प्रतीप अलंकार
नई परिभाषा (दिमाग में बैठाने के लिए): 'प्रतीप' का मतलब है — 'नियम का उल्टा कर देना' या 'VIP की बेइज्जती करना'। साहित्य का नियम है कि इंसान की तुलना हमेशा प्रकृति की महान चीज़ों (चाँद, सूर्य, सागर, कमल) से की जाती है। लेकिन प्रतीप अलंकार में कवि इस नियम को दो तरह से तोड़ता है:
① उल्टी तुलना: महान चीज़ों को इंसान के बराबर लाकर खड़ा कर देना (जैसे — पेड़ को आदमी जैसा लंबा बताना)।
② बिना लॉजिक बेइज्जती: महान चीज़ों को बिना किसी तार्किक कारण के सीधा 'बेचारा', 'गरीब', 'तुच्छ' या 'शर्मिंदा' कह देना।
पंक्ति पढ़ते ही चेक करें:
• क्या प्रसिद्ध प्राकृतिक चीज़ (उपमान) को उपमेय (इंसान) जैसा बताया जा रहा है? (उल्टी उपमा)
• या क्या चाँद/कमल के लिए 'बापुरो' (बेचारा), 'रंक' (गरीब), 'लजाई' (शर्मिंदा) जैसे अपमानजनक शब्द आए हैं, बिना यह बताए कि उनमें कमी क्या है?
⚡ यदि हाँ, तो यह प्रतीप है।
सरल अर्थ: सीता जी के मुख की बराबरी वह चाँद कैसे करेगा? वह तो बेचारा (बापुरो) भिखारी (रंक) है।
यह प्रतीप क्यों है (व्यतिरेक क्यों नहीं): यहाँ चाँद में कोई भौतिक कमी (Physical Flaw) नहीं बताई गई है। चाँद को 'भिखारी' कहना कोई वैज्ञानिक तर्क नहीं है, यह सिर्फ एक भावनात्मक बेइज्जती है। बिना तर्क की बेइज्जती = प्रतीप।
सरल अर्थ: वहाँ देवदारु के पेड़ ऐसे खड़े थे, जैसे वे उस तपस्वी के समान लंबे हों।
यह प्रतीप क्यों है: नियम कहता है "आदमी पेड़ जैसा लंबा है"। लेकिन यहाँ कहा गया "पेड़ आदमी जैसा लंबा है"। तुलना पूरी तरह उल्टी (Reverse) कर दी गई है। उल्टी तुलना = प्रतीप।
सरल अर्थ: राम यमुना में नहाए, जिसका जल उनके शरीर के समान साँवला (श्याम) था।
यह प्रतीप क्यों है: फिर से तुलना उल्टी कर दी गई। नदी के रंग की तुलना इंसान के रंग से कर दी गई, जबकि होना उल्टा चाहिए था।
सीय बदन सम हिमकर नाहीं॥
सरल अर्थ: मैंने मन में बहुत सोचा, पर यह चाँद (हिमकर) सीता के मुख के बराबर हो ही नहीं सकता।
यह प्रतीप क्यों है: यहाँ भी कोई कारण नहीं दिया गया कि चाँद बराबर क्यों नहीं हो सकता (जैसे उसमें दाग है या वह घटता है)। बस सीधा कह दिया कि वह लायक नहीं है। बिना कारण के खारिज करना = प्रतीप।
सरल अर्थ: चाँद बिल्कुल तुम्हारे मुख जैसा है।
यह प्रतीप क्यों है: यह उपमा अलंकार ("मुख चाँद सा है") का 180 डिग्री उल्टा रूप है। उपमान को उपमेय बना दिया गया है।
सरल अर्थ: नायिका का मुख देखकर चाँद (विधु) भी शर्मा (लजाई) गया।
यह प्रतीप क्यों है: चाँद का शर्माना एक भावनात्मक आरोप है, कोई तार्किक कमी नहीं। उपमान को लज्जित/तुच्छ दिखाना प्रतीप का मुख्य लक्षण है।
सरल अर्थ: यह कमल बिल्कुल तुम्हारे नेत्रों जैसा है।
यह प्रतीप क्यों है: "कमल नयन" का उल्टा कर दिया गया है। प्राकृतिक वस्तु (कमल) की तुलना मानव अंग (नेत्र) से की गई है।
सरल अर्थ: हे सखी, चाँद से तो यह मुख ही ज्यादा अच्छा है, जिसे देखकर आनंद आता है।
यह प्रतीप क्यों है: चाँद से अच्छा मुख है, बस कवि को ऐसा लगता है (देखै होय अनंद)। चाँद में क्या बुराई है, यह नहीं बताया गया।
सरल अर्थ: आकाश इतना सुंदर है, मानो भगवान राम का रूप हो।
यह प्रतीप क्यों है: आकाश (ब्रह्मांड की विशाल चीज़) की तुलना मनुष्य रूपी राम से की गई है। तुलना का क्रम पलट दिया गया है।
सरल अर्थ: ऐ चाँद! तू किस बात का घमंड करता है? तू तो इस मुख की बराबरी भी नहीं पा सकता।
यह प्रतीप क्यों है: चाँद के घमंड को तोड़कर उसे नीचा दिखाया गया है, लेकिन कोई ठोस कमी नहीं गिनाई गई है।