उत्तराखंड वन एवं वन्यजीव · लेख 3

उत्तराखंड के वन प्रकार एवं वन पंचायत

वनों के प्रशासनिक, कानूनी और ऊंचाई-आधारित वर्गीकरण से लेकर 8 प्रमुख वन प्रकार, वैज्ञानिक नाम और वन पंचायत की ऐतिहासिक व प्रशासनिक व्यवस्था तक।

4 अध्ययन खंडलेख 3 / 5UKPSC · UKSSSC

01 उत्तराखंड के वनों का वर्गीकरण

01 प्रबंधन एवं नियंत्रण के आधार पर / प्रशासनिक वर्गीकरण

वन विभाग (Forest Department)

सबसे बड़ा प्रशासनिक हिस्सा। मुख्य रूप से आरक्षित वनों का प्रबंधन करता है।

70.46%वन क्षेत्र
वन पंचायतें (Van Panchayats)

स्थानीय समुदायों द्वारा प्रबंधित (शुरुआत: 1931)। यह अनूठी व्यवस्था केवल उत्तराखंड में है।

15.32%वन क्षेत्र
राजस्व विभाग (Revenue Department)

इन्हें 'सिविल-सोयम वन' कहते हैं। ग्रामीणों को पारंपरिक अधिकार प्राप्त हैं।

13.76%वन क्षेत्र
निजी, नगर पालिका एवं छावनी बोर्ड

व्यक्तिगत संपत्तियां, नगर पालिका क्षेत्र या सैन्य छावनी परिषदों के अधीन आने वाले छोटे वन।

0.46%वन क्षेत्र

03 ऊंचाई के आधार पर / वनावरण का भौगोलिक वितरण

ISFR के Digital Elevation Model (DEM) पर आधारित डेटा · कुल 6 ऊंचाई क्षेत्र

ऊंचाई ज़ोनवन क्षेत्रहिस्सा
0 – 500 मी.
2,827.73 वर्ग किमी
11.63%
500 – 1000 मी.
3,937.41 वर्ग किमी
16.20%
1000 – 2000 मी.मुख्य वन-पट्टा
10,027.08 वर्ग किमी
41.26%
2000 – 3000 मी.
5,738.04 वर्ग किमी
23.61%
3000 – 4000 मी.
1,760.63 वर्ग किमी
7.24%
> 4000 मी.
12.94 वर्ग किमी
0.05%
कुल योग24,303.83 वर्ग किमी100%
सर्वाधिक वन1000–2000 मीटर · 41.26% · 10,027 वर्ग किमी

यह उत्तराखंड का मुख्य वन-पट्टा है जहाँ बाँज, बुरांस व चीड़ के घने जंगल हैं।

02 ऊंचाई के अनुसार 8 प्रमुख वन प्रकार

Quick Recall

ऊंचाई के अनुसार वन-क्रम

ऊंचाई, वर्षा, वन प्रकार और प्रमुख वृक्षों की त्वरित तुलना
ऊंचाईवर्षावन प्रकारवृक्ष / प्रजातियां
< 1,000 मी70–100 सेमी1. उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन
(Tropical Dry Deciduous)
खैर, शीशम, गूलर, ढाक/पलाश, बेल, अमलतास
< 1,000 मी100–200 सेमी2. उष्णकटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन
(Tropical Moist Deciduous)
साल, सागौन*, सेमल, महुआ, जामुन, शहतूत, आंवला
900 – 1,800 मी100–200 सेमी3. उपोष्ण कटिबंधीय चीड़ वन
(Sub-Tropical Pine Forests)
चीड़ (मुख्य), बांज ओक व काफल (मिश्रित)
1,800 – 3,000 मी150–250 सेमी4. हिमालयी नम शीतोष्ण वन
(Himalayan Moist Temperate)
बांज, बुरांश, काफल, मेपल
2,000 – 3,400 मी100–250 सेमी5. शीतोष्ण कोणधारी वन
(Temperate Coniferous Forests)
देवदार, फर, ब्लू पाइन, बुरांश, स्प्रूस, साइप्रस/सुरई
2,900 – 3,500 मीकम (हिम रूप)6. उप-अल्पाइन वन
(Sub-Alpine Forests)
भोजपत्र, जूनीपर, बौने रोडोडेंड्रोन, विलो
3,500 – 4,500 मीकम (हिम रूप)7. अल्पाइन झाड़ियां / बुग्याल
(Alpine Scrub / Meadows)
अल्पाइन घास, ब्रह्मकमल, कीड़ा जड़ी/यार्सागूंबा, जटामांसी, अतीस, कुटकी
4,500+ मीनगण्य8. टुंड्रा तुल्य वनस्पति
(Dry Alpine / Tundra-like)
काई, लाइकेन
परीक्षा युक्ति: ऊंचाई क्रम याद रखें: खैर/शीशम — साल/सागौन — चीड़ — बांज/बुरांश — देवदार/फर — भोजपत्र — ब्रह्मकमल — काई-लाइकेन। कुल 8 प्रकार — यही क्रम UKPSC/UKSSSC में सीधे पूछा जाता है। (*सागौन देशज नहीं, केवल प्लांटेशन वृक्ष है — नीचे देखें)
Exam Focus

