लॉर्ड वेलेजली
सहायक संधि, मैसूर, अवध, मराठा राजनीति, फोर्ट विलियम कॉलेज और प्रेस नीति की मूल पूर्ण अध्ययन सामग्री।
परिचय एवं त्वरित सार
भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद का स्वर्णकाल — जिसने सहायक संधि की तलवार से समस्त भारतीय स्वतंत्र शक्तियों को अधीन किया और 7 वर्षों में उपमहाद्वीप का राजनीतिक मानचित्र बदल दिया।
1798 में नेपोलियन का मिस्र अभियान — भारत पर फ्रांसीसी आक्रमण का भय। वेलेजली का एकमात्र लक्ष्य था — भारत में फ्रांसीसी प्रभाव का संपूर्ण उन्मूलन और ब्रिटिश सर्वोच्चता की स्थापना।
पूर्व की 'रिंग फेंस नीति' (बफर राज्य रखो) को वेलेजली ने त्याग दिया। उसका सिद्धांत था — स्वतंत्र भारतीय शक्तियों को अधीनस्थ करो, नहीं तो वे फ्रांस के साथ मिलकर अंग्रेजों को उखाड़ फेंकेंगी।
सहायक संधि प्रणाली (Subsidiary Alliance System)
वेलेजली सहायक संधि का आविष्कारक नहीं, बल्कि इसे औपचारिक और व्यापक रूप देने वाला गवर्नर-जनरल था।
वास्तविक जनक: फ्रांसीसी गवर्नर जोसेफ फ्रांस्वा डुप्ले (Joseph François Dupleix) — जिसने सर्वप्रथम भारतीय राज्यों में सशस्त्र हस्तक्षेप और सेना किराए पर देने की प्रथा आरंभ की।
इलाहाबाद की संधि में दीवानी-निज़ामत का पृथक्करण — सहायक व्यवस्था का प्रारंभिक बीज।
रक्षा के बदले राजस्व — किंतु अलिखित और अनौपचारिक।
अभी भी पूर्णतः संस्थागत नहीं — वेलेजली ने इसे विधिवत रूप दिया।
इस प्रणाली को पूर्णतः संस्थागत (Institutionalise) करके एक लिखित, स्पष्ट और व्यापक नीति के रूप में विधिवत लागू किया। इसे एक कूटनीतिक अस्त्र (Diplomatic Weapon) के रूप में स्थापित किया।
शासक की राजधानी में स्थायी ब्रिटिश सेना रखी जाएगी। इसका संपूर्ण व्यय — नकद या भू-भाग के रूप में — शासक वहन करेगा।
दरबार में एक ब्रिटिश रेजिडेंट नियुक्त होगा। सैद्धांतिक रूप से आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं, परंतु व्यवहार में वह वास्तविक शासक बनता था।
शासक अंग्रेजों की पूर्व-अनुमति के बिना किसी भी युद्ध, संधि या कूटनीतिक पत्राचार से वंचित रहेगा।
शासक अंग्रेजों की लिखित अनुमति के बिना किसी भी यूरोपीय (विशेषतः फ्रांसीसी) को सेना या प्रशासन में नियुक्त नहीं कर सकेगा।
इस संधि ने भारतीय शासकों को औपचारिक रूप से स्वतंत्र किंतु वास्तविक रूप से परतंत्र बना दिया। अंग्रेजों का दायित्व — बाह्य आक्रमणों से सुरक्षा की गारंटी — किंतु यह गारंटी व्यावहारिक रूप से कंपनी के हित में प्रयोग होती थी।
| राज्य | शासक | वर्ष | त्यक्त क्षेत्र / विशेष शर्त |
|---|---|---|---|
| हैदराबाद | निज़ाम अली खान | 1798, 1800 | बेल्लारी, अनंतपुर, कुडप्पा, कर्नूल (Ceded Districts) |
| मैसूर | कृष्णराज वाडियार III (5 वर्षीय) | 1799 | टीपू की मृत्यु के पश्चात् — दीवान पूर्णिया के माध्यम से प्रशासन |
| तंजौर | शरफोजी द्वितीय | 1799 | 40,000 पाउंड (4 लाख रु.) वार्षिक पेंशन पर संपूर्ण प्रशासन समर्पण |
| अवध | सआदत अली खान II | 1801 | रुहेलखंड, निचला दोआब, गोरखपुर (राज्य का लगभग आधा हिस्सा) |
| पेशवा (बेसिन की संधि) | बाजीराव द्वितीय | 31 दिसंबर 1802 | 6,000 ब्रिटिश सैनिक + 26 लाख रुपये वार्षिक राजस्व क्षेत्र |
