आधुनिक भारत · Governor-General Series · 04

लॉर्ड वेलेजली

सहायक संधि, मैसूर, अवध, मराठा राजनीति, फोर्ट विलियम कॉलेज और प्रेस नीति की मूल पूर्ण अध्ययन सामग्री।

कार्यकाल1798–1805
मुख्य नीतिSubsidiary Alliance
मैसूर विजय1799
बेसिन की संधि1802
01

परिचय एवं त्वरित सार

UPPCS | UPPCS | UKPSC | BPSC | SSC | Modern History | Governor-General Series

भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद का स्वर्णकाल — जिसने सहायक संधि की तलवार से समस्त भारतीय स्वतंत्र शक्तियों को अधीन किया और 7 वर्षों में उपमहाद्वीप का राजनीतिक मानचित्र बदल दिया।

7
वर्ष का कार्यकाल
8+
राज्य अधीन किए
1799
टीपू का पतन
1802
बेसिन की संधि
01
सहायक संधि की मास्टर नीति
डुप्ले से वेलेजली तक का विकास, 4 शर्तें, और हैदराबाद से गायकवाड़ तक 8 राज्यों का पूरा विवरण।
02
दक्षिण भारत — टीपू, मैसूर, तंजौर, सूरत
चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध 1799, टीपू की शहादत, Mediatization नीति और दक्षिण की समस्त रियासतों का अधिग्रहण।
03
उत्तर भारत — अवध का कूटनीतिक जाल
ज़मान शाह का बहाना, नवाब की विवशता, 1801 की अवध संधि और रुहेलखंड-दोआब-गोरखपुर की प्राप्ति।
04
मराठा महासंग्राम — बेसिन से भरतपुर
बेसिन की संधि 1802, द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध 1803-05, अस्सये-लसवाड़ी के युद्ध और अपराजित होलकर की महागाथा।
05
फोर्ट विलियम कॉलेज, प्रेस एवं विरासत
1800 का फोर्ट विलियम कॉलेज, 1799 का प्रेस सेंसरशिप एक्ट, वापसी के कारण और ऐतिहासिक मूल्यांकन।
06
PYQs — सभी प्रमुख परीक्षाओं के प्रश्न
UPPCS, UPPCS, UKPSC, BPSC, SSC — 22 महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर Active Recall प्रारूप में।
वैचारिक पृष्ठभूमि
भय से उत्पन्न साम्राज्यवाद

1798 में नेपोलियन का मिस्र अभियान — भारत पर फ्रांसीसी आक्रमण का भय। वेलेजली का एकमात्र लक्ष्य था — भारत में फ्रांसीसी प्रभाव का संपूर्ण उन्मूलन और ब्रिटिश सर्वोच्चता की स्थापना।

रिंग फेंस से आक्रमण तक

पूर्व की 'रिंग फेंस नीति' (बफर राज्य रखो) को वेलेजली ने त्याग दिया। उसका सिद्धांत था — स्वतंत्र भारतीय शक्तियों को अधीनस्थ करो, नहीं तो वे फ्रांस के साथ मिलकर अंग्रेजों को उखाड़ फेंकेंगी।

पुनरावर्तन
02

सहायक संधि प्रणाली (Subsidiary Alliance System)

उत्पत्ति, विकास, 4 शर्तें, 8 राज्य — संपूर्ण विश्लेषण
उत्पत्ति एवं वास्तविक जनक — UPPCS Core Fact
परीक्षा में सबसे अधिक पूछा जाने वाला तथ्य

वेलेजली सहायक संधि का आविष्कारक नहीं, बल्कि इसे औपचारिक और व्यापक रूप देने वाला गवर्नर-जनरल था।

वास्तविक जनक: फ्रांसीसी गवर्नर जोसेफ फ्रांस्वा डुप्ले (Joseph François Dupleix) — जिसने सर्वप्रथम भारतीय राज्यों में सशस्त्र हस्तक्षेप और सेना किराए पर देने की प्रथा आरंभ की।

पूर्ववर्ती प्रयोग (Predecessors)
1765
रॉबर्ट क्लाइव — द्वैध शासन (Dual Government)