उत्तराखंड वन एवं वनस्पति: महत्वपूर्ण तथ्य

वनों के प्रकार:

  • ऊंचाई के आधार पर उत्तराखंड में कुल 8 प्रकार के वन पाए जाते हैं।

प्रमुख वृक्ष-आच्छादन (FSI डेटा):

  • प्रथम स्थान: चीड़ — लगभग 28.24% वन क्षेत्र।
  • द्वितीय स्थान: शिवालिक साल — लगभग 12.8% वन क्षेत्र।

राज्य प्रतीक एवं उनकी ऊंचाई:

  • राज्य वृक्ष: बुरांश (Rhododendron arboreum) — 1500 से 4000 मीटर की ऊंचाई पर।
  • राज्य पुष्प: ब्रह्मकमल (Saussurea obvallata) — 3500 से 4800 मीटर की ऊंचाई पर।

परीक्षा उपयोगी विशेष तथ्य:

  • अपवाद: उत्तराखंड में उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन (Tropical Evergreen Forests) नहीं पाए जाते हैं।
  • सागौन (Teak): यह उत्तराखंड का मूल (देशज) वृक्ष नहीं है; इसे मुख्यतः तराई-भाबर क्षेत्र में वन विभाग द्वारा प्लांटेशन के रूप में लगाया गया है।

01 उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन (Tropical Dry Deciduous)

ऊंचाई< 1,000 मी (सीमा: 1,200 मी)
वर्षा70 – 100 सेमी

क्षेत्र:

  • भाबर का शुष्क भाग
  • शिवालिक निचली ढलानें
  • यमुना–अगलार संगम
  • कंडी क्षेत्र

कंडी क्षेत्र: शिवालिक और भाबर के मध्य का कंकरीला-पथरीला भाग — यहां मुख्यतः शुष्क पर्णपाती वन पाए जाते हैं।

मुख्य वृक्ष:

  • खैरअकेसिया कैटेचू
  • शीशमडालबर्जिया सिस्सू
  • गूलरफाइकस रेसीमोसा
  • ढाक / पलाशब्यूटिया मोनोस्पर्मा

अन्य प्रजातियां:

  • बेल
  • अमलतास

आर्थिक महत्व

  • खैर: तने से 'कत्था' (Catechu) — हल्द्वानी प्रमुख केंद्र।
  • शीशम: उच्च गुणवत्ता फर्नीचर व नक्काशी।

पारिस्थितिक महत्व

  • शुष्क/पथरीली भाबर मिट्टी में अपरदन रोकते हैं।
  • पत्ते जनवरी–मार्च में झड़ते हैं — घास मैदान जैसे दिखते हैं।
  • अत्यधिक सूखे को सहने में सक्षम।

एग्जाम पॉइंट्स:

  • कत्था उत्पादन का स्रोत = खैर वृक्ष
  • 'कंडी' क्षेत्र में मुख्य वन = शुष्क पर्णपाती
  • 'जंगल की आग' (Flame of the Forest) = ढाक / पलाश

02 उष्णकटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन (Tropical Moist Deciduous)

ऊंचाई< 1,000 मी
वर्षा100 – 200 सेमी

क्षेत्र:

