अलंकार
भ्रांतिमान अलंकार

अर्थालंकार

भ्रांतिमान अलंकार

भ्रांतिमान अलंकार की परिभाषा, पहचान और संदेह से अंतर

भ्रांतिमान अलंकार

भ्रांतिमान अलंकार की परिभाषा, पहचान और संदेह से अंतर

जहाँ रूप, रंग या गुण की अत्यधिक समानता के कारण 'उपमेय' में 'उपमान' का मिथ्या ज्ञान (निश्चित भ्रम) उत्पन्न हो जाए, और उसी भ्रम के वशीभूत होकर कोई क्रिया (Action) भी संपन्न कर ली जाए — वहाँ भ्रांतिमान अलंकार होता है।

(भ्रम + क्रिया — दोनों ज़रूरी हैं)

💡 पहचान ट्रिक + संदेह vs भ्रांतिमान

वाचक शब्द:

जानि मानि जान समझ समझकर भ्रम भ्रांति मानकर विचारि

⚡ भ्रांतिमान = भ्रम + क्रिया दोनों ज़रूरी। केवल भ्रम हो पर क्रिया न हो → भ्रांतिमान नहीं।

संदेह अलंकार:
अनिश्चय अंत तक बना रहे (यह रस्सी है या सर्प?) → संदेह।
भ्रांतिमान:
रस्सी को 'सर्प' मानकर भाग जाए → भ्रांतिमान।
1
नाक का मोती + तोता
नाक का मोती अधर की कान्ति से, बीज दाड़िम का समझकर भ्रान्ति से।
देखता ही रह गया शुक मौन है, सोचता है अन्य शुक यह कौन है॥
भ्रमितभ्रमक्रियावाचक
शुक (तोता) मोती → दाड़िम का बीज; नासिका → अन्य शुक मौन देखता रह गया (भ्रमित होकर रुक गया) समझकर, भ्रान्ति

व्याख्या: नायिका के लाल होंठों की चमक पड़ने से उसकी नाक का सफेद मोती लाल दिखने लगता है, जिसे तोता दाड़िम (अनार) का दाना समझ बैठता है। साथ ही उसकी नुकीली नाक को देखकर वह यह सोचकर मौन रह जाता है कि यहाँ कोई दूसरा तोता आ बैठा है।

2
हंसिनी + ओस बिंदु
ओस बिन्दु चुग रही हंसिनी, मोती उनको जान।
भ्रमितभ्रमक्रियावाचक
हंसिनी ओस की बूँदें → मोती चुगने लगी (क्रिया) जान

व्याख्या: प्रातःकाल घास पर पड़ी चमकदार ओस की बूँदों को देखकर हंसिनी को भ्रम होता है कि ये सच्चे मोती हैं, और वह उन्हें खाने के लिए चुगने लगती है।

3
नाइन + एड़ी
पायँ महावर देन को नाइन बैठी आय।
फिरि-फिरि जानि महावरी एड़ी मीड़ति जाय॥
भ्रमितभ्रमक्रियावाचक
नाइन नायिका की लाल एड़ी → पहले से लगा महावर बार-बार रगड़ती रही जानि

व्याख्या: नाइन नायिका के पैरों में महावर (आलता) लगाने बैठती है, पर नायिका की एड़ियाँ स्वाभाविक रूप से ही इतनी लाल हैं कि उसे भ्रम हो जाता है कि रंग पहले से लगा हुआ है। इसलिए वह रंग लगाने के बजाय उसे मिटाने के लिए बार-बार एड़ी रगड़ती रहती है।

4
सर्प + हाथी (दोनों भ्रमित)
बिल बिचारि प्रबिसन लग्यो नाग सूँड़ में ब्याल।
ताहि कारी ऊख भ्रम लियो उठाय उताल॥
भ्रमितभ्रमक्रियावाचक
सर्प + गजराज (दोनों) सूँड़ → बिल (सर्प को); सर्प → काली ईख (हाथी को) सर्प ने सूँड़ में घुसना चाहा; हाथी ने उठा लिया बिचारि, भ्रम

व्याख्या: यहाँ दोनों को एक-दूसरे से भ्रम होता है — साँप हाथी की सूँड़ को अपना बिल समझकर उसमें घुसने का प्रयास करता है, और हाथी उस काले साँप को काली ईख समझकर उसे तुरंत सूँड़ से उठा लेता है।

