विभावना अलंकार
जहाँ कारण (साधन/Cause) के नितांत अभाव में भी कार्य (Effect/Action) के संपन्न होने का वर्णन किया जाए, वहाँ विभावना अलंकार होता है। (सरल: जहाँ काम को करने वाला कोई साधन मौजूद न हो, फिर भी वह काम पूरा हो जाए।)
विभावना की पहचान के लिए वाचक शब्द:
विशेषोक्ति अलंकार: 'कारण' मौजूद है, फिर भी 'कार्य' नहीं हो रहा है। (जैसे: पानी में रहकर भी मछली का प्यासा होना)
कर बिनु करम करै बिधि नाना॥
भावार्थ: तुलसीदास जी परब्रह्म की महिमा का वर्णन करते हैं — वह ईश्वर बिना पैरों (पद) के चलता है, बिना कानों के सुनता है और बिना हाथों (कर) के अनेक प्रकार के कार्य संपन्न करता है।
अकादमिक स्पष्टीकरण: चलने, सुनने और कार्य करने के लिए पैर, कान और हाथ जैसे 'कारणों' का अभाव है, फिर भी ये 'कार्य' संपन्न हो रहे हैं।
वाचक शब्द: बिनु
बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥
भावार्थ: वह परब्रह्म बिना मुख (आनन) के ही संसार के संपूर्ण रसों का भोग करता है, और बिना वाणी (जीभ) के ही बहुत बड़ा वक्ता है।
अकादमिक स्पष्टीकरण: मुख और वाणी (कारण) के अभाव में भी रसभोग और वक्ता होने का 'कार्य' हो रहा है।
वाचक शब्द: रहित, बिनु
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय॥
भावार्थ: कबीरदास कहते हैं कि निंदक (आलोचक) को पास रखो, क्योंकि वह हमारी कमियाँ बता-बताकर हमारे स्वभाव को बिना जल और बिना साबुन के ही स्वच्छ (निर्मल) कर देता है।
अकादमिक स्पष्टीकरण: किसी को स्वच्छ करने के लिए जल और साबुन 'कारण' होते हैं। यहाँ इन कारणों के बिना ही निर्मलता (कार्य) की प्राप्ति हो रही है।
वाचक शब्द: बिन, बिना
ते नरेस बिनु पावक दहहीं॥
भावार्थ: तुलसीदास कहते हैं — जिन राजाओं के अत्याचारों से मुनि और तपस्वी दुःख पाते हैं, वे राजा मुनियों के श्राप से बिना अग्नि (पावक) के ही जलकर भस्म हो जाते हैं।
अकादमिक स्पष्टीकरण: जलने के लिए अग्नि (पावक) 'कारण' है, परंतु यहाँ अग्नि के अभाव में भी भस्म होने का 'कार्य' घटित हो रहा है।
वाचक शब्द: बिनु
भावार्थ: वन में मयूर बिना वर्षा ऋतु (पावस) के ही अचानक प्रफुल्लित होकर नृत्य करने लगे।
अकादमिक स्पष्टीकरण: मयूरों के नृत्य का 'कारण' वर्षा ऋतु होती है। यहाँ वर्षा के न होने पर भी नाचने का 'कार्य' संपन्न हो रहा है।
वाचक शब्द: बिनु
बिनही रितु बरसत निसि बासर, सदा मलिन दोउ तारे॥
भावार्थ: विरह से व्याकुल गोपी कहती है — ये नेत्र बादलों को भी हरा चुके हैं, क्योंकि बादल तो वर्षा ऋतु में बरसते हैं, किंतु ये नेत्र 'बिना वर्षा ऋतु' के ही दिन-रात अश्रु बहाते रहते हैं।
अकादमिक स्पष्टीकरण: वर्षा होने के लिए वर्षा ऋतु (कारण) आवश्यक है, परंतु यहाँ उसके बिना ही अश्रु-वर्षा का 'कार्य' हो रहा है।
वाचक शब्द: बिनही (बिना)