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सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

महाप्राण · मुक्त छंद के प्रवर्तक · क्रांतिकारी कवि · वसंत का अग्रदूत
छायावाद प्रगतिवाद मुक्त छंद विद्रोही
जन्म
21 फरवरी 1899 ई., महिषादल रियासत (मेदिनीपुर, पश्चिम बंगाल)
मूल निवास
गढ़ाकोला, उन्नाव (उत्तर प्रदेश)
पिता / पत्नी
पंडित रामसहाय त्रिपाठी / मनोहरा देवी
पुत्री
सरोज — असामयिक निधन पर 'सरोज-स्मृति' (हिंदी का सर्वश्रेष्ठ शोक-गीत)
मृत्यु
15 अक्टूबर 1961 ई., इलाहाबाद/प्रयागराज
पत्रिका संपादन
समन्वय · मतवाला (कलकत्ता) · सुधा (लखनऊ)
उपाधियाँ (किसने दी — परीक्षा में बार-बार!)
महाप्राण — गंगाप्रसाद पांडेय द्वारा
✒️मुक्त छंद के प्रवर्तक (रबर/केंचुआ छंद) — मात्रा व वर्ण-बंधन से हिंदी को मुक्ति दिलाई
🌸वसंत का अग्रदूत — सुमित्रानंदन पंत द्वारा (वसंत पंचमी को जन्म)
🔥ओज और औदात्य का कवि — आचार्य रामविलास शर्मा द्वारा
⚔️क्रांतिकारी व विद्रोही कवि — सामाजिक रूढ़ियों के प्रखर विरोध के कारण
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ट्रिक — 'मतवाला' से 'निराला' 'मतवाला' पत्रिका के नाम पर ही इन्होंने उपनाम 'निराला' रखा था।
काव्य संग्रह (कालक्रम)
📜 छायावाद से यथार्थवाद तक — प्रमुख संग्रह
1923 ई.
अनामिका (प्रथम)प्रथम काव्य संग्रह; हिंदी में मुक्त छंद (Free Verse) की शुरुआत
1930 ई.
परिमल — छायावादी और प्रगतिवादी मिश्रण; जूही की कली · भिक्षुक · विधवा · बादल राग · संध्या सुंदरी
1936 ई.
गीतिका — पूरी तरह संगीतात्मक और लयात्मक गीतों का संग्रह
1938 ई.
अनामिका (द्वितीय)सर्वाधिक महत्वपूर्ण संग्रह; 'राम की शक्तिपूजा' · 'सरोज स्मृति' · 'वह तोड़ती पत्थर'
1938 ई.
तुलसीदास — खंडकाव्य; संत तुलसीदास के मानसिक-आध्यात्मिक विकास का चित्रण
1942 ई.
कुकुरमुत्ता — पूँजीवाद (गुलाब) पर तीखा समाजवादी व्यंग्य; शोषित (कुकुरमुत्ता) का समर्थन
1943 ई.
अणिमा — भाषा सरल; दार्शनिक और आध्यात्मिक शांति की ओर झुकाव
1946 ई.
बेला — उर्दू गज़ल और फारसी काव्य शैलियों का प्रभाव | नये पत्ते — सामाजिक यथार्थ ('वह तोड़ती पत्थर')
1950 ई.
अर्चना — पूरी तरह भक्तिपरक, प्रार्थना और स्तुति के गीत
1953 ई.
आराधना — उत्तर-काल के आध्यात्मिक और ईश्वर-वंदना के गीत
1954 ई.
गीत गुंज — जीवन के अंतिम वर्षों में लिखा गया लघु गीत संग्रह
1969 ई.
सांध्य काकलीमरणोपरांत (Posthumous) प्रकाशित अंतिम संग्रह
ऐतिहासिक कविताएँ (Masterpieces)
🌟 महत्वपूर्ण कविताएँ
जूही की कली (1916)
प्रथम कविता + मुक्त छंद का पहला उदाहरण | 1916 में द्विवेदी ने 'अश्लील' बताकर 'सरस्वती' में छापने से मना किया
सरोज स्मृति (1935)
18 वर्षीय पुत्री के निधन पर | हिंदी का प्रथम एवं सर्वश्रेष्ठ शोक-गीत (Elegy)
राम की शक्तिपूजा (1936)
आधार: बांग्ला 'कृत्तिवास रामायण' | राम के भीतर मानवीय द्वंद्व और शक्ति की मौलिक कल्पना
बादल राग
6 खंडों में | 'बादल' = क्रांतिकारी — शोषकों को नष्ट कर किसानों को राहत
अंतिम कविता (1961)
"पत्रात्कंठित जीवन का विष बुझा हुआ है।" — 'सांध्य काकली' में संकलित
कहानी संग्रह एवं उपन्यास
📘 कहानी संग्रह
लिली (1934) ⭐ प्रथम सखी (1935) → बाद में 'चतुरी चमार' सुकुल की बीवी (1941) चतुरी चमार (1945) ⭐ दलित विमर्श देवी (1948)
📗 उपन्यास
1931 ई.
