अतिशयोक्ति अलंकार
'अतिशय' (बहुत अधिक) + 'उक्ति' (कथन) → जहाँ किसी व्यक्ति, वस्तु या स्थिति का वर्णन इतना बढ़ा-चढ़ाकर किया जाए कि वह लोक-मर्यादा या वास्तविकता (Reality) की सीमा को पार कर जाए — वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है।
कोई निश्चित वाचक शब्द नहीं होता। पंक्ति पढ़ने पर यदि लगे कि बात 'लॉजिक या विज्ञान' के एकदम विपरीत है या सरासर असंभव है — तो अतिशयोक्ति।
⚡ उत्प्रेक्षा से अंतर: उत्प्रेक्षा में 'मनो/जनु' वाचक होते हैं और संभावना होती है। अतिशयोक्ति में ऐसा कोई वाचक नहीं — बात सीधे असंभव होती है।
लंका सगरी जल गई, गए निसाचर भाग॥
पूँछ में आग लगने से पहले ही पूरी लंका जल गई और राक्षस भाग गए। असंभव बात: आग लगने से पहले ही जलना।
राणा ने सोचा इस पार, तब तक चेतक था उस पार॥
प्रताप अभी सोच ही रहे थे कि नदी कैसे पार करें — तब तक चेतक उस पार पहुँच गया। असंभव बात: सोचने से भी तेज़ घोड़े का दौड़ना।
पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सों पग धोये॥
कृष्ण इतने रोए कि परात का पानी छुआ ही नहीं — आँसुओं से ही सुदामा के पैर धो दिए। असंभव बात: केवल आँसुओं से पैर धुलना।
ताल-तलैया सब भर डाले।
इतना ज़्यादा रोया कि आस-पास के सारे तालाब आँसुओं से भर गए। असंभव बात: रोने से तालाब भरना।
स्वर्ग से मिलने गगन में जा रही॥
साकेत (अयोध्या) की इमारतें इतनी ऊँची हैं कि आसमान में जाकर स्वर्ग से मिल रही हैं। असंभव बात: इमारतों का स्वर्ग तक पहुँचना।
धड़ से जयद्रथ का उधर सिर छिन्न वैसे ही हुआ॥
तीर छूटते ही — उसी क्षण जयद्रथ का सिर धड़ से अलग हो गया। असंभव बात: तीर छूटने और लगने के बीच का समय शून्य।
समुद्र की लहरें इतनी ऊँची उठ रही हैं कि आसमान को चूम रही हैं। असंभव बात: लहरों का आकाश छूना।
लगे उठावन टरहिं न टारा॥
दस हज़ार राजाओं ने एक साथ शिव-धनुष उठाना चाहा — फिर भी वह हिला नहीं। असंभव बात: एक धनुष पकड़ने के लिए 10,000 लोगों का एक साथ खड़ा होना।
शत्रु गिरे पहले ही भू पर।
तीर दुश्मन के शरीर तक पहुँचे भी नहीं — दुश्मन पहले ही डर कर गिर गए। असंभव बात: बाण लगने से पहले शत्रु का गिरना।
म्यान से तलवार बाहर निकलते ही — दुश्मन के प्राण निकल गए। असंभव बात: वार से पहले ही प्राण निकलना।
चढ़ी हिंडोरे सी रहै, लगी उसासन साथ॥
विरह में कमजोर नायिका — साँस लेती है तो 6-7 हाथ आगे, साँस छोड़ती है तो 6-7 हाथ पीछे जाती है। असंभव बात: साँस से पेंडुलम की तरह झूलना।
नित प्रति पून्यौ ही रहै, आनन ओप उजास॥
नायिका के चेहरे की चमक से घर के आस-पास हमेशा पूर्णिमा जैसी रोशनी — असली तिथि पंचांग से जाननी पड़ती है। असंभव बात: चेहरे की चमक से हर रात पूर्णिमा होना।