राज्य से लेकर गाँव तक —
एक सुव्यवस्थित शासन तंत्र
चंद प्रशासन 'पंचायती राज तंत्र' और 'निरंकुश राजशाही' का मिश्रण था। नीचे दिया गया जीवंत पदानुक्रम चित्र दिखाता है कि राजसत्ता कैसे राज्य → मंडल → देश → परगना → पट्टी/गर्खा → थोक → गाँव तक विभाजित होकर हर घर तक राजस्व वसूली में बदल जाती थी। किसी भी स्तर पर क्लिक करें — विवरण खुल जाएगा।
प्रशासनिक पदानुक्रम — संपूर्ण शृंखला
इकाई-वार विस्तृत विवरण
A. चंद राज्य व मंडल
- सामंतों के अधीन मंडल: विजित राज्यों के पूर्व शासक ही अधीनस्थ सामंत बनाए जाते — इन्हें 'रजवार' या 'ठक्कुर' कहा गया। ये राजा को वार्षिक कर देते थे।
- सीधे राजा द्वारा शासित मंडल: प्रशासन सीधे चंद राजा की देखरेख में।
B. देश
C. परगना
- शांत परगनों का प्रशासक सीकदार (नागरिक राजस्व अधिकारी) होता था।
- विद्रोह-प्रवण/सैन्य परगनों का प्रशासन सीधे सैन्य कमांडर बख्शी को सौंपा जाता था।
पहाड़ी क्षेत्र के प्रमुख परगने
माल (तराई-भाबर) के ठीक 6 परगने
- राजनीतिक स्थिति के आधार पर: शांत (सीकदार) / अशांत (बख्शी)
- भौगोलिक स्थिति के आधार पर: पहाड़ी के 12 परगने / माल (तराई-भाबर) के 6 परगने
D. पट्टी व गर्खा
- पट्टी — काली कुमाऊँ व माल (तराई-भाबर) में प्रयुक्त। काली कुमाऊँ की पट्टियाँ: चालसी, गुमदेश, रेगड़, गंगोल, खिलफती, ध्यानिरौ। बाज बहादुर चंद ने तराई में यह व्यवस्था स्थापित की।
- गर्खा — सोर व सीरा (पिथौरागढ़) में प्रयुक्त। सीरा परगने के गर्खे: आठबीसी, बारबीसी, डिडीहाट, माली, कसाण।
E. थोक
- 5–10 गाँवों के समूह को 'थोक' कहा जाता था, जिसका प्रशासक थोकदार या बूढ़ा था।
- गाँव के मुखिया (सयाणा/कमीण) लगान वसूलकर थोकदार को देते, और थोकदार वह राजस्व परगना अधिकारी/राजकोष में जमा करवाता।
- इस सेवा के बदले थोकदार को राजस्व का प्रतिशत हिस्सा 'दस्तूर' के रूप में मिलता था।
F. गाँव — सबसे छोटी इकाई
कमीण
दक्षिण-पूर्व कुमाऊँकाली कुमाऊँ व तराई-भाबर में गाँव का मुखिया। दस्तूर को 'कमीणचारी' कहा जाता।
सयाणा
पश्चिम-उत्तर कुमाऊँपाली पछाऊँ व सल्ट परगने में गाँव का मुखिया। दस्तूर को 'सयाणचारी' कहा जाता।
कोटाल
क्लर्कगाँव का हिसाब-किताब (राजस्व बहीखाता) रखने वाला अधिकारी।
पहरी / पौरि
चौकीदारगाँव का चौकीदार व संदेशवाहक — वेतन हेतु 'पहरी कर' लिया जाता था।
ऐतिहासिक तथ्य: कुमाऊँ में सर्वप्रथम सोमचंद ने गाँवों में बूढ़ा व सयाणों की नियुक्ति की परंपरा शुरू की थी।
राज्य व राजमहल के प्रमुख अधिकारी
| पद | कार्य एवं अधिकार |