अप्सराप्रथम उपन्यास; सामाजिक रूढ़ियों और अभिजात्य वर्ग सुधार की कथा
1933 ई.
अलका — ग्रामीण जीवन; जमींदारों द्वारा किसानों के शोषण और सुधारवाद
1936 ई.
प्रभावती — ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित | निरुपमा — नारी शिक्षा, आर्थिक स्वावलंबन, वैवाहिक समस्याएँ
1939 ई.
कुल्ली भाटजीवनीपरक (Biographical) उपन्यास; जातिवाद और सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार
1942 ई.
बिल्लेसुर बकरिहा — ग्रामीण निम्न-मध्यमवर्गीय चरित्र का व्यंग्यात्मक रेखाचित्र; रूढ़ियाँ तोड़कर बकरी चराता ब्राह्मण
1946 ई.
चोटी की पकड़ — स्वतंत्रता-पूर्व के सामाजिक और आर्थिक यथार्थ का चित्रण
अपूर्ण
काले कारनामे — व्यवस्था के भ्रष्टाचार पर प्रहार करता अधूरा उपन्यास | चमेली · इन्दुलेखा
✍️ निबंध, आलोचना एवं पत्रिका संपादन
निबंध
प्रबंध पद्म · प्रबंध प्रतिमा · चाबुक — तीखे और व्यंग्यात्मक गद्य के लिए प्रसिद्ध
आलोचना
चयन और संग्रह — मुक्त छंद के समर्थन और काव्य-शिल्प पर विचार
संपादन
'समन्वय' और 'मतवाला' (कलकत्ता) पत्रिकाओं का संपादन किया | 'मतवाला' से ही 'निराला' उपनाम मिला
📖 20 प्रमुख कविताएँ — संपूर्ण पंक्तियाँ (परीक्षा मास्टर संकलन)
01
राम की शक्तिपूजा
मूल भाव: आंतरिक संघर्ष, निराशा पर विजय और सत्य की स्थापना के लिए शक्ति की साधना
1. राम की निराशा और हताशा का भाव: अन्याय जिधर है, उधर शक्ति, कपि-दर्प-दलित-बल-विगलित-विक्रमी-सम-नत, हत-लक्ष्मण-मुक्त-कर-रावण-प्रणत-प्रचुर-पुरस्कृत, वह कृद्ध-युद्ध-ललकार-रहा, वह ऋद्ध-युद्ध-कर-रहा," 2. राम का आत्म-संघर्ष (सबसे प्रसिद्ध पंक्ति): "धिक् जीवन को जो पाता ही आया है विरोध, धिक् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध।" 3. शक्ति की पूजा का अंतिम संकल्प: "होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन! कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन।"
📚 संग्रह: अनामिका (द्वितीय, 1938)
02
सरोज स्मृति
मूल भाव: हिंदी साहित्य का प्रथम श्रेष्ठ 'शोक-गीत' (Elegy); पुत्री की मृत्यु पर पिता का विलाप
दुःख ही जीवन की कथा रही,क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!" धन्ये! मैं पिता निरर्थक था, कुछ भी तेरे हित कर न सका।
📚 संग्रह: अनामिका (द्वितीय, 1938) | हिंदी का सर्वश्रेष्ठ शोक-गीत — 18 वर्षीय पुत्री के निधन पर (1935)
03
वह तोड़ती पत्थर
मूल भाव: यथार्थवादी चित्रण; सर्वहारा/मजदूर वर्ग का शोषण और वर्ग-विभेद
वह तोड़ती पत्थर; देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर- वह तोड़ती पत्थर। कोई न छायादार पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार; श्याम तन, भर बँधा यौवन! नत नयन, प्रिय-कर्म-रत मन, गुरु हथौड़ा हाथ, करती बार-बार प्रहार:- सामने तरु-मालिका अट्टालिका, प्राकार। चढ़ रही थी धूप; गर्मियों के दिन, दिवा का तमतमाता रूप;
📚 संग्रह: नये पत्ते (1946) | इलाहाबाद की एक पत्थर तोड़ती मजदूर महिला का यथार्थ चित्रण
04
भिक्षुक
मूल भाव: गरीबी, भुखमरी और असहाय वर्ग के प्रति गहरी मानवीय सहानुभूति
वह आता- दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता। पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक, चल रहा लकुटिया टेक, मुट्ठी भर दाने को- भूख मिटाने को। मुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता- दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता। साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाए, बाएँ से वे मलते हुए पेट को चलते, और दाहिना दया-दृष्टि-पाने की ओर बढ़ाए। चाट रहे जूठी पत्तल वे कभी सड़क पर खड़े हुए।
📚 संग्रह: परिमल (1930)
05
कुकुरमुत्ता
