हिंदी साहित्य · सगुण धारा — कृष्णभक्ति शाखा

सूरदास

जीवन-परिचय, उपाधियाँ, प्रमुख रचनाएँ, भ्रमरगीत और अर्थ सहित परीक्षा-उपयोगी पंक्तियाँ।

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जीवन-परिचय

जन्म
1478 ई., सीही (दिल्ली के निकट)।
पिता
रामदास
गुरु
वल्लभाचार्य
समकालीन शासक
अकबर
भाषा
ब्रज भाषा
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उपाधियाँ

  • वात्सल्य रस का सम्राट
  • पुष्टिमार्ग का जहाज
  • हिंदी साहित्य का सूर्य
  • अष्टछाप के सर्वश्रेष्ठ कवि
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प्रमुख रचनाएँ

  1. सूरसागर

    प्रमुख रचना; ‘भ्रमरगीत’ इसी का एक भाग है।

  2. सूरसारावली
  3. सूर पचीसी
  4. साहित्य लहरी
  5. गोवर्धनलीला
  6. नल-दमयन्ती
  7. ब्याहलो
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परीक्षा उपयोगी विशेष तथ्य

भ्रमरगीत

इसमें उद्धव को ‘भ्रमर’ (भौंरे) से संबोधित करते हुए गोपियों के विरह-गीत हैं। इसमें सगुण प्रेम-भक्ति की निर्गुण ज्ञान पर जीत दिखाई गई है।

साहित्यिक स्थान

हजारी प्रसाद द्विवेदी ने सूरदास को ब्रजभाषा का प्रथम कवि माना है।

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प्रमुख पंक्तियाँ NCERT एवं अन्य महत्वपूर्ण

  1. “ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी।
    अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी॥” भ्रमरगीत

    अर्थ: गोपियाँ उद्धव पर व्यंग्य करते हुए कहती हैं—तुम बहुत “भाग्यशाली” हो कि कृष्ण के साथ रहते हुए भी प्रेम की डोर से नहीं बँधे और तुम्हारे मन में उनके प्रति अनुराग पैदा नहीं हुआ।

  2. “मन की मन ही माँझ रही।
    कहिए जाइ कौन पै ऊधौ, नाहीं परत कही॥” भ्रमरगीत

    अर्थ: गोपियाँ कहती हैं कि कृष्ण से मिलने और अपने प्रेम की बात उनसे कहने की उनकी इच्छा मन में ही रह गई; अब वे अपने मन की व्यथा किससे कहें, उन्हें कोई ऐसा नहीं मिलता जिसके सामने यह दुःख व्यक्त कर सकें।

  3. “हमारैं हरि हारिल की लकरी।
    मन बच क्रम नंदनंद सों, उर यह दृढ़ करि पकरी॥” भ्रमरगीत

    अर्थ: गोपियों के लिए कृष्ण हारिल पक्षी की उस लकड़ी के समान हैं जिसे वह कभी नहीं छोड़ता। उन्होंने मन, वचन और कर्म से नंदनंदन कृष्ण को अपने हृदय में दृढ़ता से पकड़ रखा है और उनसे अलग नहीं हो सकतीं।

  4. “हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।
    समुझी बात कहत मधुकर जो? समाचार कछु पाए?” भ्रमरगीत

    अर्थ: गोपियाँ व्यंग्य करती हैं कि कृष्ण मथुरा जाकर राजनीति सीख आए हैं। वे उद्धव से पूछती हैं—तुम जो यह संदेश सुना रहे हो, क्या सच में उसकी बात समझते हो और कृष्ण के बारे में कोई समाचार भी लाए हो?

  5. “मैया मोरी, मैं नहिं माखन खायो।
    भोर भयो गैयन के पाछे, मधुवन मोहिं पठायो॥” बाल-लीला

    अर्थ: बालकृष्ण यशोदा से कहते हैं—माँ, मैंने माखन नहीं खाया। सुबह होते ही तुमने मुझे गायों के पीछे वन में भेज दिया था; इसलिए मुझ पर माखन खाने का आरोप सही नहीं है।

  6. “खेलन में को काको गुसैयाँ।
    हरि हारे जीते श्रीदामा, बरबस हीं कत करत रिसैयाँ॥” बाल-लीला

    अर्थ: ग्वाल-बाल कृष्ण से कहते हैं—खेल में कोई किसी का स्वामी नहीं होता। कृष्ण हार गए और श्रीदामा जीत गए, इसलिए हार स्वीकार करने के बजाय कृष्ण का बेवजह क्रोधित होना उचित नहीं है।

  7. “मुरली तऊ गुपालहिं भावति।
    सुनि री सखी, जदपि नंदलालहिं नाना भाँति नचावति॥”

    अर्थ: गोपियाँ ईर्ष्यापूर्वक कहती हैं कि मुरली कृष्ण को बहुत प्रिय है, जबकि वह कृष्ण पर इतना अधिकार जमाती है कि उन्हें अनेक प्रकार से अपने अनुसार नचाती रहती है।

  8. “मो सम कौन कुटिल खल कामी।
    जेहिं तनु दियौ ताहिं बिसरायौ, ऐसौ नोनहरामी॥” PYQ

    अर्थ: सूरदास दीनता से कहते हैं—मेरे समान कुटिल, दुष्ट और विषय-वासनाओं में फँसा हुआ कौन होगा? जिस भगवान ने मुझे यह शरीर और जीवन दिया, मैं उसी को भूल गया; इसलिए मुझसे बड़ा कृतघ्न कौन होगा।

  9. “चरण कमल बंदौ हरि राई,
    जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै…” PYQ

    अर्थ: कवि भगवान हरि के कमल-समान चरणों की वंदना करता है। उनकी कृपा से लँगड़ा व्यक्ति भी पर्वत पार कर सकता है—अर्थात भगवान की कृपा से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।