लेखक: Deepak Singh Jethi · अंतिम समीक्षा:
🧂
UKPSC / UKSSSC स्पेशल
1930 – 1934
दांडी मार्च · पेशावर कांड · महिला नेतृत्व
सविनय अवज्ञा आंदोलन — उत्तराखंड
नमक सत्याग्रह
पेशावर कांड
महिला शक्ति
ब्रिटिश दमन
6 अप्रैलनमक कानून भंग, 1930
78दांडी यात्रा के सत्याग्रही
3उत्तराखंड के दांडी वीर
23 अप्रैलपेशावर कांड, 1930
11 वर्ष+चंद्र सिंह गढ़वाली की जेल
1पृष्ठभूमि एवं मुख्य सूत्र
📍
आरंभ
6 अप्रैल 1930 को गांधी जी ने नमक कानून तोड़कर इस आंदोलन की शुरुआत की। टिहरी रियासत को छोड़कर (जहाँ राजशाही थी) पूरे कुमाऊं व ब्रिटिश गढ़वाल में जगह-जगह तिरंगा फहराया गया और नमक कानून का प्रतीकात्मक उल्लंघन किया गया।
⛰️
पहाड़ की विशेषता
अल्मोड़ा में समुद्र न होने के कारण पानी से नमक बनाकर प्रतीकात्मक रूप से नमक कानून तोड़ा गया — यह पहाड़ की अपनी अनूठी क्रांति थी।
2दांडी यात्रा में उत्तराखंड का योगदान
🚶
ऐतिहासिक यात्रा
साबरमती आश्रम से दांडी तक 240 मील की यात्रा — 12 मार्च से 6 अप्रैल 1930 — में गांधी जी के 78 सत्याग्रहियों में उत्तराखंड के 3 वीर शामिल थे।
दांडी मार्च — वीर 1
ज्योतिराम कांडपाल
अल्मोड़ा से — आगे धरासना सत्याग्रह में भी सक्रिय
अल्मोड़ा से — आगे धरासना सत्याग्रह में भी सक्रिय
दांडी मार्च — वीर 2
भैरव दत्त जोशी
कुमाऊं का प्रतिनिधित्व
कुमाऊं का प्रतिनिधित्व
दांडी मार्च — वीर 3
खड़क बहादुर (गोरखा वीर)
देहरादून / गोरखा समुदाय का प्रतिनिधित्व
देहरादून / गोरखा समुदाय का प्रतिनिधित्व
2aज्योतिराम कांडपाल — विशेष योगदान
🌊
1930 — दांडी के बाद
धरासना सत्याग्रह, गुजरात
दांडी मार्च के बाद कांडपाल जी ने सरोजिनी नायडू के नेतृत्व में गुजरात के धरासना में हुए ऐतिहासिक धरने में भाग लिया और उनके साथ नमक बनाया — पूरे देश में चर्चित यह घटना कांडपाल जी की वीरता का प्रमाण है।
🏛️
1931
उद्योग मंदिर की स्थापना — देघाट, अल्मोड़ा
आंदोलन से लौटने के बाद कांडपाल जी ने अल्मोड़ा के देघाट (Deghat) में 'उद्योग मंदिर' की स्थापना की। उद्देश्य: युवाओं को स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ना और गांधी जी के रचनात्मक कार्यक्रमों (खादी आदि) को पहाड़ में लागू करना।
3राज्य के क्षेत्रों में आंदोलन का प्रभाव
देहरादून
नमक सत्याग्रह व सविनय अवज्ञा आंदोलन का मुख्य नेतृत्व महावीर त्यागी ने किया।
अल्मोड़ा
समुद्र न होने के कारण पानी से नमक बनाकर प्रतीकात्मक उल्लंघन। साथ ही तिरंगा फहराने का आंदोलन भी चला।
नैनीताल
पं. गोविंद बल्लभ पंत को नैनीताल में धारा 144 तोड़ने के आरोप में गिरफ्तार किया गया।
4महिलाओं का ऐतिहासिक नेतृत्व
🚩
अल्मोड़ा — 1932
बिश्नी देवी शाह के नेतृत्व में कुंती वर्मा, जीवंती, मंगला, रेवती आदि महिलाओं ने अल्मोड़ा नगर पालिका भवन पर तिरंगा फहराया और उग्र प्रदर्शन किया।
🏔️
नैनीताल
पद्मा जोशी के नेतृत्व में सावित्री, जानकी, भागीरथी, शकुंतला, विमला आदि महिलाओं ने जुलूसों और धरनों का सक्रिय रूप से नेतृत्व किया।
4aब्रिटिश सरकार का दमन — फरवरी 1932
⛓️
फरवरी 1932
8 महिलाओं को फतेहगढ़ जेल (उ.प्र.)
