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उत्तराखण्ड में गोरखा शासन
गोरख्याली शासन-व्यवस्था, ब्रिटिश-गोरखा संघर्ष एवं सगौली की ऐतिहासिक संधि — उत्तराखण्ड के मध्यकालीन इतिहास का सर्वाधिक परीक्षोपयोगी अध्याय।
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25 वर्ष
कुमाऊँ में गोरखा शासन
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10.5 वर्ष
गढ़वाल में गोरखा शासन
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1816
सगौली संधि का वर्ष
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15+
गोरखा करों के प्रकार
नेपाल की राजनीतिक स्थिति — 18वीं शताब्दी
18वीं सदी
नेपाल — विभाजित रियासतें एवं एकीकरण
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- नेपाल 24 छोटी-छोटी रियासतों में विभाजित था, जिन्हें सम्मिलित रूप से 'चौबीसी' कहा जाता था।
- पृथ्वी नारायण शाह (1742–1775 ई०) ने नेपाल के एकीकरण का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। उन्हें 'नेपाल का बिस्मार्क' तथा 'आधुनिक नेपाल का निर्माता' कहा जाता है।
- प्रताप शाह — शासनकाल: 1775–1778 ई०।
- रणबहादुर शाह (1778–1804 ई०) — अल्पवयस्क शासक; संरक्षिका: रानी इन्द्रलक्ष्मी। सन् 1804 ई० में साधु बनकर उन्होंने अपना नाम 'निर्गुणानंद' धारण किया।
1790 ई०
कुमाऊँ अभियान — हवालबाग का युद्ध
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- निमंत्रण: कुमाऊँ के कुटिल राजनेता हर्षदेव जोशी के निमंत्रण पर गोरखों ने कुमाऊँ पर आक्रमण किया।
- नेतृत्व: रणबहादुर शाह की आयु केवल 15 वर्ष थी, अतः अभियान का प्रत्यक्ष नेतृत्व उनके चाचा चौतरिया बहादुर शाह ने किया।
- प्रमुख गोरखा सेनापति: (1) शूरवीर थापा (2) अमर सिंह थापा (3) हस्तीदल चौतरिया (4) जगदीश पांडे।
- हवालबाग का युद्ध (1 फरवरी 1790 ई०) — चंद राजा महेंद्र चंद एवं गोरखा सेना के मध्य हुआ। गोरखों की निर्णायक विजय हुई और इसके पश्चात् कुमाऊँ (अल्मोड़ा) पर उनका अधिकार स्थापित हो गया।
◆ डॉ. अजय सिंह रावत ने गोरखों के शासन की तुलना 'यमराज' से की है।
◆ गोरखा प्रशासकों को 'सूबेदार' या 'सुब्बा' कहा जाता था।
◆ गोरखा प्रशासकों को 'सूबेदार' या 'सुब्बा' कहा जाता था।
1791–92
1. जोगा मल्ल शाह — कुमाऊँ के प्रथम गोरखा सूबेदार
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- बाउलकीगढ़ / सीमलगढ़ किला (1791): पिथौरागढ़ में इस किले का निर्माण एवं नियंत्रण किया। पश्चात् अंग्रेजों ने इसे 'लंदन फोर्ट' (London Fort) नाम दिया।
- प्रथम भूमि-बन्दोबस्त (1791-92): गोरखाओं द्वारा कुमाऊँ में पहला भूमि-बन्दोबस्त (मालगुजारी सम्बन्धी) इन्हीं के काल में हुआ।
- मांगा कर (Poll Tax): प्रत्येक वयस्क व्यक्ति से 1 रुपया।
- बीसी कर: प्रत्येक 20 नाली भूमि पर 1 रुपया।
- सुवांग दस्तूर: कार्यालय-व्यय हेतु प्रत्येक ग्राम से वसूल किया जाने वाला कर।
अत्याचारी
2. काजी नरशाही — कुमाऊँ का सर्वाधिक अत्याचारी शासक
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- काजी नेपाल सरकार द्वारा प्रदत्त सर्वोच्च अलंकार था।