  • दून घाटी
  • तराई-भाबर
  • देहरादून
  • नैनीताल (निचला भाग)
  • ऊधमसिंह नगर

मुख्य वृक्ष:

  • सालशोरिया रोबस्टाप्राकृतिक प्रमुख वृक्ष
  • सागौनटेक्टोना ग्रैंडिसकेवल वन विभाग प्लांटेशन, देशज नहीं
  • सेमलबॉम्बैक्स सीबा
  • महुआमधुका लॉन्गिफोलिया
  • जामुनसाइज़ियम क्यूमिनी

अन्य प्रजातियां:

  • शहतूत
  • आंवला

आर्थिक महत्व

  • सागौन: महंगे फर्नीचर — दीमक-प्रतिरोधी (termite-resistant)।
  • शहतूत: पत्तियां रेशम पालन (Sericulture) में उपयोग।

पारिस्थितिक महत्व

  • सघन कैनोपी — जैव विविधता में समृद्ध (राजाजी नेशनल पार्क का कोर क्षेत्र)।
  • राज्य के प्रमुख National Parks का मुख्य हिस्सा।
  • पत्तियां मार्च–अप्रैल (6–8 सप्ताह) गिरती हैं, मानसून में फिर हरे-भरे।

एग्जाम पॉइंट्स:

  • 'मानसूनी वन' (Monsoon Forests) = आर्द्र पर्णपाती वन — MCQ में बहुत पूछा जाता है।
  • दीमक-प्रतिरोधी मूल्यवान लकड़ी = सागौन (Teak)

03 उपोष्ण कटिबंधीय चीड़ वन (Sub-Tropical Pine Forests)

ऊंचाई900 – 1,800 मी (कुछ ढलानों पर 2,150 मी तक)
वर्षा100 – 200 सेमी

क्षेत्र:

  • मध्य हिमालय
  • शिवालिक ऊपरी भाग
  • राज्य के विशाल भूभाग में (सबसे व्यापक)

मुख्य वृक्ष:

  • चीड़पाइनस रॉक्सबर्गी

मिश्रित प्रजातियां:

  • बांज ओकक्वेरकस ल्यूकोट्राइकोफोरानम घाटी/ऊपरी सीमा पर मिश्रित
  • काफलमिरिका एस्कुलेंटानिचले हिस्सों में मिश्रित

आर्थिक महत्व

  • लीसा (Resin) — तारपीन तेल व अन्य उत्पाद — चीड़ इसका एकमात्र स्रोत।
  • इमारती लकड़ी — पैकेजिंग (फलों की पेटियां), दरवाजे-खिड़कियां।

पारिस्थितिक महत्व

  • 'पिरूल' (सूखी पत्तियां) अत्यधिक ज्वलनशील — वनाग्नि का मुख्य कारण।
  • मिट्टी को अम्लीय बनाता है — नीचे घास/चारा उगना घट जाता है।
  • 'पायनियर' प्रजाति — बंजर चट्टान व सूखी मिट्टी पर भी सबसे पहले उगता है।

एग्जाम पॉइंट्स:

  • राज्य के कुल वन क्षेत्र का सर्वाधिक भाग (लगभग 28.24%) चीड़ वनों से आच्छादित — FSI डेटा।
  • लीसा (Resin) का स्रोत = चीड़
  • वनाग्नि का मुख्य मौसम = मध्य-फरवरी से मध्य-जून
  • TRAP: चीड़ 'उपोष्ण' (Sub-Tropical) है — इसे देवदार/फर के 'शीतोष्ण' (Temperate) कोणधारी वनों से कन्फ्यूज न करें।

04 हिमालयी नम शीतोष्ण वन (Himalayan Moist Temperate)

ऊंचाई1,800 – 3,000 मी
वर्षा150 – 250 सेमी

क्षेत्र:

  • चमोली
  • रुद्रप्रयाग
  • पिथौरागढ़
  • अल्मोड़ा (ऊपरी भाग)
  • नैनीताल (ऊपरी भाग)

मुख्य वृक्ष:

  • बांजक्वेरकस प्रजाति
  • बुरांशरोडोडेंड्रॉन आर्बोरियम
  • काफलमिरिका एस्कुलेंटानिचली/तटीय पट्टी

