अलंकार
अनुप्रास अलंकार

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अनुप्रास अलंकार

अनुप्रास अलंकार की परिभाषा, पाँच भेद, पहचान और उदाहरण

अनुप्रास अलंकार

अनुप्रास अलंकार की परिभाषा, पाँच भेद, पहचान और उदाहरण

जहाँ काव्य-पंक्तियों में किसी एक या एकाधिक व्यंजन वर्णों की क्रमानुसार आवृत्ति (Repetition) होती है, जिससे काव्य में नाद-सौंदर्य (Phonetic beauty) उत्पन्न हो, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।

📌 पहचान: व्यंजन वर्णों की आवृत्ति | वाचक शब्द: वर्णमैत्री, नाद-सौंदर्य

अनुप्रास के पाँच भेद

क. छेकानुप्रास — जहाँ वर्ण स्वरूप और क्रम से केवल 2 बार लगातार आए
  • दीनबंधु दुखियों के दुख दूर करो। — ('द' वर्ण 2-2 बार लगातार — 'दीनबंधु दुखियों' और 'दुख दूर'। इसलिए यह वृत्त्यनुप्रास से हटकर यहाँ आया है)
  • चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रही हैं जल-थल में। — ('च' वर्ण 2 बार लगातार — 'चारु चंद्र'। इसलिए इसे भी यहाँ रखा गया है)
  • संसार की समरस्थली में धीरता धारण करो। — ('स' और 'ध' वर्ण 2-2 बार लगातार — 'संसार समरस्थली' और 'धीरता धारण')
  • बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय। — ('ल' वर्ण 2 बार लगातार — 'लालच लाल')
  • कानन कठिन भयंकर भारी, घोर घाम हिम बारि बयारी। — ('क', 'भ', 'घ', 'ब' वर्णों के जोड़े 2-2 बार लगातार)
  • अमिअ मूरिमय चूरन चारू, समन सकल भव रुज परिवारू। — ('च' और 'स' वर्ण 2-2 बार लगातार — 'चूरन चारू' और 'समन सकल')
  • बंदौ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि। — ('क' वर्ण 2 बार लगातार — 'कंज कृपा')
ख. वृत्त्यनुप्रास — जहाँ कोई वर्ण 3 या उससे अधिक बार लगातार आए
  • रघुपति राघव राजा राम, पतित पावन सीता राम। — ('र' वर्ण लगातार 4 बार आवृत्ति)
  • मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो। — ('म' वर्ण लगातार 3 बार — 'मैया मोरी मैं')
  • तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए। — ('त' वर्ण लगातार 5 बार)
  • मुदित महीपति मंदिर आए, सेवक सचिव समंत बुलाए। — ('म' और 'स' वर्ण लगातार 3-3 बार)
  • कालिंदी कूल कदंब की डारन। — ('क' वर्ण लगातार 3 बार)
  • बंदउँ गुरु पद पदुम परागा, सुरुचि सुबास सरस अनुरागा। — ('प' और 'स' वर्ण लगातार 3-3 बार)
  • सठ सुधरहिं सतसंगति पाई, पारस परस कुधात सहाई। — ('स' वर्ण लगातार 3 बार — 'सठ सुधरहिं सतसंगति')
  • कल कानन कुंडल मोरपखा, उर पे बनमाल बिराजति है। — ('क' वर्ण लगातार 3 बार)
  • विमल वाणी ने वीणा ली, कमल कोमल कर में सप्रीत। — ('क' वर्ण लगातार 3 बार — 'कमल कोमल कर')
  • भव्य भावों में भयानक भावना भरना नहीं। — ('भ' वर्ण लगातार 5 बार)
  • कूलन में केलि में कछारन में कुंजन में, क्यारिन में कलिन कलीन किलकंत है। — ('क' वर्ण बहुतायत में लगातार)
  • रीझि रीझि रहसि रहसि हँसि हँसि उठै। — ('र' वर्ण लगातार 4 बार — 'रीझि रीझि रहसि रहसि')
ग. लाटानुप्रास — जहाँ पूरे वाक्य-खंड की आवृत्ति हो परंतु तात्पर्य बदल जाए
📖 विस्तृत परिभाषा

लाटानुप्रास में शब्द और वाक्य-खंड हू-ब-हू दोहराए जाते हैं परंतु उनका तात्पर्य (Purport / अभिप्राय) भिन्न हो जाता है। यह केवल वर्ण-आवृत्ति नहीं, बल्कि सम्पूर्ण पद या वाक्यांश की पुनरावृत्ति है जिसमें संदर्भ बदलने से अर्थ का नया आयाम खुलता है।

🔑 पहचान-सूत्र: वाक्य-खंड शब्दशः समान + तात्पर्य / अभिप्राय भिन्न
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उदाहरण ⭐ सर्वाधिक पूछा गया
"पूत सपूत तो क्यों धन संचय,
पूत कपूत तो क्यों धन संचय।"
पंक्तिदोहराया गया खंडतात्पर्य
प्रथम पंक्ति "तो क्यों धन संचय" पुत्र सुयोग्य है तो धन उसके लिए आवश्यक नहीं — वह स्वयं अर्जन करेगा
द्वितीय पंक्ति "तो क्यों धन संचय" (वही शब्द) पुत्र कुयोग्य है तो धन संचय व्यर्थ है — वह उसे नष्ट कर देगा
2
उदाहरण
"तेगबहादुर, हाँ, वे ही थे गुरु-पदवी के पात्र समर्थ,
तेगबहादुर, हाँ, वे ही थे गुरु-पदवी थी जिनके अर्थ।"
पंक्तिदोहराया गया खंडतात्पर्य
प्रथम पंक्ति "तेगबहादुर, हाँ, वे ही थे" + "गुरु-पदवी" वे गुरु-पदवी पाने में पूर्णतः समर्थ/योग्य थे — पद को धारण करने की क्षमता पर बल
द्वितीय पंक्ति "तेगबहादुर, हाँ, वे ही थे" + "गुरु-पदवी" (वही शब्द) गुरु-पदवी का सच्चा अर्थ/प्रयोजन ही वे थे — पद उन्हीं के कारण सार्थक हुआ

यह लाटानुप्रास कैसे है: दोनों पंक्तियों में "तेगबहादुर, हाँ, वे ही थे" और "गुरु-पदवी" शब्द-समूह शब्दशः ज्यों के त्यों दोहराए गए हैं, परंतु पहली पंक्ति में बल "समर्थता/योग्यता" पर है जबकि दूसरी में बल "पदवी की सार्थकता/अर्थवत्ता" पर — अर्थात् शब्द एक हैं, तात्पर्य भिन्न है। यही लाटानुप्रास की कसौटी है।

घ. श्रुत्यनुप्रास — जहाँ एक ही उच्चारण स्थान वाले वर्णों की आवृत्ति हो
"तुलसीदास सीदत निसिदिन, देखत तुम्हारि निठुराई।"
दंत्य वर्णों: त, द, स, न की आवृत्ति — श्रवण-माधुर्य उत्पन्न करती है।
ङ. अन्त्यानुप्रास — जहाँ पंक्तियों के अंत में समान तुकबंदी (Rhyme) हो
  • बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी। — ('नी थी' की तुकबंदी)
  • छोरटी है गोरटी या चोरटी अहीर की। — ('रटी' शब्द की तुकबंदी)
  • जय हनुमान ज्ञान गुन सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर। — ('गर' शब्द की तुकबंदी)