रूस की क्रांति (1917)
मुख्य विषय: निरंकुश जारशाही, सामाजिक-आर्थिक संकट, 1905 की क्रांति, प्रथम विश्व युद्ध, फरवरी एवं अक्टूबर क्रांति, लेनिन की नीतियाँ और वैश्विक प्रभाव।
01 राजनीतिक एवं सामाजिक कारण
- निरंकुश राजतंत्र: 1917 तक रूस में निरंकुश एवं स्वेच्छाचारी जारशाही कायम थी।
- सामाजिक असमानता: रूसी समाज में कुलीन एवं भूस्वामी वर्ग विशेषाधिकार प्राप्त था, जबकि विशाल कृषक वर्ग आर्थिक रूप से पिछड़ा और असंतुष्ट था।
- दास प्रथा की समाप्ति (1861): जार अलेक्जेंडर द्वितीय ने 1861 में दास प्रथा (Serfdom) समाप्त की। किसानों को स्वतंत्रता तो मिली, लेकिन भूमि की कमी और आर्थिक बोझ के कारण उनकी स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ।
- रूसीकरण की नीति: जारशाही द्वारा Russification की नीति अपनाई गई, जिसके कारण गैर-रूसी राष्ट्रीयताओं में असंतोष बढ़ा।
02 आर्थिक एवं औद्योगिक कारण
- कृषि सुधार (स्टोलिपिन की नीतियाँ): रूसी प्रधानमंत्री प्योटर स्टोलिपिन ने कृषि सुधार लागू किए। इन सुधारों से समृद्ध किसान वर्ग ‘कुलक’ (Kulaks) मजबूत हुआ, जबकि छोटे और गरीब किसानों की समस्याएँ बनी रहीं।
- औद्योगीकरण की सीमाएँ:
- औद्योगिक विकास कुछ प्रमुख क्षेत्रों तक ही सीमित रहा।
- अर्थव्यवस्था और उद्योगों में राज्य का प्रभाव अधिक था।
- सरकारी खर्च और औद्योगिक विकास का भार किसानों पर करों के रूप में पड़ा।
- परिणाम: आर्थिक असमानता और कठिन परिस्थितियों के कारण श्रमिक वर्ग में वर्गीय चेतना बढ़ी और जारशाही के प्रति असंतोष तीव्र हुआ।
राजनीतिक दलों का उदय
क्रांति की पृष्ठभूमि तैयार करने में दो प्रमुख राजनीतिक दल महत्वपूर्ण रहे:
| दल | स्थापना वर्ष | प्रमुख जनाधार | प्रमुख बिंदु |
|---|---|---|---|
| सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी | 1898 | औद्योगिक मजदूर | 1903 में विभाजन — मेंशेविक (Menshevik) और बोल्शेविक (Bolshevik) |
| सोशल रिवोल्यूशनरी पार्टी | 1901 | किसान वर्ग | भूमि सुधार और कृषकों के अधिकारों पर केंद्रित |
03 1905 की घटनाएँ एवं प्रथम विश्व युद्ध
1905 की क्रांति एवं ड्यूमा
- रूस-जापान युद्ध (1904–1905): रूस की जापान से पराजय ने जारशाही की प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुँचाया।
- 22 जनवरी 1905 — रक्तरंजित रविवार (Bloody Sunday): फादर गैपॉन के नेतृत्व में मजदूर विंटर पैलेस, सेंट पीटर्सबर्ग की ओर बढ़े। सैनिकों की गोलीबारी ने जन-असंतोष को भड़का दिया और 1905 की क्रांति का तात्कालिक कारण बनी।
- ड्यूमा: 1905 की क्रांति के बाद जार निकोलस द्वितीय ने प्रतिनिधि सभा ड्यूमा की स्थापना स्वीकार की।
- प्रथम स्टेट ड्यूमा: इसकी पहली बैठक 1906 में हुई।
- जारशाही के प्रति बढ़ता असंतोष: मध्यम वर्ग, किसान और अन्य सामाजिक समूह आर्थिक कठिनाइयों तथा सरकारी नीतियों से असंतुष्ट होते गए।
प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) का प्रभाव
प्रथम विश्व युद्ध ने रूस के राजनीतिक और आर्थिक संकट को अत्यंत गंभीर बना दिया।
- युद्ध की कमजोर तैयारी: रूस पर्याप्त सैन्य और आर्थिक तैयारी के बिना युद्ध में उतरा, जिससे सेना को भारी क्षति और देश में आवश्यक वस्तुओं की कमी हुई।