|---|---|
| राजा | सर्वोच्च शासक, मुख्य न्यायाधीश और सेना का परम-सेनापति। |
| दीवान | प्रधानमंत्री। वित्त व न्याय देखने वाला सबसे शक्तिशाली अधिकारी। |
| वज़ीर / मंत्री | राजा के मुख्य सलाहकार। |
| बख्शी | सेना का मुख्य कमांडर एवं सैनिकों को वेतन बाँटने वाला अधिकारी। |
| सूबेदार / फौजदार | प्रांतीय गवर्नर/सैन्य प्रशासक — बड़े परगनों की शांति व्यवस्था। |
| किलेदार | राज्य के किलों की सुरक्षा करने वाला अधिकारी। |
| नयाभंडारी | राजकोष व राजमहल भंडार गृह का मुख्य अधिकारी। |
| नयादफ्तरी | राजकीय दस्तावेज़ों व पत्राचार को सुरक्षित रखने वाला अधिकारी। |
| नयाराजगुरु/राजपुरोहित | राजा का धार्मिक सलाहकार — पूजा, दान, ज्योतिष विभाग प्रमुख। |
| नयाराजवैद्य | राजपरिवार का मुख्य चिकित्सक। |
| सेज़्याली | राजा के शयनकक्ष, निजी सामान व अस्त्र-शस्त्र की देखरेख। |
| नयाभँसारी | राजमहल भोजनालय (राजकीय रसोई) का प्रमुख। |
| नयाबजनिया/बाजनादार | राजमहल में नगाड़े व वाद्य यंत्र बजाने वाले। |
| छ्योड़े / छ्योड़ी | राजमहल के घरेलू सेवक व सेविकाएं। |
विशिष्ट परिषदें एवं प्रभावशाली गुट
पौरि पन्द्रह बिस्वा
- राजा के सलाहकारों की परिषद — महरा, फर्त्याल व ब्राह्मण कुल शामिल।
- रुद्र चंद के समय से यह शब्द 15 वर्गों (नाई, धोबी, टम्टे आदि) सहित सम्पूर्ण सामान्य जनता के प्रतिनिधित्व हेतु भी प्रयुक्त हुआ।
चाराल / चार बूढ़ा
सोमचंद द्वारा चंपावत के राजबुंगा किले की सुरक्षा हेतु नियुक्त 4 किलेदार: कार्की, बोरा, ताड़ागी, चौधरी (मूलतः नेपाल/डोटी निवासी)।
पंच थोक
- प्रशासन व राजनीति में सीधा दखल रखने वाले 5 गुट — महरा, फर्त्याल, देव, ढेक, खड़ायत।
- सोमचंद ने महराओं को दीवान व फर्त्यालों को सेनापति बनाया था।
सैन्य व्यवस्था
- राजा के बाद राज्य का युवराज ही सेना का सर्वोच्च सेनापति होता था (सेनापति को 'बख्शी' भी कहा जाता था)।
- सेना के आधुनिकीकरण हेतु रुद्र चंद ने कुमाऊँ में स्थायी सेना के लिए 'मिलिट्री कैंप' (छावनी व्यवस्था) की स्थापना की थी।
न्याय व्यवस्था
सर्वोच्च न्याय अधिकार
राजा
सर्वोच्च न्यायाधीशदेशद्रोही को फांसी देने का अंतिम अधिकार केवल राजा को था।
सूली का डाणा
फाँसी-स्थलफाँसी ऊँचे पहाड़ पर दी जाती थी, जिसे यह नाम दिया गया था।
कचहरियाँ (न्यायालय) — लक्ष्मी चंद के सुधार
न्यौवली
आम जनता हेतुलक्ष्मी चंद द्वारा स्थापित कचहरी — सामान्य जनता के मुकदमों के लिए।
विष्टावली
सैनिक मामलों हेतुलक्ष्मी चंद द्वारा स्थापित कचहरी — सैनिक मामलों के न्याय हेतु।
