उत्तराखंड के वन आन्दोलन
कुंजणी, तिलाड़ी, चिपको, खीराकोट, पाणी राखो, बीज बचाओ, मैती सहित उत्तराखंड के प्रमुख वन आंदोलनों को कालक्रम, कारण, नेतृत्व और परिणाम के साथ पढ़ें।
01 त्वरित पुनरावलोकन तालिका (कालक्रमानुसार)
| क्रम | आन्दोलन | वर्ष | स्थान | नेतृत्व | कारण / परिणाम |
|---|---|---|---|---|---|
| 1 | कुंजणी वन आन्दोलन |
1904 | स्यूड़ व पाथों गाँव, टिहरी रियासत | अमर सिंह | कीर्तिशाह के समय बढ़ाये गये टैक्स के विरोध में। |
| 2 | खास पट्टी वन आन्दोलन |
1906–07 | टिहरी रियासत | बेलमती देवी | परिणामस्वरूप बैंक ऑफ गढ़वाल का गठन। |
| 3 | असहयोग वन आन्दोलन |
1919–22 | चमोली व पौड़ी | गोपाल सिंह राणा ('आधुनिक किसान आन्दोलनों के जनक') | सौम्य सेर व बिसाऊ प्रथा के विरुद्ध। |
| 4 | राजगढ़ी — रवाँई / तिलाड़ी काण्ड |
1926–30 | राजगढ़ी (वर्तमान बड़कोट), उत्तरकाशी | दयाराम रवालटा ('आजाद पंचायत') | वन बन्दोबस्त 1929 का विरोध; 30 मई 1930 तिलाड़ी काण्ड में 200+ शहीद — 'उत्तराखण्ड का जलियाँवाला बाग'। |
| 5 | चिपको आन्दोलन |
1973 | मण्डल गाँव व रैणी गाँव, चमोली | चण्डी प्रसाद भट्ट, गौरा देवी, सुन्दरलाल बहुगुणा | वृक्ष कटान के ठेके के विरुद्ध — विश्वप्रसिद्ध वृक्ष-रक्षा आन्दोलन। |
| 6 | पर्वतीय वन संघर्ष समिति |
1974 | अल्मोड़ा | गोबिन्द सिंह | वनों की नीलामी के विरुद्ध; 1977 में नैनीताल शैलेहॉल दहन। |
| 7 | खीराकोट वन आन्दोलन |
1978 | खीराकोट गाँव, अल्मोड़ा | मालती देवी, राधा भट्ट | खड़िया खनन के विरुद्ध। |
| 8 | डुंगी-पैंतोली आन्दोलन |
1980 | डुंगी व पैंतोली गाँव, चमोली | मथुरा देवी | बाँज वनों के हस्तान्तरण के विरुद्ध। |
| 9 | पाणी राखो आन्दोलन |
1980 दशक | उपरेखाल गाँव, पौड़ी गढ़वाल | सच्चिदानन्द भारती | 'चाल-खाल' से सूखे जलस्रोतों का पुनर्जीवन। |
| 10 | बीज बचाओ आन्दोलन |
1986–89 | जड़धार गाँव, टिहरी गढ़वाल | विजय जड़धारी | 'बारहनाजा' पद्धति से परम्परागत बीज संरक्षण। |
| 11 | रक्षासूत्र आन्दोलन |
1994 | खव्वाड़ा गाँव, भिलंगना घाटी, टिहरी गढ़वाल | सुरेश भाई | वृक्षों पर रक्षासूत्र बाँधकर संरक्षण का संकल्प। |
| 12 | मैती आन्दोलन |
1995 | ग्वालदम, चमोली | कल्याण सिंह रावत ('वृक्ष मानव') | विवाह पर मैती वृक्षारोपण की परम्परा। |
| 13 | झपटो-छीनो आन्दोलन |