- निशाना: कुमाऊँ के स्थानीय पूर्व सैनिक व लड़ाके (विशेष रूप से नगरकोटिया नेगी), जो युद्ध के पश्चात् पश्चिमी पहाड़ियों में स्थानीय स्त्रियों से विवाह कर शांत जीवन व्यतीत कर रहे थे।
- कारण (वहम): सूबेदार नर शाही को गहरा शक हो गया था कि ये पूर्व सैनिक भीतर-भीतर संगठित होकर गोरखा शासन को उखाड़ फेंकने हेतु एक बड़े गुप्त सैन्य विद्रोह (Mutiny) की साजिश रच रहे हैं।
- मंगलवार रात्रि काण्ड (1793 ई.): बिना किसी खुली चेतावनी या अदालती कार्यवाही के, गुप्तचरों द्वारा तैयार सूची के आधार पर एक मंगलवार रात गोरखा सैनिकों ने बारामण्डल क्षेत्र में चारों ओर से अचानक हमला बोलकर सोते हुए इन पूर्व सैनिकों को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया।
- लोकोक्ति का जन्म: इस अचानक एवं भयानक कत्लेआम ने पूरे कुमाऊँ को झकझोर कर रख दिया, जिसके बाद कुमाऊँनी लोक-साहित्य में यह प्रसिद्ध कहावत प्रचलित हुई।
कुमाऊँ में प्रचलित कहावत: "मंगल की रात और नरशाही का पाला है।"
क्रूर
3. अजब सिंह खवास / थापा
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- अल्मोड़ा में 1,500 ग्राम-प्रधानों की नृशंस हत्या करवाई।
पुनः सूबेदार नियुक्त होने पर इसका कुख्यात कथन: "ब्राह्मणों के पैर पूजे जाते हैं, इसलिए बोझा सिर पर रखो।"
1797–99
4. बम शाह
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- ब्राह्मण भूस्वामियों पर 'कुशही कर' आरोपित किया।
1806–1815
5. चौतरिया बम शाह — कुमाऊँ के अंतिम गोरखा सूबेदार
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- शासनकाल: कुमाऊँ में सर्वाधिक दीर्घकालीन गोरखा शासन।
- उपनाम: 'बड़ा बम शाह'।
- प्रमुख कार्य: अल्मोड़ा से नेपाल तक डाक-चौकियों का निर्माण।
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PYQ — परीक्षा में महत्त्वपूर्ण
कुमाऊँ के सूबेदारों का क्रम: जोगा मल्ल (प्रथम) → काजी नरशाही (सर्वाधिक अत्याचारी) → अजब सिंह थापा → बम शाह → चौतरिया बम शाह / बड़ा बम शाह (अंतिम)
1791 ई०
लंगरूगढ़ का युद्ध — प्रथम गोरखा संघर्ष
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- गढ़वाल नरेश प्रद्युम्न शाह एवं गोरखा सेना के मध्य प्रथम संघर्ष।
- इसी बीच चीन ने नेपाल पर आक्रमण किया, जिससे गोरखों को पीछे हटना पड़ा। परिणामस्वरूप 1792 ई०: 'लंगरूगढ़ की संधि' हुई।
- प्रद्युम्न शाह ने नेपाल को वार्षिक कर 4,000 रुपये देना स्वीकार किया, जो कालान्तर में बढ़कर 9,000 और फिर 25,000 रुपये हो गया।
आपदाएँ
कमजोर गढ़वाल — प्राकृतिक आपदाएँ
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- 1795 ई०: 'इकावनवी-बावनी अकाल' ने गढ़वाल की आर्थिक रीढ़ तोड़ दी।
- 1 सितम्बर 1803 ई०: विनाशकारी भूकम्प (रिक्टर 9.0) — इसने गढ़वाल को सैन्य दृष्टि से और भी दुर्बल कर दिया।
14 मई 1804
खुड़बुड़ा का युद्ध — प्रद्युम्न शाह की वीरगति
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- आदेश: नेपाल के राजा गीर्वाण युद्ध विक्रम शाह (प्रधानमंत्री — रणबहादुर थापा)।
- गोरखा सेनापति: अमर सिंह थापा + हस्तीदल चौतरिया।
- गढ़वाल नरेश प्रद्युम्न शाह युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए।
- गोरखों ने उनका हरिद्वार में ससम्मान अन्तिम संस्कार करवाया।
- प्रद्युम्न शाह के भाई प्रीतम शाह को बंदी बनाकर नेपाल भेजा गया।
