'अल्मोड़ा अखबार' में कुमाऊं क्षेत्र की राजनीतिक एवं सामाजिक समस्याओं के समाधान हेतु एक संगठित मंच की आवश्यकता पर बिंदु प्रकाशित हुआ — यही आगे चलकर 'कुमाऊं परिषद' की परिकल्पना का आधार बना। यह विचार परिषद की वास्तविक स्थापना (1916) से पूरे 8 वर्ष पहले सामने आ चुका था।
लेखक: Deepak Singh Jethi · अंतिम समीक्षा:
कुमाऊं परिषद
1पृष्ठभूमि — परिकल्पना (1908) व लखनऊ में प्रतिनिधित्व (दिसंबर 1916)
2स्थापना — 30 सितंबर 1916, मझेड़ा (नैनीताल)
30 सितंबर 1916 को नैनीताल ज़िले के मझेड़ा गांव में कुमाऊं के प्रबुद्ध राष्ट्रवादियों ने 'कुमाऊँ परिषद्' की औपचारिक स्थापना की।
- कुली बेगार प्रथा (कुली उतार, कुली बर्दायश) का अंत करना।
- अंग्रेजों के वन कानूनों (Forest Laws) का विरोध करना।
- स्थानीय जनता में राजनीतिक व सामाजिक चेतना जागृत करना।
- प्रथम अध्यक्ष — रा.ब. नारायण दत्त छिल्वाल (छिमवाल)
- प्रथम महासचिव — प्रेम वल्लभ पांडे
कुमाऊं परिषद की स्थापना (सितंबर 1916) के ठीक 3 महीने बाद, दिसंबर 1916 में बद्रीदत्त पांडे, गोविन्द बल्लभ पंत और चिरंजी लाल ने नवगठित 'कुमाऊं परिषद' के प्रतिनिधियों के रूप में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के ऐतिहासिक लखनऊ अधिवेशन में भाग लिया।
यहीं से कुमाऊं की क्षेत्रीय समस्याएं — विशेषकर कुली बेगार — लोकमान्य तिलक और महात्मा गांधी जैसे राष्ट्रीय नेताओं के सामने रखी गईं, जिससे उत्तराखण्ड का क्षेत्रीय आंदोलन राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा से जुड़ गया।
- पहली भेंट (1905) — बनारस (वाराणसी) कांग्रेस अधिवेशन में।
- दूसरी भेंट (1916) — लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन में।
- तीसरी भेंट (1917) — कलकत्ता (कोलकाता) में।
- चौथी भेंट (1919) — अमृतसर कांग्रेस अधिवेशन के दौरान (कुछ संदर्भों में 1918/1919 के दिल्ली-अमृतसर दौर के रूप में भी दर्ज, पर मुख्यतः अमृतसर में)।
3अधिवेशन कालक्रम — 6 अधिवेशन (1917 – 1926)
परिषद का प्रथम अधिवेशन अल्मोड़ा में जयदत्त जोशी की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ।
इस सत्र का प्राथमिक उद्देश्य परिषद के विचारों का गांव-गांव में प्रचार-प्रसार करना था, जिससे आम जनमानस तक कुमाऊं की राजनीतिक मांगें पहुँचाई जा सकें।
- जनसंपर्क और प्रचार का मुख्य दायित्व लक्ष्मी दत्त शास्त्री को सौंपा गया।
- कुली बेगार और जंगलात (Forest Act) संबंधी समस्याओं पर पहली बार संगठित रूप से राजनीतिक चर्चा शुरू हुई।
- अध्यक्षता: तारादत्त गैरोला 📖 पत्रकारिता का युग & तारादत्त गैरोला, गिरिजा दत्त नैथानी,विशम्भर दत्त चंदोला नोट्स देखें
- हरगोविंद पंत द्वारा कुली बेगार प्रथा के विरुद्ध पहला औपचारिक प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया।
- कुली बेगार प्रथा को 2 वर्ष के भीतर समाप्त करने की मांग की गई, अन्यथा जनता द्वारा सत्याग्रह करने की चेतावनी दी गई।
- रा.ब. बद्रीदत्त जोशी (नरमपंथी) की अध्यक्षता में कुली बर्दायश (बेगार) प्रथा पर तीखी बहस हुई।
- अधिवेशन के पश्चात परिषद के 100 से अधिक सदस्य (मुकुंदी लाल, बद्री दत्त पांडे, हरगोविंद पंत आदि) INC के अमृतसर अधिवेशन में भाग लेने रवाना हुए।
