रसखान
जीवन-परिचय, उपाधियाँ, प्रमुख रचनाएँ और अर्थ सहित प्रसिद्ध सवैये — परीक्षा-केंद्रित revision नोट्स।
जीवन-परिचय
- मूल नाम
- सैयद इब्राहीम।
- जन्म
- 1548 ई., पिहानी (हरदोई, उ.प्र.)।
- मृत्यु
- 1628 ई., वृंदावन (मथुरा)।
- समाधि
- महाबन (मथुरा)।
- गुरु
- गोस्वामी विट्ठलनाथ (वल्लभाचार्य के पुत्र)।
- भाषा
- शुद्ध ब्रजभाषा।
- प्रिय छंद
- सवैया।
उपाधियाँ एवं महत्त्वपूर्ण कथन
प्रमुख उपाधियाँ
- रस की खान
- सवैया छंद के सम्राट
भारतेंदु हरिश्चंद्र का प्रसिद्ध कथन
“इन मुसलमान हरिजनन पर, कोटिन हिंदू वारिए।”
प्रमुख रचनाएँ
- सुजान रसखान
रसखान की सर्वप्रमुख रचना।
- प्रेम वाटिका
1614 ई.
- दानलीला
11 दोहे।
- अष्टयाम
कृष्ण की आठों पहर की दिनचर्या का वर्णन।
प्रमुख पंक्तियाँ और भावार्थ
“मानुष हौं तो वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन। जो पसु हौं तो कहा बसु मेरो चरौं नित नंद की धेनु मँझारन।”
अर्थ: यदि मनुष्य बनाओ तो गोकुल के ग्वालों के बीच बसाना। यदि पशु बनाओ तो नंद की गायों के बीच चरने वाली गाय बनाना।
“पाहन हौं तो वही गिरि को जो कियो हरिछत्र पुरंदर धारन। जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदी-कूल-कदंब की डारन।”
अर्थ: यदि पत्थर बनाओ तो उसी गोवर्धन पर्वत का पत्थर जिसे कृष्ण ने इंद्र का मान तोड़ने को उठाया। यदि पक्षी बनाओ तो यमुना तट के कदंब की डाल पर बसेरा हो।
“या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहूँ पुर को तजि डारौं। आठहुँ सिद्धि नवो निधि के सुख नंद की गाइ चराइ बिसारौं।”
अर्थ: कृष्ण की उस लाठी और काली कमली के बदले तीनों लोकों का राज छोड़ने को तैयार हूँ। नंद की गायें चराने का सुख आठों सिद्धियों और नौ निधियों से भी बढ़कर है।
“धूरि भरे अति सोहत स्याम जू, तैसी बनी सिर सुंदर चोटी। खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनी बाजति, पीरी कछोटी।”
अर्थ: धूल से सने बाल-कृष्ण अत्यंत सुशोभित लग रहे हैं। सुंदर चोटी, पीली धोती और पैरों में पायल बजाते हुए आँगन में खेलते-खाते घूम रहे हैं।
“सेस गनेस महेस दिनेस सुरेसहु जाहि निरंतर गावैं। ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं।”
अर्थ: जिसे शेषनाग, गणेश, शिव, सूर्य और इंद्र भी निरंतर गाते हैं, उसी कृष्ण को गोकुल की अहीर लड़कियाँ एक छोटी कटोरी छाछ के लालच में अपने इशारों पर नचा रही हैं — सगुण भक्ति की श्रेष्ठता का सशक्त उदाहरण।