अल्मोड़ा और अन्य क्षेत्रों से 8 प्रमुख आंदोलनकारी महिलाओं को गिरफ्तार कर उत्तर प्रदेश की फतेहगढ़ जेल भेजा गया।
🔒
फरवरी 1932
पद्मा जोशी — लखनऊ जेल
नैनीताल में सक्रिय पद्मा जोशी को गिरफ्तार कर लखनऊ जेल भेजा गया।
🎯
1932
कुंती वर्मा — "जिंदा या मुर्दा" वॉरंट
कुंती वर्मा के क्रांतिकारी तेवरों और भूमिगत गतिविधियों के कारण ब्रिटिश सरकार ने उन्हें "जिंदा या मुर्दा" (Dead or Alive) पकड़ने का दुर्लभ फरमान (वॉरंट) जारी किया — उत्तराखंड की किसी महिला स्वतंत्रता सेनानी के विरुद्ध यह अभूतपूर्व कदम था।
⚠️
आयोग का ट्रैप — दो अलग प्रश्न!
① राष्ट्रीय आंदोलन (सविनय अवज्ञा) में जेल जाने वाली प्रथम महिला: 👉 बिश्नी देवी शाह
② वन आंदोलनों में जेल जाने वाली प्रथम महिला: 👉 दुर्गा देवी
UKPSC और UKSSSC दोनों प्रश्नों को मिला-जुलाकर पूछते हैं — दोनों को भिन्न रखें।
② वन आंदोलनों में जेल जाने वाली प्रथम महिला: 👉 दुर्गा देवी
UKPSC और UKSSSC दोनों प्रश्नों को मिला-जुलाकर पूछते हैं — दोनों को भिन्न रखें।
5पेशावर कांड (23 अप्रैल 1930) — सैन्य अध्याय
🏔️
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (वर्तमान पाकिस्तान) में 'सीमांत गांधी' (खान अब्दुल गफ्फार खान) के खुदाई खिदमतगार (लाल कुर्ती दल) का शांतिपूर्ण सत्याग्रह था। इसे कुचलने के लिए ब्रिटिश सरकार ने गढ़वाली सैनिकों को भेजा।
घटना की तिथि
23 अप्रैल 1930
घटना स्थल
किस्सा ख्वानी बाजार, पेशावर
संबंधित बटालियन
2/18 रॉयल गढ़वाल राइफल्स
महानायक
वीर चंद्र सिंह 'गढ़वाली'
मूल नाम: चंद्र सिंह भंडारी
मूल नाम: चंद्र सिंह भंडारी
ब्रिटिश अधिकारी
कैप्टन रिकेट्स (Captain Ricketts)
कोर्ट-मार्शल स्थान
एबटाबाद (Abbottabad) छावनी
5aवह ऐतिहासिक क्षण
🔫
23 अप्रैल 1930 — किस्सा ख्वानी बाजार
कैप्टन रिकेट्स का आदेश
निहत्थे पठान सत्याग्रहियों पर कैप्टन रिकेट्स ने गढ़वाली सैनिकों को "Garhwalis, open fire!" का आदेश दिया।
🙏
चंद्र सिंह का साहस
"गढ़वाली निहत्थों पर गोली नहीं चलाते!"