| भोंसले | राघोजी द्वितीय | 1803 | कटक (ओडिशा), वर्धा नदी के पश्चिम का क्षेत्र |
| सिंधिया | दौलत राव सिंधिया | 1804 | गंगा-यमुना दोआब, दिल्ली, आगरा, अहमदनगर दुर्ग |
| गायकवाड़ | आनंद राव गायकवाड़ | 1805 | वेलेजली के शासनकाल के अंतिम चरण में |
हैदराबाद के निज़ाम अली खान प्रथम शासक थे जिन्होंने स्वेच्छा से सहायक संधि स्वीकार की। स्वेच्छा से स्वीकार करने पर अपेक्षाकृत उदार शर्तें, और पराजय के पश्चात् अत्यंत कठोर।
दक्षिण भारत का विजय अभियान (1799–1801)
| प्राप्तकर्ता | क्षेत्र |
|---|---|
| ब्रिटिश साम्राज्य | कनारा, वायनाड, कोयंबटूर, श्रीरंगपट्टनम |
| हैदराबाद निज़ाम (पुरस्कार) | गूटी, गुर्रमकोंडा — गठबंधन के प्रतिफल |
| वाडियार वंश (पुनर्स्थापना) | शेष मैसूर — 5 वर्षीय कृष्णराज तृतीय, दीवान पूर्णिया (Purnaiah) |
वेलेजली ने पहले से अंग्रेजों के संरक्षण में रह रही रियासतों को 'नाममात्र का राजा' (Titular Ruler) बनाकर उनका संपूर्ण प्रशासन ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया। इसे "Doctrine of Mediatization" कहा गया।
वेलेजली ने बिना किसी बड़े युद्ध के — केवल कूटनीतिक दबाव और उत्तराधिकार विवादों का लाभ उठाकर — दक्षिण भारत का संपूर्ण तटीय प्रशासन अपने नियंत्रण में कर लिया।
उत्तर भारत एवं अवध का अधिग्रहण (1801)
अवध बंगाल की रक्षा के लिए 'बफर स्टेट' के रूप में कार्य करता था। वेलेजली ने इस रक्षात्मक स्थिति को आक्रामक विस्तारवाद में परिवर्तित किया।
एक धमकी को तत्काल स्वीकार करके सबको स्तब्ध करना और नवाब को ऐसे जाल में फँसाना जिससे निकलना असंभव था — यह वेलेजली की सर्वाधिक चतुर कूटनीतिक चाल थी।
1801 की संधि के अंतर्गत अवध का लगभग आधा भू-भाग ब्रिटिश अधिकार में चला गया।
| क्षेत्र | स्थिति | सामरिक महत्व |
|---|---|---|
| रुहेलखंड (Rohilkhand) | अवध के उत्तर-पश्चिम में | अफगान और मराठा संपर्क का मार्ग अवरुद्ध |
| निचला दोआब (Lower Doab) | गंगा-यमुना का उपजाऊ क्षेत्र | इलाहाबाद, कानपुर, इटावा — उत्तर भारत का हृदय |
| गोरखपुर | नेपाल की सीमा से सटा | ब्रिटिश सीमा पहली बार नेपाल से टकराई — 1814-16 के आंग्ल-नेपाल युद्ध का बीज |
इन क्षेत्रों को ऐतिहासिक रूप से 'Ceded Provinces of Oudh' कहा गया।
अवध अब दक्षिण, पूर्व एवं पश्चिम — तीनों ओर से ब्रिटिश साम्राज्य से घिर गया।
दोआब के अधिग्रहण से अवध का सिंधिया (मराठा) से सीधा भूमि-संपर्क पूर्णतः समाप्त।
मराठा साम्राज्य के साथ महासंग्राम (1802–1805)
पूना में सत्ता संघर्ष: पेशवा बाजीराव द्वितीय + सिंधिया बनाम यशवंतराव होलकर।
पूना का युद्ध (अक्टूबर 1802): होलकर ने पेशवा-सिंधिया की संयुक्त सेना को पराजित किया और पूना पर अधिकार किया।
— ब्रिटिश इतिहासकार सिडनी ओवेन
पेशवा मराठा संघ के नाममात्र के प्रमुख थे। जब पेशवा ने ही अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार की, तो मराठा संघ की एकता की नींव हिल गई।
दौलत राव सिंधिया और राघोजी भोंसले द्वितीय ने युद्ध की घोषणा की। होलकर इस गठबंधन में शामिल नहीं हुआ — यह मराठों की सबसे बड़ी कूटनीतिक भूल थी!
