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लेखक: · अंतिम समीक्षा:

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UKPSC / UKSSSC स्पेशल 1908 – 1926 परिकल्पना से INC विलय तक · संपूर्ण इतिहास

कुमाऊं परिषद

स्थापना — 30 सितंबर 1916, मझेड़ा 6 अधिवेशन · 1917 – 1926
1908परिकल्पना — अल्मोड़ा अखबार
1916स्थापना (सितं.) व लखनऊ (दिसं.)
6कुल अधिवेशन
1917–26अधिवेशन काल
1926INC में विलय

1पृष्ठभूमि — परिकल्पना (1908) व लखनऊ में प्रतिनिधित्व (दिसंबर 1916)

'अल्मोड़ा अखबार' परिकल्पना — संगठित मंच का प्रथम विचार

'अल्मोड़ा अखबार' में कुमाऊं क्षेत्र की राजनीतिक एवं सामाजिक समस्याओं के समाधान हेतु एक संगठित मंच की आवश्यकता पर बिंदु प्रकाशित हुआ — यही आगे चलकर 'कुमाऊं परिषद' की परिकल्पना का आधार बना। यह विचार परिषद की वास्तविक स्थापना (1916) से पूरे 8 वर्ष पहले सामने आ चुका था।

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कनेक्शन: दोनों तिथियों को अलग-अलग याद रखें — परिकल्पना 1908, वास्तविक स्थापना 1916। 'अल्मोड़ा अखबार' के संपूर्ण इतिहास हेतु:   📖 अल्मोड़ा अखबार नोट्स देखें

2स्थापना — 30 सितंबर 1916, मझेड़ा (नैनीताल)

मझेड़ा, नैनीताल कुमाऊं परिषद की औपचारिक स्थापना

30 सितंबर 1916 को नैनीताल ज़िले के मझेड़ा गांव में कुमाऊं के प्रबुद्ध राष्ट्रवादियों ने 'कुमाऊँ परिषद्' की औपचारिक स्थापना की।

मुख्य उद्देश्य
  • कुली बेगार प्रथा (कुली उतार, कुली बर्दायश) का अंत करना।
  • अंग्रेजों के वन कानूनों (Forest Laws) का विरोध करना।
  • स्थानीय जनता में राजनीतिक व सामाजिक चेतना जागृत करना।
प्रथम पदाधिकारी
  • प्रथम अध्यक्ष — रा.ब. नारायण दत्त छिल्वाल (छिमवाल)
  • प्रथम महासचिव — प्रेम वल्लभ पांडे
संस्थापक सदस्य
पं. गोविंद बल्लभ पंत हरगोविंद पंत बद्रीदत्त पांडे विक्टर मोहन जोशी जयदत्त जोशी लक्ष्मी दत्त शास्त्री चिरंजी लाल मथुरादत्त नैथानी भोलादत्त पांडे चंद्रदत्त पांडे
लखनऊ — INC अधिवेशन राष्ट्रीय मंच पर कुमाऊं — स्थापना के 3 माह बाद

कुमाऊं परिषद की स्थापना (सितंबर 1916) के ठीक 3 महीने बाद, दिसंबर 1916 में बद्रीदत्त पांडे, गोविन्द बल्लभ पंत और चिरंजी लाल ने नवगठित 'कुमाऊं परिषद' के प्रतिनिधियों के रूप में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के ऐतिहासिक लखनऊ अधिवेशन में भाग लिया।

यहीं से कुमाऊं की क्षेत्रीय समस्याएं — विशेषकर कुली बेगारलोकमान्य तिलक और महात्मा गांधी जैसे राष्ट्रीय नेताओं के सामने रखी गईं, जिससे उत्तराखण्ड का क्षेत्रीय आंदोलन राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा से जुड़ गया।