चंद्र सिंह ने अपनी राइफल नीचे कर ली और यह ऐतिहासिक घोषणा की। उनके इस साहस को देखकर पूरी बटालियन ने गोली चलाने से इंकार कर दिया — ब्रिटिश सेना के इतिहास में यह एक महान विद्रोह था।
⚖️
कोर्ट-मार्शल — एबटाबाद
59 सैनिकों पर मुकदमा — वकील: बैरिस्टर मुकंदी लाल
बगावत के आरोप में चंद्र सिंह सहित 59 सैनिकों पर एबटाबाद छावनी में कोर्ट-मार्शल। बैरिस्टर मुकंदी लाल के शानदार तर्कों से इन्हें फांसी से बचाकर कारावास में परिवर्तित कराया।
🔗
सजा
11 वर्ष 3 माह 18 दिन — रिहाई 1941
वीर चंद्र सिंह गढ़वाली को सबसे कड़ी सजा: 11 वर्ष 3 माह 18 दिन का कठोर कारावास। वे 1941 में रिहा हुए।
5bराष्ट्रीय सम्मान एवं प्रभाव
'गढ़वाली' उपाधि
महात्मा गांधी ने अहिंसा के इस सर्वोच्च उदाहरण से प्रभावित होकर इन्हें 'गढ़वाली' की उपाधि दी।
गढ़वाल दिवस
मोतीलाल नेहरू ने सैनिकों की देशभक्ति से अभिभूत होकर प्रतिवर्ष 23 अप्रैल को "गढ़वाल दिवस" मनाने की घोषणा की।
डाक टिकट
भारत सरकार ने 23 अप्रैल 1994 को वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के नाम का डाक टिकट जारी किया।
गढ़वाली निहत्थों पर गोली नहीं चलाते!
वीर चंद्र सिंह गढ़वाली — 23 अप्रैल 1930, किस्सा ख्वानी बाजार, पेशावर
5cब्रिटिश प्रतिक्रिया — 'अमन सभा' का गठन
🛡️
घबराई हुई ब्रिटिश सरकार
सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रसार और 23 अप्रैल 1930 के पेशावर कांड (वीर चंद्र सिंह गढ़वाली) से सेना में विद्रोह की आशंका से घबराकर, गढ़वाल की जनता व सैनिकों को कांग्रेस-राष्ट्रवाद से दूर रखने हेतु अंग्रेजों ने एक 'राजभक्त' (Pro-British) संस्था गठित करवाई — 'अमन सभा'।
स्थापना
नवम्बर 1930
मुख्यालय / केंद्र
लैंसडाउन, पौड़ी गढ़वाल
लैंसडाउन ही क्यों?
यह गढ़वाल राइफल्स की छावनी (Cantonment) थी — सेना में दोबारा पेशावर कांड जैसी बगावत रोकने हेतु यहीं केंद्र रखा गया।
सदस्य कौन थे?
आम जनता नहीं — मुख्यतः सरकारी कर्मचारी, रिटायर्ड फौजी, पेंशनर्स, थोकदार व मालगुजार (जिनसे अंग्रेजों को लगान मिलता था)।
🎯
मुख्य उद्देश्य
1. काउंटर-प्रोपेगेंडा — सविनय अवज्ञा आंदोलन व कांग्रेस के विरुद्ध गांव-गांव प्रचार।
2. ब्रिटिश राज का गुणगान — जनता को समझाना कि ब्रिटिश राज हितकारी है और आंदोलनकारी 'अमन भंग' कर रहे हैं।
3. सैनिकों की वफादारी — सैनिकों व उनके परिवारों को राष्ट्रवादी विचारधारा से बचाना।
2. ब्रिटिश राज का गुणगान — जनता को समझाना कि ब्रिटिश राज हितकारी है और आंदोलनकारी 'अमन भंग' कर रहे हैं।
3. सैनिकों की वफादारी — सैनिकों व उनके परिवारों को राष्ट्रवादी विचारधारा से बचाना।
5dजयानंद भारती — 'काले झंडे' की घटना (V.V.I.P)