मूल भाव: सर्वहारा वर्ग (कुकुरमुत्ता/मशरूम) द्वारा शोषक/पूंजीपति वर्ग (गुलाब) पर तीखा व्यंग्य
अबे, सुन बे, गुलाब, भूल मत जो पाई खुशबू, रंगो-आब, खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट, डाल पर इतराता है कैपिटलिस्ट! कितनों को तूने बनाया है गुलाम, माली कर रखा, सहाया जाड़ा-घाम। बार-बार उस पर तूने हुक्म चलाया, अपना ही रोब हर जगह जमाया। पर याद रख, दिन बदलने वाले हैं, पूँजीपतियों के पैर उखड़ने वाले हैं। कुकुरमुत्ता ही अब हर जगह छाएगा, तेरा यह रंग-रूप धरा रह जाएगा।
📚 संग्रह: कुकुरमुत्ता (1942) | मार्क्सवादी विचारधारा का प्रतीकात्मक व्यंग्य काव्य
06
जूही की कली
मूल भाव: प्रकृति का श्रृंगारिक मानवीकरण; पवन और कली के माध्यम से प्रेम की अभिव्यक्ति
विजन-वन-वल्लरी पर सोती थी सुहाग-भरी-स्नेह-स्वप्न-मग्न- अमल कोमल तन्तु तरुणी-जूही की कली, दृग बन्द किये, शिथिल-पत्रांक में, वासन्ती निशा थी; विरह-विधुर-प्रिया-संग-छोड़ किसी दूर देश में था पवन। जिसे कहते हैं मलय-अनिल। आई याद चाँदनी की अलक-कुल-प्रिया की, याद आई वह सुंदर रूप-राशि, फिर क्या, पवन चला वेग से, उड़ते हुए पत्तों को पार कर, पहुँचा वह उस विजन कुंज में।
📚 रचना: 1916 | संग्रह: परिमल (1930) | ⚠️ महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 'सरस्वती' में छापने से 'अश्लील' बताकर मना किया था | निराला की प्रथम कविता और मुक्त छंद का पहला उदाहरण
07
उत्साह
मूल भाव: बादलों का 'आह्वान गीत'; क्रांति, नई ऊर्जा और नवजीवन का प्रतीक
बादल, गरजो! घेर घेर घोर गगन, धाराधर ओ! ललित ललित, काले घुँघराले, बाल कल्पना के-से पाले, विद्युत छबि उर में, कवि, नवजीवन वाले! वज्र छिपा, नूतन कविता, फिर भर दो— बादल, गरजो! विकल विकल, उन्मन थे उन्मन विश्व के निदाघ के सकल जन, आए अज्ञात दिशा से अनंत के घन! तप्त धरा, जल से फिर शीतल कर दो—बादल, गरजो!
📚 संग्रह: अनामिका (द्वितीय, 1938) | बादल = क्रांति और नवजीवन का प्रतीक
08
अट नहीं रही है
मूल भाव: फागुन (बसंत ऋतु) के प्राकृतिक सौंदर्य का अनूठा और असीम चित्रण
अट नहीं रही है आभा फागुन की तन सट नहीं रही है। कहीं साँस लेते हो, घर घर भर देते हो, उड़ने को नभ में तुम पर-पर कर देते हो, आँख हटाता हूँ तो हट नहीं रही है। पत्तों से लदी डाल कहीं हरी, कहीं लाल, कहीं पड़ी है उर में मंद-गंध-पुष्प-माल।
📚 संग्रह: नये पत्ते (1946) | फागुन के सौंदर्य का ऐसा वर्णन कि आँखें हटाए नहीं हटतीं
09
बादल राग
मूल भाव: बादलों को क्रांतिदूत मानकर शोषितों के उद्धार के लिए पुकार (6 खंडों में)
>तिरती है समीर-सागर पर, अस्थिर सुख पर दुख की छाया, जग में जल हैप्लव प्लावित माया। यह तेरी रण-तरी, भरी आकांक्षाओं से घन! भेरी-गर्जन से सजजित, मदित-मृत-खेतों में रुधिर-प्लावित-जन-मन के खेत!" "अशनि-पात से सापित उन्नत शत-शत वीर, क्षत-विक्षत हत अचल-शरीर। गगन-स्पर्शी स्पर्धा धीर! हँसते हैं छोटे पौधे लघु भार, शस्य-अपार, हिल-हिल, खिल-खिल, हाथ हिलाते, तुझे बुलाते, विप्लव-रव से छोटे ही हैं शोभा पाते।
📚 संग्रह: परिमल (1930) | 6 खंडों में रचित | बादल = क्रांतिकारी — शोषकों को नष्ट कर किसानों को राहत
10
ध्वनि
मूल भाव: युवा पीढ़ी को संदेश; जीवन के प्रति आशावाद और जिजीविषा का संचार
अभी न होगा मेरा अन्त, अभी-अभी ही तो आया है मेरे वन में मृदुल वसन्त- अभी न होगा मेरा अन्त। हरे-हरे ये पात, डालियाँ, कलियाँ कोमल गात। मैं ही अपना स्वप्न-मृदुल-कर, फेरूँगा निद्रित कलियों पर, जगा एक प्रत्यूष मनोहर। पुष्प-पुष्प से तन्द्रालस लालसा खींच लूँगा मैं, अपने नव जीवन का अमृत सहर्ष सींच दूँगा मैं, द्वार दिखा दूँगा फिर उनको, हैं जो मेरे जहाँ अनन्त।
📚 संग्रह: अनामिका (द्वितीय, 1938) | जीवन का उत्साह और प्रकृति-प्रेम का सम्मिश्रण
11
वर दे, वीणावादिनि वर दे!