- उनके पुत्र सुदर्शन शाह ने हरिद्वार से प्रतिरोध जारी रखा।
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PYQ — अत्यंत महत्त्वपूर्ण
खुड़बुड़ा का युद्ध (14 मई 1804) = गढ़वाल में गोरखा शासन का आरम्भ-बिन्दु। राजकुमार सुदर्शन शाह ने आगे चलकर अंग्रेजों से सैन्य सहायता माँगी।
प्रथम
1. अमर सिंह थापा — गढ़वाल के प्रथम सूबेदार
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- विशेषता: गढ़वाल तथा कुमाऊँ — दोनों के प्रशासक रहे।
- उपाधि: नेपाल सरकार द्वारा प्रदत्त 'काजी' की उपाधि।
- निर्माण: गंगोत्री मंदिर का जीर्णोद्धार (गंगोत्री, चार धामों में सबसे कम ऊँचाई पर स्थित — लगभग 3,048 मीटर)।
- बाद में पश्चिमी अभियानों में व्यस्त होने के कारण गढ़वाल का प्रशासन अन्य सूबेदारों को सौंपा।
2
2. रणजोर सिंह थापा — विद्वत्प्रेमी शासक
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- विद्वानों को संरक्षण एवं शरण प्रदान करते थे।
- मौलाराम: इन्हीं के शासनकाल में प्रसिद्ध चित्रकार मौलाराम ने 'रणबहादुर चंद्रिका' की रचना की तथा रणजोर सिंह थापा को 'दानवीर कर्ण' की उपाधि से अलंकृत किया।
- प्रशासनिक पद: 'विचारी' (न्यायाधीश) एवं 'अविचारी' (अधिशासक/कार्यपालक अधिकारी) पदों का सृजन।
- न्याय-परामर्श हेतु सभा-मण्डली का गठन।
1805–1808
3. हस्तीदल चौतरिया — उदार एवं कृषक-हितैषी शासक
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- कृषकों के प्रति उदार दृष्टिकोण — तकावी ऋण प्रदान किया और भूमिकर में कमी की।
- अंग्रेज यात्री रेपर (Raper) ने 1808 ई० में गढ़राज्य की यात्रा की।
- हरिद्वार (भीमगोड़ा) में दास-विक्रय केन्द्र संचालित था।
- सिख लुटेरों का दमन कर क्षेत्र में शांति-व्यवस्था बहाल की।
1808–11
4. भैरों थापा — अत्यंत क्रूर एवं विलासी शासक
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- अत्यधिक विलासी, अत्याचारी एवं क्रूर शासन के लिए कुख्यात।
- प्रसिद्ध चित्रकार मौलाराम को नेपाल दरबार से मिली जागीर (भूमि) इसने बलपूर्वक छीन ली।
1811–12
5. काजी बहादुर शाह — भूमि 5 श्रेणियों में विभक्त
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- 1812 ई० में उर्वरता के आधार पर भूमिकर निर्धारण किया — यह कुमाऊँ-गढ़वाल में भूमि-वर्गीकरण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक कदम था।
- भूमि को पाँच श्रेणियों में विभाजित किया: (1) अव्वल (2) दोयम (दम) (3) सोम (4) चाहर (5) सुखवासी।
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PYQ — गढ़वाल सूबेदारों का क्रम
अमर सिंह थापा (प्रथम) → रणजोर सिंह थापा → हस्तीदल चौतरिया → भैरों थापा (क्रूर) → काजी बहादुर शाह (भूमि 5 श्रेणी)
① प्रशासनिक एवं सैन्य पदानुक्रम
(अ) केंद्रीय एवं प्रांतीय स्तर
(ब) पट्टी एवं ग्राम स्तर — जमीनी प्रशासन
📌 गोरखाओं ने चंद और परमार शासकों के जमीनी प्रशासन को नहीं छेड़ा — केवल टैक्स का बोझ अत्यधिक बढ़ा दिया।
② गोरखा सेना की संरचना
⚔️ सैन्य पदानुक्रम — घटते क्रम में
सूबेदार
›
जमादार
›
हुद्दा (≈हवलदार)
›
अमलीदार
›
प्यादा (सामान्य सैनिक)
🏡
मनौचौल / खांगी — भूमि-वेतन प्रणाली