1998 | रैणी-लाता, चमोली | गोविन्द सिंह रावत (प्रेरणा) | नन्दा देवी उद्यान का प्रबन्धन ग्रामीणों को सौंपने की माँग। |
02 कुंजणी वन आन्दोलन (1904)
- क्षेत्र: हेबल नदी घाटी (स्यूड़ व पाथों गाँव), टिहरी रियासत।
- तत्कालीन शासक: कीर्तिशाह।
- नेतृत्व: अमर सिंह।
- कारण: अंग्रेज़ सरकार को आर्थिक सहायता देने के लिए रियासत द्वारा कर (टैक्स) में की गई वृद्धि।
- विशेष तथ्य: कर वृद्धि के विरोध में स्यूड़ व पाथों गाँव में हज़ारों किसानों ने व्यापक घेराव व प्रदर्शन किया था।
03 खास पट्टी वन आन्दोलन (1906–07)
- क्षेत्र: खास पट्टी, टिहरी रियासत।
- तत्कालीन शासक: कीर्तिशाह।
- नेतृत्व: बेलमती देवी, भगवान सिंह बिष्ट और भरोसाराम।
- कारण: वन बंदोबस्त के तहत वनों पर स्थानीय जनता के अधिकारों को सीमित करना।
- विशेष तथ्य: इस आन्दोलन में महिलाओं ने अत्यंत सक्रिय भूमिका निभाई, जिसमें बेलमती देवी प्रमुख नेत्री थीं।
- परिणाम: इस आन्दोलन के परिणामस्वरूप कीर्तिशाह द्वारा किसानों की सुविधा के लिए बैंक ऑफ गढ़वाल की स्थापना की गई।
04 असहयोग वन आन्दोलन (1919–22)
- क्षेत्र: चमोली और पौड़ी।
- नेतृत्व: गोपाल सिंह राणा।
- कारण: 'सौम्या सेर' और 'बिसाऊ' जैसी शोषक व बेगार प्रथाओं का विरोध।
- पृष्ठभूमि: इन कुप्रथाओं के खिलाफ गोपाल सिंह राणा ने 1915 में ही विरोध शुरू कर दिया था। 1919–22 के दौरान राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे असहयोग आंदोलन से प्रेरित होकर यह एक व्यापक वन/किसान आंदोलन में बदल गया।
- विशेष तथ्य: गोपाल सिंह राणा को उत्तराखंड में 'आधुनिक किसान आन्दोलनों का जनक' माना जाता है।
05 रवाँई / तिलाड़ी काण्ड कालखंड (1926–1930)
1 पृष्ठभूमि: कठोर वन कानूनों का निर्माण (1926–1928)
- कानून लागू: 1926 में टिहरी रियासत में 'वर्किंग प्लान ऑफ टिहरी गढ़वाल स्टेट' लागू किया गया। इसी कानून को बाद में 'वन बन्दोबस्त 1929' के नाम से जाना गया।
- सृजनकर्ता: इस वन कानून का मसौदा (Draft) तत्कालीन DFO पदमदत्त रतूड़ी ने तैयार किया था।
- वन नीति (1927-28): वनों का सीमाकरण (Demarcation) कर दिया गया। वनों में ग्रामीणों और उनके पशुओं का प्रवेश पूरी तरह वर्जित कर दिया गया।
- ऐतिहासिक संवाद: जब त्रस्त जनता ने तत्कालीन राजा नरेन्द्र शाह से पूछा कि "पशु कहाँ जाएंगे?", तो राजा का क्रूर उत्तर था — "ढंगार (खाई) में फेंक दो!"