अन्य प्रजातियां:

  • मेपल

उत्तराखंड में बांज (Oak) की 5 प्रमुख प्रजातियां — 'हरा सोना'

उत्तराखंड में बांज की पांच प्रमुख प्रजातियां, वैज्ञानिक नाम, ऊंचाई और पहचान
स्थानीय नाम वैज्ञानिक नाम ऊंचाई पहचान
बांज Q. leucotrichophora 1,500–2,400 मी सबसे आम — चारा/ईंधन
मोरू / तिलोंज Q. floribunda 2,000–2,700 मी कठोर लकड़ी
खर्सू Q. semecarpifolia 2,500–3,300 मी सबसे अधिक ऊंचाई पर
रियांज Q. lanata (syn. Q. lanuginosa) मध्य पट्टी अपेक्षाकृत कम पाया जाता है
फल्यांट / हरींज Q. glauca नम घाटियां नदी-नालों के किनारे
'जल बैंक' (Water Banks) — बांज की जड़ें स्पंज की तरह पानी सोखती हैं, जो गर्मियों में प्राकृतिक जलस्रोतों (नौले-धारे) को रीचार्ज करती हैं।

आर्थिक महत्व

  • बांज: उत्तम चारा (Fodder) + कृषि उपकरणों (हल) की टिकाऊ लकड़ी।
  • बुरांश: फूलों से जूस/स्क्वैश — हृदय रोगों में लाभदायक, स्थानीय रोजगार।

पारिस्थितिक महत्व

  • चौड़ी पत्तियां गिरकर बेहतरीन खाद (Humus) बनाती हैं।
  • बांज का फल 'एकॉर्न' — जंगली भालू व काकड़ का मुख्य भोजन।
  • बुरांश रंग: 1,500–2,500 मी लाल, 2,500–3,000 मी गुलाबी, 3,000 मी+ सफेद।

एग्जाम पॉइंट्स:

  • राज्य वृक्ष = बुरांश | राज्य पुष्प = ब्रह्मकमल — दोनों अलग-अलग हैं।
  • रक्षा सूत्र आंदोलन (1994) — टिहरी की भिलंगना घाटी, नेतृत्व सुरेश भाई — बांज मिश्रित वन बचाने हेतु।
  • मीरा बेन — 'चीड़ के स्थान पर बांज' उगाने का अभियान चलाया।

05 शीतोष्ण कोणधारी वन (Temperate Coniferous Forests)

ऊंचाई2,000 – 3,400 मी
वर्षा100 – 250 सेमी (भारी हिमपात)

क्षेत्र:

  • उत्तरकाशी
  • चमोली
  • पिथौरागढ़
  • अल्मोड़ा (जागेश्वर धाम)

ऊंचाई के साथ वृक्ष-क्रम

2,000–2,700 मी देवदार (Deodar)
2,700–3,400 मी फर (Fir) — देवदार से भी ऊंचा

मुख्य वृक्ष:

  • देवदारसीड्रस देवदारा
  • फरएबीज़ पिंड्रो
  • ब्लू पाइनपाइनस वालिचियाना
  • बुरांशरोडोडेंड्रॉन आर्बोरियम

अन्य प्रजातियां:

  • स्प्रूस
  • साइप्रस / सुरई

आर्थिक महत्व

  • देवदार: टिकाऊ सुगंधित लकड़ी — मंदिर निर्माण, नक्काशी, रेलवे स्लीपर।
  • औषधीय तेल — पारंपरिक चिकित्सा व कीट-प्रतिरोधी उपयोग।

पारिस्थितिक महत्व

  • शंक्वाकार आकार — भारी बर्फ शाखाओं पर नहीं टिकती, पेड़ नहीं टूटते।
  • ठंडी/बर्फीली हवाओं से पहाड़ों व वन्यजीवों का बचाव।
  • सुई-पत्तियां — कम वाष्पोत्सर्जन, ठंड व सूखा सहनशील।

एग्जाम पॉइंट्स:

  • देवदार = 'देवताओं का वृक्ष' (Tree of Gods)।
  • जागेश्वर धाम (अल्मोड़ा) — पूरी तरह देवदार वनों से घिरा।
  • TRAP: चीड़ उपोष्ण है, जबकि देवदार व फर शीतोष्ण कोणधारी — कन्फ्यूज न करें।

