उत्तराखंड के वन प्रकार एवं वन पंचायत
वनों के प्रशासनिक, कानूनी और ऊंचाई-आधारित वर्गीकरण से लेकर 8 प्रमुख वन प्रकार, वैज्ञानिक नाम और वन पंचायत की ऐतिहासिक व प्रशासनिक व्यवस्था तक।
01 उत्तराखंड के वनों का वर्गीकरण
01 प्रबंधन एवं नियंत्रण के आधार पर / प्रशासनिक वर्गीकरण
सबसे बड़ा प्रशासनिक हिस्सा। मुख्य रूप से आरक्षित वनों का प्रबंधन करता है।
स्थानीय समुदायों द्वारा प्रबंधित (शुरुआत: 1931)। यह अनूठी व्यवस्था केवल उत्तराखंड में है।
इन्हें 'सिविल-सोयम वन' कहते हैं। ग्रामीणों को पारंपरिक अधिकार प्राप्त हैं।
व्यक्तिगत संपत्तियां, नगर पालिका क्षेत्र या सैन्य छावनी परिषदों के अधीन आने वाले छोटे वन।
02 भारतीय वन अधिनियम, 1927 के आधार पर / वैधानिक-कानूनी वर्गीकरण
महत्वपूर्ण: यह अंतर इसलिए है क्योंकि RFA में वे क्षेत्र भी शामिल हैं जो वनावरण से रहित हैं।
03 ऊंचाई के आधार पर / वनावरण का भौगोलिक वितरण
ISFR के Digital Elevation Model (DEM) पर आधारित डेटा · कुल 6 ऊंचाई क्षेत्र
यह उत्तराखंड का मुख्य वन-पट्टा है जहाँ बाँज, बुरांस व चीड़ के घने जंगल हैं।
02 ऊंचाई के अनुसार 8 प्रमुख वन प्रकार
ऊंचाई के अनुसार वन-क्रम
| ऊंचाई | वर्षा | वन प्रकार | वृक्ष / प्रजातियां |
|---|---|---|---|
| < 1,000 मी | 70–100 सेमी | 1. उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन (Tropical Dry Deciduous) | खैर, शीशम, गूलर, ढाक/पलाश, बेल, अमलतास |
| < 1,000 मी | 100–200 सेमी | 2. उष्णकटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन (Tropical Moist Deciduous) | साल, सागौन*, सेमल, महुआ, जामुन, शहतूत, आंवला |
| 900 – 1,800 मी | 100–200 सेमी | 3. उपोष्ण कटिबंधीय चीड़ वन (Sub-Tropical Pine Forests) | चीड़ (मुख्य), बांज ओक व काफल (मिश्रित) |
| 1,800 – 3,000 मी | 150–250 सेमी | 4. हिमालयी नम शीतोष्ण वन (Himalayan Moist Temperate) | बांज, बुरांश, काफल, मेपल |
| 2,000 – 3,400 मी | 100–250 सेमी | 5. शीतोष्ण कोणधारी वन (Temperate Coniferous Forests) | देवदार, फर, ब्लू पाइन, बुरांश, स्प्रूस, साइप्रस/सुरई |
| 2,900 – 3,500 मी | कम (हिम रूप) | 6. उप-अल्पाइन वन (Sub-Alpine Forests) | भोजपत्र, जूनीपर, बौने रोडोडेंड्रोन, विलो |
| 3,500 – 4,500 मी | कम (हिम रूप) | 7. अल्पाइन झाड़ियां / बुग्याल (Alpine Scrub / Meadows) | अल्पाइन घास, ब्रह्मकमल, कीड़ा जड़ी/यार्सागूंबा, जटामांसी, अतीस, कुटकी |
| 4,500+ मी | नगण्य | 8. टुंड्रा तुल्य वनस्पति (Dry Alpine / Tundra-like) | काई, लाइकेन |
उत्तराखंड वन एवं वनस्पति: महत्वपूर्ण तथ्य
वनों के प्रकार:
- ऊंचाई के आधार पर उत्तराखंड में कुल 8 प्रकार के वन पाए जाते हैं।