इलाहाबाद की संधि में दीवानी-निज़ामत का पृथक्करण — सहायक व्यवस्था का प्रारंभिक बीज।

~1780s
वारेन हेस्टिंग्स — अवध के साथ सीमित 'सहायक' व्यवस्था

रक्षा के बदले राजस्व — किंतु अलिखित और अनौपचारिक।

1790
लॉर्ड कॉर्नवालिस — हैदराबाद के साथ प्रथम अर्ध-सहायक व्यवस्था

अभी भी पूर्णतः संस्थागत नहीं — वेलेजली ने इसे विधिवत रूप दिया।

वेलेजली का योगदान

इस प्रणाली को पूर्णतः संस्थागत (Institutionalise) करके एक लिखित, स्पष्ट और व्यापक नीति के रूप में विधिवत लागू किया। इसे एक कूटनीतिक अस्त्र (Diplomatic Weapon) के रूप में स्थापित किया।

सहायक संधि की 4 मूलभूत शर्तें
1 ब्रिटिश सहायक सेना (Subsidiary Force)

शासक की राजधानी में स्थायी ब्रिटिश सेना रखी जाएगी। इसका संपूर्ण व्यय — नकद या भू-भाग के रूप में — शासक वहन करेगा।

2 ब्रिटिश रेजिडेंट (British Resident)

दरबार में एक ब्रिटिश रेजिडेंट नियुक्त होगा। सैद्धांतिक रूप से आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं, परंतु व्यवहार में वह वास्तविक शासक बनता था।

3 विदेश नीति का समर्पण

शासक अंग्रेजों की पूर्व-अनुमति के बिना किसी भी युद्ध, संधि या कूटनीतिक पत्राचार से वंचित रहेगा।

4 यूरोपीय नागरिकों का निष्कासन

शासक अंग्रेजों की लिखित अनुमति के बिना किसी भी यूरोपीय (विशेषतः फ्रांसीसी) को सेना या प्रशासन में नियुक्त नहीं कर सकेगा।

परिणाम — "राजनीतिक दासता का लिखित अनुबंध"

इस संधि ने भारतीय शासकों को औपचारिक रूप से स्वतंत्र किंतु वास्तविक रूप से परतंत्र बना दिया। अंग्रेजों का दायित्व — बाह्य आक्रमणों से सुरक्षा की गारंटी — किंतु यह गारंटी व्यावहारिक रूप से कंपनी के हित में प्रयोग होती थी।

सहायक संधि स्वीकार करने वाले राज्य (1798–1805)
राज्यशासकवर्षत्यक्त क्षेत्र / विशेष शर्त
हैदराबाद निज़ाम अली खान 1798, 1800 बेल्लारी, अनंतपुर, कुडप्पा, कर्नूल (Ceded Districts)
मैसूर कृष्णराज वाडियार III (5 वर्षीय) 1799 टीपू की मृत्यु के पश्चात् — दीवान पूर्णिया के माध्यम से प्रशासन
तंजौर शरफोजी द्वितीय 1799 40,000 पाउंड (4 लाख रु.) वार्षिक पेंशन पर संपूर्ण प्रशासन समर्पण
अवध सआदत अली खान II 1801 रुहेलखंड, निचला दोआब, गोरखपुर (राज्य का लगभग आधा हिस्सा)
पेशवा (बेसिन की संधि) बाजीराव द्वितीय 31 दिसंबर 1802 6,000 ब्रिटिश सैनिक + 26 लाख रुपये वार्षिक राजस्व क्षेत्र
भोंसले राघोजी द्वितीय 1803 कटक (ओडिशा), वर्धा नदी के पश्चिम का क्षेत्र
सिंधिया दौलत राव सिंधिया 1804 गंगा-यमुना दोआब, दिल्ली, आगरा, अहमदनगर दुर्ग
गायकवाड़ आनंद राव गायकवाड़ 1805 वेलेजली के शासनकाल के अंतिम चरण में
UPPCS/PSC Master Fact