- आर्थिक संकट: युद्ध व्यय में वृद्धि, मुद्रा प्रसार और आपूर्ति व्यवस्था के बिगड़ने से मुद्रास्फीति और महँगाई तेजी से बढ़ी।
- सैन्य विफलताएँ: लगातार पराजयों और भारी जनहानि से सेना और जनता का जारशाही पर विश्वास कम हुआ।
- जार द्वारा सेना की कमान: निकोलस द्वितीय ने 1915 में सेना की सर्वोच्च कमान स्वयं संभाल ली, जिससे सैन्य असफलताओं की जिम्मेदारी सीधे उस पर आने लगी।
- राजधानी में राजनीतिक संकट: जार की अनुपस्थिति में जारिना अलेक्जेंड्रा और रासपुतिन का प्रभाव बढ़ा, जिससे राजदरबार की प्रतिष्ठा और अधिक कमजोर हुई।
04 राजतंत्र का अंत और लेनिन का आगमन
राजतंत्र का अंत और लेनिन का आगमन
- 15 मार्च 1917 — फरवरी क्रांति: जार निकोलस द्वितीय ने सिंहासन त्याग दिया। इसके साथ रोमानोव वंश तथा जारशाही का अंत हुआ।
- अप्रैल 1917 — लेनिन की वापसी: व्लादिमीर लेनिन निर्वासन से रूस लौटे और बोल्शेविकों का नेतृत्व मजबूत किया।
- जुलाई 1917 — केरेन्स्की: अलेक्जेंडर केरेन्स्की अस्थायी सरकार के प्रधानमंत्री बने।
अक्टूबर क्रांति
- 25 अक्टूबर 1917 (पुराना रूसी कैलेंडर) / 7 नवंबर 1917 (Gregorian) — अक्टूबर क्रांति: बोल्शेविकों ने अस्थायी सरकार को हटाकर सत्ता पर अधिकार कर लिया।
- 1917 — प्रमुख नारा: “शांति, भूमि और रोटी” — लेनिन/बोल्शेविकों का प्रमुख नारा।
प्रमुख राजनीतिक दल
| दल | प्रमुख आधार | प्रमुख दृष्टिकोण |
|---|---|---|
| सोशल रिवोल्यूशनरी पार्टी | किसान वर्ग | भूमि सुधार और कृषक हित |
| मेंशेविक | औद्योगिक मजदूर | पहले बुर्जुआ-लोकतांत्रिक चरण, फिर समाजवादी क्रांति |
| बोल्शेविक | औद्योगिक मजदूर; लेनिन | सर्वहारा के नेतृत्व में समाजवादी क्रांति |
05 व्लादिमीर लेनिन: विचारधारा, नीतियाँ और सफलता
कार्ल मार्क्स के अनुसार सर्वहारा क्रांति सबसे पहले औद्योगिक देश में होगी, लेकिन लेनिन ने इसे रूस की परिस्थिति के अनुसार ढाला। लेनिन के अनुसार— "पूंजीवादी व्यवस्था एक सशक्त जंजीर है, तथा सर्वहारा वर्ग को इसके सबसे कमज़ोर भाग पर चोट करनी चाहिए।"
अप्रैल थीसिस (April Theses): लेनिन ने अप्रैल 1917 में निर्वासन से रूस लौटने के बाद इसे प्रस्तुत किया। इसमें प्रथम विश्व युद्ध से रूस की वापसी, बैंकों के राष्ट्रीयकरण, उद्योगों एवं उत्पादन पर श्रमिक नियंत्रण तथा सत्ता सोवियतों को हस्तांतरित करने जैसे प्रमुख निर्देश दिए गए।
पुस्तक का नाम: Two Tactics of Social-Democracy लेखक: व्लादिमीर लेनिन
पुस्तक का नाम: Two Tactics of Social-Democracy लेखक: व्लादिमीर लेनिन
लेनिन की सफलता के प्रमुख कारण
- उचित समय पर निर्णय: इसी कारण अक्टूबर 1917 में लेनिन द्वारा बोल्शेविक पार्टी का रूस पर नियंत्रण स्थापित हो सका।
- अवसरवादी दृष्टिकोण।
- प्रतिपक्ष के खिलाफ आक्रामक नीति।
अक्टूबर 1917 में सत्ता में आने के बाद लेनिन के प्रमुख कार्य
- 3 मार्च 1918 — ब्रेस्ट-लिटोव्स्क संधि: सोवियत रूस और Central Powers के बीच हुई; इसके साथ रूस प्रथम विश्व युद्ध से बाहर हुआ।
- भूमि का पुनर्वितरण: किसानों के बीच भूमि बांटी गई, जिससे किसान खुश हुए।
- आतंक व रियासत की नीति:
- विरोधियों को कुचलने के लिए "चेका" नामक गुप्त पुलिस संगठन बनाया।