गोरखाकाल में वेतन नकद के बजाय भूमि के रूप में दिया जाता था। सैन्य या किसी अन्य सेवा के प्रतिफल में प्रदत्त इस भूमि को 'मनौचौल' अथवा 'खांगी' कहा जाता था।
③ विशिष्ट शब्दावली — VVIP For Exam
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🎯 स्व-परीक्षण तालिका — सम्पूर्ण शब्दावली
| शब्द / पद | अर्थ / विवरण | श्रेणी |
|---|---|---|
| लाल मुहर | नेपाल के राजा द्वारा जारी आदेश-पत्र / मुहर | केंद्रीय प्रशासन |
| स्याही मुहर | सूब्बा (प्रांतीय गवर्नर) द्वारा जारी आदेश / मुहर | केंद्रीय प्रशासन |
| काजी (Kazi) | सर्वोच्च उपाधि (पद नहीं) — मुख्य मंत्रियों/सेनापतियों को। उदा॰ अमर सिंह थापा। | केंद्रीय प्रशासन |
| चौतरिया | राजपरिवार के सदस्य — सूब्बा बनने पर सर्वाधिक अधिकार | केंद्रीय प्रशासन |
| सूब्बा (Subba) | प्रांत (कुमाऊँ / गढ़वाल) का सर्वोच्च गवर्नर | प्रांतीय प्रशासन |
| फौजदार | परगने का प्रमुख सैन्य व नागरिक अधिकारी | प्रांतीय प्रशासन |
| थोकदार / सयाना / कमीण | पट्टी के प्रमुख — फौजदार तक टैक्स पहुँचाना | जमीनी प्रशासन |
| प्रधान | गाँव का मुखिया — बेगार/कुली व्यवस्था मुख्य कार्य | जमीनी प्रशासन |
| दस्तूर (Dastur) | राजकर के ऊपर थोकदारों को मिलने वाला अतिरिक्त शुल्क (अनाज/घी/बकरे की टांग) | जमीनी प्रशासन |
| जागर्या / जागरिया | स्थायी सेना — सामान्यकाल 6 रु०/माह; युद्धकाल 8 रु०/माह | सेना |
| ढाकचा / ढाकरिया | अस्थायी/रिजर्व सेना — 2 वर्ष पश्चात् सेवामुक्त | सेना |
| मनौचौल / खांगी | सैन्य सेवा के बदले दी जाने वाली भूमि-वेतन | सेना / राजस्व |
| सूबेदार → जमादार → हुद्दा → अमलीदार → प्यादा | गोरखा सेना का पदानुक्रम — घटते क्रम में | सेना |
| अविचारी (Avichari) | कार्यपालक अधिकारी (Executive Officer) | न्याय / प्रशासन |
| विचारी / बिचारी | न्यायाधीश (Judge) | न्याय / प्रशासन |
| ठाकुरिया | पेंशन-प्राप्त प्रधान अधिकारी | न्याय / प्रशासन |
| बलि (Bali) | गोरखा सैनिकों द्वारा मनमाने ढंग से कर-वसूली की क्रूर प्रक्रिया | राजस्व |
| कठुवा (Kathuwa) | ब्राह्मण दास — गोरखाकाल में ब्राह्मणों को भी दास बनाया जाता था | सामाजिक / जातीय |
| कामी (Kami) | शिल्पकार (Craftsman) | सामाजिक / जातीय |
| सुनवार (Sunwar) | सुनार (Goldsmith) | सामाजिक / जातीय |
| नौ (Nau) | नाई (Barber) | सामाजिक / जातीय |
| कर का नाम | विवरण |
|---|---|
| पुगाड़ी कर | कृषि-भूमि पर आरोपित। गोरखों की आय का मुख्य स्रोत (~1.5 लाख रु०/वर्ष)। सैनिकों के वेतन की पूर्ति इसी कर से होती थी। |
| कुशही कर | बम शाह द्वारा ब्राह्मण भूस्वामियों पर आरोपित। 260 नाली (13 ज्यूलिया) तक भूमि अर्जित करने वाले ब्राह्मणों से 5 रु० प्रतिमाह। |
| मांगा कर | युद्ध-काल में प्रत्येक युवा (नौजवान) व्यक्ति से 1 रुपया। |
| तिमारी कर | गोरखा फौजदार को 4 आना तथा सूबेदार को 2 आना के रूप में देय। |
| सायर कर | सीमा-कर / चुंगी-कर — व्यापारिक माल पर। |
| रहता कर | ग्राम छोड़कर पलायन करने वाले व्यक्तियों पर। |
| मरो कर | पुत्रहीन व्यक्ति पर आरोपित। |
| बहता कर | छिपाई गई सम्पत्ति पर। |
| टीका भेंट कर | विवाह एवं शुभ अवसरों पर। |
| सोण्या फागुन कर | फाल्गुन माह के उत्सवों के अवसर पर। |