हैदराबाद के निज़ाम अली खान प्रथम शासक थे जिन्होंने स्वेच्छा से सहायक संधि स्वीकार की। स्वेच्छा से स्वीकार करने पर अपेक्षाकृत उदार शर्तें, और पराजय के पश्चात् अत्यंत कठोर।

पुनरावर्तन
03

दक्षिण भारत का विजय अभियान (1799–1801)

टीपू का पतन · मैसूर · तंजौर · सूरत · कर्नाटक · Mediatization
चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध (1799) एवं टीपू सुल्तान का वीरांत
युद्ध के प्रमुख कारण
टीपू ने क्यों नहीं माना?
  • टीपू ने मॉरीशस (फ्रांसीसी), अफगानिस्तान और तुर्की को ब्रिटिश-विरोधी गठबंधन हेतु पत्र लिखे।
  • टीपू ने 1787 में 'जकोबिन क्लब' (Jacobin Club) की मैसूर में स्थापना की और स्वयं को 'नागरिक टीपू' (Citoyen Tippu) घोषित किया।
  • वेलेजली के सहायक संधि के अल्टीमेटम को टीपू ने दृढ़ता से अस्वीकार किया।
  • त्रिकोणीय आक्रमण — ब्रिटिश रणनीति
    पूर्व से
    जनरल हैरिस + आर्थर वेलेजली
    पश्चिम से
    जनरल स्टुअर्ट (बॉम्बे सेना)
    उत्तर से
    हैदराबाद के निज़ाम की सहायक सेना
    श्रीरंगपट्टनम का पतन — 4 मई 1799
  • टीपू सुल्तान श्रीरंगपट्टनम के किले के जल-द्वार (Water Gate) पर लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
  • उनका पार्थिव शरीर ढेर सारे अन्य शवों के बीच पहचाना गया।
  • टीपू की मृत्यु भारत में फ्रांसीसी प्रभाव के अंत का प्रतीक बनी।
  • टीपू अंतिम भारतीय शासक थे जिन्होंने सहायक संधि को अस्वीकार किया।
  • मैसूर का विभाजन
    प्राप्तकर्ताक्षेत्र
    ब्रिटिश साम्राज्यकनारा, वायनाड, कोयंबटूर, श्रीरंगपट्टनम
    हैदराबाद निज़ाम (पुरस्कार)गूटी, गुर्रमकोंडा — गठबंधन के प्रतिफल
    वाडियार वंश (पुनर्स्थापना)शेष मैसूर — 5 वर्षीय कृष्णराज तृतीय, दीवान पूर्णिया (Purnaiah)
    Mediatization — रियासतों का नाममात्र शासन (1799–1801)
    नीति क्या थी?

    वेलेजली ने पहले से अंग्रेजों के संरक्षण में रह रही रियासतों को 'नाममात्र का राजा' (Titular Ruler) बनाकर उनका संपूर्ण प्रशासन ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया। इसे "Doctrine of Mediatization" कहा गया।

    अक्टूबर 1799
    तंजौर (Tanjore)
  • कारण: उत्तराधिकार विवाद — वेलेजली ने शरफोजी द्वितीय के दावे का समर्थन किया।
  • परिणाम: 40,000 पाउंड वार्षिक पेंशन के बदले संपूर्ण प्रशासन कंपनी को सौंपा।
  • मार्च 1800
    सूरत (Surat)
  • कारण: 1799 में नवाब की मृत्यु — उत्तराधिकारी को गद्दी की शर्त।
  • परिणाम: नए नवाब को मान्यता तभी — जब पूरा प्रशासन कंपनी को सौंप दे।
  • जुलाई 1801
    कर्नाटक / आर्काट (Carnatic)
  • आरोप: नवाब उमदत-उल-उमरा ने टीपू के साथ गुप्त राजद्रोही पत्राचार किया।
  • परिणाम: अज़ीम-उद-दौला को नाममात्र के नवाब घोषित किया — राजस्व का 1/5 भाग पेंशन।
  • निष्कर्ष — "अहिंसक साम्राज्यवाद का प्रथम प्रयोग"

