अनुप्रास अलंकार
जहाँ काव्य-पंक्तियों में किसी एक या एकाधिक व्यंजन वर्णों की क्रमानुसार आवृत्ति (Repetition) होती है, जिससे काव्य में नाद-सौंदर्य (Phonetic beauty) उत्पन्न हो, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।
अनुप्रास के पाँच भेद
- दीनबंधु दुखियों के दुख दूर करो। — ('द' वर्ण 2-2 बार लगातार — 'दीनबंधु दुखियों' और 'दुख दूर'। इसलिए यह वृत्त्यनुप्रास से हटकर यहाँ आया है)
- चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रही हैं जल-थल में। — ('च' वर्ण 2 बार लगातार — 'चारु चंद्र'। इसलिए इसे भी यहाँ रखा गया है)
- संसार की समरस्थली में धीरता धारण करो। — ('स' और 'ध' वर्ण 2-2 बार लगातार — 'संसार समरस्थली' और 'धीरता धारण')
- बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय। — ('ल' वर्ण 2 बार लगातार — 'लालच लाल')
- कानन कठिन भयंकर भारी, घोर घाम हिम बारि बयारी। — ('क', 'भ', 'घ', 'ब' वर्णों के जोड़े 2-2 बार लगातार)
- अमिअ मूरिमय चूरन चारू, समन सकल भव रुज परिवारू। — ('च' और 'स' वर्ण 2-2 बार लगातार — 'चूरन चारू' और 'समन सकल')
- बंदौ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि। — ('क' वर्ण 2 बार लगातार — 'कंज कृपा')
- रघुपति राघव राजा राम, पतित पावन सीता राम। — ('र' वर्ण लगातार 4 बार आवृत्ति)
- मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो। — ('म' वर्ण लगातार 3 बार — 'मैया मोरी मैं')
- तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए। — ('त' वर्ण लगातार 5 बार)
- मुदित महीपति मंदिर आए, सेवक सचिव समंत बुलाए। — ('म' और 'स' वर्ण लगातार 3-3 बार)
- कालिंदी कूल कदंब की डारन। — ('क' वर्ण लगातार 3 बार)
- बंदउँ गुरु पद पदुम परागा, सुरुचि सुबास सरस अनुरागा। — ('प' और 'स' वर्ण लगातार 3-3 बार)
- सठ सुधरहिं सतसंगति पाई, पारस परस कुधात सहाई। — ('स' वर्ण लगातार 3 बार — 'सठ सुधरहिं सतसंगति')
- कल कानन कुंडल मोरपखा, उर पे बनमाल बिराजति है। — ('क' वर्ण लगातार 3 बार)
- विमल वाणी ने वीणा ली, कमल कोमल कर में सप्रीत। — ('क' वर्ण लगातार 3 बार — 'कमल कोमल कर')
- भव्य भावों में भयानक भावना भरना नहीं। — ('भ' वर्ण लगातार 5 बार)
- कूलन में केलि में कछारन में कुंजन में, क्यारिन में कलिन कलीन किलकंत है। — ('क' वर्ण बहुतायत में लगातार)
- रीझि रीझि रहसि रहसि हँसि हँसि उठै। — ('र' वर्ण लगातार 4 बार — 'रीझि रीझि रहसि रहसि')
लाटानुप्रास में शब्द और वाक्य-खंड हू-ब-हू दोहराए जाते हैं परंतु उनका तात्पर्य (Purport / अभिप्राय) भिन्न हो जाता है। यह केवल वर्ण-आवृत्ति नहीं, बल्कि सम्पूर्ण पद या वाक्यांश की पुनरावृत्ति है जिसमें संदर्भ बदलने से अर्थ का नया आयाम खुलता है।
पूत कपूत तो क्यों धन संचय।"
| पंक्ति | दोहराया गया खंड | तात्पर्य |
|---|---|---|
| प्रथम पंक्ति | "तो क्यों धन संचय" | पुत्र सुयोग्य है तो धन उसके लिए आवश्यक नहीं — वह स्वयं अर्जन करेगा |
| द्वितीय पंक्ति | "तो क्यों धन संचय" (वही शब्द) | पुत्र कुयोग्य है तो धन संचय व्यर्थ है — वह उसे नष्ट कर देगा |
तेगबहादुर, हाँ, वे ही थे गुरु-पदवी थी जिनके अर्थ।"
| पंक्ति | दोहराया गया खंड | तात्पर्य |
|---|---|---|
| प्रथम पंक्ति | "तेगबहादुर, हाँ, वे ही थे" + "गुरु-पदवी" | वे गुरु-पदवी पाने में पूर्णतः समर्थ/योग्य थे — पद को धारण करने की क्षमता पर बल |
| द्वितीय पंक्ति | "तेगबहादुर, हाँ, वे ही थे" + "गुरु-पदवी" (वही शब्द) | गुरु-पदवी का सच्चा अर्थ/प्रयोजन ही वे थे — पद उन्हीं के कारण सार्थक हुआ |
यह लाटानुप्रास कैसे है: दोनों पंक्तियों में "तेगबहादुर, हाँ, वे ही थे" और "गुरु-पदवी" शब्द-समूह शब्दशः ज्यों के त्यों दोहराए गए हैं, परंतु पहली पंक्ति में बल "समर्थता/योग्यता" पर है जबकि दूसरी में बल "पदवी की सार्थकता/अर्थवत्ता" पर — अर्थात् शब्द एक हैं, तात्पर्य भिन्न है। यही लाटानुप्रास की कसौटी है।
- बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी। — ('नी थी' की तुकबंदी)
- छोरटी है गोरटी या चोरटी अहीर की। — ('रटी' शब्द की तुकबंदी)
- जय हनुमान ज्ञान गुन सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर। — ('गर' शब्द की तुकबंदी)