2 राजगढ़ी वन आन्दोलन (1926-30) व 'आजाद पंचायत' (1929)
- राजा के इस रवैये और वन कानूनों के विरोध में राजगढ़ी (बड़कोट) के ग्रामीणों ने रियासत के खिलाफ एक समानांतर व्यवस्था के रूप में 'आजाद पंचायत' का गठन किया।
- अध्यक्ष: दयाराम सिंह रवालटा।
- उपाध्यक्ष: राम सिंह।
- प्रमुख उपाधियाँ (परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण):
- हीरा सिंह को 'पांच सरकार' की उपाधि दी गई।
- बैजराम को 'तीन सरकार' की उपाधि दी गई।
- आन्दोलन का विस्तार: राजगढ़ी से शुरू हुई यही 'आजाद पंचायत' और आन्दोलन धीरे-धीरे पूरे रवाँई परगने में फैल गया, जिसकी परिणति अंततः तिलाड़ी काण्ड में हुई।
3 आन्दोलन का उग्र रूप एवं शासक की कूटनीति (मई 1930)
- प्रथम हिंसक टकराव: आन्दोलन के दौरान ग्रामीणों ने SDM सुरेन्द्र दत्त को घेर लिया। बचाव में DFO पदमदत्त रतूड़ी ने गोली चला दी, जिससे 3 ग्रामीण मारे गए।
- धोखे से गिरफ्तारी: मई 1930 में राजा नरेन्द्र शाह ने वार्ता के बहाने आन्दोलनकारी नेताओं को बुलाया और उन्हें धोखे से गिरफ्तार कर लिया।
- राजा का यूरोप प्रवास: आन्दोलन जब अपने चरम पर था, तब महाराजा नरेन्द्र शाह स्वास्थ्य कारणों (इलाज) से यूरोप चले गए।
4 तिलाड़ी काण्ड: भीषण नरसंहार (30 मई 1930)
- नेताओं की गिरफ्तारी और वन अधिकारों के हनन के विरोध में रवाँई की जनता ने एक विशाल महापंचायत बुलाई।
- स्थान: यमुना नदी के तट पर स्थित तिलाड़ी मैदान।
- उपनाम: तिलाड़ी काण्ड को 'उत्तराखण्ड का जलियाँवाला बाग' कहा जाता है।
- नरसंहार: राजा नरेन्द्र शाह की अनुपस्थिति का फायदा उठाते हुए, टिहरी रियासत के दीवान (प्रधानमंत्री) चक्रधर जुयाल ने तिलाड़ी मैदान को चारों ओर से घेरकर निहत्थी भीड़ पर अंधाधुंध गोलियाँ चलवा दीं।
- हताहत: 200 से अधिक ग्रामीण शहीद हुए और 100 से अधिक घायल हुए। कई लोगों ने यमुना नदी में कूदकर अपनी जान बचाई।
- स्मृति: हर 30 मई को 'तिलाड़ी शहीद दिवस' मनाया जाता है।
'यमुना के बागी बेटे' — ऐतिहासिक उपन्यास
- लेखक (Author): विद्यासागर नौटियाल। (इन्हें 'उत्तराखंड का प्रेमचंद' भी कहा जाता है)।
- प्रकाशन: यह उपन्यास 2012 के आसपास प्रकाशित हुआ था।
- मुख्य विषय (Central Theme): यह उपन्यास पूरी तरह से टिहरी रियासत के रवाँई आन्दोलन और ऐतिहासिक तिलाड़ी काण्ड (30 मई 1930) की पृष्ठभूमि पर आधारित है।
06 चिपको आन्दोलन (1973)
पृष्ठभूमि एवं तात्कालिक कारण
- संस्थागत शुरुआत (1964): चण्डी प्रसाद भट्ट ने गोपेश्वर में 'दशोली ग्राम स्वराज्य मण्डल' (DGSM) की स्थापना की — आन्दोलन की वैचारिक व व्यावहारिक नींव।
- ऐतिहासिक प्रेरणा: खेजड़ली/विश्नोई आन्दोलन (1730, राजस्थान)।
- प्रकृति की चेतावनी: 1970 की अलकनन्दा बाढ़ (400 वर्गमील क्षेत्र जलमग्न) ने वन-कटान व बाढ़/भूस्खलन का सीधा संबंध उजागर किया।
- तात्कालिक कारण (अंगू वृक्ष विवाद): DGSM ने कृषि उपकरण (हल-जूआ) हेतु 'अंगू (Ash)' पेड़ों की माँग की — अस्वीकृत। इसके विपरीत इलाहाबाद की 'साइमण्ड' कम्पनी (खेल सामग्री निर्माता) को 300 अंगू पेड़ काटने का ठेका दे दिया गया।
प्रमुख नेतृत्वकर्ता एवं उनका योगदान
चिपको आन्दोलन के प्रमुख चेहरों को उनकी भूमिका, घटनाक्रम और परीक्षा-योग्य उपलब्धियों के साथ पढ़ें।
चंडी प्रसाद भट्ट