    वेलेजली ने बिना किसी बड़े युद्ध के — केवल कूटनीतिक दबाव और उत्तराधिकार विवादों का लाभ उठाकर — दक्षिण भारत का संपूर्ण तटीय प्रशासन अपने नियंत्रण में कर लिया।

    पुनरावर्तन
    04

    उत्तर भारत एवं अवध का अधिग्रहण (1801)

    बिना युद्ध के साम्राज्य विस्तार — वेलेजली की सबसे चतुर कूटनीतिक चाल
    अवध पर दबाव — ज़मान शाह का कूटनीतिक बहाना
    सामरिक महत्व

    अवध बंगाल की रक्षा के लिए 'बफर स्टेट' के रूप में कार्य करता था। वेलेजली ने इस रक्षात्मक स्थिति को आक्रामक विस्तारवाद में परिवर्तित किया।

    वेलेजली की चाल — तीन चरण
    चरण 1 — 1800
    ज़मान शाह के आक्रमण का भय
  • अफगानिस्तान के ज़मान शाह ने उत्तर भारत पर आक्रमण की धमकी दी।
  • वेलेजली ने नवाब सआदत अली खान II को पत्र लिखकर कहा — अवध की सेना ज़मान शाह का सामना करने में सर्वथा अक्षम है
  • चरण 2
    अपमानजनक मांगें
  • नवाब अपनी स्वयं की समस्त सेना को तुरंत भंग (Disband) करे।
  • अवध में ब्रिटिश सेना की संख्या में भारी वृद्धि करे।
  • इसके व्यय हेतु अवध का एक बड़ा भू-भाग स्थायी रूप से कंपनी को सौंपे।
  • नवंबर 1801
    नवाब की अंतिम पराजय — संधि पर हस्ताक्षर
  • नवाब ने गद्दी छोड़ने की धमकी दी — वेलेजली ने तुरंत स्वीकार किया!
  • भयाक्रांत नवाब को त्यागपत्र वापस लेना पड़ा और 1801 की अत्यंत कठोर सहायक संधि पर हस्ताक्षर करने पड़े।
  • UPPCS Lesson — सर्वश्रेष्ठ कूटनीतिक चाल

    एक धमकी को तत्काल स्वीकार करके सबको स्तब्ध करना और नवाब को ऐसे जाल में फँसाना जिससे निकलना असंभव था — यह वेलेजली की सर्वाधिक चतुर कूटनीतिक चाल थी।

    छीने गए क्षेत्र एवं दूरगामी परिणाम

    1801 की संधि के अंतर्गत अवध का लगभग आधा भू-भाग ब्रिटिश अधिकार में चला गया।

    क्षेत्रस्थितिसामरिक महत्व
    रुहेलखंड (Rohilkhand)अवध के उत्तर-पश्चिम मेंअफगान और मराठा संपर्क का मार्ग अवरुद्ध
    निचला दोआब (Lower Doab)गंगा-यमुना का उपजाऊ क्षेत्रइलाहाबाद, कानपुर, इटावा — उत्तर भारत का हृदय
    गोरखपुर नेपाल की सीमा से सटाब्रिटिश सीमा पहली बार नेपाल से टकराई — 1814-16 के आंग्ल-नेपाल युद्ध का बीज

    इन क्षेत्रों को ऐतिहासिक रूप से 'Ceded Provinces of Oudh' कहा गया।

    तीन दिशाओं से घेराव

    अवध अब दक्षिण, पूर्व एवं पश्चिम — तीनों ओर से ब्रिटिश साम्राज्य से घिर गया।

    मराठा संपर्क का विच्छेद

    दोआब के अधिग्रहण से अवध का सिंधिया (मराठा) से सीधा भूमि-संपर्क पूर्णतः समाप्त।

    पुनरावर्तन
    05

    मराठा साम्राज्य के साथ महासंग्राम (1802–1805)

    बेसिन की संधि · द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध · होलकर की अपराजित गाथा
    बेसिन की संधि — 31 दिसंबर 1802
    पृष्ठभूमि — मराठा गृहयुद्ध

