विरोधाभास अलंकार
📖 परिभाषा
जहाँ किन्हीं दो वस्तुओं या स्थितियों में वास्तविक विरोध न होते हुए भी, केवल शब्दों के माध्यम से विरोध का 'आभास' (प्रतीत) कराया जाए, वहाँ विरोधाभास अलंकार होता है। (सरल: जहाँ दो सर्वथा विपरीत बातें एक साथ कही जाएँ, किंतु गहराई से अर्थ निकालने पर कोई विरोध न रहे।)
काव्य पंक्ति में प्रायः विलोम (Antonyms) या परस्पर विरोधी शब्दों का एक साथ प्रयोग देखने को मिलता है — जैसे: शीतल-ज्वाला, विषमय-अमृत, मीठा-नमक, अंधा-देखना।
ज्यों-ज्यों बूड़े स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्जवल होय॥
भावार्थ: कवि कहते हैं — इस प्रेमी मन की गति कोई नहीं समझ सकता। यह जैसे-जैसे कृष्ण की भक्ति के श्याम (काले) रंग में डूबता है, वैसे-वैसे और अधिक पवित्र (उज्जवल) होता जाता है।
काले रंग में डूबने से किसी वस्तु का सफेद/उज्जवल होना प्रत्यक्ष रूप से विरोधी कथन है — यही विरोधाभास है।
यह व्यर्थ साँस चल-चल कर, करती है काम अनल का॥
भावार्थ: विरह में हृदय के भीतर एक ठंडी आग (शीतल ज्वाला) जल रही है, और आँखों से बहने वाला पानी (दृग जल) उसमें ईंधन का काम कर रहा है।
दो विरोध हैं — (1) ज्वाला (आग) कभी 'शीतल' नहीं होती। (2) जल (पानी) कभी आग का 'ईंधन' नहीं बनता; पानी तो आग बुझाता है।
भावार्थ: यह गोदावरी नदी विष (ज़हर) से युक्त होने के बाद भी अमृत के समान फल प्रदान करती है।
जो वस्तु 'विषमय' (ज़हरीली) हो, उसका 'अमृत' प्रदान करना पूर्णतः विरोधाभास है।
ज्यों खरचै त्यों-त्यों बढ़ै, बिन खरचै घटि जात॥
भावार्थ: माँ सरस्वती (ज्ञान) के भंडार की बात अनोखी है — इसे जितना खर्च करो (बाँटो), उतना बढ़ता है और न खर्च करने पर घट जाता है।
संसार में वस्तुएँ खर्च करने पर घटती हैं, किंतु यहाँ खर्च करने पर बढ़ने का कथन विरोधाभासी है।
शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ॥
भावार्थ: कवि कहता है कि मेरे रोने (रोदन) में भी प्रेम का गीत (राग) है, और मेरी ठंडी आवाज़ (शीतल वाणी) में भी क्रांति की आग छिपी है।
शीतल (ठंडी) वाणी के साथ 'आग' का होना प्रत्यक्ष विरोध को दर्शाता है।
भावार्थ: कवि कहता है कि जब से प्रिय से आँख लगी (प्रेम हुआ) है, तब से मेरी आँख ही नहीं लगी (नींद नहीं आई)।
'आँख लगना' (प्रेम होना) और 'आँख न लगना' (नींद न आना) — दोनों विपरीत क्रियाओं का एक साथ घटित होना विरोधाभास है।
अनबूड़े बूड़े तरे, जे बूड़े सब अंग॥
भावार्थ: संगीत, कविता और प्रेम के रस में जो नहीं डूबे (अनबूड़े), वे संसार में डूब गए (बर्बाद)। जो इनमें पूरी तरह डूबे, वे भवसागर पार कर गए।
'न डूबने वाले का डूब जाना' और 'डूबने वाले का पार हो जाना' स्पष्ट विरोधाभास है।
भावार्थ: नायिका की आँखों का नमकीनपन (लुनाई/सौंदर्य) बड़ा मीठा प्रतीत होता है।
'नमकीन' (लुनाई) वस्तु का 'मीठा' लगना विरोधी कथन है।
भावार्थ: प्रिय की याद (सुधि) आने पर मेरी अपनी सुध-बुध (सुधि) चली जाती है।
याद (स्मृति) आने पर स्वयं की स्मृति लुप्त हो जाना विरोधाभास है।
भावार्थ: मैं एक छोटी सी सीपी में पूरा सागर भरकर ले आऊँगी।
क्षुद्र सीपी में विशाल सागर का समाहित होना तर्कसंगत रूप से विरोधी बात है।