मानवीकरण अलंकार
जहाँ जड़ प्रकृति (पर्वत, नदी, बादल, वृक्ष, लताएँ आदि) अथवा अमूर्त भावों पर मानवीय भावनाओं, चेष्टाओं और क्रियाकलापों का आरोप किया जाए, वहाँ मानवीकरण अलंकार होता है। (सरल: जब कवि निर्जीव या प्राकृतिक उपादानों का वर्णन इस प्रकार करे मानों वे कोई जीवित मनुष्य हों।)
काव्य पंक्ति पढ़ने पर यदि प्रकृति या निर्जीव वस्तु द्वारा मनुष्यों जैसे कार्यों (हँसना, रोना, नाचना, सजना, बोलना, जागना आदि) को संपन्न करने का भाव प्रकट हो — वहाँ मानवीकरण अलंकार होता है।
भावार्थ: वसंत के आगमन पर फूल हँस रहे हैं और कलियाँ मुस्कुरा रही हैं।
अकादमिक स्पष्टीकरण: प्राकृतिक उपादानों (फूल और कलियों) पर 'हँसने' और 'मुस्कुराने' जैसी मानवीय चेष्टाओं का पूर्ण आरोप किया गया है。
वह संध्या सुंदरी परी-सी, धीरे-धीरे।
भावार्थ: सूर्यास्त (दिवसावसान) के समय 'संध्या' (शाम) को एक सुंदर परी के रूप में चित्रित किया गया है, जो आसमान से धीरे-धीरे नीचे उतर रही है।
अकादमिक स्पष्टीकरण: अमूर्त 'संध्या' (शाम) पर 'सुंदरी परी' का आरोपण कर उसके 'उतरने' की मानवीय क्रिया को दर्शाया गया है।
भावार्थ: प्रातःकाल होने पर वनस्पतियाँ (पेड़-पौधे) आलस्य त्याग कर जाग रही हैं और ठंडे ओस रूपी जल से अपना मुख धो रही हैं।
अकादमिक स्पष्टीकरण: वनस्पतियों का 'आलस करना', 'जागना' और 'मुख धोना' विशुद्ध रूप से मानवीय क्रियाकलाप हैं।
भावार्थ: आकाश में छाए बादलों को देखकर कवि कहता है कि मेघ किसी शहरी दामाद की भाँति पूरी तरह सज-संवर कर (बन-ठन के) गाँव में आए हैं।
अकादमिक स्पष्टीकरण: प्राकृतिक उपादान 'मेघ' पर 'सजने-संवरने' जैसी मानवीय प्रवृत्ति का मनोहारी आरोप है।
भावार्थ: प्रातःकाल (उषा) की किरणें जब धरती पर पड़ती हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई विजय प्राप्त करने वाली देवी (जय लक्ष्मी) सुनहरे तीर चलाती हुई प्रकट हुई हो।
अकादमिक स्पष्टीकरण: 'उषा' (प्रातःकाल) पर 'तीर बरसाने' और 'जय लक्ष्मी' के रूप में उदित होने का मानवीय आरोप है।
भावार्थ: कवि कहता है कि यह नई बेल (लतिका) भी एक नवयौवना स्त्री की भाँति नए पराग रूपी जल से अपनी गागरी (मटका) भरकर ले आई है।
अकादमिक स्पष्टीकरण: लता (बेल) पर गागरी (मटका) भरकर लाने वाली 'पनहारिन' या 'स्त्री' का मानवीकरण किया गया है।
भावार्थ: समुद्र की लहरें उसकी छाती (उर) पर नृत्य कर रही हैं और मीठा गीत गा रही हैं।
अकादमिक स्पष्टीकरण: लहरों पर 'नृत्य करने' (नाचने) और 'गीत गाने' की मानवीय चेष्टाओं का आरोपण है।
भावार्थ: सुमित्रानंदन पंत कहते हैं कि कलियाँ अपनी पंखुड़ियों रूपी दरवाज़े खोलकर झाड़ियों के बीच से मुस्कुरा रही हैं।
अकादमिक स्पष्टीकरण: कलियों का 'दरवाज़ा खोलना' और 'मुस्कुराना' स्पष्ट मानवीकरण है।
हाथ पीले कर लिए हैं, ब्याह मंडप में पधारी॥
भावार्थ: केदारनाथ अग्रवाल कहते हैं कि खेत में लहलहाती पीली सरसों अब बड़ी (सयानी) हो गई है और मानो उसने शादी के लिए अपने हाथ पीले कर लिए हैं तथा मंडप में आ बैठी है।
अकादमिक स्पष्टीकरण: सरसों की फसल पर एक 'विवाह योग्य कन्या' का अत्यंत सुंदर मानवीकरण किया गया है।
अवलोक रहा है बार-बार...
भावार्थ: करधनी के आकार का एक विशाल पर्वत अपने ऊपर खिले हुए हज़ारों पुष्प रूपी आँखों (दृग) को फाड़-फाड़ कर नीचे तालाब में अपना चेहरा देख रहा है।
अकादमिक स्पष्टीकरण: पर्वत का 'आँखें फाड़ना' और दर्पण (तालाब) में स्वयं को 'देखना' मानवीय कृत्य है।
भावार्थ: वृक्षों की कतारें इतनी शांति से खड़ी थीं, जैसे वे इंसानों की तरह छुपकर किसी की 'निजी बातें' सुन रही हों।
अकादमिक स्पष्टीकरण: वृक्षों द्वारा 'निजी बात सुनने' का आरोप विशुद्ध मानवीकरण है।
भावार्थ: जयशंकर प्रसाद कहते हैं कि यह पृथ्वी (धरा) समुद्र रूपी शय्या (सेज) पर एक नई दुल्हन (वधू) की भाँति संकोच और शर्म के साथ सिकुड़ कर बैठी है।
अकादमिक स्पष्टीकरण: धरा (पृथ्वी) पर लज्जाशील 'वधू' (दुल्हन) का अत्यंत कोमल मानवीकरण है।
भावार्थ: वायु के झोंकों से हिलते हुए कम वज़न वाले छोटे पौधे ऐसे प्रतीत होते हैं मानो वे प्रसन्नता से हँस रहे हों।
अकादमिक स्पष्टीकरण: पौधों में 'हँसने' की मानवीय भावना का आरोपण है।
भावार्थ: वर्षा ऋतु के आगमन पर बादलों को आता देखकर गाँव के सबसे पुराने (बूढ़े) पीपल के वृक्ष ने आगे बढ़कर एक वयोवृद्ध व्यक्ति की भाँति अतिथि का स्वागत (जुहार) किया।
अकादमिक स्पष्टीकरण: पीपल के वृक्ष पर 'बुज़ुर्ग व्यक्ति' का तथा उसके द्वारा 'स्वागत करने' (जुहार) का मानवीकरण किया गया है।
भावार्थ: प्रातःकाल (ऊषा) रूपी चतुर स्त्री, आकाश रूपी पनघट पर तारे रूपी घड़ों को डुबो रही है (तारे छिप रहे हैं)।
अकादमिक स्पष्टीकरण: यहाँ 'ऊषा' पर 'चतुर स्त्री' (नागरी) का आरोपण होने से मानवीकरण का सशक्त पुट विद्यमान है।