वक्रोक्ति अलंकार
जहाँ वक्ता के कथन का श्रोता द्वारा कंठ-ध्वनि (आवाज़ के लहजे) या श्लेष (शब्द के अनेक अर्थ) के कारण कोई भिन्न या व्यंग्यात्मक अर्थ निकाल लिया जाए, वहाँ वक्रोक्ति अलंकार होता है।
क. काकु वक्रोक्ति — कंठ-ध्वनि (Tone) के कारण अर्थ बदले
व्याख्या: शाब्दिक अर्थ: "हे स्वामी! मैं सुकुमारी हूँ, अतः मेरे लिए सुख भोगना उचित है और आप वन के कठोर तप के योग्य हैं।"
काकु (लहज़े) से व्यंग्यार्थ: सीता जी के बोलने के लहज़े से यहाँ एक विपरीत अर्थ उत्पन्न होता है— "क्या मैं (आपकी अर्धांगिनी होकर) केवल महल के सुख भोगने के योग्य हूँ और आप वन में कठोर तप करने के योग्य हैं?" इस प्रश्नवाचक लहज़े का स्पष्ट अर्थ यही है कि वे किसी भी स्थिति में श्री राम के बिना सुख नहीं भोगेंगी और उनके साथ वन की सभी कठिनाइयाँ सहेंगी।
व्याख्या: शाब्दिक अर्थ: "कोई भी राजा बने, मुझे क्या हानि? क्या मैं दासी का पद छोड़कर रानी बन जाऊँगी?"
काकु (लहज़े) से व्यंग्यार्थ: मंथरा का लहज़ा यहाँ 'उदासीनता का ढोंग' है। वह अपनी स्थिति नहीं, बल्कि कैकेयी के 'सत्ता खोने' के डर को उजागर कर रही है। वह व्यंग्य करती है— "मैं तो दासी हूँ और रहूँगी, पर क्या आप रानी बनी रहेंगी?"
ख. श्लेष वक्रोक्ति — शब्द के अनेक अर्थ होने के कारण श्रोता जानबूझकर भिन्न अर्थ निकाले
चितचोर कहावत हैं हम तो तहाँ जाओ जहाँ धन है सरसो॥
व्याख्या: कृष्ण 'घनश्याम' और 'चितचोर' कहकर परिचय देते हैं। राधा जानबूझकर 'घनश्याम' = काले बादल और 'चितचोर' = धन चुराने वाला चोर अर्थ निकालती हैं — 'बादल हो तो कहीं और बरसो, चोर हो तो वहाँ जाओ जहाँ भारी संपत्ति हो।'
कृष्ण नाम है मेरा गोरी, तो क्या काले का काम यहाँ?
व्याख्या: कृष्ण 'हरि' हूँ कहते हैं। राधा 'हरि' का दूसरा अर्थ 'वानर' (बंदर) निकालकर कहती हैं — बंदर का घर के अंदर क्या काम? फिर 'कृष्ण' = काला — राधा: 'तो काले का यहाँ क्या काम?'
पशुपाल कहाँ सजनी! जमुना तट धेनु चरावत री॥
व्याख्या: लक्ष्मी जी पार्वती से पूछती हैं — तुम्हारा 'भिक्षुक' (शिव) कहाँ है? पार्वती 'भिक्षुक' = वामन अवतार (विष्णु) अर्थ लेकर कहती हैं — वो राजा बलि के द्वार दान माँगने गए। 'पशुपाल' = कृष्ण — यमुना किनारे गाय चरा रहे हैं।