प्रमुख वृक्ष-आच्छादन (FSI डेटा):
- प्रथम स्थान: चीड़ — लगभग 28.24% वन क्षेत्र।
- द्वितीय स्थान: शिवालिक साल — लगभग 12.8% वन क्षेत्र।
राज्य प्रतीक एवं उनकी ऊंचाई:
- राज्य वृक्ष: बुरांश (Rhododendron arboreum) — 1500 से 4000 मीटर की ऊंचाई पर।
- राज्य पुष्प: ब्रह्मकमल (Saussurea obvallata) — 3500 से 4800 मीटर की ऊंचाई पर।
परीक्षा उपयोगी विशेष तथ्य:
- अपवाद: उत्तराखंड में उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन (Tropical Evergreen Forests) नहीं पाए जाते हैं।
- सागौन (Teak): यह उत्तराखंड का मूल (देशज) वृक्ष नहीं है; इसे मुख्यतः तराई-भाबर क्षेत्र में वन विभाग द्वारा प्लांटेशन के रूप में लगाया गया है।
01 उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन (Tropical Dry Deciduous)
क्षेत्र:
- भाबर का शुष्क भाग
- शिवालिक निचली ढलानें
- यमुना–अगलार संगम
- कंडी क्षेत्र
कंडी क्षेत्र: शिवालिक और भाबर के मध्य का कंकरीला-पथरीला भाग — यहां मुख्यतः शुष्क पर्णपाती वन पाए जाते हैं।
मुख्य वृक्ष:
- खैर — अकेसिया कैटेचू
- शीशम — डालबर्जिया सिस्सू
- गूलर — फाइकस रेसीमोसा
- ढाक / पलाश — ब्यूटिया मोनोस्पर्मा
अन्य प्रजातियां:
- बेल
- अमलतास
आर्थिक महत्व
- खैर: तने से 'कत्था' (Catechu) — हल्द्वानी प्रमुख केंद्र।
- शीशम: उच्च गुणवत्ता फर्नीचर व नक्काशी।
पारिस्थितिक महत्व
- शुष्क/पथरीली भाबर मिट्टी में अपरदन रोकते हैं।
- पत्ते जनवरी–मार्च में झड़ते हैं — घास मैदान जैसे दिखते हैं।
- अत्यधिक सूखे को सहने में सक्षम।
एग्जाम पॉइंट्स:
- कत्था उत्पादन का स्रोत = खैर वृक्ष।
- 'कंडी' क्षेत्र में मुख्य वन = शुष्क पर्णपाती।
- 'जंगल की आग' (Flame of the Forest) = ढाक / पलाश।
02 उष्णकटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन (Tropical Moist Deciduous)
क्षेत्र:
- दून घाटी
- तराई-भाबर
- देहरादून
- नैनीताल (निचला भाग)
- ऊधमसिंह नगर
मुख्य वृक्ष:
- साल — शोरिया रोबस्टा — प्राकृतिक प्रमुख वृक्ष
- सागौन — टेक्टोना ग्रैंडिस — केवल वन विभाग प्लांटेशन, देशज नहीं
- सेमल — बॉम्बैक्स सीबा
- महुआ — मधुका लॉन्गिफोलिया
- जामुन — साइज़ियम क्यूमिनी
अन्य प्रजातियां:
- शहतूत
- आंवला
आर्थिक महत्व
- सागौन: महंगे फर्नीचर — दीमक-प्रतिरोधी (termite-resistant)।
- शहतूत: पत्तियां रेशम पालन (Sericulture) में उपयोग।
पारिस्थितिक महत्व
- सघन कैनोपी — जैव विविधता में समृद्ध (राजाजी नेशनल पार्क का कोर क्षेत्र)।
- राज्य के प्रमुख National Parks का मुख्य हिस्सा।
- पत्तियां मार्च–अप्रैल (6–8 सप्ताह) गिरती हैं, मानसून में फिर हरे-भरे।
एग्जाम पॉइंट्स:
- 'मानसूनी वन' (Monsoon Forests) = आर्द्र पर्णपाती वन — MCQ में बहुत पूछा जाता है।
- दीमक-प्रतिरोधी मूल्यवान लकड़ी = सागौन (Teak)।
03 उपोष्ण कटिबंधीय चीड़ वन (Sub-Tropical Pine Forests)
क्षेत्र:
- मध्य हिमालय
- शिवालिक ऊपरी भाग
- राज्य के विशाल भूभाग में (सबसे व्यापक)
मुख्य वृक्ष:
- चीड़ — पाइनस रॉक्सबर्गी
मिश्रित प्रजातियां:
- बांज ओक — क्वेरकस ल्यूकोट्राइकोफोरा — नम घाटी/ऊपरी सीमा पर मिश्रित
- काफल — मिरिका एस्कुलेंटा — निचले हिस्सों में मिश्रित
आर्थिक महत्व
- लीसा (Resin) — तारपीन तेल व अन्य उत्पाद — चीड़ इसका एकमात्र स्रोत।
- इमारती लकड़ी — पैकेजिंग (फलों की पेटियां), दरवाजे-खिड़कियां।
पारिस्थितिक महत्व
- 'पिरूल' (सूखी पत्तियां) अत्यधिक ज्वलनशील — वनाग्नि का मुख्य कारण।
- मिट्टी को अम्लीय बनाता है — नीचे घास/चारा उगना घट जाता है।
- 'पायनियर' प्रजाति — बंजर चट्टान व सूखी मिट्टी पर भी सबसे पहले उगता है।
एग्जाम पॉइंट्स:
- राज्य के कुल वन क्षेत्र का सर्वाधिक भाग (लगभग 28.24%) चीड़ वनों से आच्छादित — FSI डेटा।
- लीसा (Resin) का स्रोत = चीड़।
- वनाग्नि का मुख्य मौसम = मध्य-फरवरी से मध्य-जून।
- TRAP: चीड़ 'उपोष्ण' (Sub-Tropical) है — इसे देवदार/फर के 'शीतोष्ण' (Temperate) कोणधारी वनों से कन्फ्यूज न करें।
04 हिमालयी नम शीतोष्ण वन (Himalayan Moist Temperate)
क्षेत्र:
- चमोली
- रुद्रप्रयाग
- पिथौरागढ़
- अल्मोड़ा (ऊपरी भाग)
- नैनीताल (ऊपरी भाग)
मुख्य वृक्ष:
- बांज — क्वेरकस प्रजाति
- बुरांश — रोडोडेंड्रॉन आर्बोरियम
- काफल — मिरिका एस्कुलेंटा — निचली/तटीय पट्टी
अन्य प्रजातियां:
- मेपल
उत्तराखंड में बांज (Oak) की 5 प्रमुख प्रजातियां — 'हरा सोना'
| स्थानीय नाम | वैज्ञानिक नाम | ऊंचाई | पहचान |
|---|---|---|---|
| बांज | Q. leucotrichophora | 1,500–2,400 मी | सबसे आम — चारा/ईंधन |
| मोरू / तिलोंज | Q. floribunda | 2,000–2,700 मी | कठोर लकड़ी |
| खर्सू | Q. semecarpifolia | 2,500–3,300 मी | सबसे अधिक ऊंचाई पर |
| रियांज | Q. lanata (syn. Q. lanuginosa) | मध्य पट्टी | अपेक्षाकृत कम पाया जाता है |
| फल्यांट / हरींज | Q. glauca | नम घाटियां | नदी-नालों के किनारे |
आर्थिक महत्व
- बांज: उत्तम चारा (Fodder) + कृषि उपकरणों (हल) की टिकाऊ लकड़ी।
- बुरांश: फूलों से जूस/स्क्वैश — हृदय रोगों में लाभदायक, स्थानीय रोजगार।
पारिस्थितिक महत्व
- चौड़ी पत्तियां गिरकर बेहतरीन खाद (Humus) बनाती हैं।
- बांज का फल 'एकॉर्न' — जंगली भालू व काकड़ का मुख्य भोजन।
- बुरांश रंग: 1,500–2,500 मी लाल, 2,500–3,000 मी गुलाबी, 3,000 मी+ सफेद।
एग्जाम पॉइंट्स:
- राज्य वृक्ष = बुरांश | राज्य पुष्प = ब्रह्मकमल — दोनों अलग-अलग हैं।