मुख्य रणनीतिकार1973 में मंडल घाटी के ग्रामीणों को 'पेड़ों से चिपकने' की अहिंसक रणनीति दी।
गौरा देवी
'चिपको वुमन'रैणी गाँव के 'महिला मंगल दल' की अध्यक्षा।
- 25 मार्चगाँव के पुरुषों को मुआवजे के बहाने चमोली बुला लिया गया।
- 26 मार्चठेकेदारों के आने पर 27 महिलाओं को एकत्रित किया।
- परिणामइन महिलाओं ने 2451 पेड़ों को बाहों में घेरकर कटने से बचा लिया।
साहसिक कथन“यह जंगल हमारा मायका है, पहले हमें गोली मारो, फिर कुल्हाड़ी चलाओ।”
गौरा देवी को ‘वृक्ष मित्र’ पुरस्कार मिला।
सुंदरलाल बहुगुणा
वैश्विक प्रचारकआंदोलन को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय (UNO आदि) मंचों तक पहुँचाया।
वनों की रक्षा हेतु कश्मीर से कोहिमा तक 5,000 किमी लंबी 'ट्रांस-हिमालयन पदयात्रा' की।
1981: पद्मश्री ठुकराई — “जब तक पेड़ कट रहे हैं, मैं सम्मान के योग्य नहीं हूँ।”
2009: पद्म विभूषण सम्मान स्वीकारा।
अन्य विशिष्ट चेहरे
स्थानीय नेतृत्व एवं जनभागीदारीकॉमरेड गोविंद सिंह रावत (CPI नेता)
- रैणी गाँव में पुरुषों की अनुपस्थिति में गौरा देवी का रणनीतिक साथ दिया।
- विरोध स्वरूप जोशीमठ–मलारी मार्ग को जाम किया।
धूम सिंह नेगी
अडवाणी वन (हेंवलघाटी) में वनों की रक्षा हेतु आमरण अनशन किया।
बचनी देवी (1977)
- अडवाणी वन क्षेत्र में पेड़ों का ठेका लेने वाले अपने ही ग्राम प्रधान पति के विरुद्ध विद्रोह किया।
- अन्य महिलाओं के साथ मिलकर पेड़ों पर रक्षासूत्र बाँधे।
घनश्याम रतूड़ी ‘शैलानी’ जनकवि
सांस्कृतिक प्रचारक — जनगीतों के माध्यम से चिपको आन्दोलन का संदेश गाँव-गाँव पहुँचाया।
चिपको आन्दोलन: प्रमुख घटनाएँ एवं कालक्रम
उत्तराखंड के इतिहास में चिपको आंदोलन का क्रमिक विकास इस प्रकार रहा है:
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प्रथम प्रतिरोध
मण्डल गाँव चमोली
घटना'दशोली ग्राम स्वराज्य मण्डल' (DGSM) के नेतृत्व में स्थानीय लोगों ने साइमण्ड कम्पनी द्वारा 'अंगू' वृक्षों के कटान का विरोध किया।
परिणामयह चिपको आन्दोलन की पहली व्यावहारिक और सफल शुरुआत थी। वन विभाग को ठेका रद्द करना पड़ा।
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आन्दोलन का चरमोत्कर्ष
रैणी गाँव चमोली
घटनावन विभाग द्वारा 2451 पेड़ों की नीलामी की गई। पुरुषों की अनुपस्थिति में गौरा देवी ने 27 महिलाओं का नेतृत्व किया।
कार्यवाहीमहिलाओं ने पेड़ों से चिपक कर ठेकेदारों को वापस जाने पर मजबूर कर दिया। यह चिपको आन्दोलन की सबसे प्रसिद्ध और निर्णायक घटना मानी जाती है।
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वन पहरा
फाटा-फडांग वन केदारनाथ घाटी
घटनामण्डल गाँव से ठेका रद्द होने के बाद साइमण्ड कम्पनी को फाटा के जंगलों में कटान का ठेका दिया गया।
कार्यवाहीस्थानीय महिलाओं और DGSM के कार्यकर्ताओं ने कड़कड़ाती ठंड में दिन-रात जंगलों में पहरा देकर वन कटान को सफलतापूर्वक रोका।
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रक्षासूत्र का प्रयोग
अडवाणी वन हेंवलघाटी, टिहरी
घटनाग्राम प्रधान (जो स्वयं वन ठेकेदार थे) के विरुद्ध उनकी पत्नी बचनी देवी ने महिलाओं के साथ मिलकर खुला विद्रोह किया।
कार्यवाहीमहिलाओं ने पेड़ों को कटने से बचाने के लिए उन पर 'रक्षासूत्र' (पवित्र धागा) बाँधे।
