लेखक: Deepak Singh Jethi · अंतिम समीक्षा:
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UKPSC / UKSSSC स्पेशल
1822 – 1924
प्रथा, संघर्ष व ऐतिहासिक अंत
कुली बेगार आंदोलन
1822ट्रेल की खच्चर सेना
1907मूल्य देने की घोषणा
1908कुली एजेंसी स्थापना
40Kबागेश्वर जनसमूह
1921कुमाऊं में अंत
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चरण 1 · 1822 – 1907
प्रथा का उद्भव, प्रकार व प्रारंभिक प्रतिरोध
1प्रथा का मूल और प्रकार
ऐतिहासिक नाम
प्राचीन / चंद काल नाम
'बिष्टी' (Bishti)
हलाक बेगार
डाक (Post) हेतु बेगार — 1891 में समाप्त
अंग्रेजों के समय तीन मुख्य रूप
कुली बेगार
बिना वेतन के अंग्रेजों का सामान एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचाना।
कुली उतार
अनिवार्य रूप से अपना काम छोड़कर एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक अंग्रेजों का सामान ढोना (इसके लिए नाममात्र की मजदूरी दी जाती थी, लेकिन काम बाध्यकारी था)।
कुली बर्दायश
अंग्रेजों के लिए खाने की सामग्री व राशन की व्यवस्था (बिना पैसे के)।
2शुरुआती विरोध का ऐतिहासिक क्रम (17वीं सदी – 1907)
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सर्वप्रथम · 17वीं सदी
सुमाड़ी गाँव (पौड़ी) — 'पंथा दादा' का बलिदान
राज्य में अन्यायपूर्ण कर/बेगार का पहला बड़ा विरोध। पंवार वंश के राजा मेदिनी शाह के समय 'रोजा' (अन्यायपूर्ण कर) के खिलाफ 16 वर्षीय वीर बालक पंथ्या ने अग्निकुंड में आत्मदाह किया था।
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1822
कमिश्नर ट्रेल की 'खच्चर सेना'
विलियम ट्रेल ने बेगार की समस्या कम करने के लिए खच्चर सेना बनाई।
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1840
लोहाघाट छावनी का विरोध
1839 में छावनी बनने के बाद सैनिकों के लिए मुफ्त राशन (बर्दायश) पहुँचाने का कड़ा विरोध किया गया।
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संदर्भ
1839 में लोहाघाट छावनी की विधिवत स्थापना हुई। सैनिकों की संख्या बढ़ने से ग्रामीणों पर 'बर्दायश' का बोझ अचानक बढ़ गया, जिसके कारण ठीक अगले वर्ष 1840 में यह ऐतिहासिक विरोध हुआ।
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1893
लाहौर अधिवेशन — दादा भाई नौरोजी
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में दादा भाई नौरोजी ने कुली बेगार के विरोध में प्रस्ताव पास किया।
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1903–04
खत्याड़ी गाँव (अल्मोड़ा) — हाई कोर्ट केस
- लॉर्ड कर्जन की यात्रा के समय ग्रामीणों ने बेगार देने से मना किया। मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट गया।
- 1904 में हाई कोर्ट ने ग्रामीणों को मुकदमे से मुक्त किया और बेगार को "अवैध" घोषित किया।
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1907
सरकार की नई घोषणा
सरकार ने घोषणा की कि बेगार के बदले अब मूल्य (पैसे) दिया जाएगा।
3कुली एजेंसी (1908 – 1924) का संपूर्ण ढांचा
स्थापना वर्ष व स्थान
1908 — पौड़ी गढ़वाल
संस्थापक
जोध सिंह नेगी
अध्यक्ष
तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर स्टोवेल (Stowell)
सचिव
जोध सिंह नेगी, तारा दत्त गैरोला, शालिग्राम
अन्य नाम (पूर्ण नाम)
ट्रांसपोर्ट एंड सप्लाई कोऑपरेटिव एसोसिएशन (Transport & Supply Cooperative Association)
शाखाओं का विस्तार
1912 — लैंसडाउन; 1913 — रुद्रप्रयाग