06 उप-अल्पाइन वन (Sub-Alpine Forests)

ऊंचाई2,900 – 3,500 मी
वर्षणकम — अधिकांश हिम रूप में

क्षेत्र:

  • चमोली
  • उत्तरकाशी
  • पिथौरागढ़ (उच्च हिमालयी भाग)

मुख्य वृक्ष:

  • भोजपत्रबेटुला यूटिलिस
  • जूनीपरजूनिपेरस मैक्रोपोडा

अन्य प्रजातियां:

  • बौने रोडोडेंड्रोन
  • विलो

आर्थिक महत्व

  • भोजपत्र: छाल का ऐतिहासिक उपयोग — पांडुलिपि लेखन हेतु 'कागज़'।
  • जूनीपर: धार्मिक धूप (Incense) व पारंपरिक औषधि।

पारिस्थितिक महत्व

  • यह क्षेत्र 'टिम्बरलाइन' बनाता है — इससे ऊपर बड़े वृक्ष नहीं उगते।
  • अत्यंत ठंडी व कठोर जलवायु के पूर्ण अनुकूलित प्रजातियां।

एग्जाम पॉइंट्स:

  • प्राचीन काल में लेखन हेतु प्रयुक्त वृक्ष-छाल = भोजपत्र
  • टिम्बरलाइन (~3,500 मी) के समीप प्रमुख वन = उप-अल्पाइन वन

07 अल्पाइन झाड़ियां / बुग्याल (Alpine Scrub / Meadows)

ऊंचाई3,500 – 4,500 मी
Snow Coverवर्ष के 6–8 माह

क्षेत्र:

  • चमोली — रूपकुंड, औली, वेदिनी
  • उत्तरकाशी — दयारा बुग्याल
  • पिथौरागढ़ — मुनस्यारी उच्च क्षेत्र

मुख्य वनस्पति:

  • अल्पाइन घासपूर्णतः वृक्ष-रहित क्षेत्र
  • ब्रह्मकमलसॉसुरिया ऑबवैलेटाराज्य पुष्प
  • कीड़ा जड़ी / यार्सागूंबाओफियोकॉर्डिसेप्स साइनेन्सिस

औषधीय जड़ी-बूटियां:

  • जटामांसी
  • अतीस
  • कुटकी

आर्थिक महत्व

  • भोटिया व गुज्जर जनजातियों का ग्रीष्मकालीन चारागाह (Transhumance)।
  • दुर्लभ व मूल्यवान औषधीय जड़ी-बूटियों का भंडार।

पारिस्थितिक महत्व

  • 'प्रकृति के स्पंज' — नमी सोखकर गर्मियों में धीरे-धीरे नदियों में छोड़ते हैं।
  • घनी घास परत मृदा को बांधे रखती है — भूस्खलन कम होता है।

एग्जाम पॉइंट्स:

  • बुग्यालों को कहते हैं = 'मखमली गलीचा' (कश्मीर में 'मर्ग', जैसे गुलमर्ग)।
  • ब्रह्मकमल = राज्य पुष्प, केवल बुग्यालों में जुलाई–सितंबर के बीच खिलता है।
  • कीड़ा जड़ी को कहते हैं = 'हिमालयी सोना' — विश्व की सबसे महंगी फफूंद-आधारित औषधियों में से एक।

08 टुंड्रा तुल्य वनस्पति (Dry Alpine / Tundra-like) — अंतिम प्रकार

ऊंचाई4,500 – 4,800+ मी
वर्षणनगण्य — अधिकांश हिम रूप में

क्षेत्र:

  • स्थायी हिमरेखा के ठीक नीचे
  • ऊंचे हिमालयी शिखरों के समीप चट्टानी भाग

मुख्य वनस्पति:

  • काई
  • लाइकेन

अन्य:

  • सेज (Sedge), अत्यधिक छोटी कुशन-जैसी घासें (ज़मीन से चिपकी)