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हिमालय बचाओ यात्रा
सुन्दरलाल बहुगुणा की यात्रा टिहरी क्षेत्र
घटनाटिहरी क्षेत्र से सुन्दरलाल बहुगुणा ने वनों के प्रति जन-जागरूकता हेतु यात्रा प्रारम्भ की।
प्रसिद्ध पारिस्थितिक नारा“क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार। मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार।”
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वन माफिया का प्रतिरोध
पुलना गाँव भ्यूंडार घाटी
घटनाफूलों की घाटी (Valley of Flowers) के निकट स्थित पुलना गाँव में वन माफिया का प्रवेश हुआ।
कार्यवाहीस्थानीय महिलाओं ने अत्यंत उग्र रूप धारण करते हुए ठेकेदारों व वन माफियाओं के कुल्हाड़ी और अन्य औजार जब्त कर लिए।
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ऐतिहासिक राजनीतिक जीत
हरे वृक्षों के कटान पर ऐतिहासिक प्रतिबंध
घटनासुन्दरलाल बहुगुणा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी से मुलाकात कर हिमालयी वनों की स्थिति से अवगत कराया।
परिणामहिमालयी क्षेत्र में 1000 मीटर से अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों में हरे पेड़ों के व्यावसायिक कटान पर 15 वर्ष के लिए पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया गया। यह आन्दोलन की सबसे बड़ी राजनीतिक जीत थी।
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ट्रांस-हिमालयन पदयात्रा
कश्मीर से कोहिमा 5,000 किलोमीटर
घटनावनों के विनाश के प्रति वैश्विक और राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित करने हेतु सुन्दरलाल बहुगुणा द्वारा कश्मीर से कोहिमा तक 5,000 किलोमीटर की लंबी पदयात्रा की गई।
नारे एवं साहित्य
- प्रारम्भिक नारा (1973): "हिम पुत्रियों की ललकार, वन नीति बदले सरकार।"
- सर्वप्रसिद्ध नारा (1977, हेंवलघाटी): "क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार — मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार।"
- बहुगुणा जी का वैश्विक नारा: "पारिस्थितिकी ही स्थायी अर्थव्यवस्था है।" (Ecology is permanent economy)
- जनकवि घनश्याम रतूड़ी 'शैलानी': गीतों से आन्दोलन में प्राण फूंके — "गले लगाओ इन पेड़ों को, इन्हें न कटने देना" व "आज हिमालय जागेगा, क्रूर कुल्हाड़ा भागेगा।"
- ऐतिहासिक संदर्भ पुस्तक:
- 'The Unquiet Woods' — लेखक रामचन्द्र गुहा; चिपको व उत्तराखण्ड वन आन्दोलनों का सर्वाधिक प्रामाणिक दस्तावेज़।
- ‘The Chipko Movement: A People’s History’ — लेखक शेखर पाठक।
- ‘हरी भरी उम्मीद’ — लेखक शेखर पाठक।
जाँच समिति, परिणाम एवं वैश्विक प्रभाव
रैणी की निर्णायक घटना के बाद चिपको आन्दोलन का प्रभाव जाँच, वन नीति, पुरस्कार और वैश्विक पर्यावरण आंदोलनों तक क्रमशः पहुँचा।
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रैणी घटना के बादजाँच समिति
वीरेन्द्र कुमार समिति
गठनतत्कालीन CM हेमवती नन्दन बहुगुणा ने वनस्पति विज्ञानी डॉ. वीरेन्द्र कुमार की अध्यक्षता में जाँच समिति बनाई।
परिणामइसी रिपोर्ट के आधार पर अलकनन्दा घाटी में वन कटान पर रोक लगी।
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15 वर्षीय प्रतिबन्ध
हरे वृक्षों की व्यावसायिक कटाई पर रोक
