सर जॉन शोर
राजस्व विशेषज्ञ से गवर्नर-जनरल बनने तक—स्थायी बंदोबस्त विवाद, चार्टर एक्ट 1793, खर्डा और अवध के मूल नोट्स।
परिचय एवं त्वरित सार
भू-राजस्व विशेषज्ञ जिसने स्थायी बंदोबस्त का मसौदा तैयार किया, अहस्तक्षेप की नीति अपनाई — और अपनी ही नीति का अपवाद बन गया।
पृष्ठभूमि — जॉन शोर कौन थे?
- सर जॉन शोर का जन्म 1751 में हुआ।
- 1769 में ईस्ट इंडिया कंपनी के Writer (लेखक) के रूप में भारत आए।
- बोर्ड ऑफ रेवेन्यू (Board of Revenue) के अध्यक्ष के रूप में भू-राजस्व विशेषज्ञता हासिल की।
- Permanent Settlement का Blueprint तैयार किया।
- लॉर्ड कॉर्नवालिस के बाद GG बने — पहले Indian Civil Service अधिकारी जो GG बने।
- पिट्स इंडिया एक्ट की नीति में विश्वास: अहस्तक्षेप (Non-Intervention)।
भू-राजस्व नीति — स्थायी बंदोबस्त विवाद
- भूमि का असली मालिक राज्य/कंपनी है
- ज़मींदार केवल कर वसूलने वाले एजेंट हैं
- राज्य जब चाहे उन्हें हटा सकता है
- ऐतिहासिक रूप से ज़मींदार ही असली मालिक हैं
- राज्य का अधिकार केवल निश्चित राजस्व तक
- कॉर्नवालिस ने शोर का तर्क माना
शोर ने भूमि को ज़मींदारों की मानी, लेकिन वह इसे 10 वर्षीय (Decennial) बंदोबस्त बनाना चाहते थे। कॉर्नवालिस ने इसे Permanent (स्थायी) कर दिया — जो भारतीय किसानों के लिए बड़ी त्रासदी बनी।
चार्टर एक्ट 1793
- कंपनी के भारत व्यापार एकाधिकार को अगले 20 वर्ष के लिए बढ़ाया गया।
- सभी नियम व कानून लिखित रूप में होंगे।
- न्यायालयों को इन्हीं लिखित कानूनों से न्याय करना होगा।
- Board of Control के सदस्यों का वेतन अब भारतीय राजस्व से दिया जाएगा।
- यह व्यवस्था 1919 तक चली।
Board of Control का वेतन British Treasury से नहीं बल्कि Indian Revenues से — यह बार-बार पूछा जाता है।
- GG को परिषद के निर्णय रद्द करने की शक्ति — जो पहले केवल कॉर्नवालिस (1786) को थी — अब सभी भविष्य के GG को दी गई।
अहस्तक्षेप की नीति — Policy of Non-Intervention
जॉन शोर ने पिट्स इंडिया एक्ट (1784) की भावना के अनुसार भारतीय राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया।
युद्धों से बचा; तटस्थता बनाए रखी; कंपनी का खर्च कम किया।
खर्डा में निज़ाम की हार; फ्रांसीसी प्रभाव बढ़ा; अंग्रेजी प्रतिष्ठा घटी।
खर्डा का युद्ध — मार्च 1795
- मराठों और हैदराबाद के निज़ाम के बीच चौथ व सरदेशमुखी वसूली का विवाद।
- निज़ाम ने Triple Alliance (1790) का हवाला देकर अंग्रेजों से सैन्य मदद मांगी।
- शोर ने अहस्तक्षेप नीति का तर्क देकर मदद करने से स्पष्ट इनकार किया।
- नाना फड़नवीस के नेतृत्व में मराठों ने निज़ाम को बुरी तरह पराजित किया।
- निज़ाम को भारी हर्जाना और बड़ा क्षेत्र मराठों को देना पड़ा।
निज़ाम अंग्रेजों से नाराज़ हुआ और उसने फ्रांसीसी अधिकारी 'रेमंड' (Raymond) को सेना प्रशिक्षित करने के लिए नियुक्त किया। इससे दक्षिण भारत में फ्रांसीसी प्रभाव पुनः बढ़ गया — यही वेलेज़ली की Subsidiary Alliance की पृष्ठभूमि बनी।
अवध में हस्तक्षेप — विरोधाभास 1797
- अवध के नवाब आसफ-उद-दौला की 1797 में मृत्यु।
- उसका कथित पुत्र वज़ीर अली गद्दी पर बैठा — अंग्रेजों ने प्रारंभ में मान्यता दी।
- वज़ीर अली ब्रिटिश-विरोधी था। शोर ने उसे वैध पुत्र नहीं घोषित किया।
- शोर स्वयं लखनऊ जाकर वज़ीर अली को गद्दी से हटाया।
- सआदत अली खान द्वितीय (आसफ-उद-दौला का भाई) को अवध का नया नवाब बनाया।
- शर्तें: इलाहाबाद किला अंग्रेजों को; ब्रिटिश सेना के लिए subsidy बढ़ाई; वज़ीर अली को बनारस भेजा।
शोर की Non-Intervention नीति का एकमात्र अपवाद = अवध। और यही उनकी सबसे बड़ी विरोधाभासी (Contradictory) नीति मानी जाती है।
बंगाल सेना के यूरोपीय अधिकारियों ने भत्तों की कटौती और पदोन्नति में अनियमितता का विरोध किया। शोर ने उनकी मांगें मान लीं — यह लंदन को कमज़ोरी लगी।
Court of Directors ने शोर को 1798 में वापस बुला लिया और लॉर्ड वेलेज़ली को GG नियुक्त किया।
One-Liners & Previous Year Questions
अंतिम सार-सारणी
| क्षेत्र | मुख्य घटना/नीति | वर्ष | परीक्षा ट्रैप |
|---|---|---|---|
| पहचान | बोर्ड ऑफ रेवेन्यू अध्यक्ष → GG | 1793 | भू-राजस्व विशेषज्ञ थे |
| स्थायी बंदोबस्त | मसौदा शोर ने बनाया; 10 साल का प्रस्ताव दिया | 1793 | मसौदाकार = शोर, पर श्रेय = कॉर्नवालिस को |
| चार्टर एक्ट | कंपनी का 20 साल एकाधिकार बढ़ा; GG शक्ति विस्तार | 1793 | Board of Control का वेतन भारतीय राजस्व से |
| अहस्तक्षेप | पिट्स इंडिया एक्ट की नीति का पालन | 1793-98 | वेलेज़ली ने बाद में इसे बदला |
| खर्डा 1795 | निज़ाम को मदद देने से इनकार → मराठों से हार | मार्च 1795 | फ्रांसीसी 'रेमंड' का आगमन |
| अवध हस्तक्षेप | वज़ीर अली हटाकर सआदत अली खान बैठाया | 1797-98 | अहस्तक्षेप नीति का विरोधाभास |