | ट्रेल | द्वितीय कमिश्नर नियुक्त; अल्मोड़ा जेल का निर्माण। |
| 1817 | ट्रेल | देहरादून सहारनपुर में शामिल। (भूमि बंदोबस्त — द्वितीय वर्ष) |
| 1818 | ट्रेल | भूमि बंदोबस्त — तृतीय वर्ष। |
| 1819 | ट्रेल | पटवारी पद का सृजन (वंशानुगत)। |
| 1820 | ट्रेल | स्टाम्प पेपर की शुरुआत; भूमि बंदोबस्त — चतुर्थ वर्ष। |
| 1821 | ट्रेल | पौड़ी जेल का निर्माण। |
| 1822 | ट्रेल | आबकारी विभाग की स्थापना; खच्चर सेना (मिस्टर ग्लिन का सुझाव)। |
| 1823 | ट्रेल | 80 साला बंदोबस्त (भूमि बंदोबस्त — पंचम वर्ष); परगना 22 से 26 में विभाजित। |
| 1824 | ट्रेल | रंवाई राजा सुदर्शन शाह को वापस; डबल लॉक व्यवस्था आरम्भ। |
| 26 जून 1825 | ट्रेल | देहरादून कुमाऊं कमिश्नरी में शामिल। |
| 1827–28 | ट्रेल | हरिद्वार–बद्रीनाथ/केदारनाथ मार्ग निर्माण आरम्भ। |
| 1828 | ट्रेल | जन्म-मृत्यु-विवाह पंजीकरण आरम्भ; देहरादून मेरठ कमिश्नरी में मिला; भूमि बंदोबस्त — षष्ठम वर्ष। |
| 1829 | ट्रेल | सदाबर्त निधि (चारधाम यात्री भोजन-दान गाँव) का प्रबंधन पंडा-पुजारियों के गबन के कारण सीधे ट्रेल के हाथ में। |
| 1829–30 | ट्रेल | सस्पेंशन (झूला) पुलों का निर्माण आरम्भ। |
| 1830 | ट्रेल | मलाकतोली ग्लेशियर के पास ट्रेल पास की खोज (गाइड: मलक सिंह बूढ़ा)। |
| 1833 | ट्रेल | अल्मोड़ा में देसी चिकित्सकों की नियुक्ति; भूमि बंदोबस्त — सप्तम (अंतिम) वर्ष। |
| 1834 | ट्रेल | आधुनिक हल्द्वानी शहर की स्थापना। |
| 1835 | ट्रेल | ट्रेल का 19 वर्षीय कार्यकाल समाप्त (इस्तीफा); बीच में मोस्ले स्मिथ कार्यवाहक कमिश्नर रहे, फिर गोवान नियमित कमिश्नर बने। |
| 1836 | गोवान | दास प्रथा, बाल-विक्रय, महिला-विक्रय का अंत — अपराध घोषित; गोरखाकालीन दिव्य परीक्षाएँ समाप्त। |
| 1837 | गोवान | 'सदर अमीन' पद का सृजन; कुमाऊं का प्रथम पुलिस थाना — अल्मोड़ा में स्थापित। |
| 1838 | गोवान | सैनिक पृष्ठभूमि से आने के कारण राजस्व-अनुभव की कमी; "अक्षम" मानकर आगरा बोर्ड द्वारा हटाए गए — कार्यकाल समाप्त (1836–1838)। |
| ── लुशिंगटन (1838–1848) — शांति काल ── | ||
| 1839 | लुशिंगटन | कमिश्नरी स्वतंत्र निकाय बनी; प्रथम स्वतंत्र कमिश्नर; ब्रिटिश गढ़वाल जिला गठित; श्रीनगर में हडलस्टन स्कूल। |
| 1840 | लुशिंगटन | पौड़ी जनपद गठन; गढ़वाल मुख्यालय श्रीनगर → पौड़ी; बद्री–केदार मार्ग पर असिस्टेंट सर्जन्स नियुक्त। |
| 1841 | लुशिंगटन | पी. बैरन द्वारा नैनीताल की खोज। |
| 1842 | लुशिंगटन | तराई जिले का गठन; Act X of 1842 — नगरपालिका एक्ट। |