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कनेक्शन — Idea Generation (31 मई 1907)
कुली एजेंसी बनाने का सबसे पहला आइडिया 31 मई 1907 को गिरिजा दत्त नैथानी — जो 'गढ़वाली' के पहले संपादक थे — ने ही 'अल्मोड़ा अखबार' में एक लेख लिखकर दिया था।
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चरण 2 · 1913 – 1924
आंदोलन का चरम, ऐतिहासिक अंत व गढ़वाल का योगदान
1आंदोलन का उग्र रूप और ऐतिहासिक अंत (1913 – 1921)
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14 जुलाई 1913
बद्रीदत्त पांडे का प्रथम लेख
कुली बेगार व जंगलात कानून के विरोध में अपना प्रथम लेख लिखा।
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दिसंबर 1918 · हल्द्वानी
द्वितीय अधिवेशन — कुली बेगार पर पहला प्रस्ताव
अध्यक्षता तारादत्त गैरोला ने की।
- इसी अधिवेशन में हरगोविंद पंत द्वारा कुली बेगार प्रथा के विरुद्ध पहला औपचारिक प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया, जिसमें इसे दो वर्ष के भीतर समाप्त करने की मांग की गई
- सरकार को स्पष्ट चेतावनी दी गई — यदि यह कुप्रथा निर्धारित समय में समाप्त नहीं हुई, तो जनता स्वयं सत्याग्रह करेगी।
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1918 व 1920
गांधी जी से कलकत्ता मुलाकात
बद्रीदत्त पांडे ने गांधी जी को कुमाऊं की कुली बेगार प्रथा से गहराई से अवगत कराया।
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दिसंबर 1920 · काशीपुर
चतुर्थ अधिवेशन — सबसे उग्र अधिवेशन
अध्यक्षता हरगोविंद पंत ने की। यह कुमाऊं परिषद का सबसे उग्र अधिवेशन था
- असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव — गोविंद बल्लभ पंत द्वारा तैयार व प्रस्तुत इस प्रस्ताव ने कुमाऊं आंदोलन को राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ दिया।
- बद्री दत्त पांडे ने कुली बेगार, कुली उतार और कुली बर्दायश को 'सामाजिक कलंक' बताया।
- यह 'राय बहादुरों' (ब्रिटिश समर्थकों) की अध्यक्षता के बिना आयोजित पहला अधिवेशन था — प्रगतिवादियों का प्रभाव स्पष्ट।
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1 जनवरी 1921
छामी (Chami) गाँव — कत्यूर घाटी
लगभग 400 लोगों (प्रधानों) ने मंदिर में कुली बेगार न देने की शपथ ली।
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13–14 जनवरी 1921
⭐ बागेश्वर — सरयू तट पर रजिस्टर विसर्जन
- सरयू और गोमती नदी के संगम पर। नेतृत्व: बद्रीदत्त पांडे, हरगोविंद पंत और चिरंजीलाल।
- 40,000 लोगों ने बागनाथ मंदिर में शपथ ली और सभी रजिस्टर सरयू नदी में बहा दिए।
- कुमाऊं कमिश्नर पी. विंढम (P. Wyndham) और डिप्टी कमिश्नर डायबल/डाइस (Dybell/Dyce) मौजूद थे।
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मार्च 1921
उत्तराखंड की प्रथम गिरफ्तारी — मोहन सिंह मेहता
कत्यूर घाटी (कुमाऊँ) से मोहन सिंह मेहता को गिरफ्तार किया गया — वे कुली बेगार आंदोलन में जेल जाने वाले उत्तराखंड के प्रथम व्यक्ति थे। (ध्यान दें: यह वन-आंदोलन में दुर्गा देवी की गिरफ्तारी से भिन्न प्रसंग है)
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विशेष अपवाद
1921 में कुमाऊं में बेगार समाप्त हो गई थी, लेकिन टिहरी और अस्कोट में यह प्रथा तुरंत खत्म नहीं हुई।
2गढ़वाल में आंदोलन और प्रमुख स्थानीय नेतृत्व
चमेठाखाल (30 जनवरी 1921)
बैरिस्टर मुकुंदी लाल — विशाल सभा, बागेश्वर घटना का सीधा समर्थन
कनकोड़ाखाल
अनुसूया प्रसाद बहुगुणा → उपाधि: 'गढ़वाल केशरी'