- इस सत्र ने कुमाऊं और गढ़वाल की राजनीतिक चेतना को एकजुट किया — स्थानीय आंदोलन अब राष्ट्रीय धारा से जुड़ रहा था।
- तत्कालीन खिलाफत आंदोलन के राष्ट्रीय प्रभाव के कारण मुस्लिम समुदाय ने भारी संख्या में भाग लिया और आयोजन में सक्रिय भूमिका निभाई, जिससे हिंदू-मुस्लिम एकता का उत्कृष्ट उदाहरण देखने को मिला।
- उग्र विचारधारा के चरम पर भी बद्री दत्त पांडे जैसे युवा नेताओं ने नरमपंथी अध्यक्ष बद्रीदत्त जोशी के प्रति गहरा सम्मान बनाए रखा — नरम व गरम दल का यह समन्वय इतिहास में 'गुरु-शिष्य भाव' कहलाता है।
- हरगोविंद पंत की अध्यक्षता में कुमाऊं परिषद का सबसे उग्र अधिवेशन आयोजित हुआ।
- गोविंद बल्लभ पंत (G.B. Pant) द्वारा तैयार एवं मंच पर प्रस्तुत असहयोग (Non-cooperation) का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित हुआ, जिसने कुमाऊं आंदोलन को राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम से पूर्णतः जोड़ दिया।
- बद्री दत्त पांडे ने कुली बेगार, कुली उतार और कुली बर्दायश को 'सामाजिक कलंक' बताया।
- यह 'राय बहादुरों' (ब्रिटिश समर्थकों) की अध्यक्षता के बिना आयोजित पहला अधिवेशन था, जिससे प्रगतिवादियों के बढ़ते प्रभाव का स्पष्ट संकेत मिला।
अध्यक्षता बद्रीदत्त पांडे ने की। भूमि बंदोबस्त (Settlement) एवं वन अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हुई — कुमाऊं की ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े ये दोनों विषय परिषद के स्थायी एजेंडे का हिस्सा बन गए। विंढम का कार्यकाल भी इसी वर्ष (1924 में) समाप्त हुआ।
अध्यक्षता बैरिस्टर मुकुंदी लाल ने की। विंढम के कार्यकाल (1914–1924) के पश्चात आयोजित यह छठा एवं अंतिम अधिवेशन रानीखेत के गनियाद्योली स्थान पर हुआ।
🧠Memory Hook — अधिवेशन याद रखें
पहले चार अधिवेशन लगातार वर्षों में हुए (1917→18→19→20), फिर 3-3 वर्ष के अंतराल से अंतिम दो (1923, 1926)। बीच का तीसरा (कोटद्वार, 1919) ही गढ़वाल का एकमात्र अधिवेशन है।
⟂परीक्षा के लिए Quick Recap
| अधिवेशन | वर्ष / स्थान | अध्यक्ष | मुख्य तथ्य |
|---|---|---|---|
| प्रथम | सितंबर 1917 — अल्मोड़ा | जयदत्त जोशी | गांव-गांव प्रचार-प्रसार; जनसंपर्क का दायित्व — लक्ष्मी दत्त शास्त्री; कुली बेगार व Forest Act पर प्रथम संगठित चर्चा |
| द्वितीय | दिसंबर 1918 — हल्द्वानी | तारादत्त गैरोला | कुली बेगार विरुद्ध पहला प्रस्ताव (हरगोविंद पंत); 2 वर्ष की चेतावनी — वरना सत्याग्रह |
| तृतीय ⭐ | अक्टूबर 1919 — कोटद्वार | रा.ब. बद्रीदत्त जोशी | गढ़वाल का एकमात्र अधिवेशन; 100+ सदस्य INC अमृतसर अधिवेशन में गए; हिन्दू-मुस्लिम एकता का सर्वश्रेष्ठ मंच (खिलाफत प्रभाव); गुरु-शिष्य भाव (नरम-गरम दल समन्वय) |
| चतुर्थ | दिसंबर 1920 — काशीपुर | हरगोविंद पंत | सबसे उग्र अधिवेशन; असहयोग प्रस्ताव — तैयार व प्रस्तुत: गोविंद बल्लभ पंत; बेगार = 'सामाजिक कलंक' (बद्री दत्त पांडे); पहला राय बहादुर-मुक्त सत्र |
| पांचवाँ | 1923 — टनकपुर | बद्रीदत्त पांडे | भूमि बंदोबस्त व वन अधिकार |
| छठा (अंतिम) | 1926 — रानीखेत | मुकुंदी लाल | तत्पश्चात INC में विलय |