निर्णयPM इन्दिरा गाँधी ने हिमालयी क्षेत्र में हरे वृक्षों की व्यावसायिक कटाई पर 15 वर्षों का पूर्ण प्रतिबन्ध लगाया।
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प्रेरित आन्दोलन
अप्पिको आन्दोलन कर्नाटक
प्रभावपाण्डुरंग हेगड़े के नेतृत्व में चला अप्पिको आन्दोलन चिपको से ही प्रेरित था।
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वृक्ष मित्र पुरस्कार
इन्दिरा प्रियदर्शिनी वृक्ष मित्र पुरस्कार
सम्मानरैणी गाँव की 30 'महिला मंगल दल' सदस्याओं को इन्दिरा प्रियदर्शिनी वृक्ष मित्र पुरस्कार मिला।
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अंतरराष्ट्रीय सम्मान
अल्टरनेटिव नोबेल
सम्मानचिपको आन्दोलन को Right Livelihood Award ('Alternative Nobel Prize') से सम्मानित किया गया।
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नीतिगत प्रभाव
राष्ट्रीय वन नीति
प्रभावराष्ट्रीय वन नीति के निर्माण पर चिपको आन्दोलन का स्पष्ट प्रभाव पड़ा।
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वैश्विक मंच
पृथ्वी सम्मेलन रियो डि जेनेरियो
वैश्विक प्रभावरियो डि जेनेरियो के 'पृथ्वी सम्मेलन' में चिपको की आधिकारिक वैश्विक सराहना हुई।
07 पर्वतीय वन संघर्ष समिति (1974)
- गठन तिथि: 4 सितम्बर 1974।
- स्थान: अल्मोड़ा।
- प्रथम अध्यक्ष: गोबिन्द सिंह।
- प्रमुख घटना (1977): वनों की नीलामी के सख्त विरोध में इस समिति द्वारा नैनीताल के 'शैलेहॉल' को फूंक (आग के हवाले कर) दिया गया। यह इस समिति का सबसे उग्र और ऐतिहासिक आन्दोलन था।
08 खीराकोट आन्दोलन (1978)
- स्थान: खीराकोट गाँव (अल्मोड़ा और कौसानी के मध्य)।
- नेतृत्व: मालती देवी (मुख्य नेत्री)। इन्हें लक्ष्मी आश्रम की राधा भट्ट और चिपको नेता चंडी प्रसाद भट्ट का भी सक्रिय सहयोग प्राप्त हुआ।
- विरोध का कारण: कानपुर की 'कटियार मिनरल्स कम्पनी' द्वारा किया जा रहा खड़िया (खनिज) खनन, जिससे स्थानीय कृषि भूमि और जंगल तेजी से नष्ट हो रहे थे।
- प्रमुख घटनाक्रम (1981): मूसलाधार बारिश के कारण खदानों का खड़िया युक्त मलबा खेतों में बहकर आ गया, जिससे पूरे खेत बर्फ की तरह सफेद और बंजर हो गए।
- परिणाम: महिलाओं के एकजुट और सशक्त विरोध के आगे कम्पनी को झुकना पड़ा और खड़िया खनन पूर्णतः बंद करवा दिया गया। इस प्रकार ग्रामीणों की भूमि व आजीविका की रक्षा हुई।
09 डुंगी-पैंतोली आन्दोलन (1980)
- क्षेत्र व कारण: चमोली के डुंगी व पैंतोली गाँव में बाँज वनों को उद्यान विभाग को हस्तान्तरित करने से ग्रामीणों के अधिकार खतरे में आ गये।
- मथुरा देवी के नेतृत्व में गाँव की महिलाओं ने सामूहिक विरोध किया।
- महिलाओं ने वन में प्रवेश कर कटान रोका — सरकार को निर्णय वापस लेना पड़ा।
- यह चिपको का ही कुमाऊँ-गढ़वाल क्षेत्र में विस्तार था।
10 पाणी राखो आन्दोलन (1980 का दशक)
- सूत्रधार: सच्चिदानन्द भारती
- क्षेत्र: उपरेखाल गाँव (पौड़ी गढ़वाल)
- संस्था: दूधातोली लोक विकास संस्थान (DLVS), स्थापना वर्ष 1982
- उद्देश्य: वन कटान के कारण सूख चुके जलस्रोतों का पुनर्जीवन।
- प्रमुख कार्य: वर्षा जल संरक्षण हेतु पहाड़ों पर परम्परागत 'चाल-खाल' (जल संचय गड्ढों) का वृहद निर्माण। इसके तहत 136 गाँवों में 12,000 से अधिक चाल-खाल बनाए गए।