    पूना में सत्ता संघर्ष: पेशवा बाजीराव द्वितीय + सिंधिया बनाम यशवंतराव होलकर

    पूना का युद्ध (अक्टूबर 1802): होलकर ने पेशवा-सिंधिया की संयुक्त सेना को पराजित किया और पूना पर अधिकार किया।

    संधि की अपमानजनक शर्तें
    विदेश नीति
    पेशवा की विदेश नीति पर अंग्रेजों का एकाधिकार
    ब्रिटिश सेना
    6,000 सैनिक पूना में स्थायी
    राजस्व क्षेत्र
    26 लाख रुपये वार्षिक आय का क्षेत्र
    "बेसिन की संधि ने ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत का साम्राज्य दे दिया।"
    — ब्रिटिश इतिहासकार सिडनी ओवेन
    महत्व

    पेशवा मराठा संघ के नाममात्र के प्रमुख थे। जब पेशवा ने ही अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार की, तो मराठा संघ की एकता की नींव हिल गई।

    द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803–1805) — द्विमोर्चा अभियान
    महत्वपूर्ण — UPPCS Trap

    दौलत राव सिंधिया और राघोजी भोंसले द्वितीय ने युद्ध की घोषणा की। होलकर इस गठबंधन में शामिल नहीं हुआ — यह मराठों की सबसे बड़ी कूटनीतिक भूल थी!

    दक्कन मोर्चा — आर्थर वेलेजली
  • अस्सये का युद्ध (23 सितंबर 1803): सिंधिया और भोंसले की संयुक्त सेना को निर्णायक पराजय। (आर्थर वेलेजली ने इसे अपने जीवन की सर्वाधिक कठिन लड़ाई कहा।)
  • अरगाँव का युद्ध (29 नवंबर 1803): भोंसले की सेना का अंतिम पराजय।
  • उत्तर मोर्चा — जनरल लॉर्ड लेक
  • लसवाड़ी का युद्ध (1 नवंबर 1803): सिंधिया की सेना का संपूर्ण विनाश।
  • प्रमुख विजय: अलीगढ़, दिल्ली, आगरा पर ब्रिटिश नियंत्रण।
  • मुग़ल बादशाह: शाह आलम द्वितीय अब अंग्रेजों का पेंशनभोगी आश्रित।
  • पराजय संधियाँ (1803–1804)
    संधिपक्षतिथिप्रमुख क्षेत्र प्राप्ति
    देवगाँव की संधि राघोजी भोंसले II दिसंबर 1803 कटक (ओडिशा) — बंगाल-मद्रास का भूमि संपर्क स्थापित
    सुरजी-अंजनगाँव की संधि दौलत राव सिंधिया दिसंबर 1803 / फरवरी 1804 गंगा-यमुना दोआब, दिल्ली, आगरा, अहमदनगर दुर्ग
    देवगाँव संधि का सामरिक महत्व

    कटक (ओडिशा) मिलने से बंगाल और मद्रास प्रेसीडेंसी के बीच पहली बार सीधा भूमि-मार्ग स्थापित हुआ — यह ब्रिटिश साम्राज्य की संरचनात्मक एकता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था।

    यशवंतराव होलकर — एकमात्र अपराजित मराठा (1804–1805)
    UPPCS/PSC Trap — यह प्रश्न बार-बार आता है!

    होलकर एकमात्र मराठा सरदार था जिसने वेलेजली के शासनकाल में सहायक संधि स्वीकार नहीं की और अंग्रेजों से अपराजित रहा।

    1804
    होलकर का एकाकी युद्ध
  • पारंपरिक युद्ध के बजाय छापामार रणनीति (Guerrilla Warfare) अपनाई।
  • ब्रिटिश कर्नल मॉन्सन (Colonel Monson) की सेना को पीछे खदेड़ दिया — अंग्रेजों के लिए अत्यंत लज्जास्पद पराजय।
  • 1805
    भरतपुर का घेरा — अंग्रेजों की नाकामी
  • जनरल लॉर्ड लेक ने होलकर का पीछा करते हुए भरतपुर (राजस्थान) के किले को घेरा।
  • 4 महीनों तक निरंतर प्रयासों के बावजूद किला नहीं जीत सके।
  • जाट राजा रणजीत सिंह भरतपुर ने होलकर का साथ दिया।
  • यह खर्चीली विफलता वेलेजली के पतन का प्रत्यक्ष कारण बनी।
  • पुनरावर्तन
    06