- रक्षा सूत्र आंदोलन (1994) — टिहरी की भिलंगना घाटी, नेतृत्व सुरेश भाई — बांज मिश्रित वन बचाने हेतु।
- मीरा बेन — 'चीड़ के स्थान पर बांज' उगाने का अभियान चलाया।
05 शीतोष्ण कोणधारी वन (Temperate Coniferous Forests)
क्षेत्र:
- उत्तरकाशी
- चमोली
- पिथौरागढ़
- अल्मोड़ा (जागेश्वर धाम)
ऊंचाई के साथ वृक्ष-क्रम
मुख्य वृक्ष:
- देवदार — सीड्रस देवदारा
- फर — एबीज़ पिंड्रो
- ब्लू पाइन — पाइनस वालिचियाना
- बुरांश — रोडोडेंड्रॉन आर्बोरियम
अन्य प्रजातियां:
- स्प्रूस
- साइप्रस / सुरई
आर्थिक महत्व
- देवदार: टिकाऊ सुगंधित लकड़ी — मंदिर निर्माण, नक्काशी, रेलवे स्लीपर।
- औषधीय तेल — पारंपरिक चिकित्सा व कीट-प्रतिरोधी उपयोग।
पारिस्थितिक महत्व
- शंक्वाकार आकार — भारी बर्फ शाखाओं पर नहीं टिकती, पेड़ नहीं टूटते।
- ठंडी/बर्फीली हवाओं से पहाड़ों व वन्यजीवों का बचाव।
- सुई-पत्तियां — कम वाष्पोत्सर्जन, ठंड व सूखा सहनशील।
एग्जाम पॉइंट्स:
- देवदार = 'देवताओं का वृक्ष' (Tree of Gods)।
- जागेश्वर धाम (अल्मोड़ा) — पूरी तरह देवदार वनों से घिरा।
- TRAP: चीड़ उपोष्ण है, जबकि देवदार व फर शीतोष्ण कोणधारी — कन्फ्यूज न करें।
06 उप-अल्पाइन वन (Sub-Alpine Forests)
क्षेत्र:
- चमोली
- उत्तरकाशी
- पिथौरागढ़ (उच्च हिमालयी भाग)
मुख्य वृक्ष:
- भोजपत्र — बेटुला यूटिलिस
- जूनीपर — जूनिपेरस मैक्रोपोडा
अन्य प्रजातियां:
- बौने रोडोडेंड्रोन
- विलो
आर्थिक महत्व
- भोजपत्र: छाल का ऐतिहासिक उपयोग — पांडुलिपि लेखन हेतु 'कागज़'।
- जूनीपर: धार्मिक धूप (Incense) व पारंपरिक औषधि।
पारिस्थितिक महत्व
- यह क्षेत्र 'टिम्बरलाइन' बनाता है — इससे ऊपर बड़े वृक्ष नहीं उगते।
- अत्यंत ठंडी व कठोर जलवायु के पूर्ण अनुकूलित प्रजातियां।
एग्जाम पॉइंट्स:
- प्राचीन काल में लेखन हेतु प्रयुक्त वृक्ष-छाल = भोजपत्र।
- टिम्बरलाइन (~3,500 मी) के समीप प्रमुख वन = उप-अल्पाइन वन।
07 अल्पाइन झाड़ियां / बुग्याल (Alpine Scrub / Meadows)
क्षेत्र:
- चमोली — रूपकुंड, औली, वेदिनी
- उत्तरकाशी — दयारा बुग्याल
- पिथौरागढ़ — मुनस्यारी उच्च क्षेत्र
मुख्य वनस्पति:
- अल्पाइन घास — पूर्णतः वृक्ष-रहित क्षेत्र
- ब्रह्मकमल — सॉसुरिया ऑबवैलेटा — राज्य पुष्प
- कीड़ा जड़ी / यार्सागूंबा — ओफियोकॉर्डिसेप्स साइनेन्सिस
औषधीय जड़ी-बूटियां:
- जटामांसी
- अतीस
- कुटकी
आर्थिक महत्व
- भोटिया व गुज्जर जनजातियों का ग्रीष्मकालीन चारागाह (Transhumance)।
- दुर्लभ व मूल्यवान औषधीय जड़ी-बूटियों का भंडार।
पारिस्थितिक महत्व
- 'प्रकृति के स्पंज' — नमी सोखकर गर्मियों में धीरे-धीरे नदियों में छोड़ते हैं।
- घनी घास परत मृदा को बांधे रखती है — भूस्खलन कम होता है।