| पगड़ी कर | जायदाद / भूमि-हस्तांतरण के समय। |
| जान्या सुन्या | राज-कर्मचारियों को लगान की जानकारी देने के लिए। |
| सलामी कर | एक प्रकार का नज़राना / उपहार-कर। |
| अधनी दफ्ती कर | खस ज़मींदारों पर आरोपित। |
| दोनिया कर | पहाड़ी पशुचारकों पर। |
| हेड़ी मेवाती कर | मैदानी पशुचारकों पर लगने वाला कर। |
| बीसी कर | प्रत्येक 20 नाली भूमि पर 1 रुपया। |
| टांडकर / तानकर | बुनकरों / कपड़ों पर लगने वाला कर। |
| मिझारी कर | शिल्पकारियों व जागारियों से लिया जाने वाला कर। |
| मौ कर / घृतही-पिच्छी कर | प्रत्येक परिवार से लिया जाने वाला कर। |
| घी कर | पशुओं / पशुपालकों पर लगने वाला कर। |
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सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण — परीक्षा हेतु
पुगाड़ी कर = मुख्य आय-स्रोत | मांगा कर = युद्धकालीन कर | कुशही कर = ब्राह्मणों पर | मरो कर = पुत्रहीन पर | बीसी कर = प्रति 20 नाली 1 रु०
🙏 धर्म एवं आस्था
- गोरखा गाय तथा ब्राह्मणों (उपाध्याय एवं पांडे वर्ग) को अत्यधिक सम्मान देते थे।
- सर्वप्रिय पर्व: दशैं (दशहरा)।
🗣️ भाषाएँ
- राजभाषा: गोरखाली।
- साहित्यिक भाषा: नेवारी।
- अन्य प्रचलित भाषा: खसकुरी।
🕌 सदावर्त (तीर्थयात्रियों के लिए विशेष व्यवस्था)
- देहरादून में गुरु रामराय के महंत 'हरिशेव' को सदावर्त संस्था का संरक्षक नियुक्त किया गया।
- रणबहादुर शाह की पत्नी 'कांतिदेवी' ने शतोवी परगने के कुछ ग्राम केदारनाथ मंदिर को सदावर्त-दान में दिये।
- रणबहादुर शाह ने 'कोटली परगने' के ग्राम बद्रीनाथ मंदिर के सदावर्त हेतु दान में दिये।
न्याय-प्रणाली — दीप व्यवस्था (अग्नि-जल परीक्षा)
⚖️ न्याय-प्रणाली का स्वरूप
गोरखाओं के पास कोई लिखित अथवा सुनिश्चित न्याय-संहिता नहीं थी। 'विचारी' (न्यायाधीश) मौखिक निर्णय सुनाते थे।
- ▸ उत्तराखण्ड की प्रथम अदालत अल्मोड़ा में स्थापित हुई।
- ▸ न्याय-प्रक्रिया में 'महाभारत की शपथ' दिलाई जाती थी।
| दीप का प्रकार | विवरण (परीक्षा-विधि) |
|---|---|
| गोला दीप | गर्म लोहे का गोला हाथ में पकड़ना। |
| तराजू दीप | सायं को तौलना + प्रातः पुनः तौलना — भार बढ़ने पर व्यक्ति को दोषी माना जाता था। |
| कढ़ाई दीप | उबलते तेल में हाथ डालना। |
| तीर का दीप | जल में सिर डुबोकर तब तक रखना जब तक तीर गन्तव्य तक न पहुँचे। |
| घात का दीप | घाट पर सम्पन्न होने वाली परीक्षा। |
| बोकाटी हरया दीप | बोक्साड़ी दीप — स्थानीय परम्परा पर आधारित परीक्षा। |
प्रमुख दण्ड-विधान
| अपराध | दण्ड |
|---|---|
| देशद्रोह | मृत्युदण्ड। |
| हत्या | वृक्ष पर फाँसी। |
| आत्महत्या | आत्महत्या करने वाले के परिवार पर अर्थदण्ड (जुर्माना)। |
| ब्राह्मण (हत्या का अभियुक्त) | मृत्युदण्ड नहीं — 'देश-निर्वासन' का दण्ड। |
| ब्राह्मण (चोरी का अभियुक्त) | 'चोटी काट ली जाती थी' — सामाजिक लांछन। |
संघर्ष के प्रमुख कारण
👑 सुदर्शन शाह का निमंत्रण
प्रद्युम्न शाह के पुत्र सुदर्शन शाह ने अपना पैतृक गढ़वाल-राज्य पुनः प्राप्त करने की आकांक्षा से अंग्रेजों से सैन्य सहायता माँगी।
📋 सहायक-संधि का अस्वीकार
गोरखों ने अंग्रेजों की 'सहायक संधि' (Subsidiary Alliance) स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