| संधि | पक्ष | तिथि | प्रमुख क्षेत्र प्राप्ति |
|---|---|---|---|
| देवगाँव की संधि | राघोजी भोंसले II | दिसंबर 1803 | कटक (ओडिशा) — बंगाल-मद्रास का भूमि संपर्क स्थापित |
| सुरजी-अंजनगाँव की संधि | दौलत राव सिंधिया | दिसंबर 1803 / फरवरी 1804 | गंगा-यमुना दोआब, दिल्ली, आगरा, अहमदनगर दुर्ग |
कटक (ओडिशा) मिलने से बंगाल और मद्रास प्रेसीडेंसी के बीच पहली बार सीधा भूमि-मार्ग स्थापित हुआ — यह ब्रिटिश साम्राज्य की संरचनात्मक एकता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था।
होलकर एकमात्र मराठा सरदार था जिसने वेलेजली के शासनकाल में सहायक संधि स्वीकार नहीं की और अंग्रेजों से अपराजित रहा।
प्रशासन, शिक्षा, प्रेस एवं विरासत
यह भारतीय भाषाओं को ब्रिटिश शिक्षा में स्थान दिलाने का प्रथम ब्रिटिश प्रयास था। इसने अनेक प्रारंभिक प्राच्यविदों (Orientalists) को प्रशिक्षित किया।
वेलेजली भारत में प्रेस पर सर्वाधिक कठोर प्रतिबंध लागू करने वाला प्रथम गवर्नर-जनरल था।
कोई भी सामग्री छापने से पूर्व सरकारी सचिव (Secretary) की अनुमति अनिवार्य।
प्रत्येक समाचार-पत्र में मुद्रक, संपादक एवं स्वामी का नाम छापना अनिवार्य।
उल्लंघन पर संपादक को तुरंत यूरोप निर्वासित (Deport) किया जाएगा।
ब्रिटिश सरकार की किसी भी नीति की सार्वजनिक आलोचना पर संपूर्ण प्रतिबंध।
वेलेजली एक ओर फोर्ट विलियम कॉलेज से ज्ञान को प्रोत्साहित करता था और दूसरी ओर प्रेस सेंसरशिप से विचार-स्वातंत्र्य को कुचलता था। यह उसकी नीतियों का आंतरिक विरोधाभास था।
शांति स्थापित करने के उद्देश्य से वृद्ध लॉर्ड कॉर्नवालिस को दूसरी बार गवर्नर-जनरल बनाकर भेजा गया — परंतु 1805 में ही गाजीपुर (उत्तर प्रदेश) में उनकी मृत्यु हो गई।
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त्वरित संदर्भ — वेलेजली
अंतिम सार-सारणी
| विषय | तथ्य |
|---|---|
| पूरा नाम | Richard Colley Wellesley, Marquess Wellesley |
| उपाधि | अर्ल ऑफ मॉर्निंगटन (Earl of Mornington) |
| कार्यकाल | 1798–1805 (7 वर्ष) |
| उपनाम | "बंगाल का शेर" (Bengal Tiger) |
| विचारधारा | घोर साम्राज्यवादी (Imperialist) |
| पूर्ववर्ती | लॉर्ड सर जॉन शोर (Sir John Shore) |
| उत्तरवर्ती | लॉर्ड कॉर्नवालिस (दूसरी बार, 1805 — गाजीपुर में मृत्यु) |
| मुख्य अस्त्र | Subsidiary Alliance (सहायक संधि) |
| सर्वप्रथम संधि | हैदराबाद के निज़ाम अली खान (1798) |
| सर्वप्रमुख सफलता | टीपू सुल्तान का पतन — 4 मई 1799 |
| वापसी का कारण | होलकर की चुनौती, अत्यधिक ऋण, कंपनी का घाटा |
| भाई | आर्थर वेलेजली — अस्सये और अरगाँव के नायक, बाद में ड्यूक ऑफ वेलिंगटन |