| 1843 | लुशिंगटन | नैनीताल पुलिस थाना स्थापित (गोवान के पश्चात्)। |
| 1845 | लुशिंगटन | खैरना–नैनीताल सड़क निर्माण आरंभ। |
| 1848 | लुशिंगटन | अल्मोड़ा डिस्पेंसरी कमेटी; बागेश्वर में गोमती नदी पर पुल; नैनीताल में पद पर मृत्यु। |
| ── बैटन (1848–1856) — स्वर्ण युग ── | ||
| 1840 | बैटन (सहायक) | गढ़वाल का 20 साला बंदोबस्त — गढ़वाल का प्रथम विस्तृत भूमि बंदोबस्त। |
| 1844 | बैटन (सहायक) | कुमाऊं का 20 साला बंदोबस्त (8वाँ भूमि बंदोबस्त)। |
| 1848 | बैटन | शिक्षित पटवारियों की नियुक्ति। |
| 1849 | बैटन | डाक बंगले आम यात्रियों के लिए खोले गए। |
| 1849 | बैटन | अल्मोड़ा दवाखाने की शाखा पिथौरागढ़ में। |
| 1850 | बैटन | अल्मोड़ा में लंदन मिशनरी सोसाइटी (Rev. J.H. Budden) की स्थापना। |
| 1850 | बैटन | बमोरी–अल्मोड़ा मार्ग का सड़क सर्वेक्षण। |
| 1851 | बैटन | भारत की प्रथम मालगाड़ी — रुड़की से पिरान कलियर (ऊपरी गंगा नहर निर्माण)। |
| 1853 | बैटन | जॉन स्ट्रेची — श्रीनगर में अलकनंदा पर प्रथम लोहे का सस्पेंशन पुल। |
| 1854 | बैटन | ऊपरी गंगा नहर (Upper Ganga Canal) पूर्ण। |
| अक्टूबर 1854 | बैटन | कुमाऊं कमिश्नरी मुख्यालय अल्मोड़ा → नैनीताल स्थानांतरित। |
| 1869 | — | रानीखेत पुलिस थाना स्थापित। |
| ── रैमजे (1856–1884) — कुमाऊं का बेताज बादशाह ── | ||
| 1850 | रैमजे (सहायक) | सहायक कमिश्नर रहते हुए रामनगर शहर की स्थापना। |
| 1857 | रैमजे | 1857 की क्रांति — मार्शल लॉ लागू; 17 सितंबर को काले खां द्वारा हल्द्वानी पर कब्ज़ा; कैप्टन मैक्सवेल व गोरखा रणवीर सेना द्वारा पुनः कब्ज़ा; कालू माहरा (चंपावत) — 'क्रांतिवीर' संगठन, उत्तराखंड के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी। |
| 1858 | रैमजे | नैनीताल में विलियम बटलर द्वारा प्रथम (मेथोडिस्ट) चर्च की स्थापना; हिल रेजिमेंट का गठन। |
| 1863–1873 | रैमजे | 9वाँ भूमि बंदोबस्त (बैकेट बंदोबस्त) — जी.ई. बैकेट; भूमि को 5 भागों (तलाव, उपराऊं अव्वल, उपराऊं दोयम, कटील, इजरान) में विभाजित। |
| 1864 | रैमजे | अल्मोड़ा नगरपालिका की स्थापना। |
| 1867 | रैमजे | नैनीताल में भूस्खलन के बाद 'हिल सेफ्टी कमेटी' गठित — उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन का प्रथम प्रयास। |
| 1870 | रैमजे | अल्मोड़ा में बुद्धि बल्लभ पंत द्वारा 'डिबेटिंग क्लब' की स्थापना। |
| 1874 | रैमजे | अधिसूचित जिला अधिनियम (Scheduled District Act) लागू — कुमाऊं नॉन-रेगुलेशन प्रांत घोषित। |