मूल भाव: माँ सरस्वती की प्रसिद्ध वंदना; अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर नए ज्ञान और स्वतंत्रता की कामना
वर दे, वीणावादिनि वर दे! प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव भारत में भर दे! काट अंध-उर के बंधन-स्तर बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर, कलुष-भेद-तम-हर प्रकाश भर। जगमग जग कर दे! नव गति, नव लय, ताल-छंद नव, नवल कंठ, नव जलद-मन्द्र रव, नव नभ के नव विहग-वृंद को, नव पर, नव स्वर दे! वर दे, वीणावादिनि वर दे!
📚 प्रसिद्ध सरस्वती-वंदना | भारत की स्वतंत्रता और नवजागरण की प्रार्थना
🃏 Active Recall — फ्लैशकार्ड
निराला · उपाधियाँ (किसने दी?)
'महाप्राण', 'वसंत का अग्रदूत' और 'ओज-औदात्य का कवि' — किसने किसे कहा?
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महाप्राण → गंगाप्रसाद पांडेय | वसंत का अग्रदूत → सुमित्रानंदन पंत | ओज और औदात्य → आचार्य रामविलास शर्मा
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निराला · प्रथम रचनाएँ
निराला की प्रथम कविता, प्रथम काव्य संग्रह और प्रथम कहानी संग्रह कौन से हैं?
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✓ उत्तर
प्रथम कविता → जूही की कली (1916, मुक्त छंद का पहला उदाहरण) | प्रथम काव्य संग्रह → अनामिका (1923) | प्रथम कहानी संग्रह → लिली (1934)
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निराला · शोक-गीत
'सरोज स्मृति' क्यों लिखी गई? इसे हिंदी साहित्य में क्या स्थान प्राप्त है?
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✓ उत्तर
18 वर्षीय पुत्री सरोज के असामयिक निधन पर (1935) | हिंदी साहित्य का प्रथम एवं सर्वश्रेष्ठ शोक-गीत (Elegy) | 'अनामिका' द्वितीय संस्करण (1938) में संकलित
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निराला · उपन्यास
निराला का आत्मकथात्मक उपन्यास कौन सा है? 'बिल्लेसुर बकरिहा' की कथावस्तु क्या है?
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आत्मकथात्मक → कुल्ली भाट (1939) | बिल्लेसुर बकरिहा — एक संघर्षशील ब्राह्मण युवक जो सामाजिक रूढ़ियाँ तोड़कर बकरी चराने का काम अपनाता है — व्यंग्यात्मक
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निराला · 'निराला' नाम की उत्पत्ति
सूर्यकांत त्रिपाठी ने 'निराला' उपनाम कैसे रखा? 'जूही की कली' के बारे में क्या विवाद था?
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'मतवाला' पत्रिका (कलकत्ता) के नाम पर 'निराला' उपनाम रखा | जूही की कली (1916) — महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 'अश्लील' बताकर 'सरस्वती' पत्रिका में छापने से मना किया था
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निराला · 'राम की शक्तिपूजा'
'राम की शक्तिपूजा' का मूल आधार क्या है? इसकी विशेषता क्या है?
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✓ उत्तर
मूल आधार: बांग्ला भाषा की कृत्तिवास रामायण | विशेषता: राम के भीतर का मानवीय द्वंद्व और शक्ति की मौलिक कल्पना | 'अनामिका' द्वितीय संस्करण (1938) में संकलित
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