5
माता सीता + मुद्रिका
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब।
जानि असोक अङ्गार सीय हरषि उठि कर गहेउ॥
भ्रमितभ्रमक्रियावाचक
माता सीता स्वर्णिम मुद्रिका (अंगूठी) → प्रज्ज्वलित अंगार हर्षपूर्वक उठा लिया जानि

व्याख्या: अशोक वाटिका में हनुमान जी जब पेड़ से श्रीराम की चमकती स्वर्ण मुद्रिका नीचे गिराते हैं, तो सीता माता को भ्रम होता है कि यह अशोक वृक्ष द्वारा दिया गया सुलगता अंगार है, और वे प्राण त्यागने की इच्छा से प्रसन्न होकर उसे उठा लेती हैं।

6
शिशु (मुन्ना) + चोटी
मुन्ना तब मम्मी के सिर पर देख-देख दो चोटी।
भाग उठा भय मानकर सिर पर सापिन लोटी॥
भ्रमितभ्रमक्रियावाचक
शिशु (मुन्ना) माँ की दो चोटियाँ → सर्पिणी भयभीत होकर भाग गया मानकर

व्याख्या: छोटा बच्चा अपनी माँ के सिर पर गुंथी दो लंबी काली चोटियों को देखता है, और काले रंग व आकार की समानता के कारण उन्हें नागिनें समझकर डर से भाग खड़ा होता है।

7
भ्रमर + शुक (दोनों भ्रमित)
किंशुक कुसुम जानकर झपटा, भौंरा शुक की लाल तुंड पर।
तोते ने भी ठौर चलाई, जामुन का फल उसे समझकर॥
भ्रमितभ्रमक्रियावाचक
भ्रमर + शुक (दोनों) लाल चोंच → पलाश पुष्प (भ्रमर को); भ्रमर → जामुन फल (तोते को) भ्रमर ने झपट्टा मारा; तोते ने चोंच प्रहार किया जानकर, समझकर

व्याख्या: भौंरे को तोते की लाल चोंच देखकर भ्रम होता है कि यह पलाश (किंशुक) का लाल फूल है, इसलिए वह उस पर झपटता है; तोते को भी गोल काले भौंरे में जामुन के फल का भ्रम होता है, इसलिए वह भी उसे खाने के लिए चोंच चला देता है।

8
मयूर + श्रीकृष्ण
जानि स्याम को स्याम घन, नाच उठे बन मोर।
भ्रमितभ्रमक्रियावाचक
वन के मयूर श्याम वर्ण श्रीकृष्ण → काले बादल आनंदित होकर नाचने लगे जानि

व्याख्या: वन के मोरों को श्रीकृष्ण के सांवले रंग को देखकर आकाश में छाए काले बादलों का भ्रम हो जाता है, और बादल देखकर प्रसन्न होने की अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति के कारण वे आनंदित होकर नाचने लगते हैं।

9
मयूर + राधा-कृष्ण
वृन्दावन बिहरत फिरै, राधा नन्द किसोर।
नीरद दामिनि जानि संग, डोलैं बोलैं मोर॥
भ्रमितभ्रमक्रियावाचक
मयूर कृष्ण → नवनीरद (मेघ); राधा → दामिनी (विद्युत) आह्लादित होकर डोलने-बोलने लगे जानि

व्याख्या: राधा-कृष्ण को साथ वृंदावन में विहार करते देख मोरों को भ्रम होता है — सांवले कृष्ण में वर्षा के काले बादल और गोरी राधा में बिजली की चमक दिखाई देती है, जिससे वे प्रसन्न होकर झूमने और शोर मचाने लगते हैं।

10
पालतू मयूर + केश
बादल काले-काले केशों को देख निराले।
नाचा करते हैं हरदम पालतू मोर मतवाले॥
भ्रमितभ्रमक्रियावाचक
पालतू मयूर नायिका के काले केश → काले मेघ प्रफुल्लित होकर नृत्य करते हैं अनुमान (गुण-साम्य)

व्याख्या: नायिका के लंबे, घने काले बालों को देखकर घर के पालतू मोरों को आसमान में छाए काले बादलों का भ्रम हो जाता है, और इसी खुशी में वे मतवाले होकर नृत्य करने लगते हैं।