अलंकार
विशेषोक्ति अलंकार

अर्थालंकार

विशेषोक्ति अलंकार

विशेषोक्ति अलंकार की परिभाषा, पहचान और विभावना से अंतर

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विशेषोक्ति अलंकार

विशेषोक्ति अलंकार की परिभाषा, पहचान और विभावना से अंतर

जहाँ कारण (साधन/Cause) के पूर्णतः उपस्थित होने पर भी कार्य (Action/Effect) के संपन्न न होने का वर्णन किया जाए, वहाँ विशेषोक्ति अलंकार होता है। (सरल: कार्य को पूरा करने वाले सभी साधन मौजूद हैं, किंतु फिर भी वह कार्य पूर्ण नहीं हो रहा।)

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विभावना अलंकार: कारण (साधन) नहीं है ➔ फिर भी कार्य हो रहा है।
विशेषोक्ति अलंकार: कारण (साधन) उपस्थित है ➔ फिर भी कार्य नहीं हो रहा है।
1
उदाहरण
जल बिच मीन पियासी।
मोहि सुनि-सुनि आवै हाँसी॥

भावार्थ: कबीरदास कहते हैं — जल के बीच रहते हुए भी मछली (मीन) प्यासी है, यह सुनकर मुझे बहुत हँसी आती है। (आध्यात्मिक अर्थ: परमात्मा हमारे भीतर है, फिर भी मनुष्य उसे बाहर खोजता है।)
अकादमिक स्पष्टीकरण: प्यास बुझाने के लिए असीमित 'जल' (कारण) उपस्थित है, किंतु फिर भी प्यास बुझने का 'कार्य' संपन्न नहीं हो रहा।

2
उदाहरण
नीर भरे नित प्रति रहें, तऊ न प्यास बुझाई।

भावार्थ: वियोग शृंगार में नायिका के नेत्रों में नित्य-प्रति अश्रु रूपी नीर (जल) भरा रहता है, किंतु फिर भी उसके नेत्रों की प्रिय-दर्शन की प्यास नहीं बुझती।
अकादमिक स्पष्टीकरण: नेत्रों में नीर (कारण) विद्यमान है, परंतु प्यास बुझने का (कार्य) नहीं हो रहा है।

3
उदाहरण
देखो दो-दो मेघ बरसते, मैं प्यासी की प्यासी।

भावार्थ: मैथिलीशरण गुप्त कृत 'साकेत' में उर्मिला विरह-व्यथा में कहती हैं कि मेरे दोनों नेत्र रूपी दो-दो मेघ निरंतर जल बरसा रहे हैं, किंतु मैं अभी भी प्यासी ही हूँ।
अकादमिक स्पष्टीकरण: जल बरसाने वाले दो-दो मेघों (कारण) की उपस्थिति के बावजूद प्यास न बुझना (कार्य का अभाव) विशेषोक्ति को प्रमाणित करता है।

4
उदाहरण
फूलहिं फलहिं न बेत, जद्यपि सुधा बरिसहिं जलद।
मूरख हृदय न चेत, जो गुरु मिलहिं बिरंचि सम॥

भावार्थ: तुलसीदास कहते हैं — यदि बादल (जलद) अमृत (सुधा) की वर्षा भी कर दें, तो भी बाँस (बेत) पर फूल-फल नहीं आते। उसी प्रकार यदि मूर्ख को ब्रह्मा (बिरंचि) के समान श्रेष्ठ गुरु भी मिल जाएँ, तो भी ज्ञान नहीं आता।
अकादमिक स्पष्टीकरण: अमृत की वर्षा तथा ब्रह्मा के समान गुरु की प्राप्ति रूपी 'सशक्त कारण' उपस्थित हैं, किंतु फिर भी फलने-फूलने और ज्ञानी होने का 'कार्य' घटित नहीं हो रहा।

5
उदाहरण
सुनत जुगल कर माल उठाई।
प्रेम बिबस पहिराइ न जाई॥

भावार्थ: सीता स्वयंवर के प्रसंग में, श्री राम को देखकर माता सीता ने दोनों हाथों (जुगल कर) से जयमाला उठा तो ली, किंतु प्रेम और संकोच के वशीभूत होने के कारण पहना नहीं पा रही हैं।
अकादमिक स्पष्टीकरण: माला पहनाने के लिए हाथ और माला (साधन/कारण) दोनों सुलभ हैं, परंतु प्रेम-विवशता के कारण माला पहनाने का 'कार्य' पूर्ण नहीं हो पा रहा।

6
उदाहरण
धन-दौलत के होने पर भी, उसे नींद नहीं आती।

भावार्थ: एक संपन्न व्यक्ति के पास सुख-सुविधाओं के समस्त साधन उपलब्ध हैं, किंतु फिर भी वह सुख की निद्रा से वंचित है।
अकादमिक स्पष्टीकरण: सुखपूर्वक सोने के लिए धन-दौलत और सुविधाएँ (कारण) मौजूद होने पर भी 'नींद आने' का कार्य नहीं हो रहा। अतः यह विशेषोक्ति का सटीक आधुनिक उदाहरण है।