- रियासत नीति के तहत अल्पसंख्यकों को नई पहचान दिलाई।
- नई आर्थिक नीति (NEP - 1921): इसके अंतर्गत मिश्रित अर्थव्यवस्था अपनाई गई। कृषि, निजी व्यापार तथा छोटे और मध्यम उद्योगों में सीमित निजी गतिविधि एवं बाज़ार की अनुमति दी गई, जबकि भारी उद्योग, बैंकिंग, परिवहन और विदेशी व्यापार जैसे अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रों पर राज्य का नियंत्रण बना रहा।
06 रूस की क्रांति की देन (वैश्विक प्रभाव)
- विश्व की पहली सर्वहारा (श्रमिक वर्ग) क्रांति: यह इतिहास की पहली सफल श्रमिक क्रांति थी।
- वैचारिक प्रभाव: रूसी क्रांति ने पूँजीवाद और समाजवाद के बीच वैश्विक वैचारिक विभाजन को गहरा किया।
- समाजवादी विचारधारा का सर्वाधिक प्रसार: पूरे विश्व में यह विचारधारा तेजी से फैली।
- आर्थिक नियोजन व राज्य नियंत्रित अर्थव्यवस्था: इसका लाभ यह हुआ कि 1929-30 की वैश्विक आर्थिक महामंदी का रूस पर बहुत कम प्रभाव पड़ा।
07 रूस की क्रांति के महत्वपूर्ण तथ्य
प्रमुख विचारक और जनक
| विचार / क्षेत्र | प्रमुख नाम एवं तथ्य |
|---|---|
| 'समाजवाद' शब्द का जनक | रॉबर्ट ओवेन — इन्हें आदर्श समाजवाद का प्रवक्ता माना जाता है। |
| वैज्ञानिक समाजवाद का जनक | कार्ल मार्क्स (जर्मनी)। जन्म — ट्रायर, जर्मनी। पुस्तक: दास कैपिटल (Das Kapital) और कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो (Communist Manifesto - कार्ल मार्क्स + एंगेल)। नारा: "दुनिया के मज़दूरों एक हो जाओ!" प्रसिद्ध कथन: “Religion is the Opium of the People” — “धर्म जनता की अफीम है।” |
| फ्रांसीसी साम्यवाद का जनक | सेंट साइमन। |
| फेबियन सोशलिज्म | नेतृत्व: जॉर्ज बर्नार्ड शॉ। फेबियन सोसायटी की स्थापना: लंदन (1884)। |
| Nihilism शब्द | इवान तुर्गनेव — ‘Fathers and Sons’ (1862) के माध्यम से ‘Nihilism’ शब्द को लोकप्रिय बनाने से संबंधित। |
1. मूल तथ्य
- रूस के सम्राट ‘जार’ कहलाते थे; अंतिम जार निकोलस द्वितीय था।
- 1917 में जारशाही और रोमानोव वंश का अंत हुआ।
- “एक जार, एक चर्च, एक रूस” — जारशाही की रूसीकरण (Russification) नीति से संबंधित।
- रूसी साम्राज्य में स्लाव जनसंख्या प्रमुख थी।
2. 1917 की प्रमुख क्रांतियाँ
- फरवरी/मार्च क्रांति — पेत्रोग्राद: 15 मार्च 1917 को निकोलस द्वितीय ने सिंहासन त्याग दिया।
- अक्टूबर क्रांति: लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविक सत्ता में आए; 25 अक्टूबर 1917 (Old Style) = 7 नवंबर 1917 (Gregorian)।
- प्रमुख नारा — “शांति, भूमि और रोटी”।
3. प्रमुख नेता एवं संबंधित तथ्य
- लियोन ट्रॉट्स्की — लाल सेना के संगठन में प्रमुख भूमिका; स्थायी क्रांति के सिद्धांत से संबंधित।
- पीटर महान — आधुनिक रूस का निर्माता।
4. प्रसिद्ध पुस्तकें एवं लेखक
| पुस्तक | लेखक |
|---|---|
| War and Peace (युद्ध और शांति) | Leo Tolstoy |
| Anna Karenina | Leo Tolstoy |
| Mother (माँ) | Maxim Gorky |
| Rights of Man | Thomas Paine |
| Common Sense (1776; पुस्तिका) | Thomas Paine |
अध्याय अभ्यास परीक्षा
40 प्रश्नों में सत्यापित सरकारी परीक्षा प्रश्न और UKPSC/UKSSSC स्तर के PYQ-पैटर्न प्रश्न शामिल हैं।