    प्रशासन, शिक्षा, प्रेस एवं विरासत

    फोर्ट विलियम कॉलेज · प्रेस सेंसरशिप · वेलेजली की विदाई · ऐतिहासिक मूल्यांकन
    फोर्ट विलियम कॉलेज — 1800
    स्थापना
    1800
    स्थान
    कलकत्ता
    उद्देश्य
    सिविल सेवा प्रशिक्षण
    नागरिक प्रशिक्षण बंद
    1802
    पढ़ाए जाने वाले विषय
    भारतीय भाषाएं एवं संस्कृति
  • हिंदुस्तानी, बंगाली, फ़ारसी, तेलुगू, संस्कृत
  • भारतीय कानून, इतिहास, दर्शन एवं प्रशासन के सिद्धांत
  • भारतीय रीति-रिवाज एवं सामाजिक व्यवस्था
  • विवाद एवं विकल्प
    क्यों बंद हुआ?
  • वेलेजली ने इसे लंदन की पूर्वानुमति के बिना स्थापित किया — विवाद का विषय बना।
  • अत्यधिक खर्च के कारण 1802 में 'कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स' ने नागरिक प्रशिक्षण बंद करने का आदेश दिया।
  • विकल्प के रूप में 1806 में इंग्लैंड में 'हेलीबरी कॉलेज (Haileybury College)' खोला गया।
  • महत्व — भारतीय भाषाओं को औपचारिक शिक्षा में

    यह भारतीय भाषाओं को ब्रिटिश शिक्षा में स्थान दिलाने का प्रथम ब्रिटिश प्रयास था। इसने अनेक प्रारंभिक प्राच्यविदों (Orientalists) को प्रशिक्षित किया।

    प्रेस सेंसरशिप एक्ट — 1799

    वेलेजली भारत में प्रेस पर सर्वाधिक कठोर प्रतिबंध लागू करने वाला प्रथम गवर्नर-जनरल था।

    तात्कालिक कारण — नेपोलियन का भय
  • नेपोलियन का मिस्र अभियान (1798-99) — भारत की ओर संभावित अग्रसर।
  • भारत के अनेक समाचारपत्र फ्रांसीसियों एवं असंतुष्ट अंग्रेजों द्वारा संचालित थे।
  • आशंका: ये अखबार गुप्त सैन्य जानकारी लीक कर सकते हैं।
  • 1799 के 'Censorship of Press Act' के 4 प्रावधान
    1 पूर्व-सेंसरशिप (Pre-censorship)

    कोई भी सामग्री छापने से पूर्व सरकारी सचिव (Secretary) की अनुमति अनिवार्य।

    2 अनिवार्य नाम प्रकाशन

    प्रत्येक समाचार-पत्र में मुद्रक, संपादक एवं स्वामी का नाम छापना अनिवार्य।

    3 कठोर दंड

    उल्लंघन पर संपादक को तुरंत यूरोप निर्वासित (Deport) किया जाएगा।

    4 नीति-आलोचना प्रतिबंध

    ब्रिटिश सरकार की किसी भी नीति की सार्वजनिक आलोचना पर संपूर्ण प्रतिबंध।

    ऐतिहासिक विडंबना

    वेलेजली एक ओर फोर्ट विलियम कॉलेज से ज्ञान को प्रोत्साहित करता था और दूसरी ओर प्रेस सेंसरशिप से विचार-स्वातंत्र्य को कुचलता था। यह उसकी नीतियों का आंतरिक विरोधाभास था।