- उपलब्धि: 150 गाँवों की महिलाओं के सक्रिय सहयोग से मृतप्राय 'सुखराउला' नदी का सफल पुनर्जीवन (2001)।
- विशेष: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 'मन की बात' (जून 2021) में सच्चिदानन्द भारती के जल संरक्षण कार्यों की सराहना की गई।
11 बीज बचाओ आन्दोलन (1986–89)
- प्रवर्तक: विजय जड़धारी
- क्षेत्र: जड़धार गाँव (टिहरी गढ़वाल)
- कारण: हरित क्रान्ति के दुष्प्रभावों से विलुप्त हो रहे पर्वतीय क्षेत्रों के परम्परागत बीजों का संरक्षण।
- प्रमुख पद्धति: 'बारहनाजा' कृषि पद्धति का पुनर्जीवन — एक ही खेत में धान, मडुवा, राजमा आदि 12 प्रकार के अनाजों की मिश्रित बुवाई।
- उपलब्धि: 700 से अधिक परम्परागत बीजों का सफल संरक्षण। वर्ष 2002 में प्रख्यात लेखिका अरुन्धती रॉय द्वारा इस आन्दोलन को आर्थिक समर्थन दिया गया।
- सम्मान: इन्दिरा गाँधी पर्यावरण पुरस्कार (2009)।
12 रक्षासूत्र आन्दोलन (1994)
- प्रवर्तक: सुरेश भाई
- क्षेत्र: खव्वाड़ा गाँव (भिलंगना घाटी, टिहरी गढ़वाल)
- स्वरूप: वन संरक्षण को सांस्कृतिक एवं धार्मिक आधार प्रदान करते हुए, वृक्षों को कटान से बचाने हेतु उन पर पवित्र 'रक्षासूत्र' बाँधकर उनकी सुरक्षा का संकल्प लेना।
- नारा: "ऊँचाई पर पेड़ रहेंगे, नदी ग्लेशियर टिके रहेंगे। पेड़ कटेंगे पहाड़ टूटेंगे, जंगल बचेगा देश बचेगा।"
13 मैती आन्दोलन (1995)
- प्रारम्भ वर्ष: 1995
- स्थान: ग्वालदम (चमोली)
- संस्थापक: कल्याण सिंह रावत
- 'मैती' का अर्थ: गढ़वाली बोली में 'मैती' का अर्थ 'मायका' (माँ का घर) होता है।
- प्रमुख परम्परा: विवाह समारोह के दौरान वर-वधू द्वारा वधू के मायके (मैती) में एक फलदार या छायादार वृक्ष लगाने की परम्परा।
- मैती संगठन व कोष: गाँव की अविवाहित युवतियों का एक 'मैती संगठन' होता है। वर द्वारा इन 'मैती दीदियों' को वृक्ष की देखभाल हेतु कुछ धनराशि दी जाती है, जो 'मैती कोष' में जमा होती है। इस कोष का उपयोग गाँव के सामाजिक कार्यों (जैसे निर्धन कन्याओं के विवाह) में किया जाता है।
- विस्तार: वर्तमान में यह आन्दोलन भारत के 18 से अधिक राज्यों के साथ-साथ कनाडा, अमेरिका, यूके, नेपाल और इंडोनेशिया तक फैल चुका है।
14 झपटो-छीनो आन्दोलन (1998)
- प्रारम्भ तिथि: 21 जून 1998
- मुख्य क्षेत्र: लाता गाँव और रैणी गाँव (चमोली) — नन्दा देवी राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र।
- प्रेरणा स्रोत: कामरेड गोविन्द सिंह रावत
- आन्दोलन का कारण: वर्ष 1982 में नन्दा देवी क्षेत्र को 'राष्ट्रीय उद्यान' घोषित किए जाने के कारण स्थानीय ग्रामीणों के वनों से जड़ी-बूटियाँ चुगने और बुग्यालों में पशु चराने के पारंपरिक अधिकार पूर्णतः समाप्त कर दिए गए थे।
- प्रमुख घटनाक्रम:
- 21 जून 1998: लाता गाँव में ग्रामीणों ने धरना प्रारम्भ किया और मांग रखी कि नन्दा देवी राष्ट्रीय उद्यान का प्रबन्धन ग्रामीणों को सौंपा जाए।
- 15 जुलाई 1998: प्रशासन द्वारा मांगें न माने जाने पर ग्रामीण अपने पशुओं के साथ जबरन राष्ट्रीय उद्यान के प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश कर गए।
- ऐतिहासिक महत्व: वनों पर स्थानीय जनता के अधिकारों की बहाली के इस आन्दोलन ने ही भविष्य में भारत के 'वन अधिकार अधिनियम, 2006' (Forest Rights Act, 2006) की पृष्ठभूमि तैयार की।