एग्जाम पॉइंट्स:
- बुग्यालों को कहते हैं = 'मखमली गलीचा' (कश्मीर में 'मर्ग', जैसे गुलमर्ग)।
- ब्रह्मकमल = राज्य पुष्प, केवल बुग्यालों में जुलाई–सितंबर के बीच खिलता है।
- कीड़ा जड़ी को कहते हैं = 'हिमालयी सोना' — विश्व की सबसे महंगी फफूंद-आधारित औषधियों में से एक।
08 टुंड्रा तुल्य वनस्पति (Dry Alpine / Tundra-like) — अंतिम प्रकार
क्षेत्र:
- स्थायी हिमरेखा के ठीक नीचे
- ऊंचे हिमालयी शिखरों के समीप चट्टानी भाग
मुख्य वनस्पति:
- काई
- लाइकेन
अन्य:
- सेज (Sedge), अत्यधिक छोटी कुशन-जैसी घासें (ज़मीन से चिपकी)
आर्थिक महत्व
- नगण्य — इस ऊंचाई पर व्यावसायिक दोहन संभव नहीं, वृद्धि अत्यंत धीमी।
पारिस्थितिक महत्व
- प्राथमिक अनुक्रमण (Primary Succession) — लाइकेन नंगी चट्टानों को तोड़कर मिट्टी बनाते हैं।
- चरम जलवायु (अत्यधिक ठंड, कम ऑक्सीजन) में जीवन का प्रतीक।
एग्जाम पॉइंट्स:
- लाइकेन = वायु प्रदूषण (विशेषकर SO₂) का प्राकृतिक संकेतक।
- भारत का पहला लाइकेन पार्क = मुनस्यारी (पिथौरागढ़)।
- लाइकेन = कवक (Fungi) व शैवाल (Algae) का सहजीवी संबंध।
03 प्रमुख वृक्ष प्रजातियां एवं वैज्ञानिक नाम
इस भाग में ऊपर वर्णित सभी वृक्ष प्रजातियों (शिवालिक से लेकर हिमरेखा तक) को उनके वैज्ञानिक नामों के साथ एक ही तालिका में संकलित किया गया है।
| स्थानीय नाम | वैज्ञानिक नाम | वन प्रकार / पेटी |
|---|---|---|
| खैर | Acacia catechu | भाबर — शुष्क पर्णपाती |
| शीशम | Dalbergia sissoo | भाबर — शुष्क पर्णपाती |
| गूलर | Ficus racemosa | भाबर — शुष्क पर्णपाती |
| ढाक / पलाश | Butea monosperma | भाबर — शुष्क पर्णपाती |
| साल | Shorea robusta | तराई — आर्द्र पर्णपाती (प्रमुख वृक्ष) |
| सागौन | Tectona grandis | तराई — प्लांटेशन (देशज नहीं) |
| सेमल | Bombax ceiba | तराई — आर्द्र पर्णपाती |
| महुआ | Madhuca longifolia | तराई — आर्द्र पर्णपाती |
| जामुन | Syzygium cumini | तराई — आर्द्र पर्णपाती |
| चीड़ | Pinus roxburghii | शिवालिक/मध्य हिमालय — चीड़ वन |
| बांज | Quercus leucotrichophora | मध्य हिमालय — बांज/शीतोष्ण वन |
| काफल | Myrica esculenta | मध्य हिमालय — मिश्रित पेटी |
| बुरांश | Rhododendron arboreum | मध्य हिमालय / उप-अल्पाइन |
| देवदार | Cedrus deodara | उप-अल्पाइन शंकुधारी वन |
| फर | Abies pindrow | उप-अल्पाइन शंकुधारी वन |
| ब्लू पाइन | Pinus wallichiana | उप-अल्पाइन शंकुधारी वन |
| भोजपत्र | Betula utilis | अल्पाइन झाड़ी सीमा (हिमरेखा के निकट) |
| जूनीपर | Juniperus macropoda | अल्पाइन झाड़ी सीमा |
04 वन पंचायत
परिचय एवं प्रमुख आंकड़े
वन पंचायत क्या है?