🏛️
1932 — पौड़ी (गढ़वाल)
गवर्नर सर मैल्कम हेली का दरबार
संयुक्त प्रांत (United Provinces) के तत्कालीन गवर्नर सर मैल्कम हेली (Sir Malcolm Hailey) पौड़ी दौरे पर आए, जिनके स्वागत हेतु 'अमन सभा' ने एक विशाल दरबार आयोजित किया।
☂️
जयानंद भारती का साहस
छाते में छिपाकर काला झंडा लाए
भारी सुरक्षा के बावजूद जयानंद भारती अपने छाते (Umbrella) के अंदर काला झंडा छिपाकर सभा में प्रविष्ट हो गए।
🚩
भरी सभा में विरोध
"मैल्कम हेली गो बैक" के नारे
उन्होंने भरी सभा में मैल्कम हेली के सामने काले झंडे फहराए और "मैल्कम हेली गो बैक" (वापस जाओ) के नारे लगाए — इस घटना ने अमन सभा के शक्ति-प्रदर्शन की धज्जियां उड़ा दीं।
✊
कुमाऊं में अमन सभा का विरोध
गढ़वाल की तर्ज पर अल्मोड़ा व नैनीताल में भी अमन सभा की शाखाएं खोली गईं। जब अल्मोड़ा में अमन सभा का सम्मेलन हुआ, तो कुमाऊं के राष्ट्रवादियों व स्वतंत्रता सेनानियों ने इसका कड़ा बहिष्कार कर काले झंडे दिखाए।
6स्मरण अभ्यास — क्लिक करें
दांडी मार्च कब शुरू हुआ और कब समाप्त?
12 मार्च 1930 (साबरमती) → 6 अप्रैल 1930 (दांडी)
क्लिक करें
दांडी मार्च में उत्तराखंड के 3 सत्याग्रही?
ज्योतिराम कांडपाल · भैरव दत्त जोशी · खड़क बहादुर (गोरखा)
क्लिक करें
देघाट (अल्मोड़ा) में 1931 में क्या स्थापित हुआ?
उद्योग मंदिर — ज्योतिराम कांडपाल द्वारा
क्लिक करें
धरासना सत्याग्रह में उत्तराखंड से कौन थे?
ज्योतिराम कांडपाल — सरोजिनी नायडू के साथ
क्लिक करें
देहरादून में सविनय अवज्ञा का नेतृत्व किसने किया?
महावीर त्यागी
क्लिक करें
नैनीताल में धारा 144 तोड़ने पर किसे गिरफ्तार किया?
पं. गोविंद बल्लभ पंत
क्लिक करें
अल्मोड़ा नगर पालिका में तिरंगा किसके नेतृत्व में फहराया?
बिश्नी देवी शाह (1932) — कुंती वर्मा, जीवंती, मंगला, रेवती आदि के साथ
क्लिक करें
नैनीताल में आंदोलन की कमान किसने संभाली?
पद्मा जोशी — (बाद में लखनऊ जेल)
क्लिक करें
8 महिला सत्याग्राहियों को कहाँ भेजा गया (1932)?
फतेहगढ़ जेल, उत्तर प्रदेश
क्लिक करें
"जिंदा या मुर्दा" वॉरंट किस महिला के विरुद्ध?
कुंती वर्मा
क्लिक करें
पेशावर कांड की तिथि, स्थान और बटालियन?
23 अप्रैल 1930 · किस्सा ख्वानी बाजार · 2/18 रॉयल गढ़वाल राइफल्स
क्लिक करें
चंद्र सिंह गढ़वाली का वास्तविक नाम क्या था?
चंद्र सिंह भंडारी — 'गढ़वाली' उपाधि गांधी जी ने दी
क्लिक करें
कोर्ट-मार्शल में चंद्र सिंह के वकील कौन थे?
बैरिस्टर मुकंदी लाल — फांसी को कारावास में बदलाया
क्लिक करें
चंद्र सिंह गढ़वाली की सजा और रिहाई?
11 वर्ष 3 माह 18 दिन — 1941 में रिहाई
क्लिक करें
'गढ़वाल दिवस' की घोषणा किसने की?