    वेलेजली की विदाई — 1805
    वापसी के प्रमुख कारण
  • अत्यधिक ऋण: लगातार युद्धों के कारण कंपनी का खजाना रिक्त — 'कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स' व्यापारिक घाटे से चिंतित।
  • होलकर की चुनौती: भरतपुर के घेरे में जनरल लेक की विफलता — लंदन के धैर्य का अंत।
  • अनियंत्रित विस्तारवाद: 'कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स' वेलेजली की आक्रामक नीति से तंग आ चुके थे।
  • बिना अनुमति के निर्णय: फोर्ट विलियम कॉलेज जैसी स्थापनाएं बिना लंदन की सहमति — अनुशासनहीनता।
  • उत्तराधिकारी की दुखद कहानी

    शांति स्थापित करने के उद्देश्य से वृद्ध लॉर्ड कॉर्नवालिस को दूसरी बार गवर्नर-जनरल बनाकर भेजा गया — परंतु 1805 में ही गाजीपुर (उत्तर प्रदेश) में उनकी मृत्यु हो गई।

    ऐतिहासिक मूल्यांकन — वेलेजली की विरासत
    सकारात्मक पक्ष
  • भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव को अजेय बनाया।
  • फ्रांसीसी खतरे का संपूर्ण उन्मूलन किया।
  • फोर्ट विलियम कॉलेज — भारतीय भाषाओं को औपचारिक शिक्षा में स्थान।
  • 7 वर्षों में भारत का राजनीतिक मानचित्र आमूलचूल बदला।
  • नकारात्मक पक्ष
  • अत्यधिक ऋण — कंपनी दिवालियेपन के कगार पर।
  • भारतीय स्वतंत्रता का हनन — सहायक संधि से राज्यों की परतंत्रता।
  • प्रेस की स्वतंत्रता का दमन — 1799 का सेंसरशिप एक्ट।
  • होलकर के विरुद्ध विफलता — सैन्य अपराजेयता का मिथक टूटा।
  • "वेलेजली एक साम्राज्यवादी था, परंतु उसके साम्राज्यवाद ने ब्रिटेन के लिए वह नींव रखी जिस पर अगले 150 वर्षों का भारतीय शासन टिका।"
    पुनरावर्तन
    07

    PYQs एवं One-Liners

    UPPCS · UPPCS · UKPSC · BPSC · SSC — परीक्षा में बार-बार आने वाले प्रश्न
    Active Recall मोड

    ऊपर sidebar में स्मृति मोड सक्रिय करें — उत्तर छिप जाएंगे। प्रत्येक उत्तर पर क्लिक करके स्वयं परीक्षण करें।

    पुनरावर्तन
    08

    त्वरित संदर्भ — वेलेजली

    35 महत्वपूर्ण तथ्य — परीक्षा से 1 दिन पहले अवश्य पढ़ें
    पुनरावर्तन
    09

    अंतिम सार-सारणी

    विषयतथ्य
    पूरा नामRichard Colley Wellesley, Marquess Wellesley
    उपाधिअर्ल ऑफ मॉर्निंगटन (Earl of Mornington)
    कार्यकाल1798–1805 (7 वर्ष)
    उपनाम"बंगाल का शेर" (Bengal Tiger)
    विचारधाराघोर साम्राज्यवादी (Imperialist)
    पूर्ववर्तीलॉर्ड सर जॉन शोर (Sir John Shore)
    उत्तरवर्तीलॉर्ड कॉर्नवालिस (दूसरी बार, 1805 — गाजीपुर में मृत्यु)
    मुख्य अस्त्रSubsidiary Alliance (सहायक संधि)
    सर्वप्रथम संधिहैदराबाद के निज़ाम अली खान (1798)
    सर्वप्रमुख सफलताटीपू सुल्तान का पतन — 4 मई 1799
    वापसी का कारणहोलकर की चुनौती, अत्यधिक ऋण, कंपनी का घाटा
    भाईआर्थर वेलेजली — अस्सये और अरगाँव के नायक, बाद में ड्यूक ऑफ वेलिंगटन
    पुनरावर्तन
    अगला अध्यायसर जॉर्ज बार्लोकार्यकाल: 1805–1807 · स्थिति: कार्यवाहक गवर्नर-जनरल