आर्थिक महत्व

  • नगण्य — इस ऊंचाई पर व्यावसायिक दोहन संभव नहीं, वृद्धि अत्यंत धीमी।

पारिस्थितिक महत्व

  • प्राथमिक अनुक्रमण (Primary Succession) — लाइकेन नंगी चट्टानों को तोड़कर मिट्टी बनाते हैं।
  • चरम जलवायु (अत्यधिक ठंड, कम ऑक्सीजन) में जीवन का प्रतीक।

एग्जाम पॉइंट्स:

  • लाइकेन = वायु प्रदूषण (विशेषकर SO₂) का प्राकृतिक संकेतक
  • भारत का पहला लाइकेन पार्क = मुनस्यारी (पिथौरागढ़)
  • लाइकेन = कवक (Fungi) व शैवाल (Algae) का सहजीवी संबंध

03 प्रमुख वृक्ष प्रजातियां एवं वैज्ञानिक नाम

इस भाग में ऊपर वर्णित सभी वृक्ष प्रजातियों (शिवालिक से लेकर हिमरेखा तक) को उनके वैज्ञानिक नामों के साथ एक ही तालिका में संकलित किया गया है।

उत्तराखंड के प्रमुख वृक्षों के स्थानीय नाम, वैज्ञानिक नाम और वन प्रकार / पेटी
स्थानीय नामवैज्ञानिक नामवन प्रकार / पेटी
खैरAcacia catechuभाबर — शुष्क पर्णपाती
शीशमDalbergia sissooभाबर — शुष्क पर्णपाती
गूलरFicus racemosaभाबर — शुष्क पर्णपाती
ढाक / पलाशButea monospermaभाबर — शुष्क पर्णपाती
सालShorea robustaतराई — आर्द्र पर्णपाती (प्रमुख वृक्ष)
सागौनTectona grandisतराई — प्लांटेशन (देशज नहीं)
सेमलBombax ceibaतराई — आर्द्र पर्णपाती
महुआMadhuca longifoliaतराई — आर्द्र पर्णपाती
जामुनSyzygium cuminiतराई — आर्द्र पर्णपाती
चीड़Pinus roxburghiiशिवालिक/मध्य हिमालय — चीड़ वन
बांजQuercus leucotrichophoraमध्य हिमालय — बांज/शीतोष्ण वन
काफलMyrica esculentaमध्य हिमालय — मिश्रित पेटी
बुरांशRhododendron arboreumमध्य हिमालय / उप-अल्पाइन
देवदारCedrus deodaraउप-अल्पाइन शंकुधारी वन
फरAbies pindrowउप-अल्पाइन शंकुधारी वन
ब्लू पाइनPinus wallichianaउप-अल्पाइन शंकुधारी वन
भोजपत्रBetula utilisअल्पाइन झाड़ी सीमा (हिमरेखा के निकट)
जूनीपरJuniperus macropodaअल्पाइन झाड़ी सीमा

04 वन पंचायत

01 / 05

परिचय एवं प्रमुख आंकड़े

12,167+ कुल वन पंचायतें राज्य में वर्तमान
15.32% कुल वन क्षेत्र का हिस्सा ≈ 3,721 वर्ग किमी
1931 प्रथम नियम वर्ष कुमाऊं वन पंचायत नियम
एशिया सबसे पुराना CFM मॉडल Community Forest Mgmt.

वन पंचायत क्या है?

  • यह 'सामुदायिक वन प्रबंधन' (Community Forest Management) का एशिया का सबसे पुराना और सफल मॉडल है।
  • स्वामित्व: 'राज्य के स्वामित्व' और 'सामुदायिक जिम्मेदारी' का मिला-जुला अनूठा रूप।
  • यह व्यवस्था पूरे भारत में केवल उत्तराखंड में है।
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उत्तराखंड में ब्रिटिश वन प्रबंधन का इतिहास

1

प्रारंभिक वन प्रबंधन

ठेकेदारी से प्रारंभिक सरकारी वन-संरक्षण तक

अंग्रेजों ने वनों को ठेके (Contract) पर देना प्रारंभ किया। वन उपज और राजस्व वसूली का कार्य स्थानीय ठेकेदारों/जमींदारों को दिया जाता था।
कमिश्नर G.W. Traill ने साल (Sal) के वृक्षों की कटाई पर प्रतिबंध लगाया। थापला (Thapla) क्षेत्रों को वन-संरक्षण व्यवस्था से जोड़ा गया। इसे कुमाऊँ में प्रारंभिक सरकारी वन-संरक्षण प्रयास माना जाता है।
2