★ सहायक-संधि का प्रवर्तन फ्रांसीसी गवर्नर डुप्ले (Dupleix) ने किया; भारत में इसे लागू किया लॉर्ड वेलेज़ली (Wellesley) ने।
★ सहायक-संधि का प्रवर्तन फ्रांसीसी गवर्नर डुप्ले (Dupleix) ने किया; भारत में इसे लागू किया लॉर्ड वेलेज़ली (Wellesley) ने।
🗺️ सीमा-विवाद (गोरखपुर)
1784 ई० में गोरखों ने सेनापति भीमसेन थापा के नेतृत्व में गोरखपुर के 200 ग्रामों पर अधिकार कर लिया था।
🏘️ बुटवल पर अधिकार (1814 ई०)
गोरखों ने बुटवल (Butwal) पर अधिकार जमाया — वहाँ का ब्रिटिश-नियुक्त प्रशासक पृथ्वीपाल था।
🏔️ व्यापारिक हित
अंग्रेज तिब्बत व्यापार-मार्ग पर नियंत्रण चाहते थे — गोरखा राज्य इसमें प्रमुख बाधा बन रहा था।
🪖 अंग्रेजों के 4 प्रमुख सैन्य अभियान — नवम्बर 1814
गवर्नर-जनरल लॉर्ड मोयरा (Lord Moira / Marquess of Hastings) ने गोरखाओं के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की और चार दिशाओं में सेना प्रेषित की:
- (1) मेजर जनरल मार्ले (Marley) → काठमांडू अभियान।
- (2) मेजर जनरल जे.एस. वुड (J.S. Wood) → गोरखपुर अभियान।
- (3) मेजर जनरल गिलेस्पी (Gillespie) → देहरादून अभियान।
- (4) मेजर जनरल ऑक्टरलोनी (Ochterlony) → नाहन-क्षेत्र (पश्चिमी सीमा)।
प्रमुख युद्ध एवं संधियाँ — कालक्रम
अक्टूबर–नव० 1814
1. नालापानी / खलंगा का युद्ध
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- मुकाबला: जनरल गिलेस्पी बनाम गोरखा वीर सरदार बलभद्र थापा।
- 31 अक्टूबर 1814: जनरल गिलेस्पी युद्धभूमि में मारे गये। अन्ततः अंग्रेजों की जीत।
- विस्तृत वर्णनकर्ता: अंग्रेज लेखक विलियम फ्रेज़र (W. Frazer)।
31 मार्च 1815
2. दिगालीचौड़ / खिलपती का युद्ध — गोरखों की विजय
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- मुकाबला: कैप्टन हियरसे (Captain Hearsey) बनाम हस्तीदल चौतरिया।
- परिणाम: गोरखों की विजय; कैप्टन हियरसे बंदी बना लिये गये।
23 अप्रैल 1815
3. गणनाथ डांडा का युद्ध
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- मुकाबला: एडवर्ड गार्डनर + कर्नल निकल्सन बनाम हस्तीदल चौतरिया।
- परिणाम: गोरखा सेनापति हस्तीदल चौतरिया वीरगति को प्राप्त हुए।
27 अप्रैल 1815
4. अल्मोड़ा / लालमंडी युद्ध + संधि
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- 'अल्मोड़ा / लालमंडी की संधि' (27 अप्रैल 1815)।
- ब्रिटिश पक्ष: एडवर्ड गार्डनर | गोरखा पक्ष: सूबेदार बमशाह चौतरिया।
- बमशाह के सेनापति: चामू भंडारी।
- परिणाम: गोरखों ने कुमाऊँ छोड़ना आरम्भ किया।
15 मई 1815
5. मलावगढ़ का युद्ध + संधि
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- मुकाबला: अमर सिंह थापा बनाम जनरल ऑक्टरलोनी।
- 'मलावगढ़ की संधि' (Treaty of Malaun) — 15 मई 1815।
| घटना | विवरण |
|---|---|
| नेपाल का विरोध | राजा: गीर्वाण युद्ध विक्रम शाह | प्रधानमंत्री: भीमसेन थापा — दोनों मलावगढ़ संधि स्वीकार नहीं करना चाहते थे। |
| मध्यस्थता | स्वर्गीय रणबहादुर शाह के गुरु 'गजराज मिश्र' को मध्यस्थता हेतु काठमांडू बुलाया गया। |