- यह 'सामुदायिक वन प्रबंधन' (Community Forest Management) का एशिया का सबसे पुराना और सफल मॉडल है।
- स्वामित्व: 'राज्य के स्वामित्व' और 'सामुदायिक जिम्मेदारी' का मिला-जुला अनूठा रूप।
- यह व्यवस्था पूरे भारत में केवल उत्तराखंड में है।
उत्तराखंड में ब्रिटिश वन प्रबंधन का इतिहास
प्रारंभिक वन प्रबंधन
ठेकेदारी से प्रारंभिक सरकारी वन-संरक्षण तक
रैमजे काल एवं वन विभाग
प्रत्यक्ष सरकारी नियंत्रण और संस्थागत वन प्रशासन
- पाटली दून
- कोटरी दून
- चंडी
- उदयपुर
- Reserved Forest — आरक्षित वन
- Protected Forest — संरक्षित वन
- Village Forest — ग्राम वन
1893–1917 : वन नियंत्रण एवं बंदोबस्त
संरक्षित भूमि, आरक्षित वृक्ष और सिविल वन
इन वृक्षों की कटाई को सरकारी नियंत्रण/अनुमति के अधीन किया गया।
- भीमताल
- सातताल
- नौकुचियाताल
- मलुआ ताल
Stiffe–Nelson Forest Settlement
1911–1917 का वन बंदोबस्त
- Class A
- Forest Department का कड़ा नियंत्रण। मुख्य उद्देश्य: Timber production, वन संरक्षण, स्थानीय timber आवश्यकता और surplus timber की बिक्री।
- Class B
- मुख्यतः ग्रामीण आवश्यकताओं हेतु—ईंधन, चारा, घास, चराई और Minor Forest Produce।
- Class C
- स्थानीय ग्रामीण उपयोग के लिए comparatively अधिक खुला क्षेत्र; Forest Department का नियंत्रण अपेक्षाकृत कम।
Exam Fact: बाद में Class-B का अधिकांश क्षेत्र Class-A में शामिल कर दिया गया, जिससे जन-असंतोष बढ़ा।
गढ़वाल वन प्रशासन
विभाजन, Working Plans और पुनः एकीकरण
North Garhwal — A. E. Osmaston
South Garhwal — M. P. Bhola
याद रखें: 1914 → विभाजन | 1934 → पुनः एकीकरण
वन आंदोलन एवं कुमाऊँ परिषद
वन-अधिकार, आंदोलन और शिकायत समिति
- P. Wyndham
- R.G. Marriott
- Lakshmi Datt Pande
- Jodh Singh Negi
वन पंचायत
Community Forest से विधिक पंचायत व्यवस्था तक
संरचना एवं कार्यप्रणाली
महिला एवं SC/ST आरक्षण
महिला आरक्षण
नियम 2005 के तहत समिति की 50% सीटें महिलाओं के लिए अनिवार्य हैं। 5–9 सदस्यों में से कम से कम 4–5 महिला सदस्य होना आवश्यक है।
SC/ST आरक्षण
ग्राम सभा की जनसंख्या के अनुपात में SC और ST के लिए सीटें आरक्षित। कोई निश्चित % नहीं — जनसंख्या-आधारित।
जिलेवार रैंकिंग एवं अपवाद
वन पंचायतों की संख्या के आधार पर
| रैंक | जिला | वन पंचायतें |
|---|---|---|
| 1 | पौड़ी गढ़वाल | 2,212 वन पंचायतें |
| 2 | अल्मोड़ा | 2,041 वन पंचायतें |
| 3 | पिथौरागढ़ | 1,516 वन पंचायतें |
| 4 | चमोली | 1,345 वन पंचायतें |
| 5 | टिहरी गढ़वाल | 1,290 वन पंचायतें |
वन पंचायत क्षेत्रफल के आधार पर
| रैंक | जिला | क्षेत्रफल |
|---|---|---|
| 1 | चमोली | 3,18,477 हेक्टेयर |
| 2 | पिथौरागढ़ | 1,20,964 हेक्टेयर |
| 3 | अल्मोड़ा | 50,597 हेक्टेयर |
| 4 | पौड़ी गढ़वाल | 46,736 हेक्टेयर |
| 5 | चंपावत | 30,834 हेक्टेयर |
कारण: वन पंचायत व्यवस्था मुख्य रूप से पर्वतीय क्षेत्रों (Hill areas) के वनों के प्रबंधन के लिए बनी है। हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर मैदानी जिले हैं।