पंच नवीसी / चारथान
गाँव स्तरस्थानीय पंचायती-कचहरी — गाँव स्तर पर छोटे विवादों का निपटारा करती थी।
दंड क्रियान्वयन
डंडे (दंडाधिकारी)
अर्थदंड व कारावासछोटे झगड़ों में अर्थदंड (जुर्माना) वसूलता था और बड़े अपराध होने पर कारागार में डालता था।
सीराकोट
कुख्यात कारागारचंद काल का सबसे कुख्यात व प्रसिद्ध कारागार — पिथौरागढ़ में स्थित।
भूमि व्यवस्था
मापन की इकाइयाँ (बीज क्षमता पर आधारित)
- पहला बंदोबस्त: कुमाऊं का पहला व्यवस्थित भूमि बंदोबस्त रतन चंद द्वारा।
- दस्तावेज़ीकरण केंद्र: 'दफ़्तर-ए-माल'।
कृषक एवं भूमि अधिकारों की श्रेणियाँ (पदानुक्रम — उच्च से निम्न)
| श्रेणी | भूमि का स्रोत | बेच/दान कर सकता है? | बेदखल किया जा सकता है? |
|---|---|---|---|
| थातवान | राजा से सीधे 'थात' प्राप्त — वास्तविक स्वामी | हाँ | नहीं |
| खायकर | पुश्तैनी काश्तकार — थातवान को 'दस्तूर' (भेंट) देता है | नहीं | नहीं |
| सिरतान | इच्छाधीन काश्तकार — 'सिरती' (नकद) या अनाज देकर दूसरों की भूमि जोतता है | नहीं | हाँ, कभी भी |
| कैनी | थातवानों के कृषि दास / बंधुआ मज़दूर — सबसे निचला स्तर | लागू नहीं | स्वामी पर पूर्ण निर्भर |
भूमि अनुदान के प्रकार
| गूंठ | मंदिरों व धार्मिक कार्यों हेतु कर-मुक्त दान भूमि। |
| रौत | युद्ध में वीरता दिखाने वाले सैनिकों को ईनाम में भूमि। |
| संकल्प / विष्णुप्रित / बितल | विद्वान ब्राह्मणों को कर-मुक्त दान भूमि। |
| जागीर | राज्य अधिकारियों को नकद वेतन के बदले दी जाने वाली भूमि। |
कर प्रणाली — "36 रकम 32 कलम"
त्वरित रिवीज़न तालिका
| बिंदु | तथ्य |
|---|---|
| पदानुक्रम क्रम | राज्य → मंडल → देश → परगना → पट्टी/गर्खा → थोक → गाँव |
| शांत परगना अधिकारी | सीकदार |
| अशांत/सैन्य परगना अधिकारी | बख्शी |
| पट्टी क्षेत्र | काली कुमाऊँ, माल (तराई-भाबर) |
| गर्खा क्षेत्र | सोर, सीरा (पिथौरागढ़) |
| थोक प्रशासक | थोकदार / बूढ़ा |
| गाँव मुखिया (दक्षिण-पूर्व) | कमीण → कमीणचारी |
| गाँव मुखिया (पश्चिम-उत्तर) | सयाणा → सयाणचारी |
| पहला भूमि बंदोबस्त | रतन चंद |
| स्थायी मानक भूमि इकाई | बीसी (20 नाली) |
| मुख्य भू-कर (गल्ला-छाड़ा) | उपज का 1/6 भाग |
| न्यौवली व विष्टावली स्थापक | लक्ष्मी चंद |
| कुख्यात कारागार | सीराकोट (पिथौरागढ़) |
| बूढ़ा/सयाणा नियुक्ति परंपरा प्रारंभ | सोमचंद |
| स्थायी सेना/छावनी स्थापक | रुद्र चंद |
| पट्टी व्यवस्था (तराई) स्थापक | बाज बहादुर चंद |