मोतीलाल नेहरू — 23 अप्रैल प्रतिवर्ष
क्लिक करें
चंद्र सिंह गढ़वाली का डाक टिकट कब जारी हुआ?
23 अप्रैल 1994 — भारत सरकार द्वारा
क्लिक करें
⟂परीक्षा के लिए Quick Recap
| तथ्य / घटना | विवरण | विशेष नोट |
|---|---|---|
| आंदोलन प्रारंभ | 6 अप्रैल 1930 — गांधी जी द्वारा नमक कानून भंग | दांडी मार्च 12 मार्च को शुरू, 78 सत्याग्रही |
| टिहरी की स्थिति | टिहरी रियासत — आंदोलन से बाहर | राजशाही होने के कारण |
| उत्तराखंड के दांडी वीर | ज्योतिराम कांडपाल · भैरव दत्त जोशी · खड़क बहादुर | 78 में से 3 उत्तराखंड से |
| धरासना सत्याग्रह | ज्योतिराम कांडपाल — सरोजिनी नायडू के साथ | दांडी के बाद, गुजरात |
| उद्योग मंदिर | 1931 — देघाट, अल्मोड़ा — ज्योतिराम कांडपाल | रचनात्मक कार्यक्रम, खादी, युवा जोड़ना |
| देहरादून नेतृत्व | महावीर त्यागी | नमक सत्याग्रह व सविनय अवज्ञा |
| अल्मोड़ा में नमक | पानी से नमक बनाकर प्रतीकात्मक उल्लंघन | समुद्र न होने के कारण अनूठी विधि |
| G.B. पंत गिरफ्तारी | नैनीताल — धारा 144 तोड़ने पर | सविनय अवज्ञा आंदोलन |
| अल्मोड़ा तिरंगा (1932) | बिश्नी देवी शाह का नेतृत्व | कुंती वर्मा, जीवंती, मंगला, रेवती — नगर पालिका भवन |
| नैनीताल महिला नेतृत्व | पद्मा जोशी | सावित्री, जानकी, भागीरथी, शकुंतला, विमला साथ |
| 8 महिलाएं — जेल | फतेहगढ़ जेल, उ.प्र. — फरवरी 1932 | अल्मोड़ा व अन्य क्षेत्रों से |
| पद्मा जोशी — जेल | लखनऊ जेल | नैनीताल में सक्रियता के कारण |
| "जिंदा या मुर्दा" वॉरंट | कुंती वर्मा | भूमिगत गतिविधियों के कारण — अभूतपूर्व कदम |
| प्रथम महिला (राष्ट्रीय आंदोलन) | बिश्नी देवी शाह | सविनय अवज्ञा में जेल जाने वाली प्रथम — वन आंदोलन से भिन्न |
| प्रथम महिला (वन आंदोलन) | दुर्गा देवी | अलग संदर्भ — 1921 — न जोड़ें |
| पेशावर कांड | 23 अप्रैल 1930 — किस्सा ख्वानी बाजार | 2/18 रॉयल गढ़वाल राइफल्स · कैप्टन रिकेट्स |
| महानायक | वीर चंद्र सिंह 'गढ़वाली' (मूल: चंद्र सिंह भंडारी) | "गढ़वाली निहत्थों पर गोली नहीं चलाते!" |
| 59 सैनिकों पर कोर्ट-मार्शल | एबटाबाद छावनी — वकील: मुकंदी लाल | फांसी → कारावास |
| चंद्र सिंह की सजा | 11 वर्ष 3 माह 18 दिन — रिहाई 1941 | सबसे कड़ी सजा |
| 'गढ़वाली' उपाधि | महात्मा गांधी द्वारा प्रदत्त | अहिंसा के उच्चतम उदाहरण के सम्मान में |
| गढ़वाल दिवस — 23 अप्रैल | मोतीलाल नेहरू की घोषणा | प्रतिवर्ष पूरे देश में |
| डाक टिकट | 23 अप्रैल 1994 — भारत सरकार | वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के सम्मान में |