| 18 सितंबर 1880 | रैमजे | शेर-का-डांडा भूस्खलन (नैनीताल) — लगभग 151 मृत्यु; नैना देवी मंदिर नष्ट। |
| 1883 | रैमजे | तराई इम्प्रूवमेंट फंड की स्थापना। |
| 24 अप्रैल 1884 | रैमजे | लखनऊ से काठगोदाम — पहली ट्रेन पहुँची; रैमजे का कार्यकाल समाप्त (1856–1884)। |
| ── रॉस (1885–1887) — 8वें कमिश्नर ── | ||
| 28 दिसंबर 1885 | रॉस | बॉम्बे के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत महाविद्यालय में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की स्थापना। |
| ── रीड (1887–1889) — 9वें कमिश्नर ── | ||
| 5 मई 1887 | रीड | ई.पी. मेनवरिंग द्वारा अल्मोड़ा में 39वीं गढ़वाल राइफल्स की स्थापना। |
| 4 नवंबर 1887 | रीड | गढ़वाल राइफल्स का मुख्यालय अल्मोड़ा → कालोडांडा (लैंसडाउन) स्थानांतरित। |
| 1889 | रीड | कुमाऊं में हथियारों हेतु 'लाइसेंस नीति' (Arms License Policy) लागू। |
| ── अर्सकाइन (1889–1892) — 10वें कमिश्नर ── | ||
| 1891 | अर्सकाइन | कुमाऊं जिले का दो जनपदों — अल्मोड़ा + नैनीताल — में विभाजन। |
| 1892 | अर्सकाइन | तराई जनपद का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त; नैनीताल जिले का Sub-division बना। |
| ── हैम्बलिन (1899–1902) — 13वें कमिश्नर ── | ||
| 1 मार्च 1900 | हैम्बलिन | देहरादून में प्रथम यात्री ट्रेन; हरिद्वार–देहरादून रेलवे लाइन पूर्ण। |
| 19 अगस्त 1901 | हैम्बलिन | तारादत्त गैरोला द्वारा गढ़वाल हितकारिणी सभा की स्थापना (1904 — 'गढ़वाल यूनियन'; मुखपत्र: 'गढ़वाली', मई 1905; प्रथम संपादक: गिरिजा दत्त नैथानी)। |
| 1902–03 | हैम्बलिन | नैनीताल जिला जेल का निर्माण। |
| ── कैम्पबेल (1906–1914) — 15वें कमिश्नर ── | ||
| 1906 | कैम्पबेल | कुमाऊं भाबर हेतु 'खेतिहर निवासी विधि' (Agricultural Tenancy Rules) लागू। |
| 1906–1909 | कैम्पबेल | ग्लोगी जलविद्युत परियोजना — निर्माण आरम्भ 1906; उत्पादन आरम्भ 1909 (मसूरी)। |
| 1908 | कैम्पबेल | कुली एजेंसी — द्वारिखाल (पौड़ी); संस्थापक: जोध सिंह नेगी; प्रथम अध्यक्ष: वी. ए. स्टोवेल। |
| 1909 | कैम्पबेल | कुमाऊं गवर्नमेंट गार्डन की स्थापना; प्रभारी: नॉर्मन गिल (सेब-बागवानी के प्रवर्तक)। |
| 1912 | कैम्पबेल | अल्मोड़ा कांग्रेस की स्थापना; प्रेरणा: बांकीपुर (पटना) अधिवेशन; 'रीढ़': हरगोविंद पंत। |
| 1914 | कैम्पबेल | उत्तराखंड होमरूल लीग की स्थापना (बद्री दत्त पांडे, विक्टर मोहन जोशी, चिरंजीलाल, हेमचंद्र)। |
| ── पर्सी विंढम (1914–1924) — 16वें कमिश्नर — राजनीतिक जन-जागरण का स्वर्णिम काल ── | ||