"लोकमान्य तिलक के चार बार दर्शन करना, चार धाम की यात्रा पूरी करने के समान है।"
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अनुक्रम याद रखें: पहले स्थापना (सितंबर 1916), फिर लखनऊ (दिसंबर 1916) — लखनऊ परिषद की प्रेरणा नहीं, बल्कि परिषद ने वहाँ अपना प्रतिनिधित्व किया। बद्रीदत्त पांडे की मुलाकात बाल गंगाधर तिलक से हुई, जिन्हें पांडे जी ने अपना "राजनीतिक गुरु" माना।
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बद्रीदत्त पांडे — तिलक से चार भेंट
  • पहली भेंट (1905) — बनारस (वाराणसी) कांग्रेस अधिवेशन में।
  • दूसरी भेंट (1916) — लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन में।
  • तीसरी भेंट (1917) — कलकत्ता (कोलकाता) में।
  • चौथी भेंट (1919) — अमृतसर कांग्रेस अधिवेशन के दौरान (कुछ संदर्भों में 1918/1919 के दिल्ली-अमृतसर दौर के रूप में भी दर्ज, पर मुख्यतः अमृतसर में)।
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साइड नोट — कन्फ्यूजन से बचें: दो अलग-अलग 'जयदत्त जोशी'
कुमाऊं परिषद के संस्थापक सदस्य जयदत्त जोशी (राजनेता), 'समय विनोद' (1868, नैनीताल) के संपादक जयदत्त जोशी (पत्रकार) से भिन्न व्यक्ति हैं — परीक्षा में दोनों को एक न समझें। ('समय विनोद' के विस्तृत तथ्यों हेतु देखें — कमिश्नर रैमजे का कार्यकाल, वर्ष 1868)।

3अधिवेशन कालक्रम — 6 अधिवेशन (1917 – 1926)

1917
अल्मोड़ा
1918
हल्द्वानी
1919
कोटद्वार
1920
काशीपुर
1923
टनकपुर
1926
रानीखेत
अल्मोड़ा प्रथम अधिवेशन

परिषद का प्रथम अधिवेशन अल्मोड़ा में जयदत्त जोशी की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ।
इस सत्र का प्राथमिक उद्देश्य परिषद के विचारों का गांव-गांव में प्रचार-प्रसार करना था, जिससे आम जनमानस तक कुमाऊं की राजनीतिक मांगें पहुँचाई जा सकें।

  • जनसंपर्क और प्रचार का मुख्य दायित्व लक्ष्मी दत्त शास्त्री को सौंपा गया।
  • कुली बेगार और जंगलात (Forest Act) संबंधी समस्याओं पर पहली बार संगठित रूप से राजनीतिक चर्चा शुरू हुई।
हल्द्वानी द्वितीय अधिवेशन
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कुली बेगार के संपूर्ण इतिहास व आगे के सभी प्रस्तावों के लिए:   📖 कुली बेगार नोट्स देखें
कोटद्वार तृतीय अधिवेशन
  • रा.ब. बद्रीदत्त जोशी (नरमपंथी) की अध्यक्षता में कुली बर्दायश (बेगार) प्रथा पर तीखी बहस हुई।
  • अधिवेशन के पश्चात परिषद के 100 से अधिक सदस्य (मुकुंदी लाल, बद्री दत्त पांडे, हरगोविंद पंत आदि) INC के अमृतसर अधिवेशन में भाग लेने रवाना हुए।
  • इस सत्र ने कुमाऊं और गढ़वाल की राजनीतिक चेतना को एकजुट किया — स्थानीय आंदोलन अब राष्ट्रीय धारा से जुड़ रहा था।
  • तत्कालीन खिलाफत आंदोलन के राष्ट्रीय प्रभाव के कारण मुस्लिम समुदाय ने भारी संख्या में भाग लिया और आयोजन में सक्रिय भूमिका निभाई, जिससे हिंदू-मुस्लिम एकता का उत्कृष्ट उदाहरण देखने को मिला।
  • उग्र विचारधारा के चरम पर भी बद्री दत्त पांडे जैसे युवा नेताओं ने नरमपंथी अध्यक्ष बद्रीदत्त जोशी के प्रति गहरा सम्मान बनाए रखा — नरम व गरम दल का यह समन्वय इतिहास में 'गुरु-शिष्य भाव' कहलाता है।
गढ़वाल का एकमात्र अधिवेशन: छह अधिवेशनों में यह इकलौता सत्र है जो गढ़वाल क्षेत्र (कोटद्वार) में आयोजित हुआ — शेष पाँचों सत्र कुमाऊं मंडल में हुए। परीक्षा में बार-बार पूछा जाने वाला तथ्य।
काशीपुर चतुर्थ अधिवेशन
  • हरगोविंद पंत की अध्यक्षता में कुमाऊं परिषद का सबसे उग्र अधिवेशन आयोजित हुआ।
  • गोविंद बल्लभ पंत (G.B. Pant) द्वारा तैयार एवं मंच पर प्रस्तुत असहयोग (Non-cooperation) का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित हुआ, जिसने कुमाऊं आंदोलन को राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम से पूर्णतः जोड़ दिया।
  • बद्री दत्त पांडे ने कुली बेगार, कुली उतार और कुली बर्दायश को 'सामाजिक कलंक' बताया।
  • यह 'राय बहादुरों' (ब्रिटिश समर्थकों) की अध्यक्षता के बिना आयोजित पहला अधिवेशन था, जिससे प्रगतिवादियों के बढ़ते प्रभाव का स्पष्ट संकेत मिला।
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परीक्षा ट्रैप: 'अंतिम अल्टीमेटम' शब्द चतुर्थ अधिवेशन (1920, काशीपुर) से जुड़ा है — द्वितीय (1918) से नहीं। 1918 में दो वर्ष की चेतावनी दी गई थी; 1920 में असहयोग का प्रस्ताव पारित हुआ।
टनकपुर पांचवाँ अधिवेशन