रैमजे काल एवं वन विभाग

प्रत्यक्ष सरकारी नियंत्रण और संस्थागत वन प्रशासन

सर हेनरी रैमजे ने वनों की ठेकेदारी प्रथा समाप्त की और वन प्रबंधन को प्रत्यक्ष सरकारी नियंत्रण में लाया।
रैमजे के समय वन प्रबंधन/बंदोबस्त की व्यवस्थित व्यवस्था प्रारंभ हुई। वृक्षारोपण तथा वन संरक्षण पर बल दिया गया।
भारत में Forest Department की स्थापना हुई। Dietrich Brandis प्रथम Inspector General of Forests बने।
प्रथम Indian Forest Act, 1865 पारित हुआ।
कुमाऊँ के वन Forest Department के नियंत्रण में आए। Major Pearson को वन प्रशासन की जिम्मेदारी दी गई।
Garhwal Forest Division को अलग प्रशासनिक इकाई के रूप में संगठित किया गया। प्रमुख क्षेत्र:
  • पाटली दून
  • कोटरी दून
  • चंडी
  • उदयपुर
Indian Forest Act, 1878 के तहत वनों को तीन श्रेणियों में बाँटा गया:
  1. Reserved Forest — आरक्षित वन
  2. Protected Forest — संरक्षित वन
  3. Village Forest — ग्राम वन
चीड़ से लीसा/Resin tapping का प्रारंभिक कार्य शुरू हुआ।
Resin tapping का व्यावसायिक स्तर पर विस्तार हुआ।
3

1893–1917 : वन नियंत्रण एवं बंदोबस्त

संरक्षित भूमि, आरक्षित वृक्ष और सिविल वन

बेनाप/सरकारी waste lands को District Protected Forests घोषित किया गया।
भारत की प्रथम वन नीति (First Forest Policy) घोषित हुई।
कुमाऊँ में आठ वृक्ष प्रजातियों को Reserved Trees घोषित किया गया:
देवदारसुरईचीड़पापड़ीसालशीशमतूनखैर

इन वृक्षों की कटाई को सरकारी नियंत्रण/अनुमति के अधीन किया गया।

बिना licence मछली पकड़ना प्रतिबंधित किया गया:
  • भीमताल
  • सातताल
  • नौकुचियाताल
  • मलुआ ताल
कुमाऊँ के Civil Forests को दो भागों में बाँटा गया: Closed Civil Forests और Open Civil Forests
4

Stiffe–Nelson Forest Settlement

1911–1917 का वन बंदोबस्त

वन बंदोबस्त के लिए Stiffe — Almora और Nelson — Garhwal नियुक्त हुए। Nainital क्षेत्र दोनों के बीच बाँटा गया।
Class A
Forest Department का कड़ा नियंत्रण। मुख्य उद्देश्य: Timber production, वन संरक्षण, स्थानीय timber आवश्यकता और surplus timber की बिक्री।
Class B
मुख्यतः ग्रामीण आवश्यकताओं हेतु—ईंधन, चारा, घास, चराई और Minor Forest Produce।
Class C
स्थानीय ग्रामीण उपयोग के लिए comparatively अधिक खुला क्षेत्र; Forest Department का नियंत्रण अपेक्षाकृत कम।

Exam Fact: बाद में Class-B का अधिकांश क्षेत्र Class-A में शामिल कर दिया गया, जिससे जन-असंतोष बढ़ा।

5

गढ़वाल वन प्रशासन

विभाजन, Working Plans और पुनः एकीकरण

गढ़वाल के वनों को प्रशासनिक रूप से दो वन प्रभागों में बाँटा गया: North Garhwal Forest Division और South Garhwal Forest Division
पाँच-वर्षीय Working Plans
North Garhwal — A. E. Osmaston
South Garhwal — M. P. Bhola
North और South Garhwal Forest Divisions का पुनः एकीकरण करके Garhwal Forest Division बनाया गया।