| हस्ताक्षरकर्ता | ब्रिटिश पक्ष: लेफ्टिनेंट कर्नल पैरिस ब्रेडशॉ (Paris Bradshaw), गवर्नर-जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्ज़ (मोइरा) की ओर से अधिकृत। नेपाल पक्ष: राज गुरु गजराज मिश्र एवं उनके सहयोगी चन्द्रशेखर उपाध्याय (Chandra Shekhar Upadhyaya)। |
| प्रारम्भिक हस्ताक्षर | 2 दिसम्बर 1815 — बिहार के चम्पारण ज़िले में स्थित सुगौली में कर्नल ब्रेडशॉ ने मसौदे पर हस्ताक्षर कर 15 दिन की अल्टीमेटम-सीमा सहित नेपाल भेजा। |
| पुनः आक्रमण | समय पर अनुसमर्थन (Ratification) न होने पर फरवरी 1816 में जनरल डेविड ऑक्टरलोनी ने मकवानपुर घाटी की ओर पुनः कूच किया, जिससे नेपाल पर दबाव बढ़ा। |
| अन्तिम स्वीकृति | 4 मार्च 1816 — मकवानपुर घाटी में चन्द्रशेखर उपाध्याय ने अनुसमर्थित प्रति सौंपी; इसी के साथ 'सगौली / संगोली की संधि' विधिवत् प्रभावी हुई। |
संधि की प्रमुख धाराएँ (Key Provisions)
🗺️ सीमा-निर्धारण
काली / महाकाली नदी को नेपाल की पश्चिमी सीमा तथा मेची नदी को पूर्वी सीमा घोषित किया गया — यही सीमाएँ आज भी प्रभावी हैं।
📉 भू-भाग का त्याग
नेपाल को विगत ~25 वर्षों में जीते गए क्षेत्र छोड़ने पड़े —
▸ पश्चिम में कुमाऊँ-गढ़वाल (वर्तमान उत्तराखंड)।
▸ पूर्व में मेची नदी से आगे का क्षेत्र, जिसमें सिक्किम व दार्जिलिंग सम्मिलित थे।
▸ पश्चिम में कुमाऊँ-गढ़वाल (वर्तमान उत्तराखंड)।
▸ पूर्व में मेची नदी से आगे का क्षेत्र, जिसमें सिक्किम व दार्जिलिंग सम्मिलित थे।
🌾 तराई का त्याग व आंशिक वापसी
तराई का बड़ा भाग भी अंग्रेजों को सौंपना पड़ा; सद्भावना स्वरूप कुछ भाग बाद में लौटाया गया —
▸ दिसम्बर 1816 में कोसी–राप्ती के मध्य का भाग।
▸ 1860 में राप्ती–काली के मध्य का भाग (1857 के विद्रोह में सहायता हेतु पुरस्कार स्वरूप)।
▸ दिसम्बर 1816 में कोसी–राप्ती के मध्य का भाग।
▸ 1860 में राप्ती–काली के मध्य का भाग (1857 के विद्रोह में सहायता हेतु पुरस्कार स्वरूप)।
🏛️ ब्रिटिश रेजीडेंट
नेपाल को काठमांडू में स्थायी ब्रिटिश प्रतिनिधि (रेजीडेंट) रखना स्वीकार करना पड़ा। पूर्व कुमाऊँ-कमिश्नर एडवर्ड गार्डनर (Edward Gardner) 1816 में नेपाल के पहले ब्रिटिश रेजीडेंट नियुक्त हुए।
🌐 विदेश-नीति पर नियंत्रण
नेपाल सहमत हुआ कि वह ब्रिटिश सरकार की पूर्व अनुमति के बिना किसी भी यूरोपीय अथवा अमेरिकी नागरिक को अपनी सेवा में नियुक्त नहीं करेगा।
⚔️ गोरखा रेजीमेंट की नींव
गोरखा सैनिकों की वीरता से प्रभावित होकर अंग्रेजों को गोरखों की भर्ती का अधिकार मिला — यहीं से प्रसिद्ध गोरखा रेजीमेंट की नींव पड़ी (1816 के अंत तक 4 गोरखा बटालियन गठित)।
सगौली संधि के मुख्य परिणाम — उत्तराखंड पर प्रभाव
⚔️ परिणाम 1 — गोरखा शासन का अन्त
गढ़वाल व कुमाऊँ से गोरखाओं का अधिकार पूर्णतः समाप्त।
▸ कुमाऊँ में 25 वर्षीय गोरखा शासन समाप्त।
▸ गढ़वाल में 10.5 वर्षीय गोरखा शासन समाप्त।
▸ कुमाऊँ में 25 वर्षीय गोरखा शासन समाप्त।
▸ गढ़वाल में 10.5 वर्षीय गोरखा शासन समाप्त।
👑 परिणाम 2 — गढ़वाल का विभाजन व टिहरी रियासत
अंग्रेजों ने गढ़वाल को दो भागों में बाँटा —
▸ पूर्वी भाग अंग्रेजों के पास रहा, जो 'ब्रिटिश गढ़वाल' (मुख्यालय पौड़ी) कहलाया।
▸ अलकनंदा नदी के पार पश्चिमी भाग प्रद्युम्न शाह के पुत्र सुदर्शन शाह को वापस सौंपा गया, जो आगे टिहरी रियासत कहलाया।
