संदेह अलंकार
जहाँ उपमेय और उपमान में रूप, रंग या गुण की अत्यधिक समानता के कारण यह अनिश्चय (दुविधा) बना रहे कि 'यह उपमेय है या उपमान' — वहाँ संदेह अलंकार होता है।
विशेषता: अंत तक संशय बना रहता है, बुद्धि कोई निश्चित निर्णय नहीं ले पाती और कोई क्रिया नहीं होती।
⚡ संदेह vs भ्रांतिमान: संदेह = अनिश्चय अंत तक, कोई क्रिया नहीं। | भ्रांतिमान = भ्रम + क्रिया दोनों।
कि सारी ही की नारी है कि नारी ही की सारी है॥
वाचक: 'कि' (अनेक बार)
व्याख्या: श्रीकृष्ण की कृपा से साड़ी खींचते-खींचते भी समाप्त नहीं होती और लगातार बढ़ती जाती है। साड़ियों के इस अनंत ढेर को देखकर दुःशासन पूरी तरह चकित हो जाता है और अंत तक यह तय नहीं कर पाता कि साड़ी के बीच स्त्री है या स्त्री के भीतर से साड़ी निकल रही है।
बीररस बीर तरवारि सी उघारी है॥
वाचक: 'कैधौं' (क्या / अथवा)
व्याख्या: हनुमान जी की जलती हुई पूँछ की भयंकर अग्नि और उससे उठते धुएँ को देखकर लंकावासी राक्षस निर्णय नहीं कर पाते कि आकाश में बहुत-से विनाशकारी धूमकेतु उदय हो गए हैं, या साक्षात् वीर रस ने अपनी रक्त-रंजित तलवार म्यान से बाहर खींच ली है।
वाचक: 'अथवा'
व्याख्या: प्रिय से दूरी नायिका को मानसिक कष्ट देती है, पर इसी विरह के कारण वह हर पल प्रिय के ध्यान में डूबी रहती है। इसलिए उसका मन इस उलझन में रहता है कि यह वियोग उसके लिए अभिशाप है या फिर उसे प्रिय के और निकट लाने वाला कोई अनूठा वरदान।
अल्प जल में या विकल लघु मीन हैं?
वाचक: 'या'
व्याख्या: नायिका की आँखें आँसुओं से भरी और उदास (मलिन) हैं। इनकी बनावट और उनमें भरे जल को देखकर कवि का मन स्थिर नहीं हो पाता कि ये सचमुच कमल जैसी सुंदर आँखें हैं, या फिर कम पानी वाले किसी पात्र में तड़पती छोटी-छोटी मछलियाँ हैं।
वाचक: 'या'
व्याख्या: यह संदेह अलंकार का सबसे सरल उदाहरण है। नायिका के अत्यंत सुंदर और कांतिमय चेहरे को देखकर प्रेमी असमंजस में पड़ जाता है और तय नहीं कर पाता कि वह प्रियतमा का मानवीय मुख देख रहा है या आकाश में चमकता साक्षात् चंद्रमा।
कैधौं मोतिन की झालरि झलकत है॥
वाचक: 'कैधौं'
व्याख्या: जब सूर्य की किरणें पानी की बूँदों या बादलों के झरोखे से छनकर आती हैं, तो एक अद्भुत झिलमिलाती चमक बनती है। इसे देखकर दर्शक तय नहीं कर पाता कि दिन में ही तारे टूटकर झिलमिला रहे हैं, या आकाश में मोतियों से बनी कोई झालर हवा में हिलने के कारण चमक रही है।
कैधौ उगो मयंका।
वाचक: 'कि' तथा 'कैधौ'
व्याख्या: जब एक सखी अचानक अपनी सुंदर सखी (या नायिका) के चेहरे को देखती है, तो उसकी अलौकिक आभा से चकित रह जाती है और खुद से पूछती है कि यह सचमुच उसकी सखी का कोमल मुख है, या आसमान में चंद्रमा निकल आया है। रूप की अत्यधिक समानता के कारण वह अंत तक संशय में रहती है।
पाप हुआ या पुण्य यह? करूँ हर्ष या सोग।
वाचक: 'या' (दो बार)
व्याख्या: एक व्यक्ति सामने खड़े भूखे इंसान को भोजन कराने के बजाय मंदिर में भगवान शिव को भोग चढ़ा देता है। अब उसका विवेक उसे कचोटता है और वह तय नहीं कर पाता कि ईश्वर की पूजा से यह पुण्य हुआ या भूखे की उपेक्षा से पाप, और इसी वजह से वह पूजा की खुशी मनाए या इंसानियत की हार का शोक।