अध्यक्षता बद्रीदत्त पांडे ने की। भूमि बंदोबस्त (Settlement) एवं वन अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हुई — कुमाऊं की ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े ये दोनों विषय परिषद के स्थायी एजेंडे का हिस्सा बन गए। विंढम का कार्यकाल भी इसी वर्ष (1924 में) समाप्त हुआ।

रानीखेत (गनियाद्योली) छठा एवं अंतिम अधिवेशन

अध्यक्षता बैरिस्टर मुकुंदी लाल ने की। विंढम के कार्यकाल (1914–1924) के पश्चात आयोजित यह छठा एवं अंतिम अधिवेशन रानीखेत के गनियाद्योली स्थान पर हुआ।

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INC में विलय: इसी अधिवेशन में कुमाऊं परिषद का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) में औपचारिक विलय हुआ, जिससे यह क्षेत्रीय आंदोलन राष्ट्रीय धारा से पूर्णतः जुड़ गया — परिषद की स्वतंत्र यात्रा यहीं समाप्त होती है।

🧠Memory Hook — अधिवेशन याद रखें

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याद रखने की तरकीब
"अ-ह-को-का-ट-रा" — अल्मोड़ा, हल्द्वानी, कोटद्वार, काशीपुर, टनकपुर, रानीखेत
पहले चार अधिवेशन लगातार वर्षों में हुए (1917→18→19→20), फिर 3-3 वर्ष के अंतराल से अंतिम दो (1923, 1926)। बीच का तीसरा (कोटद्वार, 1919) ही गढ़वाल का एकमात्र अधिवेशन है।
प्रथम अधिवेशन कब व कहाँ हुआ?
सितंबर 1917 — अल्मोड़ा (अध्यक्ष: जयदत्त जोशी)
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प्रथम अधिवेशन में जनसंपर्क का दायित्व किसे सौंपा गया?
लक्ष्मी दत्त शास्त्री
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कुली बेगार के विरुद्ध पहला प्रस्ताव किस अधिवेशन में पारित हुआ?
द्वितीय अधिवेशन — दिसंबर 1918, हल्द्वानी (अध्यक्ष: तारादत्त गैरोला)
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द्वितीय अधिवेशन (1918) में कुली बेगार पर कड़ा प्रस्ताव किसने रखा?
हरगोविंद पंत — 2 वर्ष में समाप्त करने की मांग; वरना सत्याग्रह की चेतावनी
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गढ़वाल में हुआ एकमात्र अधिवेशन कौन सा था?
तृतीय अधिवेशन — अक्टूबर 1919, कोटद्वार (अध्यक्ष: रा.ब. बद्रीदत्त जोशी)
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तृतीय अधिवेशन (1919) के बाद 100+ सदस्य किस INC अधिवेशन में गए?
अमृतसर अधिवेशन — मुकुंदी लाल, बद्री दत्त पांडे, हरगोविंद पंत आदि
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उत्तराखंड के इतिहास में 'हिन्दू-मुस्लिम एकता' का सबसे बड़ा मंच कौन सा अधिवेशन था?