▸ पूर्वी भाग अंग्रेजों के पास रहा, जो 'ब्रिटिश गढ़वाल' (मुख्यालय पौड़ी) कहलाया।
▸ अलकनंदा नदी के पार पश्चिमी भाग प्रद्युम्न शाह के पुत्र सुदर्शन शाह को वापस सौंपा गया, जो आगे टिहरी रियासत कहलाया।
🏔️ परिणाम 3 — ब्रिटिश प्रशासन
शेष गढ़वाल-कुमाऊँ क्षेत्र अंग्रेजों के अधीन आया। 'नॉन-रेगुलेशन प्रान्त' (Non-Regulation Province) घोषित किया गया।
🎯 Exam Quick Revision — सभी महत्त्वपूर्ण तिथियाँ एवं बिन्दु
| 1 फरवरी 1790 | हवालबाग युद्ध → गोरखों का कुमाऊँ पर अधिकार। |
| 14 मई 1804 | खुड़बुड़ा युद्ध → प्रद्युम्न शाह वीरगति → गढ़वाल में गोरखा शासन आरम्भ। |
| अक्टूबर–नव० 1814 | नालापानी / खलंगा युद्ध — गिलेस्पी Vs बलभद्र थापा | 31 अक्टूबर 1814: गिलेस्पी मारे गये। |
| 31 मार्च 1815 | दिगालीचौड़ युद्ध — हियरसे बंदी बने | गोरखों की जीत। |
| 23 अप्रैल 1815 | गणनाथ डांडा — हस्तीदल चौतरिया वीरगति। |
| 27 अप्रैल 1815 | लालमंडी संधि — एडवर्ड गार्डनर + बमशाह चौतरिया | गोरखों ने कुमाऊँ छोड़ा। |
| 15 मई 1815 | मलावगढ़ संधि — अमर सिंह थापा Vs ऑक्टरलोनी। |
| 2 दिसम्बर 1815 | सगौली संधि — प्रारम्भिक हस्ताक्षर — गजराज मिश्र + कर्नल ब्रेडशॉ। |
| 4 मार्च 1816 | सगौली संधि — अन्तिम स्वीकृति — चन्द्रशेखर उपाध्याय द्वारा अनुसमर्थन सौंपा गया → गोरखा शासन का पूर्ण अन्त। |
⚠️ परीक्षा जाल (Common Exam Traps)
जाल #1कुमाऊँ के सूबेदार — PYQ
- 🔹 जोगा मल्ल शाह → कुमाऊँ के प्रथम गोरखा सूबेदार।
- 🔹 काजी नरशाही → सर्वाधिक अत्याचारी शासक।
- 🔹 चौतरिया बम शाह (बड़ा बम शाह) → अंतिम सूबेदार (1806–1815)।
जाल #2गढ़वाल के सूबेदार — क्रम
- 🔹 अमर सिंह थापा → प्रथम सूबेदार (गंगोत्री मंदिर जीर्णोद्धार)।
- 🔹 भैरों थापा → क्रूर (मौलाराम की जागीर छीनी)।
- 🔹 काजी बहादुर शाह → भूमि 5 श्रेणियों में विभक्त (अव्वल/दोयम/सोम/चाहर/सुखवासी)।
जाल #3कर — मुख्य आय-स्रोत
पुगाड़ी कर = गोरखों का मुख्य आय-स्रोत (भूमि-कर, ~1.5 लाख/वर्ष)।
मांगा कर = युद्धकाल में प्रत्येक युवक से 1 रु०।
कुशही कर = ब्राह्मण भूस्वामियों पर (बम शाह द्वारा)।
मरो कर = पुत्रहीन व्यक्ति पर।
मांगा कर = युद्धकाल में प्रत्येक युवक से 1 रु०।
कुशही कर = ब्राह्मण भूस्वामियों पर (बम शाह द्वारा)।
मरो कर = पुत्रहीन व्यक्ति पर।
जाल #4न्याय — विचारी ≠ अविचारी
- 🔹 विचारी = न्यायाधीश (Judge)।
- 🔹 अविचारी = कार्यपालक अधिकारी (Executive Officer)।
- 🔹 दीप = अग्नि/जल-परीक्षा — 6 प्रकार के।
- 🔹 ब्राह्मण हत्यारे को देश-निर्वासन (मृत्युदण्ड नहीं)।
जाल #5सगौली संधि — तिथियाँ, नाम व सीमाएँ
- 🔹 प्रारम्भिक हस्ताक्षर (मसौदा): 2 दिसम्बर 1815 — कर्नल ब्रेडशॉ।
- 🔹 अन्तिम स्वीकृति (अनुसमर्थन): 4 मार्च 1816 — मकवानपुर में।
- 🔹 गजराज मिश्र = मुख्य नेपाली प्रतिनिधि; चन्द्रशेखर उपाध्याय = सहयोगी, जिन्होंने 4 मार्च 1816 को अनुसमर्थित प्रति सौंपी — परीक्षा में अक्सर केवल गजराज मिश्र का नाम पूछा जाता है, उपाध्याय का नाम भूलने की भूल न करें।
- 🔹 कर्नल ब्रेडशॉ (पूरा नाम: लेफ्टिनेंट कर्नल पैरिस ब्रेडशॉ) = ब्रिटिश प्रतिनिधि।
- 🔹 सीमा-ट्रैप: काली/महाकाली नदी = पश्चिमी सीमा, मेची नदी = पूर्वी सीमा — क्रम न उलटें।