व्यतिरेक अलंकार
'व्यतिरेक' का शाब्दिक अर्थ है 'आधिक्य' (बढ़-चढ़कर होना)। जहाँ उपमेय को उपमान से श्रेष्ठ बताया जाए और उसका कारण भी स्पष्ट किया जाए, वहाँ व्यतिरेक अलंकार होता है।
काव्य पंक्ति में जब प्रसिद्ध उपमान (चाँद, सोना, पर्वत, मक्खन) की कोई 'कमी' (दोष) बताई जाए और उपमेय का कोई 'गुण' बताकर उसे श्रेष्ठ सिद्ध किया जाए, तो व्यतिरेक अलंकार होता है।
प्रतीप: उपमान को बिना कारण बताए तुच्छ/बेचारा कह दिया जाता है (चाँद बेचारा क्या बराबरी करेगा)।
व्यतिरेक: उपमेय को श्रेष्ठ बताने का ठोस कारण दिया जाता है (चाँद में दाग है, पर मुख बेदाग है)।
निज परिताप द्रवै नवनीता। पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता।।
| उपमेय (श्रेष्ठ) | उपमान | श्रेष्ठता का कारण |
|---|---|---|
| संत हृदय | नवनीत (मक्खन) | मक्खन स्वयं की गर्मी से पिघलता है, संत दूसरों के दुख से |
व्याख्या: कवियों ने संतों के हृदय को मक्खन के समान बताया, पर सही से कह न सके। मक्खन तो अपने ताप से पिघलता है, जबकि पवित्र संत दूसरों का दुःख देखकर द्रवित होते हैं। यह व्यतिरेक का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है।
सीय अंग सखि कोमल कनक कठोर।।
| उपमेय (श्रेष्ठ) | उपमान | श्रेष्ठता का कारण |
|---|---|---|
| सीय अंग (सीता के अंग) | कनक (सोना) | सोना कठोर है, अंग कोमल हैं |
व्याख्या: सीता जी के अंग स्वर्ण के समान सुंदर हैं, किंतु अत्यंत कोमल हैं जबकि सोना कठोर होता है — उपमेय को उपमान से श्रेष्ठ बताया गया है, कारण सहित।
ससि मलीन रबि सीतल लागे।।
| उपमेय (श्रेष्ठ) | उपमान | श्रेष्ठता का कारण |
|---|---|---|
| राजा का प्रताप | सूर्य व चंद्रमा | सूर्य में उतनी गर्मी नहीं, चाँद में उतनी चमक नहीं |
व्याख्या: राजा के यश-प्रताप के आगे चंद्रमा मलिन और सूर्य शीतल लगता है — राजा के प्रताप को दोनों उपमानों से श्रेष्ठ सिद्ध किया गया है।
निष्कलंक है वह सदा, उसमें प्रकट कलंक॥
| उपमेय (श्रेष्ठ) | उपमान | श्रेष्ठता का कारण |
|---|---|---|
| राधा मुख | चंद्र | मुख निष्कलंक है, चंद्र सकलंक (दाग वाला) |
व्याख्या: जिनकी बुद्धि दरिद्र है वही राधा के मुख को चंद्रमा के समान कहते हैं — मुख हमेशा बेदाग है, जबकि चंद्रमा में कलंक दिखता है।
| उपमेय (श्रेष्ठ) | उपमान | श्रेष्ठता का कारण |
|---|---|---|
| साधु | शैल (पर्वत) | पर्वत कठोर होता है, साधु का स्वभाव कोमल |
व्याख्या: सज्जन पर्वतों के समान ऊँचे (महान) होते हैं, किंतु स्वभाव पर्वत जैसा कठोर नहीं बल्कि सुकुमार होता है।
निसि मलीन वह निसि दिन यह बिगसाइ।।
| उपमेय (श्रेष्ठ) | उपमान | श्रेष्ठता का कारण |
|---|---|---|
| सिय मुख | शरद कमल | कमल रात में मुरझाता है, मुख सदा खिला रहता है |
व्याख्या: सीता जी के मुख को शरद ऋतु के कमल के समान कैसे कहा जाए — कमल रात में मलिन (बंद) हो जाता है, जबकि मुख रात-दिन हमेशा खिला रहता है।
| उपमेय (श्रेष्ठ) | उपमान | श्रेष्ठता का कारण |
|---|---|---|
| मुख | शशांक (चंद्रमा) | चाँद घटता-बढ़ता है, मुख सदैव एक-समान सुंदर |
व्याख्या: चाँद की कमी (घटना-बढ़ना) गिनाकर मुख की श्रेष्ठता (सदैव एक-समान रहना) स्थापित की गई है।
| उपमेय (श्रेष्ठ) | उपमान | श्रेष्ठता का कारण |
|---|---|---|
| जन्मभूमि | स्वर्ग | स्वर्ग में केवल सुख है, जन्मभूमि में अपनत्व और माँ का प्यार |
व्याख्या: यह 'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी' का हिंदी रूपांतरण है — जन्मभूमि को स्वर्ग से श्रेष्ठ बताया गया है।
सिय नयनन की समता, पा न सके तेहि रंग॥
| उपमेय (श्रेष्ठ) | उपमान | श्रेष्ठता का कारण |
|---|---|---|
| सिय नयन (सीता के नेत्र) | खंजन पक्षी | खंजन नेत्रों की बराबरी न कर सका, इसलिए तारों में छिप गया |
व्याख्या: खंजन पक्षी उड़कर आकाश में तारों के साथ छिप गए, क्योंकि वे सीता जी के नेत्रों की बराबरी नहीं कर पाए — नेत्रों की सुंदरता इतनी अधिक कि उपमान को हार माननी पड़ी।
| उपमेय (श्रेष्ठ) | उपमान | श्रेष्ठता का कारण |
|---|---|---|
| वह (नायिका का मुख) | चंद | चंद कलंकी है, मुख निकलंक (बेदाग) |
व्याख्या: यह व्यतिरेक का सबसे संक्षिप्त और सटीक सूत्र है — एक ही पंक्ति में उपमान का दोष और उपमेय का गुण बता दिया गया है।