याद रखें: 1914 → विभाजन | 1934 → पुनः एकीकरण

6

वन आंदोलन एवं कुमाऊँ परिषद

वन-अधिकार, आंदोलन और शिकायत समिति

कुमाऊँ परिषद की स्थापना कुमाऊँ की सामाजिक, आर्थिक एवं प्रशासनिक समस्याओं के समाधान हेतु हुई। वन-अधिकार इसका प्रमुख मुद्दा बना। प्रमुख नेताओं में गोविंद बल्लभ पंत शामिल थे।
वन आंदोलन में दुर्गा देवी की गिरफ्तारी का उल्लेख मिलता है। स्थान—सोमेश्वर क्षेत्र के जंगल।
Forest Grievances Committee का गठन कुमाऊँ की वन समस्याओं एवं ग्रामीण शिकायतों की जाँच के लिए हुआ। अध्यक्ष—P. Wyndham / Percy Wyndham
  • P. Wyndham
  • R.G. Marriott
  • Lakshmi Datt Pande
  • Jodh Singh Negi
गोविंद बल्लभ पंत की पुस्तक The Forest Problem in Kumaon प्रकाशित हुई।
7

वन पंचायत

Community Forest से विधिक पंचायत व्यवस्था तक

Forest Grievances Committee की सिफारिशों के बाद Community Forest / Panchayat Forest व्यवस्था का अध्ययन किया गया। Kailash Gairola को मद्रास की व्यवस्था के अध्ययन से जोड़ा जाता है।
Kumaun Panchayat Forest Rules से उत्तराखंड में वन पंचायतों को विधिक आधार मिला। स्थानीय ग्राम समुदायों को निर्धारित Panchayat Forests के प्रबंधन का अधिकार मिला। नियम Scheduled Districts Act, 1874 की Section 6 के अंतर्गत बनाए गए।
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संरचना एवं कार्यप्रणाली

भूमि
सिविल / संरक्षित वन
भूमि का प्रकार — राजस्व अधीन
समिति
5–9 पंच
कुल सदस्य प्रति समिति
कार्यकाल
5 वर्ष
समिति का कार्यकाल (Tenure)
बैठक
4 बैठकें / वर्ष
अनिवार्य — हर तिमाही एक
प्रमुख
सरपंच
समिति प्रमुख — सदस्यों द्वारा
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महिला एवं SC/ST आरक्षण

महिला 50%

महिला आरक्षण

नियम 2005 के तहत समिति की 50% सीटें महिलाओं के लिए अनिवार्य हैं। 5–9 सदस्यों में से कम से कम 4–5 महिला सदस्य होना आवश्यक है।

SC/ST जनसंख्या अनुपात

SC/ST आरक्षण

ग्राम सभा की जनसंख्या के अनुपात में SC और ST के लिए सीटें आरक्षित। कोई निश्चित % नहीं — जनसंख्या-आधारित।

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जिलेवार रैंकिंग एवं अपवाद

वन पंचायतों की संख्या के आधार पर

वन पंचायतों की संख्या के आधार पर शीर्ष पांच जिले
रैंकजिलावन पंचायतें
1पौड़ी गढ़वाल2,212 वन पंचायतें
2अल्मोड़ा2,041 वन पंचायतें
3पिथौरागढ़1,516 वन पंचायतें
4चमोली1,345 वन पंचायतें
5टिहरी गढ़वाल1,290 वन पंचायतें

वन पंचायत क्षेत्रफल के आधार पर

वन पंचायत क्षेत्रफल के आधार पर शीर्ष पांच जिले
रैंकजिलाक्षेत्रफल
1चमोली3,18,477 हेक्टेयर
2पिथौरागढ़1,20,964 हेक्टेयर
3अल्मोड़ा50,597 हेक्टेयर
4पौड़ी गढ़वाल46,736 हेक्टेयर
5चंपावत30,834 हेक्टेयर
अपवाद — शून्य वन पंचायत वाले जिले
उत्तराखंड के हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर जिलों में एक भी वन पंचायत नहीं है।

कारण: वन पंचायत व्यवस्था मुख्य रूप से पर्वतीय क्षेत्रों (Hill areas) के वनों के प्रबंधन के लिए बनी है। हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर मैदानी जिले हैं।
श्रृंखलाउत्तराखंड वन एवं वन्यजीव
अंतिम संरचनात्मक अपडेट16 अगस्त 2026
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