दुगड्डा सम्मेलन
अध्यक्षता — पुरुषोत्तम दास टंडन
नौगाँव (चाँदकोट)
केशर सिंह रावत → उपाधि: 'दक्षिण गढ़वाल का केशरी'
पिथौरागढ़
प्रयाग दत्त पंत का नेतृत्व
यमकेश्वर
कुंदन सिंह का नेतृत्व
3परीक्षा के लिए High-Yield तथ्य
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उपाधि — कुमाऊं केशरी
बद्रीदत्त पांडे को कुली बेगार आंदोलन की ऐतिहासिक सफलता के बाद यह उपाधि मिली।
उत्तराखंड की प्रथम गिरफ्तारी (पुरुष — कुली बेगार)
मार्च 1921 में मोहन सिंह मेहता — कत्यूर घाटी (कुमाऊँ) में कुली बेगार आंदोलन के दौरान जेल जाने वाले प्रथम व्यक्ति।
प्रसिद्ध पुस्तक
"Uttarakhand में कुली बेगार" — लेखक: शेखर पाठक।
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परीक्षा जाल — तीन अलग-अलग "प्रथम गिरफ्तारी/बंदी" में भ्रमित न हों
उत्तराखंड के स्वतंत्रता/जन-आंदोलनों के इतिहास में "प्रथम गिरफ्तारी" या "प्रथम महिला कैदी" जैसे सामान्य शब्द तीन पूरी तरह भिन्न संदर्भों में प्रयुक्त होते हैं। नीचे दी गई तालिका से स्पष्ट अंतर समझें:
| संदर्भ | व्यक्ति | वर्ष | स्थान / आंदोलन |
|---|---|---|---|
| 1️⃣ प्रथम पुरुष — स्वतंत्रता संग्राम (कुली बेगार) | मोहन सिंह मेहता | 1921 | कत्यूर घाटी, कुमाऊँ — कुली बेगार आंदोलन में जेल जाने वाले प्रथम व्यक्ति |
| 2️⃣ प्रथम महिला — स्थानीय/वन आंदोलन | दुर्गा देवी | 1921 | सोमेश्वर/कौसानी — अंग्रेजी वन कानूनों के विरोध में गिरफ्तार |
| 3️⃣ प्रथम महिला — राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम (सविनय अवज्ञा) | बिश्नी देवी शाह | 1930 | अल्मोड़ा नगरपालिका तिरंगा-प्रकरण (25 मई 1930) |
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याद रखने की कुंजी: मेहता = कुली बेगार के पुरुष; दुर्गा देवी = वन कानून-विरोधी महिला; बिश्नी देवी शाह = राष्ट्रीय आंदोलन की महिला। तीनों भिन्न प्रसंगों में "प्रथम" हैं, इन्हें एक-दूसरे से न जोड़ें।
4कुली बेगार पर प्रसिद्ध उक्तियाँ
"रक्तहीन क्रांति"
महात्मा गांधी
"असहयोग आंदोलन की पहली ईंट"
स्वामी सत्यदेव परिव्राजक
"सभ्य समाज के लिए कलंक"
तारा दत्त गैरोला
"अतिरिक्त श्रम की चोरी"
कार्ल मार्क्स
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कौन थे स्वामी सत्यदेव परिव्राजक?
अल्मोड़ा आगमन (1913): स्वामी सत्यदेव परिव्राजक वर्ष 1913 में अमेरिका भ्रमण के बाद सीधे अल्मोड़ा पहुँचे थे।
'शुद्ध साहित्य समिति' की स्थापना (1913): अल्मोड़ा आते ही उन्होंने 1913 में 'शुद्ध साहित्य समिति' की स्थापना की। (यह तथ्य UKSSSC परीक्षाओं में सीधे पूछा जाता है)
'शुद्ध साहित्य समिति' की स्थापना (1913): अल्मोड़ा आते ही उन्होंने 1913 में 'शुद्ध साहित्य समिति' की स्थापना की। (यह तथ्य UKSSSC परीक्षाओं में सीधे पूछा जाता है)
⟂परीक्षा के लिए Quick Recap
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| प्रथम विरोध | सुमाड़ी गाँव (पौड़ी) — 'पंथ्या दादा' |
| 1822 — पहला सरकारी कदम | कमिश्नर ट्रेल की 'खच्चर सेना' |
| 1904 — हाई कोर्ट निर्णय | खत्याड़ी गाँव केस में बेगार को "अवैध" घोषित |
| 1908 — कुली एजेंसी | संस्थापक जोध सिंह नेगी, पौड़ी गढ़वाल |
| 13–14 जनवरी 1921 | बागेश्वर — 40,000 लोग, नेतृत्व बद्रीदत्त पांडे |
| उपाधि | 'कुमाऊं केशरी' — बद्रीदत्त पांडे |
| प्रथम गिरफ्तारी (पुरुष — कुली बेगार) | मोहन सिंह मेहता (मार्च 1921) |
| अपवाद | टिहरी व अस्कोट में प्रथा तुरंत समाप्त नहीं हुई |