| 1915 | विंढम | गांधी जी की प्रथम उत्तराखंड यात्रा — हरिद्वार कुंभ मेला। |
| 1916 | विंढम | गांधी जी — देहरादून-हरिद्वार यात्रा, गुरुकुल कांगड़ी (स्वामी श्रद्धानंद से भेंट)। |
| 1916 | विंढम | INC का लखनऊ अधिवेशन — बद्रीदत्त पांडे की लोकमान्य तिलक से मुलाकात, उन्हें "राजनीतिक गुरु" माना ("चार धाम" कथन)। |
| 30 सितंबर 1916 | विंढम | कुमाऊं परिषद की स्थापना — मझेड़ा (नैनीताल); अध्यक्ष — रा.ब. नारायण दत्त छिल्वाल; महासचिव — प्रेम वल्लभ पांडे। |
| 1917 | विंढम | 'कुमाऊं वाटर रूल्स' लागू; प्रथम कुमाऊं परिषद अधिवेशन — अल्मोड़ा (जयदत्त जोशी)। |
| 1918 | विंढम | द्वितीय अधिवेशन — हल्द्वानी (तारादत्त गैरोला), कुली बेगार पर प्रथम प्रस्ताव; 'गढ़वाल कांग्रेस कमेटी' स्थापित (मुकुंदी लाल + अनुसूया प्रसाद बहुगुणा)। |
| 1919 | विंढम | तृतीय अधिवेशन — कोटद्वार (रा.ब. बद्रीदत्त जोशी), गढ़वाल का एकमात्र अधिवेशन; मुकुंदी लाल व अनुसूया प्रसाद बहुगुणा — अमृतसर अधिवेशन में भागीदारी। |
| 1920 | विंढम | चतुर्थ अधिवेशन — काशीपुर (हरगोविंद पंत); कुली बेगार हेतु 'अंतिम अल्टीमेटम'। |
| 13–14 जनवरी 1921 | विंढम | बागेश्वर कुली बेगार आंदोलन — बद्रीदत्त पांडे के नेतृत्व में 40,000 लोगों द्वारा सरयू में रजिस्टर विसर्जन; कुली बेगार प्रथा का अंत। |
| 1921 | विंढम | ताड़ीखेत 'प्रेम विद्यालय' स्थापित (देवकीनंदन पांडे + भगीरथ पांडे); गढ़वाल आंदोलन — कनकोड़ाखाल (अनुसूया प्रसाद बहुगुणा) व चमेठाखाल (मुकुंदी लाल); 13 अप्रैल — फॉरेस्ट ग्रीवांस कमेटी गठित (अध्यक्ष विंढम, सदस्य जोध सिंह नेगी)। |
| 1922 | विंढम | फॉरेस्ट ग्रीवांस कमेटी रिपोर्ट — वनों का श्रेणी-1 (राजस्व विभाग) / श्रेणी-2 (वन विभाग) में विभाजन; जी.बी. पंत — "The Forest Problem in Kumaon"। |
| 1923 | विंढम | पांचवां कुमाऊं परिषद अधिवेशन — टनकपुर (बद्रीदत्त पांडे); भूमि बंदोबस्त व वन अधिकारों पर चर्चा। |
| 1924 | विंढम | पर्सी विंढम का 10 वर्षीय कार्यकाल समाप्त (1914–1924)। |
| ── एन. सी. स्टिफ (1925–1931) — 17वें कमिश्नर — गैर-आईनी दर्जे की समाप्ति, वन पंचायत, तिलाड़ी कांड ── | ||
| 1925 | स्टिफ | कुमाऊं का गैर-आईनी (Non-Regulation) दर्जा समाप्त — G.B. पंत के दबाव का परिणाम। |
| 1926 | स्टिफ | कुमाऊं परिषद का INC में विलय — 6वां व अंतिम अधिवेशन, गनियाद्योली (रानीखेत); अध्यक्ष: मुकंदी लाल। |
| 1 अप्रैल 1926 | स्टिफ | न्यायिक पृथक्करण — कुमाऊं अब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अधीन; अलग डिस्ट्रिक्ट जज। |