तृतीय अधिवेशन — 1919, कोटद्वार (खिलाफत आंदोलन के प्रभाव में मुस्लिम समुदाय की भारी भागीदारी)
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तृतीय अधिवेशन में नरम व गरम दल के समन्वय को इतिहास में क्या कहा जाता है?
'गुरु-शिष्य भाव' — नरमपंथी अध्यक्ष बद्रीदत्त जोशी के प्रति उग्र युवा नेताओं (बद्री दत्त पांडे आदि) का आदरपूर्ण व्यवहार
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असहयोग का प्रस्ताव किस अधिवेशन में पारित हुआ और किसने तैयार व प्रस्तुत किया?
चतुर्थ अधिवेशन — दिसंबर 1920, काशीपुर (अध्यक्ष: हरगोविंद पंत); प्रस्ताव तैयार व प्रस्तुत — गोविंद बल्लभ पंत (G.B. Pant)
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बेगार प्रथाओं को 'सामाजिक कलंक' किसने कहा और किस अधिवेशन में?
बद्री दत्त पांडे — चतुर्थ अधिवेशन, काशीपुर (1920)
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भूमि बंदोबस्त व वन अधिकारों पर चर्चा किस अधिवेशन में हुई?
पांचवाँ अधिवेशन — 1923, टनकपुर (अध्यक्ष: बद्रीदत्त पांडे)
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कुमाऊं परिषद का INC में विलय कब व किस अधिवेशन में हुआ?
छठा (अंतिम) अधिवेशन — 1926, रानीखेत (अध्यक्ष: मुकुंदी लाल)
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कुमाऊं परिषद की स्थापना कब व कहाँ हुई?
30 सितंबर 1916, मझेड़ा (नैनीताल)
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परिषद की परिकल्पना सबसे पहले कहाँ छपी?
'अल्मोड़ा अखबार' में, 31 मार्च 1908 (स्थापना से 8 वर्ष पूर्व)
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परीक्षा के लिए Quick Recap

अधिवेशनवर्ष / स्थानअध्यक्षमुख्य तथ्य
प्रथमसितंबर 1917 — अल्मोड़ाजयदत्त जोशीगांव-गांव प्रचार-प्रसार; जनसंपर्क का दायित्व — लक्ष्मी दत्त शास्त्री; कुली बेगार व Forest Act पर प्रथम संगठित चर्चा
द्वितीयदिसंबर 1918 — हल्द्वानीतारादत्त गैरोलाकुली बेगार विरुद्ध पहला प्रस्ताव (हरगोविंद पंत); 2 वर्ष की चेतावनी — वरना सत्याग्रह
तृतीय ⭐अक्टूबर 1919 — कोटद्वाररा.ब. बद्रीदत्त जोशीगढ़वाल का एकमात्र अधिवेशन; 100+ सदस्य INC अमृतसर अधिवेशन में गए; हिन्दू-मुस्लिम एकता का सर्वश्रेष्ठ मंच (खिलाफत प्रभाव); गुरु-शिष्य भाव (नरम-गरम दल समन्वय)
चतुर्थदिसंबर 1920 — काशीपुरहरगोविंद पंतसबसे उग्र अधिवेशन; असहयोग प्रस्ताव — तैयार व प्रस्तुत: गोविंद बल्लभ पंत; बेगार = 'सामाजिक कलंक' (बद्री दत्त पांडे); पहला राय बहादुर-मुक्त सत्र
पांचवाँ1923 — टनकपुरबद्रीदत्त पांडेभूमि बंदोबस्त व वन अधिकार
छठा (अंतिम)1926 — रानीखेतमुकुंदी लालतत्पश्चात INC में विलय