| 1927 | स्टिफ | वन अधिनियम 1927 — Class-I (राजस्व विभाग) / Class-II (वन विभाग) विभाजन; वन पंचायत की नींव। |
| 1928 | स्टिफ | 11वां व अंतिम भूमि बंदोबस्त — इब्बटसन द्वारा, केवल ब्रिटिश गढ़वाल के लिए। |
| 1929 | स्टिफ | नायक बालिका रक्षा कानून — देवदासी प्रथा के विरुद्ध (सुधार समिति: 1924, अध्यक्ष: स्टिफ)। |
| 14 जून–2 जुलाई 1929 | स्टिफ | गांधी जी की प्रथम कुमाऊं यात्रा — कौसानी (14 दिन), 'अनासक्ति योग', "भारत का स्विट्जरलैंड"; बागेश्वर — विक्टर मोहन जोशी का अभिनंदन। |
| 1930 | स्टिफ | गढ़वाल का प्रथम राजनीतिक सम्मेलन — दुगड्डा; अध्यक्ष: G.B. पंत। |
| 12 मार्च–6 अप्रैल 1930 | स्टिफ | दांडी यात्रा — उत्तराखंड के 3 वीर: ज्योतिराम कांडपाल, भैरव दत्त जोशी, खड़क बहादुर। |
| 23 अप्रैल 1930 | स्टिफ | पेशावर कांड — किस्सा ख्वानी बाजार; वीर चंद्र सिंह गढ़वाली; 2/18 RGR; 59 सैनिकों का कोर्ट-मार्शल (वकील: मुकंदी लाल)। |
| 20 मई 1930 | स्टिफ | रंवाई प्रथम टकराव — धूम सिंह नेगी शहीद। |
| 30 मई 1930 | स्टिफ | तिलाड़ी नरसंहार — "उत्तराखंड का जलियांवाला बाग"; दीवान चक्रधर जुयाल का मशीनगन आदेश; सैकड़ों शहीद। |
| 1930 | स्टिफ | कुमाऊं वाटर रूल्स (1917) में संशोधन। |
| 1931 | स्टिफ | 'वन पंचायत' नियमों की अधिसूचना — एशिया की प्रथम सामुदायिक वन पंचायतें। |
| ── इब्बटसन (1935–1939) — 20वें कमिश्नर ── | ||
| 1937 | इब्बटसन | शांतिलाल त्रिवेदी द्वारा चनौदा (सोमेश्वर), अल्मोड़ा में गांधी आश्रम की स्थापना। |
| ── विवियन (1939–1941) — 21वें कमिश्नर ── | ||
| 1939 | विवियन | द्वितीय विश्व युद्ध प्रारम्भ। |
| 1940–41 | विवियन | उत्तराखंड के प्रथम व्यक्तिगत सत्याग्रही (पुरुष): जगमोहन सिंह नेगी; (महिला): भागीरथी देवी। |
| ── एक्टन (1941–1943) — 22वें कमिश्नर — भारत छोड़ो आंदोलन ── | ||
| 18 अगस्त 1942 | एक्टन | देघाट कांड — हरिकृष्ण उप्रेती + हीरामणि बडोला शहीद। |
| 25 अगस्त 1942 | एक्टन | सालम कांड — टीका सिंह + नरसिंह धानक शहीद; सूत्रधार: पं. मदन मोहन उपाध्याय (₹10,000 ईनाम)। |
| 2 सितंबर 1942 | एक्टन | चनौदा गांधी आश्रम सील (ताला)। |
| 5 सितंबर 1942 | एक्टन | सल्ट कांड — गंगाराम, खीमदेव, चूड़ामणि, बहादुर सिंह शहीद; गांधी जी: "कुमाऊं का बारदोली"। |
| ── फिनले (1943–1947) — 23वें एवं अंतिम ब्रिटिश कमिश्नर ── | ||
| 27 अक्टूबर 1945 | फिनले | आगरा में कुमाऊं रेजीमेंट की स्थापना। |
| मई 1948 | फिनले (पश्चात्) | कुमाऊं रेजीमेंट मुख्यालय आगरा → रानीखेत स्थानांतरित। |